भारत

अपनी सरकार से कहें कि हमारे फैसले खेलने के लिए नहीं हैं: जस्टिस आरएफ नरीमन

सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस आरएफ नरीमन ने एक मामले की सुनवाई करते हुए सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता से कहा कि कृपया अपनी सरकार को सबरीमाला मामले में सुनाए गए असहमति के फैसले को पढ़ने के लिए कहें, जो बहुत ही महत्वपूर्ण है…..हमारा फैसला खेलने के लिए नहीं है.

जस्टिस आरएफ नरीमन. (फोटो: यूट्यूब)

जस्टिस आरएफ नरीमन. (फोटो: यूट्यूब)

नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस आरएफ नरीमन ने शुक्रवार को सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता को लताड़ लगाते हुए कहा कि सरकार सुप्रीम कोर्ट के फैसलों से नहीं खेल सकती है.

जस्टिस नरीमन ने सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता से कहा, ‘कृपया अपनी सरकार को सबरीमला मामले में गुरुवार को सुनाये गये असहमति के फैसले को पढ़ने के लिए कहें, जो बहुत ही महत्वपूर्ण है…..हमारा फैसला खेलने के लिए नहीं है. अपनी सरकार से कहिए कि हमारा फैसला अडिग है.’

बता दें कि, जस्टिस नरीमन ने अपनी और जस्टिस धनंजय वाई. चन्द्रचूड़ की ओर से असहमति का आदेश लिखा था.

जस्टिस नरीमन और जस्टिस डीवाई चन्द्रचूड़ सबरीमला मामले की सुनवाई करने वाली पांच सदस्यीय संविधान पीठ के सदस्य थे ओर उन्होंने सबरीमला मंदिर में सभी आयु वर्ग की महिलाओं को प्रवेश की अनुमति देने संबंधी सितंबर, 2018 के शीर्ष अदालत के फैसले पर पुनर्विचार की याचिकाओं को खारिज करते हुए बृहस्पतिवार को बहुमत के फैसले से असहमति व्यक्त की थी.

जस्टिस नरीमन ने मेहता से यह टिप्पणी तब की, जब न्यायालय मनी लॉन्ड्रिंग के मामले में कांग्रेस के नेता डीके शिवकुमार को जमानत देने के दिल्ली हाईकोर्ट के फैसले को चुनौती देने वाली प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) की अपील पर सुनवाई कर रहा था. न्यायालय ने इस मामले में प्रवर्तन निदेशालय की अपील खारिज कर दी.

लाइव लॉ के अनुसार, शिवकुमार के मामले की सुनवाई वाली पीठ में जस्टिस नरीमन के साथ जस्टिस रविंद्र भट्ट भी थे. पीठ ने शुरू में खुद ही ईडी की याचिका पर सुनवाई करने पर अनिच्छा जताई थी.

हालांकि, जब सॉलिसिटर जनरल पीठ से लगातार मामले को खारिज न करने की अपील करते रहे तब जस्टिस नरीमन सुप्रीम कोर्ट के फैसले के अनुपालन को लेकर टिप्पणी की.

जस्टिस नरीमन ने सबरीमाला समीक्षा मामले पर अपने असहमति के फैसले से प्राधिकारियों को अवगत कराने के लिए कहा, जहां पर उन्होंने कहा था कि सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का अनुपालन अनिवार्य है.

सबरीमाला समीक्षा मामले में जस्टिस नरीमन ने जो टिप्पणी की थी वह कुछ समूहों द्वारा की गई हिंसा के संबंध में थी जिसमें वे सबरीमाला मंदिर में 10 से 50 साल आयु वर्ग की महिलाओं का प्रवेश रोक रहे थे.

जस्टिस नरीमन ने सबरीमाला समीक्षा मामले में असहमति के फैसले को सुनाते हुए कहा था, ‘संविधान ने सभी विभागों की यह जिम्मेदारी तय की है कि वे इस अदालत के फैसले को किसी भी तरह लागू करें. कानून का शासन स्थापित करने के लिए ऐसा कर्तव्य तय किया गया है. अगर अदालत के फैसलों को लागू करवाने वाले उसे लागू करने से अपनी असहमति जताएंगे तो कानून का शासन नहीं रह जाएगा.’

जस्टिस नरीमन ने कहा कि भले ही नागरिकों को संवैधानिक रूप से फैसलों की आलोचना का अधिकार हो लेकिन उन्हें सर्वोच्च अदालत के आदेशों या निर्देशों का उल्लंघन करने या उल्लंघन के लिए उकसाने की इजाजत नहीं दी जा सकती है.

(समाचार एजेंसी भाषा से इनपुट के साथ)