भारत

क्या हम सैन्यवादी राष्ट्रवाद की ओर बढ़ रहे हैं?

इसके पहले किसी जनरल या सैन्य अधिकारी के प्रेस कांफ्रेंस की कोई मिसाल हमें याद नहीं. पाकिस्तानी सेना के आत्मसमर्पण के समय भी नहीं. सेना को हमेशा नागरिक सत्ता के आदेशों का अनुसरण करते हुए देखा गया.

Leetul Farook 1

अमरिंदर सिंह, उस ख़ून की प्यासी भीड़ का हिस्सा हैं, जिससे ख़बरदार रहने की सलाह प्रताप भानु मेहता ने सेना को दी है. इसमें हैरत जैसा कुछ भी नहीं कि अमरिंदर सिंह की बात को सेना और सरकार ने तवज्जो दी है. सिंह, मेजर नितिन लीतुल गोगोई के लिए विशेष मेडल के ख़्वाहिशमंद थे. सेना प्रमुख ने उनकी बात सुन ली है. कश्मीर गहराते दर्द और बढ़ते गुस्से के साथ राज्य में व्याप्त बेचैनी और अशांति का हल निकालने की रणनीति को लेकर भारत में बन रही सर्वसम्मति को देख रहा है.

ख़ुद को महाराजा और कैप्टेन कहलाना पसंद करने वाले अमरिंदर सिंह के हर शब्द से टपकनेवाला घमंड, श्रेष्ठता-भाव, संवेदनहीनता और कश्मीर पर मिल्कियत का हिंसक बोध, वास्तव में कठोर सैन्यवादी भारतीय मन की अभिव्यक्ति है, जो कश्मीर को बेरहमी से अपने पांव तले कुचलकर रखना चाहता है.

कश्मीर में एक कथित यु़द्ध में मुब्तला सेना को खुली छूट देने के विचार को अरुण जेटली के समर्थन में भी ऐसा कुछ नहीं है, जिसे विडंबना का नाम दिया जा सके. इसमे भी कुछ चौंकाने लायक नहीं है कि संविधान की शपथ लेने वाला और एक ‘धर्मनिरपेक्ष’ दल से ताल्लुक रखने वाला मुख्यमंत्री सेना को जनता और राजनीतिक शक्ति से उपर रखते हुए कहता है, ‘सेना को खुली छूट दी जानी चाहिए ताकि वह देश के लिए फ़ायदेमंद शर्तों पर शांति बहाल कर सके.’

ऐसा कहते हुए वे ये बात भूल जाते हैं कि शांतिवार्ता करना, देश या जनता के लिए फ़ायदेमंद शर्तें तय करना सेना का काम न होकर चुनी हुई सरकार का काम है.

इस संदेश को हमें ज़रूर ध्यान से पढ़ना चाहिए. संदेश यह है कि सेना सर्वोच्च है और संसद और न्यायपालिका, दोनों में से किसी के भी प्रति जवाबदेह नहीं है. हाल ही में सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में यह दरख़्वास्त लगाई है कि वह मणिपुर में सेना द्वारा की गई ज़्यादतियों की जांच कराने के अपने आदेश को वापस ले ले.

यानी हमें अपने ज़ेहन में कुछ चीज़ें साफ़-साफ़ बैठा लेनी चाहिए: यह सिर्फ़ कश्मीर की बात नहीं है. यह नए भारत की कहानी है जिसमें सेना जनता से बिना किसी बंदिश के अपनी शर्तों पर निपटेगी. दरअसल, हमें इसका अंदेशा तभी लगा लेना चाहिए था, जब इस साल सेना दिवस के मौक़े पर सेना प्रमुख ने आकाशवाणी और दूरदर्शन से सीधे राष्ट्र को संबोधित किया था.

बीबीसी के राजेश प्रियदर्शी के मुताबिक इसे भारत के लिए एक बदलाव की घड़ी के तौर पर रेखांकित किया जाना चाहिए. एक नयी पटकथा लिखी जा रही है, जिसमें सेना सिर्फ़ एक पेशेवर संस्था नहीं है, बल्कि एक ऐसी संस्था है जिससे देश की जनता को वैसे ही डरना चाहिए, जैसे बिगड़े हुए बच्चे सख़्त अभिभावक से डरते हैं.

इस नयी पटकथा में मेजर गोगोई की भूमिका नये रचनात्मक जीनियस की है. उन्होंने कश्मीरियों के ख़ून को तुच्छ और उनके अपमान को बीच बाज़ार तमाशे की चीज़ बना दिया है. यह कश्मीरियों के लिए संदेश है. यह उन्हें बताने के लिए है कि उनकी हैसियत खिलौनों से ज़्यादा नहीं है.

इसी के साथ भारतीयों की राष्ट्रवादी प्यास को बुझाया गया है. यह प्यास सिर्फ़ क्षेत्र विस्तार के एहसास, और दूसरी आबादियों को मातहत करके ही बुझाई जा सकती है.

वैसे, फ़ारूक़ अहमद डार की तस्वीर बेहद प्रतीकात्मक थी: बंधे हुए हाथों वाला व्यक्ति सिर्फ़ फ़ारूक़ अहमद डार नहीं था. वह कश्मीर था, जिसके दोनों हाथों को भारत के बर्बर बल ने बांध रखा था. यह अपमान की पराकाष्ठा थी. इसका मक़सद कश्मीरियों की चेतना में बेबसी और निर्बलता का एहसास भरना था, जिनकी आंखों के सामने इस पूरे दृश्य को अंजाम दिया गया, जिसमें एक व्यक्ति से उसकी पूरी मानवीय गरिमा छीन ली गई, वह भी उसके ही आदमियों के सामने.

इस सबमें एक भी गोली नहीं चली. ख़ून का एक क़तरा भी नहीं बहा. लेकिन हक़ीक़त यह है कि हमने किसी इंसान के अपमान की इससे ज़्यादा निर्मम तस्वीर हाल के समय में नहीं देखी. यह एक दोहरी हिंसा की कार्रवाई थी: एक व्यक्ति के साथ-साथ उसके साथी गांव वालों पर, जिन्हें ग़ुलाम तमाशबीन में तब्दील कर दिया गया.

गोगोई यह सब हमारी तरफ़ से कर रहे थे. हमने इस असाधारण तमाशे की सराहना की, जो हमारे ख़र्च को बचाने वाला और हमारा मनोरंजन करने वाला भी था. फिर इसके बीच कुछ दरबारी मसखरेबाज भी शामिल हो गए, जिन्होंने कई क़दम आगे बढ़ते हुए यह इच्छा जताई कि गोगोई को अरुंधति रॉय और दूसरे मानवाधिकार कार्यकताओं के साथ भी डार वाला सुलूक करना चाहिए.

यह फ़र्क़ है हमारे और हमें ग़ुलाम बनाने वाले ब्रिटेन के जनता के बीच जिसकी ओर पॉर्थ चैटर्जी ने ध्यान दिलाया. जनरल डायर को अपने किए पर कोई पछतावा न था. गोगोई को भी नहीं है. लोग पॉर्थ से नाराज़ हैं क्योंकि उनके हिसाब से डायर ने हत्या की थी, गोगोई ने गोली भी नहीं चलाई. लेकिन गोगोई ने उससे भी भयानक काम किया: कश्मीरियों को उनकी औक़ात बता कर. यही तो हम भी चाहते थे! इसलिए गोगोई हमारा नायक है. लेकिन डायर ब्रिटेन का नायक न बन सका था.

यह तथ्य कि सम्मानित किए जाने के बाद मेजर गोगोई द्वारा मीडिया के मार्फ़त राष्ट्र को फिर से किए गए संबोधन ने हमें न आघात पहुंचाया और न हमें नाराज़ किया, बदल रहे समय का परेशान करने वाला संकेत है.

गोगोई और वर्तमान सेना प्रमुख से पहले किसी जनरल या सैन्य अधिकारी के प्रेस कांफ्रेंस करने की कोई मिसाल हमें याद नहीं. ऐसी कोई नज़ीर 1971 में पाकिस्तानी सेना द्वारा आत्मसमर्पण या ऑपरेशन ब्लू स्टार और कारगिल युद्ध के बाद भी नहीं मिलती. इन सबमें असली क़िरदार सेना ने ही निभाया था.

लेकिन उसने हमेशा ख़ुद को कर्ताधर्ता के तौर पर देखे जाने से परहेज किया. सेना को हमेशा नागरिक सत्ता के आदेशों का अनुसरण करते हुए देखा गया. अब कहा जा रहा है कि उसे वह प्रमुखता दी जाए, जिसकी वह हक़दार है.

और यह सब हालात की असाधारणता के नाम पर किया जा रहा है. लेकिन भारत के दूसरे हिस्सों में भी अलग-अलग तरह के ‘आतंकवादी’ हैं. जितनी नफ़रत कश्मीर के आतंकवादियों से की जाती है, उतनी नफ़रत माओवादी शब्द से भी की जाती है. सेना को इनसे मुक़ाबला करने के लिए भी खुली छूट और सज़ा से मुक्ति देनी होगी.

आदिवासियों की पहचान को माओवादियों से मिला दिया गया है. कश्मीरियों की तरह वे भी साधारण इंसान नहीं हैं. वे माओवादियों को पनाह देते हैं और भारत की सरकार की सर्वोच्चता को चुनौती देते हैं. और माओवादी होना ही जुर्म मान लिया गया है.

सेना प्रमुख ने आगे यह भी कहा है कि दहशतगर्दों की मदद करने वालों के साथ भी दहशतगर्दों जैसा सलूक किया जाएगा. यह कौन तय करेगा कि ये मददगार कौन है! अब तो यह कहा जाता रहा है कि ये सब जेएनयू या दूसरे विश्वविद्यालयों में छात्रों और अध्यापकों का भेस धरकर छिपे हैं और उन्हें पहचानने का काम एकमात्र राष्ट्रवादी छात्र संगठन कर रहा है. तो फिर अब इस देश में देशद्रोहियों की पहचान कर उनके ख़ात्मे का काम करना है और वह सेना करेगी, ऐसा सेना प्रमुख कह रहे हैं.

कई पूर्व सैन्य अधिकारी मेजर गोगोई के कृत्य को कायराना मानते हैं. यह अंतरराष्ट्रीय समझौतों के भी ख़िलाफ़ है. हाल ही में भारत ने अंतरराष्ट्रीय समझौतों का हवाला देते हुए पाकिस्तान द्वारा कुलभूषण जाधव को फांसी की सज़ा देने के ख़िलाफ़ इंटरनेशनल कोर्ट ऑफ़ जस्टिस का दरवाज़ा खटखटाया. लेकिन भारत ख़ुद अपनी ज़मीन के अंदर छत्तीसगढ़, झारखंड, मणिपुर और जम्मू-कश्मीर में इन समझौतों को सुविधाजनक ढंग से नजरअंदाज़ करता है और इनकी धज्जियां उड़ाता है.

अमरिंदर सिंह कश्मीर जैसे हालात का सामना करने के लिए ‘दांत के बदले दांत और नाखून के बदले और नाखून’ की नीति की वकालत करते हैं. वे यह नहीं चाहते कि हमारी सेना भद्रलोक की सेना बनी रहे. अपने हालिया बयान में सेना प्रमुख ने एक तरह से उनकी ही भावनाओं को फिर से दोहरा दिया है. ये सब अपने सैनिकों को दबंगों में बदल देना चाहते हैं. लेकिन दबंग आख़़िरकार किसी बाहुबली के चाकर ही बन कर रह जाते हैं!

वर्तमान सरकार, सत्ताधारी दल की ऊंची आवाज़ के बल पर ख़ुद को वैधता देने के लिए राष्ट्रवाद को हवा दे रही है. वह यह दिखाने की कोशिश कर रही है कि वह देश की पहली सरकार है, जो सेना के साथ खड़ी है. सेना ने भी सरकार के सुर में सुर मिलाते हुए उसके राष्ट्रवादी एजेंडे को अपना एजेंडा बना लिया है.

हाल ही में सेना के उप-प्रमुख और एक एयर मार्शल ने एक सरकारी कार्यक्रम में शिरकत की, जिसमें भारत माता की तस्वीर के सामने फूल चढ़ाए गए. इस तस्वीर में भारत माता शेर पर सवार थीं, उनके हाथों में एक भगवा झंडा था. इसके पीछे एक वृहद भारत का नक़्शा था, जो हमारे आज के भारत से, जिसमें हम रहते हैं, कहीं ज़्यादा बड़ा था.

उन्होंने इस तस्वीर को सलामी दी और जब वंदे मातरम का पूरा गान किया गया, तो वे सावधान की मुद्रा में खड़े रहे. वंदे मातरम के राजकीय अवसरों पर गाए जाने का विरोध मुसलमान के नहीं, प्रत्येक समझदार भारतीय करता रहा है.

समाज का हर तबका सेना को एक तटस्थ बल के तौर पर देखता आया है. हिंसक स्थितियों में कमज़ोरों के द्वारा हमेशा सेना से मदद की गुहार लगाई जाती रही है. लेकिन अब राष्ट्रवाद के एक ख़ास संस्करण की हमजोली बनना मंज़ूर करके वह सम्मान और तटस्थता का वह स्थान गंवाती जा रही है.

देश की सेना को राष्ट्रवादी सेना में तब्दील करना भाजपा के एजेंडे को रास आता है. यह बेवजह नहीं है कि अपने संवैधानिक अधिकारों के लिए संघर्ष करने वाले छात्रों, शिक्षकों, कलाकारों और मज़दूरों के मुंह पर दम तोड़ते सैनिकों की तस्वीर मार दी जाती है. यह कहना कठोर लग सकता है, लेकिन यह सच है कि भारत में सत्ताधारी राष्ट्रवाद हमेशा बहुसंख्यक राष्ट्रवाद ही होगा.

अमरिंदर सिंह जैसे लोग एक ऐसे वैचारिक माहौल का निर्माण कर रहे हैं जो सैन्यवादी राष्ट्रवाद को वैधता प्रदान करता है, जिसमें लोगों के मौलिक अधिकार ख़ासतौर पर स्थगित कर दिए जाते हैं, क्योंकि ऐसा समय कभी नहीं आता है, जब सरकार अपनी आबादी के हर तबके के साथ पूरी शांति की स्थिति में आ जाए. इसलिए यह सिर्फ़ कश्मीर का सवाल नहीं है. कश्मीर तो बस एक आड़ है.

(अपूर्वानंद दिल्ली विश्वविद्यालय में प्रोफेसर हैं.)

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