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सुशील मोदी ने बिहार में एनपीआर के लिए घोषित की तारीख, जदयू का भी समर्थन

बिहार के उपमुख्यमंत्री सुशील मोदी ने पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी और केरल के मुख्यमंत्रियों पी. विजयन को चुनौती दी कि वे सीएए और एनपीआर लागू नहीं करें, यदि वे ऐसा कर सकते हैं. उन्होंने कहा कि कोई भी मुख्यमंत्री सीएए और एनपीआर लागू करने से इनकार नहीं कर सकता, चाहे वह इनके विरोध में क्यों न हो.

Patna: Bihar Chief Minister Nitish Kumar with Dy Chief Minister Sushil Kumar Modi during a Gandhi Jayanti function, at Gandhi Maidan in Patna, Tuesday, Oct 2, 2018. (PTI Photo) (PTI10_2_2018_000063B)

बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के साथ उप मुख्यमंत्री सुशील मोदी. (फोटो: पीटीआई)

पटना: बिहार के उपमुख्यमंत्री सुशील मोदी ने शनिवार को कहा कि राज्य में राष्ट्रीय जनसंख्या रजिस्टर (एनपीआर) के लिए आंकड़ों को जुटाने की प्रक्रिया 15 मई से 28 मई 2020 के बीच होगी.

इस दौरान उन्होंने कहा कि राष्ट्रीय नागरिक पंजी (एनआरसी) के मुद्दे पर चर्चा करने का कोई सवाल नहीं है क्योंकि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने स्पष्ट किया है कि सरकार ने इस पर कभी चर्चा नहीं की.

उन्होंने यहां संवाददाताओं से कहा, ‘एनपीआर और एनआरसी दो अलग अलग चीजें हैं.’ उन्होंने कांग्रेस और राजद पर इसको लेकर और सीएए को लेकर भ्रम फैलाने का आरोप लगाया.

पिछले महीने नागरिकता संशोधन कानून (सीएए) और प्रस्तावित देशव्यापी एनआरसी का विरोध करते हुए जदयू उपाध्यक्ष प्रशांत किशोर ने कहा था कि पार्टी प्रमुख और बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार एनआरसी के खिलाफ थे. इसकी पुष्टि करते हुए राष्ट्रीय प्रवक्ता केसी त्यागी ने कहा था कि एनआरसी लागू नहीं होगा. इसके साथ ही जदयू भाजपा की सहयोगी पहली ऐसी पार्टी बन गई थी जिसने एनआरसी का खुलकर विरोध किया था.

इस दौरान सुशील मोदी ने शनिवार को पश्चिम बंगाल और केरल के मुख्यमंत्रियों क्रमश: ममता बनर्जी और पी. विजयन को चुनौती दी कि वे संशोधित नागरिकता कानून (सीएए) और राष्ट्रीय जनसंख्या रजिस्टर (एनपीआर) लागू नहीं करें, यदि वे ऐसा कर सकते हैं.

उन्होंने कहा, ‘कोई भी मुख्यमंत्री सीएए और एनपीआर लागू करने से इनकार नहीं कर सकता, चाहे वह इनके विरोध में क्यों न हो. ना पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ना केरल के मुख्यमंत्री पी. विजयन ही यह कह सकते हैं कि वे अपने राज्यों में एनपीआर लागू नहीं करेंगे. वे जनता के लिए कुछ भी कह सकते हैं. लेकिन वे सीएए और एनपीआर को ना नहीं कह सकते…पश्चिम बंगाल सहित प्रत्येक राज्य में जनगणना निदेशक की पहले ही नियुक्ति की जा चुकी है.’

इंडियन एक्सप्रेस के अनुसार, उन्होंने कहा कि यदि कोई अधिकारी एनपीआर का विरोध करता है, तो उसे तीन साल की जेल की सजा के साथ दंडित किया जा सकता है. अगर कोई एन्यूमरेटर या कलेक्टर कहता है कि वह ऐसा नहीं करेगा, तो उसे तीन साल तक की सजा हो सकती है. एनपीआर कवायद का विरोध करने पर अनुशासनात्मक कार्रवाई और 1,000 रुपये के जुर्माने का प्रावधान है.

बता दें कि, पश्चिम बंगाल और केरल ने यह कहते हुए एनपीआर के लिए आंकड़े इकट्ठे करने की प्रक्रिया पर रोक लगा दी है कि इसका इस्तेमाल एनआरसी के लिए किया जा सकता है.

गृह मंत्रालय की साल 2018-19 की सालाना रिपोर्ट में कहा गया है कि एनआरसी लागू करने की दिशा में एनपीआर पहला कदम है. वहीं, अपने पहले कार्यकाल में नरेंद्र मोदी सरकार ने संसद में कम से कम नौ बार बताया था कि एनआरसी को एनपीआर आंकड़ों के आधार पर पूरा किया जाएगा.

जदयू प्रवक्ता त्यागी ने कहा, यह यूपीए सरकार है जिसने 2010 में जनगणना प्रक्रिया के विस्तार के रूप में एनपीआर पेश किया था. जब तक एनपीआर डेटा एनआरसी के लिए उपयोग नहीं किया जाता है तब तक हमें कोई समस्या नहीं है. अब जब पीएम ने स्पष्ट कर दिया है कि एनआरसी को लागू नहीं किया जाएगा, तो मामला शांत हो गया है. इसके अलावा, मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने स्पष्ट कर दिया है कि एनआरसी लागू नहीं किया जाएगा; एनपीआर के साथ आगे बढ़ने में अब कोई समस्या नहीं है.

(समाचार एजेंसी भाषा से इनपुट के साथ)