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सच कुछ भी हो, मीडियावाले वही अर्थ निकालेंगे जो उन्हें पसंद हो

अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय (एएमयू) में हिंदुओं पर रोज़ा थोपने की बात झूठी है, लेकिन यह झूठ ही चैनल के करोड़ों दर्शकों के लिए असली सच है. एएमयू के हिंदू छात्र लाख खंडन करते फिरें, संदेश यही जाएगा कि वे किसी दबाव में ऐसा कर रहे हैं.

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उत्तर-सत्य माने पोस्ट ट्रुथ. यह शब्द आपके कानों में भी पड़ा होगा. कुछ लोग सोचते हैं कि यह पश्चिम से आया कोई नया फ़रेब है. वैसे ही जैसे, उनके लेखे, उत्तर-आधुनिकता, उत्तर-मार्क्सवाद, उत्तर-स्त्रीवाद वगैरह थे. लेकिन उत्तर-सत्य एक हक़ीक़त है. एक ऐसी हक़ीक़त, जिसे हम आज भी जी रहे हैं, और जो हमारे आने वाले कल को भी तय कर रही है.

उत्तर सत्य एक ऐसी चीज़ है, जो सच होकर भी सच नहीं होती. झूठ होकर भी झूठ भी नहीं होती. यह सच की एक विशेष प्रकार की व्याख्या होती है. इस व्याख्या के बाद सच, सच नहीं रह जाता, लेकिन झूठ भी नहीं हो जाता. फिर मीडिया के महामायावी देव आपको मजबूर कर देंगे कि आप उस विशेष व्याख्या को पूर्ण सत्य मान लें. आप लाख सर पटक कर भी उसे झूठ साबित नहीं कर पाएंगे. सच चाहे कुछ भी हो, मीडियादेव उससे ठीक वही अर्थ निकाल कर दिखा देंगे, जो उन्हें पसंद हो. किसी सत्य घटना का बाद में निकाला गया और जनमानस में जमाया गया यह मनमाना अर्थ ही उत्तर-सत्य कहलाता है.

इस उत्तर-सत्य के सहारे वे सत्ताधीशों के हर पाप को पुण्य में बदल सकते हैं. इसी के सहारे वे अपनी पसंद की सरकारें बना सकते हैं और उन्हें अपने हिसाब से चला भी सकते हैं. सत्य को उत्तर सत्य में बदलने की कोशिश हमेशा होती रही है, लेकिन मीडिया के महाबली होने के इस ज़माने में यह जितना आसान हो गया है, उतना पहले कभी नहीं था. अगर अंग्रेज़ों के पास मीडिया के ऐसी ताक़त होती तो वे निश्चय ही भगत सिंह को भारतीय जनता का दुश्मन और एक दुर्दांत आतंकवादी मनवा ले जाते.

पिछले कुछ दिनों में भारतीय मीडिया में उत्तर-सत्य के कई बेहतरीन नमूने देखने को मिले. कश्मीर में बर्फ़बारी के पिछले मौसम में पत्थरबाजी में आई कमी को नोटबंदी की कामयाबी के सबूत के रूप में पेश किया. सभी जानते हैं कि यह मौसम हर साल कश्मीर में कदरन शांति का समय होता है. लेकिन इस साल की शांति को नोटबंदी से जोड़ ‘साबित’ किया जा सकता था कि पत्थरबाजी का मुख्य कारण पाकिस्तान से आने वाले पांच सौ रूपये के नोट थे! लगे हाथ यह भी साबित हो रहा था कि नोटबंदी देश के लिए बेहद ज़रूरी थी.

पिछले साल जेएनयू में हुई नारेबाजी की एक घटना को आज तक जेएनयू के देशद्रोह और आतंकवाद का अड्डा बन जाने के रूप में पेश किया जाता है. बावजूद इसके कि उस घटना की तफ़सीलें अब तक अस्पष्ट है. आज तक किसी को पुख़्ता जानकारी नहीं है कि भारत विरोधी नारे लगाने वाले आख़िर थे कौन और उनका मक़सद क्या था.

बावजूद इसके कि जेएनयू दुनिया में, विश्वविद्यालयों की एक रैंकिंग के अनुसार आज भी भारत का नम्बर एक विश्वविद्यालय है. उठाने वालों ने जेएनयू के बारे में प्रचारित इस उत्तर-सत्य का भरपूर सियासी फ़ायदा उठाया.

इन दिनों मीडियादेवों की मेहरबानी अलीगढ़ मुस्लिम यूनीवर्सिटी (एएमयू) पर हुई है.

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अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय. (फोटो साभार: इंडिया विज़िट आॅनलाइन)

इसका एक नमूना है एबीपी न्यूज़ का ‘घंटी बजाओ’ कार्यक्रम, जो तीस मई को प्रसारित किया गया. यह कार्यक्रम तथाकथित सामाजिक मुद्दों पर जागरूकता पैदा करने के उद्देश्य से चलाया जाता है. इस एपिसोड में सोशल मीडिया पर कथित रूप से वायरल हो रही एक ख़बर की जांच-पड़ताल करने का दावा किया गया है. ख़बर यह थी कि अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय में हिन्दू छात्रों से जबरन रोज़ा रखवाया जा रहा है.

ऐसी बे-सिर-पैर की बकवासें सोशल मीडिया पर रोज़ पैदा होती और अपनी मौत मर जाती हैं. देश में हर तरह के दौर आए गए, लेकिन एएमयू के भीतर साम्प्रदायिक तनाव की ख़बर कभी नहीं आई. यह ज़रूर है कि रमज़ान के महीने में मेस की समय सारिणी बदल जाती है. नाश्ता सहरी के साथ दिया जाता है और लंच इफ़्तार के साथ. लेकिन इस दौरान किसी के खाने-पीने पर कोई रोक नहीं होती.

एएमयू में सभी मुसलमान भी रोज़े नहीं रखते. आसपास की कैंटीनों और ढाबों में खाने-पीने का सामान मिलता रहता है, भले ही उनके सामने एक पर्दा लटका दिया जाता है. पर्दा इसलिए कि किसी रोज़ेदार की नज़र जीमते हुए लोगों पर न जाए. खाते-पीते लोगों को देख कर उसकी भूख न भडक उठे.

ये सारी बातें मैं अपने अनुभव से जानता हूं. मैंने एएमयू में बारह साल बिताए हैं. रमज़ान का महीना बेहद सुकून और सौहार्द्र का महीना होता है. इफ्तारों में ग़ैरमुसलमानों का उत्साहपूर्वक स्वागत किया जाता है. हिंदू भी इफ्तारों का आयोजन करते हैं, और कुछ लोग शौकिया एकाध दिन का रोज़ा भी रख लेते हैं.

कल्पना की किसी भी उड़ान से धार्मिक सौहार्द के इस माहौल को साम्प्रदायिक तनाव के वातावरण का रूप नहीं दिया जा सकता. ऐसा वही कर सकता है, जो सोच ही नहीं सकता कि हिंदू मुसलमान कहीं प्यार से भी रह सकते हैं. एबीपी के पत्रकारों ने कार्यक्रम का जो शीर्षक बनाया, उसके पीछे ऐसा ही कोई दिमाग़ रहा होगा.

सवाल उठाया गया कि क्या एएमयू में हिंदुओं पर इस्लाम थोपा जा रहा है, क्या उन्हें ज़बरन रोज़ा रखवाया जा रहा है! पत्रकार ने लंच के वक़्त मेस का दौरा किया और पाया कि वहां सन्नाटा छाया था. झट से उसने ताईद कर दी कि हिंदुओं को भूखा रखा जा रहा है. साबित हुआ कि वहां हिंदुओं को ज़बरन मुसलमान बनाया जा रहा है!

यह अलग बात है कि जैसे ही यह इल्ज़ाम एएमयू प्रशासन की जानकारी में आया, उसने परम्परा तोड़ कर ग़ैर-मुसलमान छात्रों के लिए दोपहर के वक़्त भी भोजन मुहैया करने का फ़ैसला ले लिया. चैनल की नज़र में उसका यह फ़ैसला ही इस बात का पक्का सबूत बन गया कि सचमुच हिंदुओं पर रोज़े थोपे जा रहे थे!

दोपहर में मेस का बंद होना सत्य था, लेकिन इसके पीछे हिंदुओं पर रोज़े थोपने की योजना का होना उत्तर-सत्य है. इस उत्तर-सत्य ने सौहार्द्र को तनाव और संघर्ष में बदल दिया. चैनल ने विश्वविद्यालय के इंतज़ाम को अपनी जीत के रूप में पेश किया. यह जीत एक ऐसे ‘संघर्ष’ में पाई गई, जिसका कोई अस्तित्व ही नहीं था. लेकिन यह उत्तर-सत्य ही चैनल के करोड़ों दर्शकों के लिए एमयू का असली सच है. एएमयू के हिंदू छात्र लाख खंडन करते फिरें, संदेश यही जाएगा कि वे किसी दबाव में ऐसा कर रहे हैं.

उदाहरण के तौर पर बेगम सुलतान जहां छात्रावास में रहने वाले क़ानून की छात्रा रश्मि ने फेसबुक पर इन बेतुके इल्ज़ामों का मज़ाक उड़ाया है. उसने लिखा है कि रमज़ान के दिनों में सहरी-इफ्तार के चलते ग़ैर-मुसलमानों का खाना-पीना कुछ ज़्यादा ही हो रहा है. लंच भी बाजाप्ता मिल रहा है, भले ही छात्रों की संख्या कम होने के कारण मेस सामान्य रूप से काम न कर रहा हो.
चैनल को इस पतित चालबाजी से क्या हासिल होता है? उसे हिंदू आहत भावना को सहलाने का मौक़ा मिलता है, जिससे हिंदू सोलिडैरिटी के इस ज़माने में उसकी टीआरपी बढ़ती है. साथ ही हिंदू-मुस्लिम विद्वेष की राजनीति को मज़बूती मिलती है, जो हिंदू सोलिडैरिटी को और आगे ले जाता है.

ताज़ातरीन ख़बर यह है कि एएमयू में हिंदुओं पर इस्लाम थोपने के ख़िलाफ़ अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद का उग्र विरोध प्रदर्शन जारी है. उत्तर-सत्य ने अपना काम कर दिया है. अब सत्य के लिए अपनी खोई हुई अस्मिता की तलाश करना बेहद बेहद चुनौतीपूर्ण होगा.

(लेखक दिल्ली विश्वविद्यालय में प्रोफेसर हैं.)