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सांसद आदर्श ग्राम योजना: यूपी में 104 ग्राम पंचायतों में से महज 15 ने पूरे किए मानक

योजना का प्रथम चरण 11 अक्टूबर, 2014 को शुरू किया गया था. रिपोर्ट के मुताबिक, ज्यादातर ग्राम पंचायतों में पाइप से पेयजल की परियोजना पूरी नहीं की गई. करीब 30 प्रतिशत ग्राम पंचायतों में ठेकेदारों ने यह परियोजना ग्राम पंचायत अधिकारियों के हवाले नहीं की.

(फोटो: रिज़वाना तबस्सुम)

(फोटो: रिज़वाना तबस्सुम)

इलाहाबाद: गांवों को गोद लेकर आदर्श ग्राम में तब्दील करने की मोदी सरकार की योजना उत्तर प्रदेश में अधिक सफल होती दिखाई नहीं दे रही है. एक मूल्यांकन में दावा किया गया है कि प्रदेश की 104 ग्राम पंचायतों में से महज 15 ग्राम पंचायतें ही आदर्श ग्राम के मानकों पर खरी पाई गईं. इनमें प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा गोद लिया गया गांव जयापुर (वाराणसी) शामिल है.

योजना का प्रथम चरण 11 अक्टूबर, 2014 को शुरू किया गया था. केंद्रीय ग्रामीण विकास मंत्रालय ने इलाहाबाद विश्वविद्यालय के सेंटर आफ साइंस एंड सोसाइटी को प्रथम चरण के मूल्यांकन का जिम्मा सौंपा था, जिसने कार्य पूरा कर रिपोर्ट मंत्रालय को सौंप दी.

मूल्यांकन टीम के संयोजक प्रोफेसर अनुपम दीक्षित ने बताया, ‘योजना के लिए चुनी गई ग्राम पंचायतों में से जिन 15 ग्राम पंचायतों का प्रदर्शन सबसे अच्छा रहा उनमें मनोहर पर्रिकर का गांव बरौलिया (अमेठी), मेनका गांधी का गांव गुलरिया भूपसिंह (पीलीभीत), राघव लखन पाल का गांव खुशालीपुर (सहारनपुर), उमा भारती का गांव पावा (ललितपुर), अशोक कुमार दोहरे का गांव महेवा (इटावा) और मनोज सिन्हा का गांव दुल्लापुर (गाजीपुर) आदि शामिल हैं.’

दीक्षित ने बताया, ‘केंद्रीय मंत्री मुख्तार अब्बास नकवी द्वारा गोद लिए गांव रामपुरा बुजुर्ग (रामपुर), संतोष गंगवार का गांव राहपुरा जागीर (बरेली), वरुण गांधी का गांव वल्लीपुर (सुल्तानपुर), मुलायम सिंह का गांव तमौली (आजमगढ़), सावित्री बाई फुले का गांव मटेही कलां (बहराईच) और सोनिया गांधी के गांव उर्वा 1 (राय बरेली) का प्रदर्शन अपेक्षा अनुरूप नहीं रहा.’

मूल्यांकन टीम के सदस्य डाक्टर राजेश कुमार ने बताया, ‘इस योजना के लिए अलग से धन आवंटित नहीं किया गया था. कई सांसदों ने कॉरपोरेट सीएसआर की मदद से गोद लिए गांव के विकास पर ध्यान दिया.’

उन्होंने बताया ‘योजना का मूल्यांकन करने में छह महीने का समय लगा और इसके लिए 20 से अधिक लोगों की 3-4 टीमों ने काम किया.’

रिपोर्ट के मुताबिक, ज्यादातर ग्राम पंचायतों में पाइप से पेयजल की परियोजना पूरी नहीं की गई. तमौली (आजमगढ़), लहुनवा खुर्द (आजमगढ़), दादरी (मिर्जापुर) जैसी ग्राम पंचायतों में यह परियोजना अब भी अपनी शुरूआती अवस्था में है. करीब 30 प्रतिशत ग्राम पंचायतों में ठेकेदारों ने यह परियोजना ग्राम पंचायत अधिकारियों के हवाले नहीं की.

मूल्यांकन रिपोर्ट के अनुसार, ज्यादातर ग्राम पंचायतों में सड़कों की स्थिति में सुधार देखा गया. इनमें नीमका, बसंतपुर बांगड़, महेवा, रावल बांगड़, बरौलिया, खुशालीपुर, जयापुर आदि शामिल हैं. महेवा, सैदपुरसकरी, जयापुर, खुशालीपुर, पुसेंता जैसी कुछ ग्राम पंचायतों में उन्नत कृषि व्यवस्था जैसे जैविक खेती, केंचुआ खाद और बागवानी तथा पशुपालन सहित सहायक आजीविका की सुविधा प्रदान की गई.

इस रिपोर्ट में कहा गया है कि योजना में शामिल जयापुर, खुशालीपुर, नीमका, दुल्लापुर सहित कुछ ग्राम पंचायतों में स्वरोजगार के लिए युवाओं को प्रशिक्षण देने के वास्ते कौशल विकास केंद्र भी खोले गए. ज्यादातर ग्राम पंचायतों में स्वयं सहायता समूह बहुत कम पाए गए या निष्क्रिय पाए गए.

डॉक्टर राजेश कुमार ने योजना को एक महत्वाकांक्षी और अनूठी पहल करार देते हुए कहा ‘यह ढांचागत सुविधाओं और सामुदायिक विकास की सभी योजनाओं को समेकित करती है. हालांकि प्रथम चरण में यह अपेक्षित सफलता हासिल नहीं कर सकी.’

द वायर से बात करते हुए प्रोफेसर अनुपम दीक्षित ने कहा, ‘उत्तर प्रदेश के 104 ग्राम पंचायतों में जाकर हमने फोटो खींचे, वीडियो बनाया और फिर उसकी रिपोर्ट इस साल नवंबर में मंत्रालय में जमा की. सरकार चरणबद्ध तरीके से इस योजना को चला रही है इसलिए उन्हें इसकी जानकारी चाहिए थी. पहले उन्होंने मूल्यांकन का काम किसी एनजीओ को दिया था लेकिन सरकार उससे संतुष्ट नहीं थी. प्रधानमंत्री ने हस्तक्षेप करके कहा कि यह काम शिक्षाविदों को दिया जाना चाहिए. अलग-अलग राज्यों में 10 विश्वविद्यालयों को इस योजना के मूल्यांकन का काम दिया गया है. उत्तर प्रदेश में यह काम इलाहाबाद विश्वविद्यालय को मिला है.’

उन्होंने कहा, ‘यह रिपोर्ट अभी सार्वजनिक नहीं है. यह प्रधानमंत्री कार्यालय तक जाएगा. रिपोर्ट का मूल्यांकन करने के बाद इसे प्रधानमंत्री कार्यालय और संसद में जमा किया जाएगा.’

(समाचार एजेंसी भाषा से इनपुट के साथ)