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गृह मंत्रालय ने अक्टूबर 2019 में एनपीआर के लिए आधार नंबर अनिवार्य करने का किया था प्रस्ताव

द वायर एक्सक्लूसिव: दस्तावेज़ों से पता चलता है कि केंद्र सरकार ने एनपीआर में अनिवार्य रूप से आधार इकट्ठा करने के लिए आधार क़ानून या नागरिकता क़ानून में भी संशोधन करने का प्रस्ताव रखा था.

Aadhaar-1200x560 Illustration by The Wire

(इलस्ट्रेशन: द वायर)

नई दिल्ली: राष्ट्रीय जनसंख्या रजिस्टर (एनपीआर) को अपडेट करने के दौरान आधार नंबर इकट्ठा करने के विवादों के बीच गृह मंत्रालय ने आश्वासन दिया है कि जिन लोगों के पास आधार नंबर नहीं है, उन्हें ऐसे दस्तावेज देने के लिए मजबूर नहीं किया जाएगा.

हालांकि आधिकारिक दस्तावेजों से पता चलता है कि केंद्र एनपीआर में वैकल्पिक या ऐच्छिक नहीं, बल्कि अनिवार्य रूप से आधार इकट्ठा करना चाहता था. सरकार इस कदर बेकरार थी कि उसने अनिवार्य रूप से आधार इकट्ठा करने के लिए आधार कानून या नागरिकता कानून में भी संशोधन करने का प्रस्ताव रखा था. द वायर  द्वारा प्राप्त किए गए सरकारी रिकॉर्ड से ये खुलासा हुआ है.

19 जुलाई 2019 की एक फाइल नोटिंग के मुताबिक, आधार पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले और आधार एवं अन्य कानून (संशोधन) एक्ट, 2019 को ध्यान में रखते हुए गृह मंत्रालय के अधीन भारत के रजिस्ट्रार जनरल का कार्यालय (ओआरजीआई) ने इलेक्ट्रॉनिक्स और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय (एमईआईटीवाई) को पत्र लिखकर एनपीआर में आधार नंबर लेने की इजाजत मांगी थी.

इसे लेकर एमईआईटीवाई के सचिव और आधार जारी करने वाली एजेंसी भारतीय विशिष्ट पहचान प्राधिकरण (यूआईडीएआई) के सीईओ को 19 जुलाई 2019 को पत्र लिखा गया था. बाद में छह अगस्त 2019 को इसे लेकर इलेक्ट्रॉनिक्स और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय के संयुक्त सचिव एस. गोपालाकृष्णन की अध्यक्षता में मीटिंग हुई थी.

द वायर  ने इस मीटिंग के मिनट्स की कॉपी प्राप्त की है. मिनट्स के मुताबिक, इस बैठक में ये फैसला किया गया कि भारत के रजिस्ट्रार जनरल का कार्यालय इस तरीके से एनपीआर में आधार नंबर ले सकता है, जो आधार (सूचनाओं को साझा करना) रेगुलेशन, 2016 के ‘क्लॉज 5’ के मानदंडों के अनुरूप हो.

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वो फाइल नोटिंग जो दर्शाता है कि शुरु में इलेक्ट्रॉनिक्स और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय ने शर्तों के साथ आधार नंबर इकट्ठा करने की इजाजत दी थी.

‘क्लॉज 5’ के मुताबिक, अगर कोई एजेंसी आधार नंबर इकट्ठा करती है तो उसे आधार धारक को ये जानकारी इकट्ठा करने का कारण और आधार नंबर देना अनिवार्य है या नहीं, ये बताना होता है. इसके अलावा उस विशेष कार्य के लिए व्यक्ति का आधार नंबर इस्तेमाल करने के लिए उसकी सहमति लेनी होती है.

इसके अलावा आधार इकट्ठा करने वाली एजेंसी उस आधार नंबर को सिर्फ उसी काम के लिए इस्तेमाल कर सकती है जिसके लिए आधार धारक से सहमति ली गई है. इन शर्तों के आधार पर एनपीआर के लिए आधार नंबर लेने की इजाजत दी गई थी.

इसके जवाब में 23 अगस्त 2019 को नोटिंग पर अतिरिक्त रजिस्ट्रार जनरल संजय ने लिखा कि हम ऐच्छिक यानी कि वैकल्पिक तरीके से आधार नंबर को इकट्ठा कर रहे हैं और 2015 के दौरान पहले से इकट्ठा किए गए आधार नंबर को यूआईडीएआई से प्रमाणित किया जाए.


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हालांकि कुछ दिन बाद रजिस्ट्रार जनरल कार्यालय ने अचानक से अपना स्टैंड बदल लिया. करीब दो महीने बाद रजिस्ट्रार जनरल कार्यालय को ये एहसास हुआ कि आधार इकट्ठा करने के लिए इलेक्ट्रॉनिक्स और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय द्वारा तय की गई शर्त यानी कि ‘क्लॉज 5’ उनके लिए लागू नहीं होता है, क्योंकि वह एक सरकारी संस्था है.

आईटी मंत्रालय की शर्तों का उल्लेख करते हुए रजिस्ट्रार जनरल कार्यालय ने लिखा, ‘इससे (क्लॉज 5) ऐसा प्रतीत होता है कि रजिस्ट्रार जनरल कार्यालय सिर्फ ऐच्छिक रूप से एनपीआर में आधार नंबर इकट्ठा कर सकता है. हालांकि ये सलाह रजिस्ट्रार जनरल कार्यालय पर लागू होती नहीं दिखाई देती है, क्योंकि यह एक सरकारी संस्था है.’

यहां से सरकार ने ये तय किया कि वे एनपीआर अपडेट करते हुए अनिवार्य रूप से आधार इकट्ठा कर सकते हैं. प्राप्त किए गए दस्तावेज इसकी पुष्टि करते हैं.

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रजिस्ट्रार जनरल कार्यालय ने प्रस्ताव रखा कि अगर मौजूदा नियमों के तहत ऐसा नहीं हो पाता है तो इसके लिए आधार एक्ट और नागरिकता कानून में संशोधन किया जाए.

12 अक्टूबर 2019 को भारत के रजिस्ट्रार जनरल विवेक जोशी द्वारा हस्ताक्षर की गई फाइल नोटिंग में लिखा गया है, ‘नागरिकता कानून, 1955 की धारा 14ए(5) के प्रावधान के मुताबिक भारत के नागरिकों के अनिवार्य पंजीकरण में अपनाई जाने वाली प्रक्रिया ऐसी होगी जिसे पूर्व निर्धारित किया जा सकता है. इसलिए नागरिकता नियमों, 2003 के नियम 3(4) के तहत जनसंख्या रजिस्टर बनाने के लिए दौरान हम आधार नंबर को अनिवार्य बना सकते हैं.’

कार्यालय ने ये भी प्रस्ताव रखा कि अगर मौजूदा नियमों के तहत ऐसा नहीं हो पाता है तो इसके लिए आधार एक्ट और नागरिकता कानून में संशोधन किया जाए.

दस्तावेज के मुताबिक, ‘एनपीआर अपडेट करने और रजिस्ट्रार जनरल कार्यालय के जन्म और मृत्यु के पंजीकरण के लिए नागरिक पंजीकरण प्रणाली (सीआरएस) योजना के लिए भी आधार नंबर को अनिवार्य रूप से इकट्ठा करने के लिए आधार अधिनियम या नागरिकता अधिनियम में संशोधन किया जा सकता है.’

इस संबंध में फैसला लेने के लिए केंद्रीय गृह सचिव की अध्यक्षता में 18 अक्टूबर 2019 को एक उच्चस्तरीय बैठक की गई थी, लेकिन अभी ये पता नहीं चल पाया है कि इसमें क्या निर्णय लिया गया. हालांकि कुछ मीडिया रिपोर्ट्स में सूत्रों के हवाले से ये दावा किया जा रहा है कि एनपीआर, 2020 में आधार ऐच्छिक रूप से लिया जाएगा.

इस बैठक में यूआईडीएआई के सीईओ, इलेक्ट्रॉनिक्स और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय के सचिव, कानून मंत्रालय के विधि कार्य विभाग के सचिव और रजिस्ट्रार जनरल कार्यालय के प्रतिनिधि शामिल थे.

इससे पहले द वायर  ने अपनी पिछली रिपोर्ट में बताया था कि एनपीआर, 2020 की प्रक्रिया शुरू करने से पहले ही करीब 60 करोड़ आधार नंबर को एनपीआर डेटाबेस के साथ जोड़ा जा चुका है. ये संख्या कुल जारी किए गए आधार नंबर का लगभग 50 फीसदी है.

एनपीआर की शुरुआत 2010 में तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के नेतृत्व वाली यूपीए सरकार द्वारा की गई थी. इसके पायलट प्रोजेक्ट की तैयारी दो साल पहले शुरू हुई थी जब शिवराज पाटिल (22 मई 2004 से 30 नवंबर 2008) और पी. चिदंबरम (30 नवंबर, 2008 से 31 जुलाई, 2012) गृह मंत्री थे.