भारत

लोग गाय माता की सेवा करते-करते ख़ुद भेड़िये बन गए हैं

वह कैसी सोच है जिसे पूरी दुनिया में केवल एक गाय ही रक्षा करने योग्य लगती है. सड़क के किनारे सोया थका-हारा मज़दूर नहीं, पुल के नीचे मिट्टी में पलते दुर्बल बच्चे नहीं, अस्पतालों के बाहर बैठे रोगी नहीं.

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पिछले महीने राजस्थान के अलवर शहर में कथित गोरक्षकों द्वारा पहलू खान की पीट पीट कर हत्या कर दी गई थी.

कहानी कई बार दोहराई गई है. मेवात के पहलू ख़ान जयपुर गए तो थे दुधारू भैंस ख़रीदने, लेकिन वहां पहुंचकर उनका इरादा बदल गया. जब उन्होंने देखा की गाय सस्ती भी है और वह दूध भी अधिक देती है, तो उन्होंने सोचा, क्यों न गाय ही ख़रीदी जाए. किंतु जिन लोगों ने सड़क पर उनका ट्रक रोका, उन्हें पहलू ख़ान के इरादों और उनकी तब्दीलियों में ज़रा भी दिलचस्पी नहीं थी.

वे तो यह सोचना ही नहीं चाहते थे की असल में पहलू ख़ान हैं कौन, वह क्या काम करते हैं, उन्होंने गाय क्यों ख़रीदी है. उन्हें केवल इस जोड़ी, इस युगल में दिलचस्पी थी: मुसलमान और गाय, गाय और मुसलमान. यानी, उनकी दृष्टि में रक्षणीय और राक्षस. हिंसा के जश्न का इससे शानदार निमंत्रण क्या हो सकता है?

ताज्जुब की बात यह नहीं है की इन लोगों ने अपनी गाय माता की इस प्रकार सेवा की कि वे स्वयं इस प्रयत्न में भेड़िये बन गए. यह भी नहीं कि सारथी अर्जुन को दो थप्पड़ मार कर छोड़ दिया और पहलू ख़ान को जान से ही मार डाला. ताज्जुब की बात यह है कि ना तो यह हमारे समय की पहली ऐसी घटना है और ना ही आख़िरी.

सोचने की बात यह है कि ऐसी घटनाओं को हमारे देश के लाखों, करोड़ो लोगों का हार्दिक और मानसिक समर्थन प्राप्त है. करोड़ों लोगों का उत्साह- चाहे वह मूक और अस्पष्ट हो, या ज़ोरदार और कोलाहलपूर्ण- इन घटनाओं को घनिष्ठ सामूहिक सहारा दे रहा है. मानो देश को सुख-शांति की ओर ले जाने का यही सबसे आसान और उचित रास्ता हो. बिना इस समर्थन के, जो शहरों से, गावों से, पुलिस चौकियों से, सरकारी दफ़्तरों से-सभी ओर से गोरक्षकों को बढ़ावा दे रहा है, उनको प्रोत्साहित कर रहा है- ऐसी घटनाएं ना घट सकतीं और ना दोहराई जा सकती थीं.

इस समर्थन और उत्साह का स्रोत कहां है? वह कैसा विचित्र दृष्टिकोण है जिसे सम्पूर्ण सृष्टि में केवल एक गाय ही रक्षणीय प्राणी प्रतीत होती है? सड़क के किनारे सोया थका-हारा मज़दूर नहीं, पुल के नीचे मिट्टी में पलते दुर्बल बच्चे नहीं, अस्पतालों के बाहर बैठे निराश रोगी नहीं- केवल गाय.

किंतु क्या इस प्रकार रक्षणीय बनने में, गाय स्वयं तो लुप्त नहीं हो गई? आख़िर हमें भी सोचना चाहिए. यदि गाय वास्तव में पूज्य है, तो क्यों? इसलिए न कि वह स्वार्थी नहीं है, उदार है, उसका दूध औरों का पोषण करता है, वह धैर्य की मूरत है, अहिंसा का स्थायी रूप है. क्या शांति, उदारता, और अहिंसा की पूजा हिंसा द्वारा की जा सकती है? क्या यह आश्चर्यजनक बात नहीं है? वैसी ही, जैसी कि दरिद्र नारायण की पूजा धन से करना?

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पिछले साल गुजरात के उना में दलित समुदाय के कुछ लोगों को मरी हुई गाय की खाल उतारने की वजह से सरेआम पिटाई की गई थी.

वास्तव में शायद ऐसी हरकतों का गाय की पूजा से कोई संबंध है ही नहीं. बल्कि गाय के सभी गुणों को मानो नज़रअंदाज़ कर, उनका तिरस्कार कर, हिंदू समाज के युवकों को यह सिखाया जा रहा है कि मुसलमान का क़त्ल वीरता का लक्षण है: कि यह क़त्ल वैध है, उचित है, सराहनीय है. ग़ैर-कानूनी तो है, किंतु क़ानून आख़िर में बहुमत के वश में किया जा सकता है.

क्या इस धारणा से हिंदू समाज को स्वयं परेशान नहीं होना चाहिए? मुसलमान पर तो जो गुज़री, सो गुज़री. लेकिन जो आदमी, जो युवक, इस प्रकार की गुंडागर्दी और हत्याबाजी का शौक़ीन बन जाए, जिसके मन में हिंसात्मक प्रवृत्ति घर बना ले, वह एकांत में अपने साथ क्या बर्ताव करेगा? वह अपनों से कैसे पेश आएगा? रात में उसके सपनों का क्या रंग होगा? जब वह अपने बारे में सोचेगा, तो क्या वह पूर्ण विश्वास से अपने-आप को गाय का रक्षक ही मानेगा? या फिर किसी मोड़ पर उसने सच्चाई और विशवास से नाता ही तोड़ दिया है?

अक्सर सुनने में आता है कि पहलू ख़ान की हत्या तथा गोरक्षा के शोर को एक कुटिल राजनीति के संदर्भ में समझना चाहिए. कहा जाता है कि यह केवल सत्ता का खेल है, वोट जमा करने का साधन है. यदि हम ये मान भी लें, फिर भी यह प्रश्न उठता है: ऐसे साधनों से वोट क्यों और कैसे जमा होते हैं? क्या यह वही पुराना, घिसा-पिटा नाटक है जो शत्रु को घोषित कर, उसकी गद्दारी और क्रूरता की कथा दोहरा-दोहरा कर, समाज को एकत्र और संगठित करने में समर्थ बनता है?

कहीं ऐसा तो नहीं कि आज की नाराज़गी मुसलमान से हो ही ना? वह तो हिंदुओं के क्रोध का ऐतिहासिक शिकार है, सो बार बार क्रोध का लक्ष्य बन जाता है. हिंदू समाज को इस जाने-पहचाने, परिचित क्रोध की मानो आदत पड़ गई हो, और हर आदत की तरह, इससे भी लोगों को लगाव-सा हो गया है. जब-जब यह क्रोध सुलगता है, यूं प्रतीत होता है कि हम अपने किसी पुराने, स्वाभाविक, परिचित स्थान पर पहुंच गए हैं. लेकिन इस क्रोध की आत्मीयता, इसकी ज़हरीली मिठास के पीछे शायद कई और अस्पष्ट और बेनामी क्रोध दुबक कर बैठे हों.

यूं तो क्रोध से लपकती हिंसा के बहुत से कारण नज़र आते हैं- बेरोज़गारी, आर्थिक विषमता, मर्दानगी के क्रूर और प्रभावशाली रूप से गहरी लगन, इत्यादि. लेकिन जिस कारण के बारे में मैं सोच रही हूं वह शायद नज़र नहीं आता. वह हमारे अंतकरण में इस प्रकार छिपा है कि हम स्वयं उस से आंख चुराते हैं.

मुझे लगता है कि एक दहकता, विनाशक क्रोध शायद ऐसा है जिसके स्रोत पर स्वयं गाय ही खड़ी है. इस क्रोध को स्वयं गाय का ही रूप सुलगाता है- वह रूप जो अब केवल एक प्रतीक है, केवल एक चिन्ह, एक ऐसे धर्म का, जिसके पास चिन्ह के अलावा मानो कुछ बचा ही ना हो. ना करुणा, ना बंधुत्व, ना सत्य, ना ईश्वर. सिर्फ़ कुछ बिखरे हुए प्रतीक जिनका खोखलापन बार-बार चुभता है; क्रूरता और विनाश की ओर खींचता है: गाय, मंदिर, तिलक, जय-जयकार.

क्या यह स्पष्ट नहीं है की इन प्रतीकों में अब धर्म नहीं बसता? इनमें बसता है शायद एक भटकता हुआ स्वाभिमान, शायद इतिहास की कठिन सच्चाइयों का भय, और ज़ुल्म की आतंरिक स्वीकृति. जहां देखो, इन प्रतीकों को घेरे हुए योद्धा नज़र आते हैं. हज़ारों जोशीले योद्धा- किंतु इनमें उपासक कहां हैं?

जब धर्म और युद्ध में कोई अंतर ही न रह जाए, तो उसे धर्मयुद्ध नहीं कहना चाहिए. बल्कि उसे धर्म का अंत कहना चाहिए, और युद्ध की विजय- उस असीम, असह्य, और अनंत युद्ध की, जो दुर्बल और अल्पसंख्यक की भयानक तलाश में धरती के सभी प्राणियों को त्रस्त कर रहा है.

(सिमोना साहनी आईआईटी दिल्ली में एसोसिएट प्रोफेसर हैं.)