भारत

सीएए और एनआरसी देश के हर नागरिक के एहसास और आज़ादी का अपमान हैं

जिस नागरिकता क़ानून को गांधी जी और भारतीयों ने आज से 113 साल पहले विदेशी धरती पर नहीं माना, उस औपनिवेशिक सोच से निकले सीएए और एनआरसी को हम आज़ाद भारत में कैसे स्वीकार कर सकते हैं?

New Delhi: A man walks past anti-Citizenship Amendment Act (CAA) graffiti in New Delhi, Saturday, Dec. 21, 2019. (PTI Photo/Vijay Verma)(PTI12_21_2019_000158B)

फोटो: पीटीआई

दक्षिण अफ्रीका में भारतीयों के लिए लाए गए नागरिकता रजिस्ट्रेशन कानून की खिलाफत ने 113 साल पहले आज के गांधी और सत्याग्रह को जन्म दिया था. उसी औपनिवेशिक सोच को आज़ाद भारत की सरकार सीएए/एनआरसी के रूप में दोहरा रही है.

जिस कानून को गांधी जी ने विदेशी धरती पर भारत और भारतीयों के साथ भेदभाव और अपमान माना था, उससे मिलते-जुलते किसी भी कानून को हम आज के आज़ाद भारत में कैसे स्वीकार कर सकते हैं. इसे स्वीकार करना गांधी, सत्याग्रह, लोकतंत्र और ‘भारत माता’ का अपमान होगा.

गृह मंत्री अमित शाह ने नागरिकता संशोधन कानून के बाद देशव्यापी एनआरसी लाने का ऐलान किया था, इसलिए इसे जोड़कर ही देखना होगा.

हालांकि बीते दिनों प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इससे इनकार किया लेकिन जनगणना की आड़ में नेशनल पापुलेशन रजिस्टर (एनपीआर) लाने का फैसला करके सरकार इस दिशा में पहला कदम उठा भी चुकी है.

हालांकि मोदी-शाह सरकार का यह दावा सही है कि इसे धर्म विशेष के विरोध से न देखें क्योंकि इसके जरिए वो न सिर्फ सांप्रदायिक एजेंडे को आगे बढ़ा रही है, बल्कि संविधान को ताक में रखकर एक आधिनायकवादी सत्ता स्थापित करना चाहती है.

इसके बाद देश के हर नागरिक की नागरिकता सरकार के एक रजिस्टर के भरोसे होगी.

इसलिए यह सिर्फ हिंदू राष्ट्र बनाने तक मामला नहीं है; जैसा ज्यादातर लोग कह रहे है, बल्कि उसकी आड़ में यह देश के हर नागरिक की आजादी, लोकतंत्र और सम्मान को सरकार के सामने नतमस्तक करने का मामला है.

सीएए के साथ मिलकर एनआरसी देश के हर नागरिक के एहसास और आज़ादी का अपमान है.

एनआरसी को लेकर अभी कानून और नियम नहीं बने है. लेकिन 2003 में बाजपेयी सरकार के एनपीआर के प्रस्ताव के आधार पर इतना तो कह ही सकते हैं कि इसके तहत केंद्र, राज्य की राजधानी, जिला स्तर, उपखंड स्तर से लेकर शहर और गांव तक नागरिको एक रजिस्टर बनेगा.

और जैसा कि गांधी जी ने दक्षिण अफ्रीका के अपने संपूर्ण आंदोलन के बारे में लिखते हुए बताया है कि उस समय वहां किसी भी सरकारी कार्यालय में कोई काम होने पर अपना रजिस्ट्रेशन कार्ड दिखाना होता था.

आजकल भारत में भी आधार कार्ड की अनिवार्यता हम देख चुके है. आने वाले समय में यह नागरिकता रजिस्ट्रेशन कार्ड और उसके नंबर में बदल सकता है.

हर नागरिक को अपना रजिस्ट्रेशन करवाना चाहिए और एक नागरिक रजिस्टर में यह सब रिकॉर्ड हो, यह एक औपनिवेशिक सोच है.

1906 में दक्षिण अफ्रीका में वहां रह रहे भारतीय नागरिकों का रजिस्ट्रेशन अनिवार्य कर उनके साथ नस्ल के आधार पर भेदभाव करने और उन पर सत्ता का शिकंजा कसने की सोच से यह मेल खाती है.

गांधी जी ने विदेशी धरती पर भी इसे भारत देश और उसके लोगों का अपमान बताया था और इसकी खिलाफत के लिए ही सत्याग्रह का हथियार गढ़ा था.

उस समय के दक्षिण अफ्रीका के एक प्रांत ट्रांसवेल में रहने वाले भारतीय नागरिकों का रिकॉर्ड रखने के लिए वहां की औपनिवेशिक सरकार ने 1906 में ‘एशियाटिक रजिस्ट्रेशन एक्ट’ लाई थी. गांधी का कहना था कि एक भी निर्दोष नागरिक का अपमान सारे देश का अपमान है.

Mahatma Gandhi

वहां रहने वाले हिंदू, मुस्लिम, पारसी, सिख सभी धर्मो और वर्गों के लोगो ने एकजुट होकर इस कानून का खुलकर विरोध किया था. सबने तय किया था कि कोई भी भारतीय नागरिक इस कानून के तहत अपना रजिस्ट्रेशन नहीं कराएगा.

इसका परिणाम यह हुआ कि उस समय जो 13,000 भारतीय उस समय दक्षिण अफ्रीका में रहते थे, उसमें से सिर्फ 500 लोगों ने ही अपना रजिस्ट्रेशन करवाया.

इसके बाद गांधी जी ने सरकार की बात पर भरोसा कर एक समझौता किया कि अगर सरकार कानून को वापस ले और कानून के आधार पर भारतीय नागरिकों के रजिस्ट्रेशन की अनिवार्यता खत्म करे, तो वे सब अपना रजिस्ट्रेशन करवा लेंगे.

और लोगों ने रजिस्ट्रेशन करवाया. लेकिन सरकार ‘एशियाटिक रजिस्ट्रेशन एक्ट’ को वापस लेने की बजाय 6 अगस्त 1908 को उसे और कड़े करने के प्रावधान वाला बिल ले आई.

इस बिल के विरोध में उसी दिन एक 2,000 लोगों ने अपने-अपने रजिस्ट्रेशन सर्टिफिकेट गांधी जी को सौंपे, जिन्हें बड़ी भीड़ के सामने एक बड़ी से कड़ाही में जलाई गयी आग के हवाले किया गया.

यह सत्याग्रह 1914 तक यानी आठ साल चला था, जिसके बाद गांधी ने भारत लौटकर यहां सत्याग्रह के उस हथियार को आजमाया था.

इस आंदोलन में हिंसा की कोई जगह नहीं थी. यह अहिंसा और दृढ़ निश्चय यानी सत्य का आग्रह करने के लिए जेल लाठी हर कष्ट झेलने का आंदोलन था.

अगर सरकार विदेशी नागरिक ढूंढना चाहती है, तो बेशक ढूंढें लेकिन क्या उसके लिए देश के हर नागरिक को शक के दायरे में लाकर कतार में खड़ा करना सही है?

यह तो ऐसा हो गया कि चार बाहरी लोगों को ढूंढने के नाम पर पूरे शहर को कतार में खड़ा किया जाए. दूसरा, उन्हें ढूंढने के बाद उनमें से कुछ लोगों को धर्म के आधार पर अलग किया जाए, तो क्या यह सही है?

एक बात और, सीएए पहले से ही भारत में आ चुके लोगों के लिए हैं, इसलिए यह कहना कि यह भारत के लोगों के खिलाफ नहीं है, गलत है.

क्योंकि इनमें से सिर्फ तीन देश लोगों को नागरिकता दी जाएगी, लेकिन उसमें एक धर्म विशेष के नागरिकों को नागरिकता न देना शामिल है.

क्या यह भारत में रह रहे व्यक्ति के साथ भेदभाव नहीं है? संविधान की धारा 14 भारत में रह रहे हर व्यक्ति को बराबरी का हक़ देती है.

देश के हर नागरिक का नाम एवं संपूर्ण जानकारी एक रजिस्टर में दर्ज हो जिसे गांव से लेकर जिला, राज्य और केंद्र हर स्तर पर रखा जाएगा, यह नागरिकों की आज़ादी पर हमला है और लोकतंत्र का अपमान है.

यह औपनिवेशिक सोच का परिचायक है. इसके खिलाफ एक और सत्याग्रह अनिवार्य है.

जिस नागरिकता कानून को गांधी जी और भारतीय लोगो ने आज से 113 साल पहले विदेशी धरती पर नहीं माना, उस औपनिवेशिक सोच से निकले इस सीएए और एनआरसी को हम इस आज़ाद भारत में कैसे स्वीकार कर सकते हैं?

लोगों को इसके लिए सत्याग्रह करना होगा. गांधी जी का सत्याग्रह आठ साल चला था. सत्याग्रह में हिंसा को कोई स्थान नहीं था.

सीएए/एनआरसी के खिलाफ लंबे सत्याग्रह की तैयारी रखनी होगा और उसके लिए कई लोगों को अपना सब कुछ छोड़कर आंदोलन में कूदना होगा.

गांधी जी ने ने दक्षिण अफ्रीका के सत्याग्रह का इतिहास के नाम इस बारे में विस्तार से लिखा है, जिसे आज हर व्यक्ति को पढ़ना चाहिए.

(लेखक समाजवादी जन परिषद के कार्यकर्ता हैं.)