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फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ का ‘हम देखेंगे’ मज़हब का नहीं अवामी इंक़लाब का तराना है…

जो लोग ‘हम देखेंगे’ को हिंदू विरोधी कह रहे हैं, वो ईश्वर की पूजा करने वाले ‘बुत-परस्त’ नहीं, सियासत को पूजने वाले ‘बुत-परस्त’ हैं.

फ़ैज़ अहमद फ़ैज़.

फ़ैज़ अहमद फ़ैज़. (फोटो साभार: ट्विटर)

आईआईटी कानपुर में इस बात की जांच होगी कि फ़ैज़ की रचना ‘हम देखेंगे’ हिंदू-विरोधी है या नहीं. मेरी उत्सुकता ये है कि कोई भी नज़्म/साहित्य ‘हिंदू विरोधी’ है या नहीं? या उसके निहितार्थ क्या हैं? इसको समझने और जांचने का तरीक़ा क्या हो सकता है?

ये सोचते हुए मुझे अचनाक उस क्लासरूम की याद आई, जहां शिक्षक शेर पढ़ने के बाद अपनी बात आमतौर से इस तरह शुरू करते थे कि… शायर इस शेर में ये कहना चाहता है, या शायर हमें ये बताना चाहता है…

मुझे ये तरीक़ा हमेशा से बचकाना लगता रहा क्योंकि मुझे इस ‘तरीक़े’ में  शायर को आरोपी बनाने की साज़िश की बू आती रही है. लेकिन अब मुझे अपने उन तमाम शिक्षकों पर बेपनाह प्यार आ रहा है जिन्होंने शायरी की टांगें तोड़ कर सारा इल्ज़ाम शायर को दे दिया कि शायर ये कहना चाहता है…और आज मुझे यक़ीन भी दिला दिया कि ऐसे अवांछित और सियासी मौक़े पर वो भी मेरे काम आ सकते हैं.

फ़ैज़ के जीते जी पहले ही कई बार पकिस्तान में फ़ैज़ की वजह से इस्लाम ख़तरे में आ चुका था और अब मरणोपरांत उन पर ‘हिंदू विरोधी’ होने का आरोप है. ख़ुदा जाने ये तथाकथित मज़हबी लोग अलग-अलग समय में भी एक ही लकीर को एक ही तरह से कैसे पीट लेते हैं.

हालांकि इस नज़्म में ऐसा कुछ नहीं है जिसको मनचाही ‘व्याख्या’ की सारी कोशिशों के बावजूद हिंदू विरोधी कहा जा सके, लेकिन फैकल्टी मेंबर को ख़ास तौर पर नज़्म के ‘बुत उठवाए जाएंगे’ और ‘नाम रहेगा अल्लाह का’ वाले हिस्से में ऐसा कुछ ‘नज़र’ आ गया जो उनकी व्याख्या में ‘हिंदू विरोधी’ है या हो सकता है.

फ़ैज़ की नज़्म को लेकर इस जारी विवाद को समझने की कोशिश करता हूं तो लगता है कि ये भी क्लासरूम वाली क़िस्म की साज़िश है. यहां शायर ने क्या कहा, नज़्म क्या कहना चाहती है, इसका क्या संदर्भ है- सब एक तरफ, बस एक शिक्षक को लगा कि शायर ये कहना चाहता है या उसमें दर्ज शब्दों का अर्थ हिंदू विरोधी है इसलिए एक कमेटी इसकी जांच करेगी.

कहीं किसी नज़्म में ‘अल्लाह’ शब्द दर्ज कर देने से या किसी के बोल देने से ये कैसे साबित होगा कि वो हिंदू विरोधी है? कहीं आप ये तो नहीं कहना चाहते कि ‘अल्लाह’ शब्द ही हिंदू विरोधी है? फिर गांधी जी के पसंदीदा भजन ‘रघुपति राघव राजा राम’ के ‘ईश्वर अल्लाह तेरो नाम…’ वाले ‘अल्लाह’ मियां का क्या किया जाएगा?

शायद आपको ये बात अच्छी न लगे लेकिन शायरी मज़हब से ज़्यादा पवित्र होती है. इतनी पवित्र कि ईश्वर-अल्लाह का फ़र्क़ मिट जाता है. शायद इसी फ़र्क़ को मिटता देख कुछ लोग फ़ैज़ और हबीब जालिब जैसे शायरों से चिढ़ जाते हैं.

मज़ेदार बात ये है कि फ़ैज़ की ये बेचारी नज़्म हमेशा से विवादों में रही है. एक ज़रा सा गूगल कीजिए तो पता चलेगा कि इस नज़्म की सिर्फ़ एक पंक्ति ‘हम देखेंगे’ को दीवार पर लिख देने की वजह से भी छात्रों को नोटिस थमाया जा चुका है.

बहाने-बहाने से इस तरह की नज़्मों पर आपत्ति का मतलब बहुत साफ है कि तमाम तरह के विरोध प्रदर्शनों में लोगों की आवाज़ बनने वाले तराने को कभी ‘धर्म’ के नाम पर दरकिनार करने की कोशिश की जाए, तो कभी स्कूल में बच्चे के तराने में भी मज़हब तलाश कर लिया जाए.


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फ़ैज़ को हिंदू विरोधी बताने वालों को जानना चाहिए कि वो हमेशा लोकतांत्रिक मूल्यों के लिए खड़े रहे, एक तरफ जहां अपने मुल्क पाकिस्तान में उन्होंने जन अधिकारों के लिए आवाज़ बुलंद की वहीं हिंदुस्तान में एक समय में नेहरू और इंदिरा गांधी के प्यारे इस शायर ने इंदिरा तक की आलोचना में किसी लाग लपेट से काम नहीं लिया.

पूर्व प्रधानमंत्री और पूर्व सूचना मंत्री इंद्र कुमार गुजराल लिखते हैं कि आपातकाल के ज़माने में फ़ैज़ ने कहा, ये ख़ूब किया, पाकिस्तान को जम्हूरी राह (लोकतंत्र के रास्ते) पर लाने के बजाय तुम लोग ख़ुद ही लुढ़क गए.

लोकतंत्र के लिए लड़ने वाला शायर भला किसी भी धर्म का अपमान कैसे कर सकता है. फिर सवाल ये है कि फ़ैज़ असल में क्या थे?

इसका कोई साधारण और सादा जवाब मुमकिन नहीं है, लेकिन मज़हब की बात करें तो वो शिद्दत पसंद नहीं थे, उन्होंने अक्सर ये कहा कि मैं सूफ़ी-सोशलिस्ट मुसलमान हूं और रूमी मेरे मुर्शिद (गुरु) हैं. मेरी शायरी भी इससे अलग नहीं है.

उनका मानना था कि सूफ़ी ही अपने समय के सबसे बड़े कॉमरेड होते हैं. एक बार उनसे पूछा गया कि कुछ लोग अपनी ज़ात (स्वयं) के हवाले से मज़हब को देखते हैं. तो उनका जवाब था, ‘बड़ी ख़ुशी से देखें मगर उनको कुछ नज़र आएगा तभी तो देखेंगे. अहम देखने वाली नज़र होती है.’

पत्नी के साथ फ़ैज़. (फोटो साभार: alchetron.com)

पत्नी के साथ फ़ैज़. (फोटो साभार: alchetron.com)

फ़ैज़ को समझने की कोशिश में याद आती है वो बात जब उनकी पत्नी एलिस ने अमृता प्रीतम को एक सवाल के जवाब में कहा था, मैं फ़ैज़ से अमृतसर में मिली, अमृतसर हिंदुस्तान बन गया और हिंदुस्तान फ़ैज़.

एक ज़माना वो था जब हिंदुस्तान का मतलब फ़ैज़ होता था. बात फ़ैज़ और हिंदुस्तान की ही करें तो जब-जब इन दो मुल्कों में तनाव हुआ फ़ैज़ ने उसको कम करने में अपनी बड़ी भूमिका निभाई. यहां तक कि उनको पकिस्तान में मुल्क का दुश्मन और भारत नवाज़ तक कहा गया. लेकिन वो अपनी करनी कर गुज़रने में यक़ीन रखते थे.

यहां उर्दू कहानीकार कृश्न चंदर और फ़ैज़ का एक प्रसंग भी याद आ रहा है, जो मास्को में पेश आया था. मास्को में दुनिया भर के रचनाकारों की कांग्रेस थी, जिसमें फ़ैज़ और कृश्न चंदर भी बुलाए गए थे. वहां हर मेहमान की मेज़ पर उसके मुल्क का झंडा लगा हुआ था.

हिंदुस्तान की तिरंगे वाली मेज़ से कोई 30 मेज़ की दूरी पर पकिस्तान का झंडा लगा था. कुछ देर बाद वहां फ़ैज़ आए और इधर उधर देखने लगे. फिर इन दोनों की नज़रें मिलीं और दोनों अपने-अपने मुल्क का झंडा लेकर आगे बढ़े और एक दूसरे के गले लग गए.

सारा हॉल ताली पीटने लगा. और फिर वहां कहा गया, ‘क्या समझते हैं ये लोग, हम लोग भी क्या पक्षपाती सियासतदानों की तरह एक दूसरे के दुश्मन हैं? साहित्य में ये दुश्मनी नहीं चलती और काश कहीं भी न चले.’

हिंदुस्तान में इसी फ़ैज़ की लोकप्रियता के बारे में पाकिस्तान में कहा जाता था कि वो तो अशोक कुमार बने फिरते हैं. इस तरह की बहुत-सी बातें हैं जो फ़ैज़ के लिए पेश की जा सकती हैं, लेकिन नफरत की भी अपनी एक सत्ता है जो फ़ैज़ की नज़्म की जांच करना चाहती है. सत्ता और सियासी आब-ओ-हवा हमेशा से यही करती आई है.

अच्छी बात ये है कि फ़ैज़ और फ़ैज़ की इस नज़्म से डरने वाले दोनों मुल्कों में अपनी-अपनी नफरत वाली दुकान चला रहे हैं. फ़ैज़ वहां इस्लाम के दुश्मन थे तो यहां हिंदू विरोधी.

इशारा पाकिस्तान की सियासत, जनरल ज़िया उल हक़ की तानाशाही और उनके फ़रमान की तरफ है. खैर से फ़ैज़ उस समाज और अवाम के शायर रहे, जहां लोकतंत्र की बहाली और जन अधिकारों के लिए उनका जेल आना-जाना लगा रहा.

फ़ैज़ ने जम्हूरियत की सलामती के लिए क्या नहीं लिखा और किस तरह की ‘नाफ़रमानी’ नहीं की, शायद इसलिए हिंदुस्तान और पाकिस्तान तो एक तरफ, उनकी आवाज़ को दुनिया भर में मज़लूमों ने अपने गले से लगाया.

इसी वजह से ये भी कहा गया कि क्या फ़ैज़ सिर्फ़ उस पाकिस्तान के नागरिक हैं जहां वो रहे या हर उस मज़लूम दुनिया के जहां सत्ता अपनी दमनकारी नीतियों के सहारे अवाम पर ज़ुल्म करती है.

जवाब देने की ज़रूरत नहीं है कि उनकी नज़्में जहां फिलिस्तीनी बच्चों को लोरी सुनाती हैं वहीं वियतनाम के मज़लूमों के साथ भी खड़ी हो जाती है. फ़ैज़ की अहमियत और ज़रूरत पर कभी और बात की जाएगी, अब उस नज़्म को सामने रखते हैं जिसको ‘हिंदू विरोधी’ कहा गया और फ़ैज़ जैसे इंसान-परस्त शायर को गाली देने की बेहूदा कोशिश की गई.

तो इस नज़्म से जुड़ा का एक दिलचस्प क़िस्सा है. जब जनरल ज़िया उल हक़ ने पाकिस्तान में हर तरह- बोलने, लिखने, पढ़ने यहां तक कि औरतों के साड़ी पहनने पर भी पाबंदी लगा रखी थी, ऐसे वक़्त में इक़बाल बानो जैसी कलाकार ने काले रंग की साड़ी पहन कर एहतिजाज दर्ज करते हुए लाहौर के एक स्टेडियम में ‘नाफ़रमानी’ को अपना अधिकार समझा और उसको व्यक्त करने के लिए इसी नज़्म का सहारा लिया.

कहते हैं लगभग पचास हज़ार लोगों ने उस वक़्त भी फ़ैज़ की इस नज़्म को अपनी आवाज़ दी, जब सत्ता के इशारे पर स्टेडियम की लाइट बंद कर दी गईं. याद करने वाली बात ये भी है कि वहां अवाम ने ‘इंक़लाब ज़िंदाबाद’ के नारे भी लगाए.

इस प्रसंग को दोहराते हुए अगर में थोड़ी देर के लिए सियासी ऐनक लगा लूं तो आपको बता सकता हूं कि उस वक़्त पाकिस्तान में जो ‘इंक़लाब ज़िंदाबाद’ के नारे लगाए गए वो हिंदुस्तानी नारा है. आप जानते ही होंगे कि ये नारा मौलाना हसरत मोहनी ने दिया था जिसको भगत सिंह और उनके दोस्तों ने भी अंग्रेज़ों के ख़िलाफ़ अपना हथियार बनाया.

अब इस संयोग पर क्या कहिए कि पाकिस्तानी अवाम, फ़ैज़ की नज़्म और हिंदुस्तानी नारा. फिर आप कह सकते हैं कि ये नारा इस्लाम विरोधी तो नहीं है न. बिल्कुल सही बात है कि ये नारा इस्लाम विरोधी नहीं है तो आपने ये कैसे मान लिया कि फ़ैज़ या फ़ैज़ की नज़्में हिंदू विरोधी हैं?

मैं क्लासरूम वाले शिक्षक की तरह फ़ैज़ की इस नज़्म पर बात करूं उससे पहले दो एक बातें याद करवा देना चाहता हूं और वो ये है कि फ़ैज़ कौन थे? आप चाहें तो इस तरह कह लीजिए कि फ़ैज़ आपके लिए क्या हैं? पाकिस्तानी शायर, मुसलमान शायर या सिर्फ़ मुसलमान इसलिए हिंदू विरोधी हैं?

आपने सही पढ़ा मैंने फ़ैज़ को कम्युनिस्ट और सोशलिस्ट नहीं लिखा मुसलमान लिखा है और फ़ैज़ ऐसे मुसलमान थे जिनको उनकी ज़िंदगी में ‘इस्लाम विरोधी’ कहा गया. जानकर शायद अच्छा लगे कि फ़ैज़ को इस्लाम विरोधी कहने वाले उतने ही मुसलमान थे जितना उनको कोई हिंदू विरोधी कहने वाला हिंदू हो सकता है.

दरअसल जो लोग इसको हिंदू विरोधी कह रहे हैं, वो ईश्वर की पूजा करने वाले ‘बुत-परस्त’ नहीं, सियासत को पूजने वाले ‘बुत-परस्त’ हैं. दाग़ ने कहा था,

ज़माना बुतों पर फ़िदा हो रहा है
ख़ुदा की ख़ुदाई में क्या हो रहा है

‘बुत’ यूं तो उर्दू शायरी में महबूब को कहा गया है, लेकिन यहां फ़ैज़ ने उन गूंगे, बहरे और अंधे सियासी रहनुमाओं को बुत कहा है जो सत्ता सनक में अवाम पर ज़ुल्म करते हैं. ये बुत न तो उर्दू शायरी वाली महबूबा है और न ही हिंदुओं की आस्था में दख़ल देते हुए किसी भगवान या ईश्वर की मूर्ति का वर्णन.

अगर आईआईटी के शिकायत करने वाले फैकल्टी मेंबर की तरह शब्दों और प्रतीकों को शब्दकोश के हिसाब से पढ़ने की कोशिश की जाए, तो फ़ैज़ क्या पूरी उर्दू शायरी सिर्फ़ इसलिए हिंदू विरोधी हो जाएगी कि उसमें काफ़िर, परस्तिश, सनम, बुतकदे जैसे शब्दों की कोई कमी नहीं है. हालांकि तब साथ-साथ ये शायरी इस्लाम विरोधी भी हो जाएगी.

यूं तो साहित्य की थोड़ी सी भी समझ रखने वालों के लिए फ़ैज़ की इस नज़्म को व्याख्या की जरूरत नहीं है. इसके बावजूद नज़्म को कुछ हिस्स्सों में तोड़कर देख लेते हैं कि नज़्म क्या कहना चाहती है. पहला हिस्सा मुलाहिज़ा कीजिए:

हम देखेंगे
लाज़िम है कि हम भी देखेंगे

वो दिन कि जिस का वादा है
जो लौह-ए-अज़ल में लिखा है

यहां सबसे पहली बात ये है कि इस नज़्म की शब्दावली और बहुत हद तक इसका टोन-आईडिया फ़ैज़ का अपना या मूल विचार नहीं है. उन्होंने इसमें बहुत कुछ क़ुरान से लिया है. इसके बावजूद ये नहीं कह सकते कि ये सिर्फ़ अनुवाद है.

दरअसल फ़ैज़ ने समकालीन समाज और सियासत को देखते हुए तमाम शब्दों और प्रतीकों को एक नए अर्थ में ढाल दिया और ये सब उन्होंने पूरी चेतना के साथ किया. इसलिए ये नज़्म अवाम की चेतना से भी जुड़ गई.

मिसाल के तौर पर यहां ‘वादा’ और ‘लौह-ए-अज़ल’ जैसे शुद्ध धार्मिक शब्द भी उस सत्ता के ख़िलाफ़ अवाम की आवाज़ बन गए हैं जिसमें अवाम का हिस्सा नहीं है. फ़ैज़ ख़ुद मानते रहे कि लौह-ए-अज़ल पर लिखा यानी अल्लाह या ईश्वर की मर्ज़ी भी यही है कि सत्ता वही है जिसमें अवाम शामिल हों और ये इंक़लाब आकर रहेगा.

साफ शब्दों में कहें तो इसमें तानाशाही के ख़िलाफ़ लोकतंत्र की जीत का यक़ीन दिलाया जा रहा है.


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एक बार जब फ़ैज़ से इंक़लाब के धार्मिक होने को लेकर सवाल किया गया तो उनका दो टूक जवाब था, ‘इंक़लाब  इस्लामी और ग़ैर-इस्लामी नहीं हुआ करते. जब लोग तख़्त-ओ-ताज को उल्टने और बादशाही निज़ाम को ताराज करने के लिए सड़कों और गलियों में निकल आएं तो फिर ये अवामी इंक़लाब बन जाता है.’

इस तरह देखिए तो ये अवामी इंक़लाब का तराना है. नज़्म का अगला हिस्सा देखिए.

जब ज़ुल्म-ओ-सितम के कोह-ए-गिरां
रूई की तरह उड़ जाएंगे

हम महकूमों के पांव तले
जब धरती धड़-धड़ धड़केगी

और अहल-ए-हकम के सर-ऊपर
जब बिजली कड़-कड़ कड़केगी

इस हिस्से में फ़ैज़ ने साफ तौर पर तानाशाही के ज़ुल्म-ओ-सितम को अवामी इंक़लाब के सामने ‘रूई की तरह उड़’ जाने का की बात एक ख़ास टोन में कही है, जो क़ुरान से लिया गया है.

इसी तरह नज़्म के अगले हिस्से में फ़ैज़ ने धार्मिक शब्दों और प्रतीकों का ख़ूब सहारा लिया है. मिसाल के तौर पर अर्ज़-ए-ख़ुदा, काबा, अहल-ए-सफ़ा, मरदूद-ए-हरम.

जब अर्ज़-ए-ख़ुदा के काबे से
सब बुत उठवाए जाएंगे

हम अहल-ए-सफ़ा मरदूद-ए-हरम
मसनद पे बिठाए जाएंगे

सब ताज उछाले जाएंगे
सब तख़्त गिराए जाएंगे

फ़ैज़ जिस अर्ज़-ए-ख़ुदा यानी ख़ुदा की ज़मीन पर काबे की बात कर रहे हैं वो तो शाब्दिक अर्थों और भूगोल के मुताबिक़ अरब में है. अगर इस संदर्भ में भी काबा की बात की जाए तो इतिहास हमें बताता है कि उस काबा से इब्राहिम के ही समय में ‘बुत’ हटा दिए गए थे. फिर फ़ैज़ किस काबे से बुत उठवाने की बात कर रहे हैं?

साहित्य के पाठक समझ सकते हैं कि जिस तरह शायर अपनी शायरी में माइथोलॉजी का इस्तेमाल करते हुए समकालीन अर्थों में अपनी बात कहता है वैसे ही वो इस्लामी प्रतीकों (तल्मीह) का प्रयोग करके भी समकालीन दुनिया की बात करता है.

मोहसिन ज़ैदी के साथ फ़ैज़. (फोटो: विकीमीडिया कॉमन्स)

मोहसिन ज़ैदी के साथ फ़ैज़. (फोटो: विकीमीडिया कॉमन्स)

यहां भी फ़ैज़ किसी अरब दुनिया और उसके काबे की बात नहीं कर रहे बल्कि उनके लिए ख़ुदा की ज़मीन और उसका काबा वो है जिस पर हमारी गूंगी, बहरी और अंधी सत्ता ने क़ब्ज़ा करके लोकतंत्र के मूल्यों को बदल दिया है.

इसी सियासी बुत को उठवाने की बात करते हुए फ़ैज़ अवाम को अहल-ए-सफ़ा मरदूद-ए-हरम अर्थात नेक और मासूम अवाम, जिसको सत्ता ने ख़ारिज दिया है जैसे विशेषण के साथ याद कर रहे हैं. और बता रहे हैं यही अवाम तानाशाही के ताज को उछालेगी और राज करेगी.

अब अगर अल्लाह वाले हिस्से पर बात करें तो यहां भी किसी धर्म विशेष की हिमायत या विरोध का कोई स्वर नहीं है, बल्कि फ़ैज़ ने यहां ‘अल्लाह’ को उस सच्चाई और ईश्वर के प्रतीक के तौर पर पेश किया है, जिसे मिटाया नहीं जा सकता.

बस नाम रहेगा अल्लाह का
जो ग़ायब भी है हाज़िर भी
जो मंज़र भी है नाज़िर भी

उट्ठेगा अनल-हक़ का नारा
जो मैं भी हूं और तुम भी हो

और राज करेगी ख़ल्क़-ए-ख़ुदा
जो मैं भी हूं और तुम भी हो

सच्चाई हर हाल में मौजूद होती है चाहे वो नज़र आए न आए. और इस सच्चाई का यक़ीन दिलाने के लिए फ़ैज़ ने ‘अनल-हक़’ की बात की है, और शायद आपको मालूम ही हो कि इस नारा को आपने समय के सूफ़ी-संत मंसूर हल्लाज ने बुलंद किया था जिसकी वजह से उनको फांसी दी गई थी.

याद रखने वाली बात है कि मंसूर ने उस सत्ता के ख़िलाफ़ ये नारा दिया था जिसने ख़ुद को ख़ुदा का दूत कह कर अवाम पर अपनी ख़ुदाई चला रखी थी.

ऐसे में एक ग़रीब धुनिया या जुलाहे के बेटे का ‘अनल-हक़’ कहना ही तानाशाही के ख़िलाफ़ आम आदमी की हुकूमत का ऐलान था. इस नारा को कुछ लोग अहं ब्रह्मास्मि के अर्थों में भी पेश करते हैं पर इसका शाब्दिक अर्थ है मैं सत्य हूं.

मैं और तुम की तमीज़ मिटा देने वाली इस नज़्म की सही तस्वीर आप हर उस प्रदर्शन में देख सकते हैं, जहां लोगों को उनके कपड़ों से नहीं पहचाना जा सकता.

आप उनको सिर्फ़ अवाम कह सकते हैं हिंदू और मुसलमान नहीं, जिनको डराने के लिए सत्ता कुछ भी कर सकती है और कर रही है. और फ़ैज़ जैसे शायर सरकार की इसी दमनकारी नीति के विरोधी हैं.

तो सिर्फ़ इस बिना पर कि कुछ शब्दों के अर्थों को लेकर आपकी सोच साफ नहीं है उसको हिंदू विरोधी या कुछ और कह दिया जाए बहुत ही हास्यास्पद है. और फ़ैज़ के शब्दों में कहें तो,

वो बात सारे फ़साने में जिसका ज़िक्र न था
वो बात उनको बहुत नागवार गुज़री है.