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क्या टाइम्स आॅफ इंडिया के संपादक ने अपने हित के लिए पत्रकारिता को ताक पर रख दिया?

अगर टाइम्स ऑफ इंडिया या अन्य अख़बार के संपादक किसी मंत्री से कहकर नियुक्ति में कोई बदलाव करवा सकते हैं, तो क्या इसके एवज में मंत्रियों को इन अख़बारों की संपादकीय नीति प्रभावित करने की क्षमता मिलती है?

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नॉर्थ ब्लाक, जहां वित्त मंत्रालय में टाइम्स ऑफ इंडिया के कार्यकारी संपादक दिवाकर अस्थाना ने एक आयकर अधिकारी की नियुक्ति के लिए अरुण जेटली से मुलाकात की थी. (फोटो: विकीमीडिया/ रॉयटर्स)

बीते दिनों वित्त मंत्री अरुण जेटली और देश के दो वरिष्ठ पत्रकारों के बीच वॉट्सऐप पर हुई बातचीत के सार्वजनिक हो जाने के बाद मौजूदा सरकार द्वारा ब्यूरोक्रेसी में ऊंचे पदों पर हो रही नियुक्तियों के तरीक़े पर कई सवाल खड़े हो रहे हैं.

एक सवाल बड़े अख़बारों के संपादकों की निष्पक्षता से जुड़ा है. ये चिंताजनक है कि निजी हितों के लिए अख़बार के संपादक अधिकारियों के पक्ष में उसी सरकार के वरिष्ठ मंत्रियों के एहसान ले रहे हैं, जिनके बारे में निष्पक्ष होकर लिखने की ज़िम्मेदारी उन पर है.

गुरुवार, 8 जून को एक वेबसाइट द्वारा यह बातचीत सार्वजनिक की गई थी, जिसकी सत्यता की पुष्टि द वायर द्वारा की गई है. ये मैसेज टाइम्स ऑफ इंडिया  के पत्रकारों के एक निजी वॉट्सऐप ग्रुप से लीक हुए थे.

सूत्रों की मानें तो ये मैसेज टाइम्स ऑफ इंडिया  के कार्यकारी संपादक दिवाकर अस्थाना द्वारा भेजा गया था. नीचे दिया गया ये मैसेज ग़लती से टाइम्स ऑफ इंडिया के दिल्ली ब्यूरो वॉट्सऐप ग़्रुप पर चला गया. इस मैसेज में दिवाकर इकोनॉमिक टाइम्स  के पूर्व संपादक व ओपन  पत्रिका के संपादक पीआर रमेश से किसी अनाम आयकर अधिकारी की लॉबिंग कर रहे हैं.

गौर करने वाली बात है कि दिवाकर अस्थाना, पीआर रमेश और वित्त मंत्री अरुण जेटली के बीच हुई बैठक बताती है कि सरकार किस तरह से ‘आईटीओयू’ पैनल की पोस्टिंग का निर्णय लेती है.

यहां आईटीओयू पैनल का अर्थ संभवतः ‘इनकम टैक्स ओवरसीज यूनिट्स’ यानी आयकर की विदेश इकाईयों से है. आईटीओयू आयकर अधिकारियों का वो समूह होता है, जिनकी नियुक्ति विदेश में स्थापित भारतीय दूतावास में होती है. ये अधिकारी भारतीय और विदेशी आयकर अधिकारियों के बीच संपर्क के रूप में काम करते हैं.

इन तीनों के बीच हुई इस मुलाक़ात में पत्रकारों ने जेटली और उनके निजी सचिव सीमंचला दास (जिन्हें वाट्सऐप मैसेज में ‘दास’ कहकर संबोधित किया गया है) से इस अनाम अधिकारी की नियुक्ति लंदन आईटीओयू में करने की बात कही है.

हालांकि इसमें समस्या यह सामने आ रही थी कि ऐसी नियुक्तियां भारत के केंद्रीय प्रत्यक्ष कर बोर्ड (सीबीडीटी) द्वारा की जाती हैं, जो इसे विदेश मंत्रालय के विदेशी सेवा बोर्ड को भेजता है.

दिवाकर के मैसेज से पता चलता है कि वे किस तरह से सुझाव देकर इस फैसले को बदलने की कोशिश कर रहे हैं. वे लिखते हैं:

‘मैंने कहा है कि वित्त मंत्री को अधिकार है कि वे सीबीडीटी के फैसले को बदल सकते हैं. दास का कहना था कि हम पूरे आईटीओयू पैनल में फेर-बदल कर सकते हैं पर केवल लंदन के लिए कोई नाम रखना अच्छा नहीं लगेगा. इस पर वित्त मंत्री ने कहा, ‘ ठीक है चलो.’

दिवाकर का पूरा मैसेज इस प्रकार है:

बाबू, रमेश के साथ आईटीओयू के मामले में वित्त मंत्री से मिला. उन्होंने दास को बुलाया और वित्त मंत्री के सामने उसने स्वीकार कि सीबीडीटी ने तुम्हें ग़लत तरह से डेप्यूटेशन पर रखा जबकि तुम असल में स्टडी लीव पर थे. वित्त मंत्री के सामने ये बात भी साफ कर दी गई कि तुम्हारी फेलोशिप सरकार की तरफ से नहीं दी गई है. दास ने वित्त मंत्री से कहा कि अरुण जी ने सीधे सीबीडीटी प्रमुख से बात कर ली थी, इसलिए वो इस बातचीत के बीच में नहीं थे. दास ने वित्त मंत्री को ये भी बताया कि मामला अब वित्त मंत्रालय के हाथ में नहीं है क्योंकि सीबीडीटी ने इसे विदेश मंत्रालय के विदेश सेवा बोर्ड को भेज दिया है. इस पर मैंने कहा है कि वित्त मंत्री को अधिकार है कि वे सीबीडीटी के फैसले को बदल सकते हैं. दास का कहना था कि हम पूरे आईटीओयू पैनल में फेर-बदल कर सकते हैं पर केवल लंदन के लिए कोई नाम आगे रखना अच्छा नहीं लगेगा. इस पर वित्त मंत्री ने कहा, ‘ठीक है चलो. तुम इस बारे में क्या सोचते हो.’

मीडिया लॉबिंग करती सरकार

पीआर रमेश 2013 में ‘ओपन’ पत्रिका से जुड़े थे. हालांकि द वायर से बातचीत में पत्रिका के संपादक एस प्रसन्नाराजन ने बताया कि अब रमेश किसी संपादकीय पद पर नहीं हैं. पत्रिका में रमेश के नाम से आख़िरी लेख 7 अप्रैल 2017  को प्रकाशित हुआ है.

वहीं कई सरकारी वेबसाइटों के अनुसार, विजय वसंत लंदन में भारत के उच्च आयोग में प्रथम सचिव (आईटीओयू) हैं. ऐसा हो सकता है कि ये वही अधिकारी हों, जिन्हें हटाए जाने की बात दिवाकर और रमेश कर रहे थे. ब्यूरोक्रेसी की गतिविधियों पर नज़र रखने वाली वेबसाइट व्हिस्पर्स इन कॉरिडोर  के अनुसार वसंत समेत दूसरे देशों में नियुक्त कुछ अन्य अधिकारियों को हाल ही में सेवा विस्तार (एक्सटेंशन) दिया गया है.

द वायर ने वित्त मंत्रालय और सीबीडीटी को भी सवालों की एक लंबी फ़ेहरिस्त भेजी है, जिनका जवाब मिलने पर इस लेख को अपडेट कर दिया जाएगा.

द वायर ने दिवाकर से भी इस पर उनकी प्रतिक्रिया मांगी है, वे अभी देश से बाहर हैं. इसके अलावा हमने टाइम्स ऑफ इंडिया समूह से भी प्रतिक्रिया जाननी चाही, लेकिन उन्होंने इसमें किसी तरह का निजी हित होने पर कुछ कहने से इनकार कर दिया.

जेटली और टाइम्स ऑफ इंडिया के वरिष्ठ पत्रकारों के बीच हुए इस बातचीत से बहुत से सवाल उठते हैं, ख़ासकर उस समय जब मोदी सरकार और मीडिया के बीच संबंधों पर कड़ी नज़र बनी हुई है.

यहां विशेष रूप से आरोप यह है कि मीडिया का एक हिस्सा जो सरकार की हां में हां नहीं मिलाता, सरकार के निशाने पर रहता है, साथ ही अन्य मीडिया संस्थानों के मालिकों और संपादकों की सरकार से नज़दीकी के चलते संपादकीय नीति के सरकार के पक्ष में हो जाने के मौक़े भी बढ़ जाते हैं.

इस अनाम अधिकारी की पोस्टिंग को लेकर इन दो संपादकों का जो भी निजी हित रहा हो, उसकी नौकरी को लेकर किए गए दावों की सच्चाई जो हो, लेकिन लीक हुए ये मैसेज साफ़ दिखाते हैं कि किस तरह दो पत्रकार देश के वित्त मंत्री से कहकर किसी हो चुकी पोस्टिंग को बदलवा सकते हैं.

दूसरी चिंताजनक बात है कि एनडीए सरकार में किस हद तक मीडिया लॉबिंग और एक-दूसरे से से फ़ायदे लेने की प्रथा प्रचलित है. वित्त मंत्रालय के उच्च पदाधिकारियों को छोड़ दें, तब भी क्या किसी सरकारी विभाग को नियुक्तियों के संबंध में ग़ैर-सरकारी व्यक्तियों से चर्चा करनी चाहिए?

अगर टाइम्स ऑफ इंडिया या किसी अन्य अख़बार के संपादक मंत्री से कहकर किसी नियुक्ति में कोई बदलाव करवा सकते हैं, तो क्या इसके एवज में मंत्रियों को इन अख़बारों की संपादकीय नीति प्रभावित करने की क्षमता मिलती है?

भारत में, विशेष तौर पर मनमोहन सिंह की यूपीए सरकार के दौरान सामने आए राडिया टेप ने बताया था कि किस तरह से प्रेस निजी रूप से और अपने समाचार रिपोर्टों के माध्यम से संगठित क्षेत्र और उसके निर्वाचित अधिकारियों के बीच एक महत्वपूर्ण संपर्क का काम करती है.

उस दौरान सामने आई ऑडियो रिकॉर्डिंग में वरिष्ठ पत्रकारों की कॉरपोरेट लॉबिस्ट नीरा राडिया के साथ जो बातचीत सामने आयी, वहां वे पत्रकार या समाज के ‘वाचडॉग’ से ज़्यादा सत्ता के दलाल लग रहे थे.

जनवरी, 2017 में फ्रंटलाइन  पत्रिका में छपी एक रिपोर्ट का हवाला देते हुए द वायर ने बताया था कि किस तरह हिंदुस्तान टाइम्स  के एक वरिष्ठ संपादक शिशिर गुप्ता अपने निजी हित के चलते केंद्र सरकार और आम आदमी पार्टी के बीच चल रहे विवाद में भाजपा की मदद कर रहे थे.

हालांकि हिंदुस्तान टाइम्स  ने अपने वरिष्ठ संपादक के सत्तारूढ़ दल से निजी रिश्तों के आरोप  से इनकार करते हुए कहा कि मीडिया में सार्वजानिक हुई शिशिर की बातचीत पत्रकारिता का जायज़ हिस्सा है.

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