भारत

सरकार को औरतों की सुरक्षा से ज़्यादा चिंता इसे लेकर होने वाली आलोचना से है

‘रेप कैपिटल’ और ‘रेप इन इंडिया’ जैसे जुमले न भी बोले जाएं, तब भी महिला सुरक्षा को लेकर होने वाली बदनामी से देश का बचना तब तक मुमकिन नहीं है, जब तक सरकार आलोचकों से ज़बानी जंग करने के बजाय औरतों के ख़िलाफ़ अपराध रोकने के लिए गंभीर नहीं होती.

(प्रतीकात्मक फोटो: रॉयटर्स)

(प्रतीकात्मक फोटो: रॉयटर्स)

अभी वह वक्त बहुत पीछे नहीं छूटा, जब किसी परिवार की कोई बहू या बेटी किसी भी तरह किसी नराधम की पाशविकता की शिकार हो जाती थी तो खानदान की इज्जत का हवाला देकर जबरन उसका मुंह बंद करा दिया जाता था.

यह कहकर कि उसने अपने साथ मुंह काला करने वाले को सजा दिलाने के फेर में थाने अथवा कोर्ट-कचहरी का मुंह किया नहीं कि ऐसी बदनामी गले आ पड़ेगी, जिसकी प्रताड़ना समूचे खानदान को झेलनी पड़ेगी- यहां तक कि उसके लिए अपनी नाक बचाना मुश्किल हो जाएगा.

फिर तो वह महिला यह सोच-सोचकर लगातार दंशित होती रहती थी कि ऐसे जीवन से तो, जिसमें न सिर्फ शरीर बल्कि आत्मा तक को खरोंच डालने वाले दानवों का तनिक भी प्रतिकार संभव न हो, मौत ही भली!

बढ़ती लोकतांत्रिक चेतना ने हालात थोड़े बदले तो ‘बदनामी’ के जबरन थोपे गये भ्रमजाल से बाहर निकलकर महिलाएं खुद पर होने वाले यौन हमलों के खिलाफ खुलकर आवाज उठाने लगीं- जान पर खेलकर और पितृसत्ता या हमलावर के पद, पहुंच व प्रभुत्व की परवाह किए बिना भी.

इसका नतीजा यह हुआ है कि इन हमलों को लेकर जो बदनामी पहले सिर्फ उन्हीं के गले मढ़ी जाती थी, उसका बड़ा अंश सरकारों के हिस्से आने लगा है. इतना ही नहीं, उनसे कई असुविधाजनक सवाल भी पूछे जाने लगे हैं, जिनमें से एक यह भी है कि उनकी व्यवस्था में बेटियों की सुरक्षा मुकम्मल क्यों नहीं हो पा रही?

लेकिन इधर महिलाओं पर बर्बर यौन हमलों को लेकर आलोचना से तिलमिलाई सरकारें और सरकारी पार्टियों के नेता जिस तरह देश की बदनामी का हवाला देकर अपने आलोचकों का मुंह बंद कराने की कोशिश कर रहे हैं, उससे लगता है कि वे ‘कुल की बदनामी’ वाले युग की रिब्रांडिंग करने या महिलाओं को फिर उसी समय में धकेलने पर आमादा हैं.

इसकी एक मिसाल तब सामने आई, जब बीते दिनों कांग्रेस सांसद राहुल गांधी ने झारखंड में एक चुनाव सभा में कह दिया कि ‘नरेंद्र मोदी ने कहा था- मेक इन इंडिया. अब आप जहां भी देखो, मेक इन इंडिया नहीं… रेप इन इंडिया है. अखबार खोलो, झारखंड में महिला से बलात्कार. उत्तर प्रदेश में देखो तो नरेंद्र मोदी के विधायक ने एक महिला का रेप किया. उसके बाद उसकी गाड़ी का एक्सीडेंट हो जाता है. नरेंद्र मोदी एक शब्द नहीं बोलते. हर प्रदेश में हर रोज रेप इन इंडिया. मोदी जी कहते हैं- बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ. मोदी जी, आपने ये नहीं बताया कि किससे बचाना है? भाजपा के एमएलए से बचाना है?’

जहां भाजपा और उसकी सरकारों को इन सवालों का सामना करना और जवाब देना चाहिए था, वहां उन्होंने ‘उल्टा चोर कोतवाल को डांटे’ की तर्ज पर इसे लेकर संसद में हंगामे का रास्ता चुन लिया.

पार्टी की जो महिला सांसद महिलाओं पर बढ़ते यौन हमलों और उनमें अपनी पार्टी के नेताओं के नाम आने को लेकर आमतौर पर चुप्पी साधे रहती हैं, वे भी हंगामे पर उतरकर मांग करने लगीं कि राहुल अपने इस बयान को लेकर देश से माफी मांगें. केंद्रीय मंत्री स्मृति ईरानी तो राहुल की शिकायत लेकर चुनाव आयोग तक भी जा पहुंचीं.

गौरतलब है कि ये वही स्मृति ईरानी हैं, जिन्होंने बहुचर्चित ‘मी टू’ अभियान के दौरान तत्कालीन विदेश राज्यमंत्री एमजे अकबर के खिलाफ लगे आरोपों पर कुछ भी बोलने से इनकार कर दिया था.

पूर्व केंद्रीय गृह राज्यमंत्री स्वामी चिन्मयानन्द का एक विधि छात्रा के यौन शोषण में फंसना भी उन्हें विचलित नहीं ही कर पाया था. उन्नाव के बहुचर्चित अपहरण व रेप कांड में भाजपा विधायक (अब निष्कासित) कुलदीप सिंह सेंगर के दोषी करार दिये जाने को लेकर भी उनकी टिप्पणी का लोगों को इंतजार ही है.

लेकिन ईरानी तो ईरानी, राहुल मुंह बंद कराने की कोशिश में रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह को यह तब याद नहीं रह गया कि मनमोहन राज में उनकी पार्टी के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार नरेंद्र मोदी भी दिल्ली को ‘रेप कैपिटल’ कह चुके हैं.

वे यह भी याद नहीं ही रख पाए कि सरकार में होने के नाते उनके सांसदों का काम संसद-सदनों में व्यवस्था बनाए रखना है, हंगामा करना नहीं. हंगामा तो विपक्षी दलों का हथियार है- सरकार द्वारा उनकी अनसुनी के खिलाफ.

इसके बाद जब राहुल ने राजधानी दिल्ली में अपनी पार्टी की ‘भारत बचाओ रैली’ में साफ कह दिया है कि वे अपने उक्त कथन को लेकर माफी नहीं मांगेंगे, क्योंकि वे ‘राहुल गांधी’ हैं, ‘राहुल सावरकर’ नहीं, भाजपा का इरादा नेक नहीं लगता.

अब वह राहुल के भाषण के अर्थ का अनर्थ कर हंगामा मचाने के स्मृति ईरानी के कृत्य से हो रही जगहंसाई की ओर से ध्यान हटाने के लिए सावरकर को लेकर कांग्रेस व शिवसेना के अंतर्विरोध का लाभ उठाने और शिवसेना को भड़काने में लग गई है, ताकि महाराष्ट्र की जो सत्ता उससे छिन गई है, फिर से उसकी झोली में आ गिरे.

इससे पहले लोकसभा में विपक्ष के नेता अधीर रंजन चौधरी ने बेटियों पर यौन हमलों के संदर्भ में केंद्र सरकार को निशाने पर लेते हुए कहा था कि उसकी काहिली के चलते देश ‘रेप इन इंडिया’ की ओर बढ़ चला है, तो भी सरकार और उसके नेता जवाबदेह बनने के बजाय भड़के ही थे.

उन्होंने उन पर देश को बदनाम करने के आरोपों की बौछार कर डाली थी. इससे पहले एक बयान में राहुल ने कहा था कि मोदी सरकार ने भारत को ‘रेप कैपिटल’ बना दिया है, तो दिल्ली के एक भाजपा नेता ने राजनीतिक शिष्टाचार की सीमाएं तोड़कर राहुल को मानसिक तौर पर बीमार तक बता दिया था. दूसरे कई नेताओं ने उन पर निजी हमलों से भी परहेज नहीं किया था.

उपराष्ट्रपति वेंकैया नायडू ने राहुल का नाम तो नहीं लिया, लेकिन वे भी ऐसे बयानों से देश का नाम खराब होने की चिंता से परे नहीं ही रह पाए थे. यह समझना भी गवारा नहीं किया था कि उपराष्ट्रपति के तौर पर उनसे ऐसी राजनीति से ‘दूर’ रहने की अपेक्षा की जाती है.

Students shout slogans during a protest against the alleged rape and murder of a 27-year-old woman, in Kolkata, India, December 2, 2019. REUTERS/Rupak De Chowdhuri

फोटो: पीटीआई

बहरहाल, इन सबसे एक साथ पूछे जाने की जरूरत है कि देश की बदनामी रोकने के लिए बेटियों पर यौन हमले रोकना जरूरी है या उसके खिलाफ आवाज उठाने वालों का मुंह पकड़ना? एक पल को मुंह पकड़ने को ‘इलाज’ मान भी लें तो मुश्किल यह है कि बात इतनी दूर तक जा चुकी है कि महज कुछ मुंह पकड़ने का कोई हासिल नहीं है.

इस तथ्य के मद्देनजर और भी कि थॉमसन रॉयटर्स फाउंडेशन के एक सर्वे में पिछले साल ही भारत को महिलाओं के लिए दुनिया का सबसे खतरनाक देश बताया जा चुका है.

तिस पर बहुचर्चित निर्भया कांड के एक दोषी ने सर्वोच्च न्यायालय में दायर अपनी ताजा पुनर्विचार याचिका में यह तक कह डाला है कि उसे फांसी पर लटकाने की क्या आवश्यकता है, जब दिल्ली की, जहां वह रहता है, हवा और पानी इतने जहरीले हो गये हैं कि वह उनके बीच रहकर दो-चार साल में ऐसे ही मर जाने वाला है.

निस्संदेह उसने पिछले दिनों सर्वोच्च न्यायालय द्वारा की गई उस टिप्पणी को अपने पक्ष में इस्तेमाल करने की कोशिश की है, जिसमें उसने दिल्ली सरकार से कहा था कि लोगों को दम घोंटकर मारने से अच्छा है कि उन्हें एक साथ बारूद से उड़ा दिया जाए.

राहुल और अधीर पर बरसने वालों ने अभी इस दोषी पर देश को बदनाम करने के आरोप नहीं लगाए हैं. क्या इससे यह समझा जाए कि उन्होंने मान लिया है कि जिस देश की राजधानी की हवा और पानी किसी अपराधी को भी जीने लायक न लगते हों, उसे कोई और क्या बदनाम करेगा?

लेकिन इससे भी बड़ा दुर्भाग्य यह है कि आज जो लोग जता रहे हैं कि उसकी नेकनामी की सबसे बड़ी फिक्र उन्हें ही है, उन्हें यह समझना भी गवारा नहीं कि किसी मर्ज के निदान में लगने के बजाय उसे छिपाते रहने से भी देश को अंततः शर्मिंदगी ही उठानी पड़ती है. इसलिए कि लगातार छिपाया जाता रहे तो मर्ज अंदर-अंदर ही सड़ने लग जाता है और तब उसकी दुर्गंध बाहर आने से नहीं रुकती.

फिर हम आजकल ऐसी दुनिया में नहीं रहते, जिसमें कोई और देश हमारे देश के हालात से वाकिफ होने के लिए किसी नेता के बयानों का मोहताज हो. अमेरिका की समाचार वेबसाइट ‘फेयर ऑब्जर्वर’ किसी बयान के आधार पर इस निष्कर्ष तक नहीं पहुंची कि भारत में बलात्कार, यौन हिंसा और उत्पीड़न के मामलों में अक्सर दोहरा रवैया अपनाया जाता है.

पिछले दिनों उसकी एक लेखिका ने इसकी नजीर देते हुए किसी बयान का नहीं, बहुप्रचारित ‘मी टू’ मुहिम का जिक्र किया, जिसमें कुछ बड़ी हस्तियों का नाम सामने आने के बाद भी उनका बाल बांका नहीं हुआ.

संयुक्त अरब अमीरात के समाचारपत्र ‘गल्फ न्यूज’ में एक अन्य लेखिका ने लिखा कि अब नरेंद्र मोदी सरकार की ‘बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ’ योजना बेटियों को बचा और पढ़ाकर दिखाने की इस धमकी में बदल गई है कि तो उसके निष्कर्ष का आधार भी कोई बयान न होकर तथ्य हैं.

इसी तरह ब्रिटेन के समाचारपत्र ‘डेली मेल’ की वेबसाइट ‘मेल ऑनलाइन’ ने उन्नाव की रेप पीड़िता को जलाये और हैदराबाद में बलात्कार के अभियुक्तों के मुठभेड़ में मारे जाने को के बारे में लिखते हुए अरुणा शानबाग, भंवरी देवी और प्रियदर्शिनी मट्टू से लेकर निर्भया गैंगरेप तक की बहुचर्चित त्रासदियों का जिक्र किया और उसे ‘महिलाओं के विरुद्ध हिंसा के भारतीय इतिहास’ की संज्ञा दी है.

उन्होंने राहुल गांधी और अधीर रंजन चौधरी के बयानों का सहारा नहीं लिया है. साफ है कि वे ‘रेप कैपिटल’ और ‘रेप इन इंडिया’ जैसे जुमले जुबान पर न भी लाएं तो बदनामी से देश का बचाव तब तक मुमकिन नहीं हैं, जब तक सरकार द्वारा आलोचकों का मुंह बंद करने के बजाय बेटियों के यौन हमलावरों को निष्कवच करके नाकाम करने के प्रयत्न नहीं किए जाते.

साथ ही समझा नहीं जाता कि देश की नेकनामी की बुनियाद कैसे डाली जा सकती है और उसकी जड़ों पर मट्ठा डालने से कैसे बचा जा सकता है?

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं.)