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महाराष्ट्र के राज्यपाल को मिला समर्थन पत्र कल सुबह 10:30 बजे तक पेश करे सरकार: सुप्रीम कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट ने भाजपा के देवेंद्र फड़णवीस को शपथ ग्रहण कराने के महाराष्ट्र के राज्यपाल के फैसले को रद्द करने संबंधी शिवसेना-एनसीपी-कांग्रेस की याचिका पर रविवार को सुनवाई के दौरान यह आदेश दिया.

New Delhi: A view of the Supreme Court of India in New Delhi, Monday, Nov 12, 2018. (PTI Photo/ Manvender Vashist) (PTI11_12_2018_000066B)

सुप्रीम कोर्ट (फोटो: पीटीआई)

नई दिल्ली:  सुप्रीम कोर्ट ने सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता को महाराष्ट्र में राष्ट्रपति शासन निरस्त कर देवेंद्र फड़णवीस की सरकार बनाने की सिफारिश करने वाले राज्यपाल के पत्रों को सोमवार सुबह अदालत में पेश करने का आदेश दिया है.

छुट्टी के दिन विशेष सुनवाई में जस्टिस एनवी रमन, जस्टिस अशोक भूषण और जस्टिस संजीव खन्ना की पीठ ने देवेंद्र फड़णवीस को मुख्यमंत्री पद की शपथ दिलाने के महाराष्ट्र के राज्यपाल के निर्णय को चुनौती देने वाली शिवसेना-एनसीपी-कांग्रेस की याचिका पर रविवार को केंद्र और महाराष्ट्र सरकार को नोटिस जारी किए.

पीठ ने मुख्यमंत्री फड़णवीस और उप मुख्यमंत्री अजित पवार को भी नोटिस जारी किया है.

सुप्रीम कोर्ट ने राज्यपाल भगत सिंह कोश्यारी के पत्र पेश करने के लिए दो दिन का समय मांगने के मेहता के अनुरोध को अनसुना कर दिया.

वरिष्ठ वकील कपिल सिब्बल और एएम सिंघवी ने संयुक्त गठबंधन की तरफ से पेश होते हुए पीठ को बताया कि शक्ति परीक्षा आज ही कराया जाना चाहिए ताकि यह पता चल सके कि फड़णवीस के पास बहुमत है या नहीं.

उन्होंने कहा कि चुनाव के बाद हुए शिवसेना-एनसीपी-कांग्रेस के गठबंधन के पास सदन में 288 सदस्यों का समर्थन प्राप्त है. सिब्बल ने मंत्रिमंडल की बैठक के बिना राष्ट्रपति शासन हटाए जाने को अजीब बताया है. वहीं सिंघवी ने कहा कि यह ‘लोकतंत्र की हत्या’ है.

भाजपा के दो विधायकों और कुछ निर्दलीय विधायकों की ओर से पेश होते हुए वरिष्ठ वकील मुकुल रोहतगी ने कहा कि यह याचिका बॉम्बे हाईकोर्ट में दायर होनी चाहिए.

सिब्बल ने कहा कि राज्यपाल ने सत्तारूढ़ पार्टी को बहुमत साबित करने के लिए 30 नवंबर तक का जो समय दिया है, उसका मतलब ‘कुछ और’ है. उन्होंने कहा, ‘यह लोकतंत्र के साथ पूरी तरह से ‘धोखा और उसकी हत्या’ है कि सरकार बनाने की मंजूरी तब दे दी गई जब एनसीपी के 41 विधायक उनके साथ नहीं हैं.’

सिब्बल ने कहा, ‘अगर देवेंद्र फड़णवीस के पास बहुमत साबित करने के लिए संख्या है तो उन्हें सदन में साबित करने दें वरना हमारे पास सरकार बनाने के लिए संख्या है.’ सिंघवी ने कहा कि एनसीपी के 41 विधायक शरद पवार के साथ हैं.

वहीं शीर्ष अदालत ने कहा कि इसमें दो राय नहीं है कि शक्ति परीक्षण बहुमत साबित करने का सबसे अच्छा तरीका है.

रोहतगी ने कहा कि कैसे कोई राजनीतिक पार्टी मौलिक अधिकारों के उल्लंघन के लिए अनुच्छेद 32 के तहत न्यायालय का दरवाजा खटखटा सकती है.

सिंघवी ने इस दौरान उत्तराखंड में कांग्रेस सरकार की बर्खास्तगी जैसे मामलों का हवाला देते हुए कहा कि सदन में शक्ति परीक्षण ही सर्वश्रेष्ठ है. उन्होंने कर्नाटक मामले में न्यायालय के 2018 के फैसले का हवाला देते हुए कहा कि शक्ति परीक्षण का आदेश दिया गया था और कोई गुप्त मतदान नहीं हुआ था.

रोहतगी ने एनसीपी की याचिका का विरोध किया. उन्होंने पीठ से कहा, ‘तीनों पार्टियों को समय दिया गया था लेकिन उन्होंने सरकार नहीं बनाई, इसलिए फड़णवीस को बहुमत साबित करने दें क्योंकि कोई जल्दबाजी नहीं है.’

रोहतगी ने कहा कि राज्यपाल का आदेश दायर नहीं किया गया और संयुक्त गठबंधन की याचिका बिना किसी दस्तावेज की है .

उन्होंने कहा कि राज्यपाल या राष्ट्रपति के पास अनुच्छेद 361 के तहत कुछ कार्य स्वतंत्रता और छूट होती है जिसके तहत वह दावा करने वाले व्यक्ति को मुख्यमंत्री या प्रधानमंत्री चयनित कर सकते हैं.

रोहतगी ने अपने तर्कों का समापन करते हुए कहा, ‘सभी पार्टी को याचिका का जवाब देने के लिए कुछ समय मिलना चाहिए और हमें रविवार शांति से बिताने दें.’

बता दें कि, महाराष्ट्र की राजनीति में शनिवार की सुबह हुए एक अप्रत्याशित घटनाक्रम में, भाजपा नेता देवेंद्र फड़नवीस ने महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री के रूप में शपथ ले ली थी. वहीं, एनसीपी नेता और  शरद पवार के भतीजे अजीत पवार ने उनके साथ उप मुख्यमंत्री पद की शपथ ले ली थी.

इससे पहले एनसीपी नेता शरद पवार ने शुक्रवार शाम घोषणा की थी कि शिवसेना-एनसीपी-कांग्रेस के बीच एक समझौता हुआ है कि उद्धव ठाकरे अगले पांच साल के लिए मुख्यमंत्री होंगे, जो गठबंधन के सर्वसम्मत उम्मीदवार थे.

अजीत पवार के इस कदम के बाद शरद पवार ने ट्वीट कर साफ किया कि महाराष्ट्र सरकार बनाने के लिए भाजपा को समर्थन देने का अजीत पवार का निर्णय उनका व्यक्तिगत निर्णय है न कि एनसीपी का. हम रिकॉर्ड पर कहते हैं कि हम उनके इस फैसले का समर्थन नहीं करते हैं.

इसके बाद शरद पवार ने एनसीपी विधायक दल की बैठक करते हुए शनिवार देर रात अजीत पवार से संसदीय दल के नेता का पद और व्हिप जारी करने का अधिकार छीन लिया. इसके साथ ही कुछ विधायकों को छोड़कर अजीत पवार के साथ गए अधिकतर विधायक शरद पवार के खेमे में वापस लौट आए.

(समाचार एजेंसी भाषा से इनपुट के साथ)