भारत

चित्रकथा: तस्वीरों के आईने में भारतीय नस्लवाद का चेहरा

फोटोग्राफर महेश शांताराम ने भारत में रह रहे अफ्रीकी छात्रों के साथ होने वाले नस्लीय भेदभाव को कैमरे में कैद किया है.

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एवेर्लोन और पेत्रा, ज़िम्बाब्वे / जयपुर, 2017 (© Mahesh Shantaram, Archival pigment print Courtesy- Tasveer)

भारत देश का अंग्रेजों द्वारा ‘नस्लीय भेदभाव’ का अपना एक लंबा अनुभव रहा है. इसके बावजूद भी भारतीयों ने नस्लवाद का समावेश इस कदर कर लिया है कि शरीर की त्वचा का रंग, रंग से बढ़ कर ऊंच-नीच करने का आधार बनता जा रहा है. इस तरह की सोच गढ़ ली गई है कि गोरे हमसे ऊपर हैं और काले हमसे नीचे.

भारतीयों की इस गढ़ी सोच के पीछे अंग्रेजों का औपनिवेशीकरण और देश में जातिवाद का लंबा इतिहास रहा है. भारत में सिर्फ देश की राजनीति और अर्थव्यवस्था का औपनिवेशिकरण नहीं हुआ बल्कि भाषा, पसंद, रंग और स्वाद का भी हुआ है.

देश में एक तरफ गोरे होने की क्रीम, प्रोडेक्ट्स का व्यापार चल रहा है तो दूसरी तरफ अंग्रेज़ी सीखने की क्लासेज़. इस तरह से एक संस्कृति को बेहतर मान कर हम उसके रंग-रूप, वेश और भाषा को अपनाने की प्रक्रिया में लंबे समय से लगे हुए हैं और धीरे-धीरे अंग्रेज़ी आना, गोरा होना, स्टिक से खाना, वैकल्पिक और स्वैच्छिक नहीं वर्ग को दर्शाते हुए अनिवार्य होते जा रहे हैं.

Aminu from Bauchi, Nigeria pursues a B.A. in Economics from NIMS, Jaipur.

अमीनोऊ नाइजीरिया के हैं और निम्स जयपुर में अर्थशास्त्र की पढाई कर रहे हैं. ये अमर किले की पार्किंग की तस्वीर है. ज़्यादातर मुस्लिम अफ्रीकी छात्र इस किले की बिल्डिंग और पार्किंग में किराये पर रहते है जैसाकि तस्वीर में हाथी भी दिख रहा है. यहां बकरियां भी रखी जाती हैं. स्थानीय लोगों के भेदभाव के कारण ये छात्र निम्स से काफ़ी दूर इस किले की बिल्डिंग में रहतें हैं.(© Mahesh Shantaram, Archival pigment print Courtesy: Tasveer)

फरवरी, 2016 में बंगलुरु में एक तंजानियाई छात्र की भीड़ द्वारा पीट-पीट कर हत्या कर दी गई. हाल में ही दिल्ली में भी अफ्रीका से पढ़ने आए छात्रों के प्रति स्थानीय लोगों ने हिंसात्मक व्यवहार दिखाया. हम देख रहें हैं कि एक हिंसात्मक प्रवृत्ति जो दिन प्रति दिन देश में बढ़ती जा रही है और हम अपनी पसंद और सोच से अलग कुछ भी होता हुआ देखें, तो हम असहिष्णु होते जाते हैं.

चाहे फेसबुक पर गाली गलौज़ हो, सड़क पर रिक्शा चालक की हत्या या अखलाक को बीफ खाने की अफ़वाह पर जान से मारना हो, पाकिस्तान के साथ क्रिकेट मैच हो या किसी महिला का बेबाक बेखौफ होकर अपने विचार रखना इन सब पर हुई हिंसाओं के अनेक उदाहरण हमारे सामने रोज़ आते हैं .

ऐसे में इन मुद्दों पर बात करना, अलग-अलग माध्यमों से अपनी बात पहुंचाना बहुत ज़रूरी हो गया है. महेश शांताराम एक ऐसे ही फोटोग्राफर हैं जिन्होंने फोटोग्राफी के ज़रिये ‘नस्लवाद’ के मुद्दे को उठाने का एक उम्दा प्रयास किया है.

द वायर के साथ अपनी बातचीत मे उन्होंने अपनी प्रदर्शनी से जुड़े कुछ मुद्दों को उठाया. ये प्रदर्शनी लाडो सराय के ‘एक्जिबिट-320’ में लगी है. ये प्रदर्शनी, महेश शांताराम: द अफ्रीकन पोर्ट्रेट्स, ‘तस्वीर’ के ग्यारहवें सीज़न का हिस्सा है.

This was taken on my terrace when Davis, Hassan, and Leon from Tanzania, Zambia, and Rwanda respectively came visiting. It's the end of their college course and the friends will soon part ways and return to their countries, to the destiny that awaits them.

डेविस तंजानिया से, हसन जाम्बिया से और लीओन रवांडा से हैं. उनका कॉलेज ख़त्म हुआ है. ये अपने-अपने देश लौट रहें हैं. ये दोबारा कब मिलेंगे यह पता नहीं है. (Credit: Mahesh Shantaram)

महेश ने कहा,’फोटोग्राफी मेरी अभिव्यक्ति का माध्यम है और मैं पिछले 11 साल से फोटोग्राफर हूं. मैं हमेशा ही इन मुद्दों के बारे में सोचता हूं. मेरी पहली फोटोग्राफी सीरीज ‘मत्रीमानिया’ और ‘भारत की राजनैतिक संस्कृति’ दोनों में ही मैं भारतीय संस्कृति और विविधता के बारे में बात रखने की कोशिश करता हूं और अलग-अलग जगह जाकर पूरे भारत को शामिल करने की कोशिश रहती है.’

भारत देश में अक्सर ही ‘अतिथि देवो भव’ और ‘अतुलनीय भारत’ के दावेदार मिल ही जाएंगे. हम बड़ी-बड़ी बातें तो कर लेतें हैं लेकिन ज़मीन पर सच्चाई कुछ और है.

जैसे हम कहते हैं जातिवाद ख़त्म हो गया है और आए दिन ‘ऑनर किलिंग’ और ‘इंस्टिट्यूशनल मर्डर’ की ख़बरें सुनने को मिल ही जाती हैं.

हम कहतें है ‘विविधता में एकता’ देश की पहचान है. भारत में इतनी विभिन्न संस्कृतियों के होते हुए भी हम नस्लवाद और उससे जुड़ी हिंसाओं को देखते हैं, जैसा कि हाल में दिल्ली और बंगलुरु में देखा गया.

महेश कहते हैं, ‘मैंने इस मुद्दे को तब उठाना ज़रूरी समझा जब मेरे अपने शहर बंगलुरु के पास एक हादसा हुआ, मुझे विश्वास नहीं हो रहा था कि एक तंजानियन छात्र को भीड़ ने मार डाला. ये घटना फरवरी 2016 की है तब से मैं इस पर काम कर रह हूं.’

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हेलेन एक मिलेट्री अफसर की बेटी हैं. ज़ाम्बिया से भारत आई हैं. जब ये आईं तब ये लड़का थी और एक लड़के की तरह ही कपड़े पहनती थी. इन्होने अपने लैंगिक वास्तविकता के बारे में खुल कर अपने दोस्तों के सामने बात रखी लेकिन इनके माता-पिता ने इस बात को नहीं अपनाया. और पैसे ख़त्म हो जाने के बाद इन्हें अपने माता पिता के पास एक लड़के की तरह लौटना पड़ा. जालंधर, 2016. (Credit: Mahesh Shantaram)

विविधता पर उन्होंने कहा, ‘मैं विविधता नहीं एकता ढूंढ़ने निकला था और हां, नस्लवाद को लेकर भारतीय हर जगह एक से हैं. कोई अफ्रीकन लोगों के साथ मेट्रो मे बैठना नहीं चाहता. बसों में लोग उनसे दूर खड़े होते हैं. वो कोई चोरी या ड्रग बेचने नहीं आयें हैं. भारत में वो पढ़ने आयें हैं. उनकी आंखों मे सपने हैं. इस दौरान मैंने उन्हें और उन्होंने मुझे जाना. ये दोनों तरफ की जान-पहचान और बातचीत से ही मैंने इस मुद्दे को समझा है.’

भारत में आज कल जिस तरह से राष्ट्रवाद की हवा चली है उसमें भी दो तरह की तस्वीरें सामने आई है. पहली उसी भारत देश के ‘पूर्वोत्तर ’ और ‘दक्षिण भारतीयों’ के साथ भेदभाव क्योंकि वो ‘हम’ से दिखते अलग हैं.

आखिर कौन है ये ‘हम’? जो संविधान की पहली लाइन में अल्पसंख्यकों को उनके अधिकार देने का वादा करते हैं, जो मांस नहीं खाते और गाय को राष्ट्रीय पशु बनाना चाहते हैं, जो महिलाओं को अधिकार देने का वादा करते हैं.

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अर्नाल्ड को डॉक्टर कांगो के नाम से जाना जाता है. ये कांगोलीस सोसाइटी के प्रेसीडेंट हैं और साथ ही अफ्रीकन स्टूडेंट एसोसिएशन में भी पदाधिकारी हैं. ये अक्सर ही उन अफ्रीकी छात्रों की मदद करते हैं जो अपने आपको भारत में मुसीबत में पाते हैं. फरीदाबाद, 2016.(Credit: Mahesh Shantaram)

ये ‘हम’ हैं. भारत देश का हिंदू, उच्च वर्गीय, उच्च जाति, उत्तर भारत मे रहने वाले, ‘हेट्रोसेक्शुअल’ पुरुष वर्ग और ये वर्ग जो सबको अल्पसंख्यक बताता है उसकी संख्या मात्र 10% ही है.

और दूसरी ये लोग ‘अफ्रीकन’ लोगों को ‘अफ्रीकन’ कह कर भेदभाव करते हैं पर अफ्रीका कोई देश नहीं है ना ही पूरे अफ्रीका प्रान्त के लोग एक जैसे दिखते हैं. आखिर, इनकी राष्ट्रवाद की भाषा किस बात पर आधारित है?

महेश ने अपनी बातचीत में कहा,’मैक्समूलर हाल में हुए एक संवाद में पहली बार बहुत से लोगों को पता चला कि बंगलुरु में इतने सारे अफ्रीकन है. ये लोग दूर रहतें हैं क्योंकि स्थानीय लोग इनके साथ भेदभाव और इन पर शक करते हैं.’

साथ ही महेश ने बताया,’मुझे नहीं पता कि मेरे इस काम से कितने लोग प्रभावित होंगे. मुझे नहीं पता कि क्या वो अपनी बात 1 बिलियन जनता तक पहुंचा पायेंगे. मैं ऐसी उम्मीद भी नहीं कर रहा हूं. पर हां हर किसी को बातचीत करना जरूरी है. मैं कैमरे के ज़रिये ‘ज़ेनोफोबिया’ को संवाद में लाना चाहता हूं. हमें ज़रूरत है, नस्लवाद को समझने की और एकजुटता दिखाने की.’

Michel is the brother of Olivier Kitanda, who was murdered on May 20th in Delhi. He has just completed his studies here and wants to leave the country as soon as possible.

मिशेल, ओलिवर का भाई है जिसकी 20 मई 2016 को हत्या कर दी गई थी. उसने अपनी पढ़ाई पूरी कर ली है. वे जल्द से जल्द अपने देश जाना चाहते हैं. (Credit: Mahesh Shantaram)

तो अलग-अलग माध्यमों से प्रतिरोध की संस्कृति को बनाए रखना भी एक तरीका हो सकता है कि इन मुद्दों पर कम से कम बातचीत चलती रहे और इस तरह की हिंसात्मक घटनाए रुक सकें या कम हो सकें.

सोचने की ज़रूरत है कि हम यूरोप के लोगों को किस दृष्टि से देखतें है और क्यों? उन्हें खुद से ऊपर क्यों समझते हैं? उनकी संस्कृति से क्यों इतना प्रभवित हैं? अफ्रीका के लोगों को भेदभाव की दृष्टि से और खुद से नीचे क्यों देखतें हैं?

अंग्रेजो के औपनिवेशीकरण से तो हमें आज़ादी मिल गई है पर असल में हमें और कितने साल लगेंगे खुद की सोच, पसंद और स्वाद को पूर्व उपनिवेश से पूरी तरह स्वतंत्र करने में.

महेश शांताराम: द अफ्रीकन पोर्ट्रेट्स की यह प्रदर्शनी ‘तस्वीर’ की सहभागिता से एक्जिबिट-320 लाडो सराय में 16 जून तक लगी है.