कैंपस

‘जब 250 बच्चों के शिक्षा की व्यवस्था नहीं हो रही, तब करोड़ों बच्चों के भविष्य का क्या होगा?’

जेएनयू में फीस बढ़ोतरी के ख़िलाफ़ चल रहे विरोध के बीच भारतीय जनसंचार संस्थान में भी फीस बढ़ाने को लेकर विरोध शुरू हो गया है. बीते 10 सालों में दोगुनी से अधिक बढ़ चुकी फीस को कम करने की मांग को लेकर संस्थान के छात्र पिछले तीन दिनों से धरने पर बैठे हैं.

IIMC Fee Protest Twitter

फोटो साभार: ट्विटर

नई दिल्ली: दिल्ली के जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (जेएनयू) में छात्रावास शुल्क में बढ़ोतरी के खिलाफ चल रहे विरोध प्रदर्शन के बीच मंगलवार से विश्वविद्यालय परिसर में स्थित भारतीय जनसंचार संस्थान (आईआईएमसी) में फीस बढ़ोतरी को लेकर विरोध शुरू हो गया.

आईआईएमसी में छात्र मंगलवार से ही संस्थान की बढ़ती फीस के खिलाफ विरोध प्रदर्शन कर रहे हैं और धरने पर बैठ गए हैं. कैंपस परिसर में उनका यह धरना दिन-रात चल रहा है. मालूम हो कि जेएनयू में छात्रावास शुल्क में बढ़ोतरी के खिलाफ बीते कई हफ़्तों से विरोध जारी है.

छात्रों का कहना है कि उनका विरोध प्रदर्शन भारी शिक्षण शुल्क और असंगत छात्रावास तथा भोजनालय शुल्क के खिलाफ है. उन्होंने कहा कि चूंकि आईआईएमसी एक सरकारी संस्थान है, इसे देखते हुए यह शुल्क बहुत अधिक है.

इसके साथ ही छात्र-छात्राएं लाइब्रेरी को 24 घंटे खोलने, रीडिंग रूम उपलब्ध कराने, छात्राओं के वॉशरूम में सैनेटरी नैपकिन वेंडिंग मशीन लगाने, कर्फ्यू टाइमिंग खत्म करने, मेस की व्यवस्था दुरुस्त करने, जिम खोलने की भी मांग कर रहा हैं.

हिंदी पत्रकारिता के छात्र राजन कहते हैं, ‘रेडियो और टीवी पत्रकारिता की फीस 1,68,000 रुपये, विज्ञापन एवं जनसंपर्क की फीस 1,30,000 रुपये और हिंदी एवं अंग्रेजी पत्रकारिता की फीस 95,500 रुपये हो गई है. इसमें हर साल 10 फीसदी की बढ़ोतरी हो रही है. पिछले तीन सालों में कई कोर्स की फीस दोगुनी से भी अधिक बढ़ गई है.’

इस बारे में सवाल करने पर आईआईएमसी के एक शीर्ष अधिकारी ने द वायर  को बताया, ‘साल 2006 में लागू हुए छठे वित्त आयोग की सिफारिशों के अनुसार आईआईएमसी कर्मचारियों का वेतन बढ़ाने की बात आई, तो तत्कालीन सरकार ने संस्थान को 30 फीसदी राजस्व खुद जुटाने का लक्ष्य दिया और इसके साथ ही साल 2008 से सालाना 10 फीसदी फीस बढ़ोतरी का प्रावधान कर दिया.’

उन्होंने कहा, ‘इस शैक्षणिक सत्र की शुरुआत से पहले बीते 30 मई को हुई कार्यकारी परिषद की बैठक में सालाना 10 फीसदी फीस बढ़ोतरी के प्रावधान पर रोक लगा दी गई. अब हर साल समीक्षा के बाद फीस बढ़ोतरी का फैसला किया जाएगा. प्रशासन इस फैसले से छात्रों को अवगत नहीं करा सका जिसके कारण यह गलतफहमी पैदा हुई. उन्होंने कहा, सस्ती शिक्षा उपलब्ध होनी चाहिए इसमें कोई दोराय नहीं है लेकिन यह एक बड़ा मुद्दा है.’

हालांकि, द वायर  को मिले दस्तावेजों से पता चलता है कि सालाना 10 फीसदी फीस बढ़ोतरी पर कार्यकारी परिषद की ओर से लगाई गई रोक केवल शैक्षणिक सत्र 2020-21 के लिए है और आगे इसमें बढ़ोतरी की पूरी संभावना है.

(फोटो: द वायर)

(फोटो: द वायर)

एक छात्रा बताती हैं, ‘यह सिर्फ फीस बढ़ोतरी की बात नहीं है बल्कि फीस के पूरे ढांचे को लेकर हमारा विरोध है. 10 फीसदी फीस बढ़ोतरी को हटा भी दें तो क्या कोई गरीब-मजदूर का बच्चा डेढ़ लाख की फीस देकर यहां पढ़ पाएगा.’

राजन कहते हैं, ‘2014-15 में उर्दू पत्रकारिता की फीस 15,000 रुपये थी जो अब बढ़कर 55,000 हजार रुपये हो गई है. प्रशासन तर्क देता है कि मराठी और मलयालम जैसी अन्य स्थानीय भाषाओं की फीस के कारण उर्दू पत्रकारिता की भी फीस बढ़ानी पड़ी. अब अगर कल हिंदी पत्रकारिता को आधार बनाते हुए उर्दू पत्रकारिता की फीस बढ़ाई जाए, तब तो वह 95,000 हजार हो जाएगी.’

हालांकि, इस बारे में आईआईएमसी के एक वरिष्ठ अधिकारी ने कहा कि साल 2014-15 में उर्दू पत्रकारिता का सिर्फ सर्टिफिकेट कोर्स चलता था लेकिन जब उसे डिप्लोमा पाठ्यक्रम के रूप में अपनाया गया, तब उसकी फीस में बढ़ोतरी हो गई. वहीं, उसकी फीस मराठी और मलयालम जैसी स्थानीय भाषाओं की फीस से कम नहीं किया जा सकता था.

आईआईएमसी के दस सालों की फीस का आंकड़ा

(सभी आंकड़े रुपये में, स्रोत: आईआईएमसी प्रॉस्पेक्टस)

बीते कई सालों की तुलना करके देखें, तो सामने आता है कि आईआईएमसी की फीस पिछले दस सालों में दोगुनी से अधिक बढ़ चुकी है.

जहां साल 2009-10 में रेडियो और टीवी पत्रकारिता के डिप्लोमा पाठ्यक्रम की फीस 76,000 रुपये, विज्ञापन तथा जनसंपर्क के लिए यह फीस 48,000 रुपये थी. हिंदी और अंग्रेजी पत्रकारिता की फीस 34,000 रुपये थी.

वहीं, साल 2019-20 में रेडियो और टीवी पत्रकारिता के डिप्लोमा पाठ्यक्रम की फीस 1,68,500 रुपये, विज्ञापन तथा जनसंपर्क की फीस 1,31,500 रुपये, हिंदी और अंग्रेजी पत्रकारिता की फीस 95,500 रुपये हो गई है.

इस समय छात्रावास और भोजनालय का शुल्क महिलाओं के लिए लगभग 6,500 रुपये प्रति माह और पुरुषों के लिए 4,800 रुपये प्रति माह है.

राजन कहते हैं, ‘साल 2012 के बाद से सभी बच्चों को हॉस्टल नहीं मिलता है. हम मानते हैं कि रिज एरिया होने के कारण यहां इतनी आसानी से हॉस्टल नहीं बन सकता है लेकिन प्रशासन ने कभी भी उन्हें यहां से बाहर रखने के बारे में भी नहीं सोचा, जबकि देश के कई संस्थान अपने बच्चों को कैंपस से बाहर भी रहने की सुविधा उपलब्ध कराते हैं.’

बता दें कि एक घटना के बाद आईआईएमसी में सिर्फ छात्राओं के लिए हॉस्टल की व्यवस्था लागू कर दी गई जो करीब ढाई दशक तक चली. हालांकि, पूर्व छात्रों के लंबे संघर्ष के बाद साल 2014-15 से मेरिट के आधार पर सीमित छात्रों के लिए हॉस्टल की व्यवस्था दोबारा शुरू की गई.

(फोटो: फेसबुक/छात्रावास आपका अधिकार है.)

(फोटो: फेसबुक/छात्रावास आपका अधिकार है.)

पुरुष छात्रावास के लिए लंबे समय तक संघर्ष करने वाले आईआईएमसी 2007-08 बैच के पूर्व छात्र और पत्रकार अभिषेक रंजन सिंह कहते हैं, ‘हमने 2007-08 में पुरुष छात्रावास की लड़ाई शुरू की और नए छात्रावास का निर्माण शुरू हुआ. हालांकि, तत्कालीन महानिदेशक ने पुरुष छात्रों को महिला छात्रावास के मेस का उपयोग करने का अधिकार दे दिया. नए छात्रावास के निर्माण के बाद जब मैंने संस्थान के महानिदेशक से लेकर तत्कालीन सूचना एवं प्रसारण मंत्री मनीष तिवारी को कई पत्र लिखा तब जाकर 2014-15 से सीमित संख्या में पुरुषों के लिए छात्रावास उपलब्ध कराया जाने लगा.’

इसके बाद साल 2017-18 में सभी पुरुष छात्रों के लिए छात्रावास की मांग को लेकर एक बार फिर से छात्र धरने पर बैठ गए. 2017-18 बैच के छात्रों ने सभी छात्रों के लिए छात्रावास उपलब्ध कराए जाने की मांग को लेकर कई दिनों तक धरना दिया जिसके बाद प्रशासन ने उन्हें आश्वासन दिया कि जल्द से जल्द सभी छात्रों के लिए छात्रावास की व्यवस्था उपलब्ध कराई जाएगी.

राजन ने कहा, ’30 बच्चों ने डीजी को पत्र लिखा है कि अगर उन्हें दूसरे सेमेस्टर की फीस जमा करनी पड़ी तो उन्हें कैंपस छोड़ना पड़ेगा. 100 से अधिक बच्चों ने फ्रीशिप के लिए आवेदन किया है. जिन बच्चों के परिवार की सालाना आय 60-70 हजार रुपये है उनसे 95 हजार रुपये फीस जमा करने को कहा जा रहा है. मैं मंत्रालय से पूछना चाहता हूं कि जब 250 बच्चों के शिक्षा की व्यवस्था नहीं की जा सकती है तब देश के करोड़ों बच्चों के भविष्य का क्या होगा?’

रेडियो एवं टीवी पत्रकारिता के छात्र हृषिकेश ने कहा, ‘मेरे परिवार की सालाना आय 70,000 रुपये है. इस कोर्स को करते हुए मेरा खर्च 2,50,000-3,00,000 से ऊपर हो सकता है. यह राशि मेरे घर की पांच साल की आमदनी के बराबर है. मेरे छह सदस्यीय परिवार के लिए यह खर्च बहुत ज्यादा है. सेकेंड सेमेस्टर की फीस जमा करने से छूट मांगने वाले 30 छात्रों में मैं भी हूं और मैंने उन्हें बताया है कि मैं कर्ज लेकर यहां पढ़ने आया हूं.’

वे कहते हैं, ‘यहां रहते हुए मैं फ्रीलांस के तौर पर काम करके थोड़े बहुत पैसे जुगाड़ लेता हूं लेकिन वह काफी नहीं होता है. अधिक छात्रों के साथ फीस की समस्या होने के कारण हम सभी चाहते हैं तो आईआईएमसी के फीस के ढांचे को पूरी तरह से बदला जाए और मध्यमवर्गीय, गरीब परिवारों से आने वाले बच्चों की पहुंच में लाया जाए.’

हिंदी पत्रकारिता के छात्र मोहित कहते हैं, ’10 महीने के कोर्स के लिए डेढ़-दो लाख रुपये फीस लेना जायज नहीं है. मैंने अभी इंजीनियरिंग पूरी की है. उसके बाद यहां के लिए मैंने बहुत मेहनत से अपने घरवालों को तैयार किया है. प्रवेश परीक्षा के लिए ही 1500-2000 से रुपये का फॉर्म भरवाया जाता है जिससे काफी छात्र तो वहीं छंट जाते हैं. उसके बाद डेढ़-दो लाख की फीस और फिर रहना-खाना लेकर 10 महीने में तीन लाख रुपये खर्च हो जाता है.’

वे कहते हैं, ‘मैंने घरवालों को बिना बताए उनसे मिलने वाले खर्च के पैसे में से ही दो हजार रुपये का फॉर्म भर दिया था और उसके बाद जैसे-तैसे करके अपना खर्च चलाया. यहां सेलेक्शन हो जाने के बाद ही मैंने घरवालों को बताया. अभी घरवालों ने कर्ज लेकर यहां की फीस दी है. अभी भी जब घर जाता हूं तो वे कहते हैं कि यह सब छोड़ दो और नौकरी कर लो. कर्ज चुकाने के लिए मुझे अपने पेशे से समझौता करना पड़ सकता है जो कि मैं नहीं करना चाहता हूं.’

एक शीर्ष अधिकारी ने बताया कि आईआईएमसी महानिदेशक कुलदीप सिंह धतवालिया ने डीन मुकुल शर्मा के नेतृत्व में एक समिति का गठन किया है और यह समिति फीस वृद्धि सहित अन्य सभी मांगों पर विचार करेगी.

हालांकि, छात्रों की मांग है कि जब तक फीस बढ़ोतरी पर कोई फैसला नहीं हो जाता है तब तक सेकेंड सेमेस्टर की फीस जमा करने की तारीख आगे बढ़ा दी जाए, जो 15 जनवरी, 2020 है.

फोटो साभार: ट्विटर

फोटो साभार: ट्विटर

रेडियो एवं टीवी पत्रकारिता की छात्रा प्रतीक्षा कहती हैं, ‘प्रशासन से हमारी मांग है कि फिलहाल सेकेंड सेमेस्टर की फीस जमा करने की तारीख को आगे बढ़ाया जाए. हम इस बात की प्रशंसा कर रहे हैं कि वे हमसे बात कर रहे हैं लेकिन बातचीत के आगे कुछ नहीं हो रहा है.’

एक अन्य छात्र ने कहा, ‘फ़र्स्ट सेमेस्टर की फीस जमा करने के बाद अगली बार फीस जमा करने के लिए कई छात्रों के घरवालों को जमीन बेचनी पड़ती है, तो कई को कर्ज लेना पड़ता है. एससी और एससटी वर्ग की सीटें खाली रह जाती हैं. प्रशासन जिन मांगों को मानने की बात कर रहा है वे तो उन्हें पहले ही करना चाहिए था. हमारी मांग तो बढ़ी हुई फीस को कम किए जाने की है.’

वहीं, आईआईएमसी के छात्र ऋषभ कहते हैं, ‘प्रशासन हमसे संवाद कर रहा है लेकिन मांगें नहीं मान रहा है. हम चाहते हैं कि हमें एक निश्चित समयसीमा दिया जाए. हालांकि, विरोध प्रदर्शन के साथ हम पढ़ाई जारी रखने की कोशिश कर रहे हैं.’

इससे पहले आईआईएमसी के एडीजी मनीष देसाई के नेतृत्व में एक ओपन हाउस बैठक आयोजित की गई जिसमें उन्होंने छात्रों के साथ चर्चा की. छात्रों ने बताया कि इस बैठक में लाइब्रेरी को अधिक देर तक खोलने, रात के समय रीडिंग रूम उपलब्ध कराने, जिम खोलने, सैनेटरी नैपकिन वेंडिंग मशीन लगाने की मांग मान ली गई थी.

हालांकि, छात्रों का कहना है कि कोई लिखित आश्वासन न मिलने के कारण वे संतुष्ट नहीं हैं, इसलिए वे अपना विरोध प्रदर्शन जारी रखेंगे.

द वायर  ने आईआईएमसी महानिदेशक का अतिरिक्त प्रभार संभालने वाले कुलदीप सिंह धतवालिया से संपर्क करने की कोशिश की थी, लेकिन उनकी ओर से कोई जवाब नहीं मिला. उनका जवाब आने पर उसे इस रिपोर्ट में जोड़ा जाएगा.