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क्या भाजपा अंग्रेज़ों की फूट डालो-राज करो की नीति पर चल रही है?

सीएए-एनआरसी के ख़िलाफ़ हो रहे प्रदर्शनों में लंबे समय बाद हिंदू-मुस्लिम एकता वापस नज़र आ रही है, जिससे सत्तारूढ़ भाजपा में बेचैनी देखी जा सकती है. ऐसी ही बैचेनी 1857 की क्रांति के बाद अंग्रेज़ों में दिखी थी, जिससे निपटने के लिए उन्होंने फूट डालो-राज करो की नीति अपनाई थी.

Vaishali: BJP National President and Union Home Minister Amit Shah addresses an awareness rally on Citizenship Amendment Act (CAA) at Kharauna Pokhar near Vaishali, Thursday, Jan. 16, 2020. (PTI Photo) (PTI1_16_2020_000088B)

फोटो: पीटीआई

नागरिकता संशोधन कानून (सीएए), नेशनल पॉपुलेशन रजिस्टर (एनपीआर) और राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर (एनआरसी) के खिलाफ हो रहे प्रदर्शनो में लंबे समय बाद हिंदू-मुस्लिम एकता वापस नजर आ रही है. इस एकता को देखकर सत्ताधारी भाजपा में बैचेनी साफ दिख रही है.

ऐसी ही बैचेनी 1857 क्रांति के बाद अंग्रेजोंं में दिखी थी. अंग्रेजों ने इससे निपटने के लिए फूट डालो राज करो की नीति अपनाई थी, देखें भाजपा क्या कर रही है? और जो वो कर रही है, वो सिर्फ दिल्ली जैसे छोटे-से राज्य के चुनाव के लिए हुआ? या मीडिया के जरिये पूरे देश को परोसा जा रहा है?

गृह मंत्रालय ने सूचना के अधिकार कानून के तहत पूछे गए एक सवाल के जवाब में बताया कि देश में कही भी कोई भी ‘टुकड़े-टुकड़े गैंग’ का अस्तित्व नहीं है.

लेकिन अपने ही मंत्रालय के जवाब को धता बताते हुए अमित शाह और उनकी पूरी पार्टी जिस तरह से एक के बाद एक शाहीन बाग के आंदोलनकारियों और उससे जुड़े लोगो पर ‘टुकड़े-टुकड़े गैंग’ से लेकर देशद्रोही और गद्दार होने के आरोप करार देते हुए रोज जिस बेशर्मी से एक नया बयान दे रही है, उससे साफ है कि भाजपा हर कीमत पर हिंदू-मुस्लिम एकता को तोड़कर वोटों का ध्रुवीकरण करना चाहती थी.

उन्होंने शाहीन बाग के नाम से सीधे-सीधे एक समुदाय विशेष के खिलाफ खुला अभियान छेड़ दिया और उन्हें देश तोड़ने वाला बताया जा रहा है.

अमित शाह ने साफ-साफ कहा कि ईवीएम का बटन इतनी जोर से दबाएं कि उसका करंट शाहीन बाग में लगे. कपिल मिश्रा ने पहले दिल्ली चुनाव को भारत बनाम पाकिस्तान बताया और अब वो चुनाव के बाद शाहीन बाग खाली कराने की बात करके आग को और हवा दे रहे है.

मोदी सरकार के वित्त राज्यमंत्री अनुराग ठाकुर ने तो इशारों-इशारों में गद्दार बताकर गोली मारने के नारे भी लगवा दिए. वैसे भी यह एक पुराना नारा है और इस का इशारा किस तरफ है, यह सब जानते हैं.

और इस इशारे को समझकर दिल्ली में पहले शाहीन बाग में एक व्यक्ति पिस्तौल के साथ पकड़ा गया और फिर एक 17 साल के युवा ने जामिया के प्रदर्शनकारी छात्रों पर फायर किया और पुलिस मूकदर्शक बनी रही.

दिल्ली से भाजपा सांसद परवेश वर्मा ने तो और आगे जाकर यहां तक कह दिया कि शाहीन बाग के आंदोलनकारी दिल्ली में लोगों के घरों में घुसकर बलात्कार करेंगे, इनसे बचना है तो भाजपा को वोट करो. इसके अलावा, उन्होंने सरकारी जमीन पर बनी सभी मस्जिदों को तोड़ने की घोषणा भी कर दी.

वोटो के ध्रुवीकरण में सबसे आगे रहने वाले उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री आदित्यनाथ ने अपना पुराना राग अलापा कि कांग्रेस और आप तो शाहीन बाग वालों बिरयानी खिला रहे हैं मगर हम पहले हम बोली से समझाते है और नहीं माने तो फिर उन्हें हमारी सेना/पुलिस गोली मारती  हैं.

दिल्ली के चुनाव में एक बार फिर हिंदू-मुस्लिम का मुद्दा छेड़कर भाजपा के चाणक्य ने यह साफ कर दिया है कि मीडिया भले ही उनकी रणनीति के कितने ढोल पीटे, और भले ही सबका साथ, सबका विकास का दावा करे लेकिन उसकी राजनीति का मूलमंत्र फूट डालो राज करो ही है.

वैसे भी यह कोई नई बात नहीं है. भाजपा राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की जिस दक्षिणपंथी विचारधारा से आती है, वो इतिहास को मुस्लिम और हिंदू राजाओं के बीच धर्म के नाम पर हुई दुश्मनी के रूप में पेश करते आई है.

जब बचपन में संघ की शाखा में खेलने के लिए जाता था, तो हमें बताया जाता था कि कैसे मुस्लिम राजाओं ने हिंदू राजाओं और हिंदू धर्म को खत्म करने का काम किया. मगर यह सच नहीं है.

अगर आप इतिहास उठाकर देखेंगे तो आपको समझ आएगा कि न तो किसी भी राजा ने धर्म के नाम पर आपस में युद्ध किया और न ही राज किया; सारे युद्द सत्ता के नाम पर हुए.

सत्ता के लिए, हिंदू राजा, हिंदू राजा से और मुस्लिम राजा, मुस्लिम राजा से लड़ते थे और एक दूसरे से भी; हिंदू राजाओ के मुस्लिम सेनापति और मुस्लिम राजा के हिंदू सेनापति भी होते थे. इसे और ढंग से समझने के लिए भारतीय राजाओं के ऊपर डॉ. राम पुनियानी की वीडियो सीरीज देख सकते हैं.

असल में फूट डालो और राज करो की नीति के बीज अंग्रेजों ने  बोए थे क्योंकि वे जानते थे कि हिंदुस्तान पर राज करना है तो हिंदू-मुस्लिम को एक नहीं होने देना है.  ब्रिटिश जनरल, सर चार्ल्स नेपियर ने तो 1835 में ही कहा था, ‘जिस दिन यह बहादुर और योग्य स्थानीय लोग [भारतीय] एक साथ आना सीख गए, उस दिन यह हमारी तरफ दौड़ेंगे और हमारा खेल खत्म हो जाएगा.’

भारत के विभिन्न शहरों में नागरिकता संशोधन कानून के खिलाफ लगातार प्रदर्शन चल रहा है. (फोटो: पीटीआई)

भारत के विभिन्न शहरों में नागरिकता संशोधन कानून के खिलाफ लगातार प्रदर्शन चल रहा है. (फोटो: पीटीआई)

आदिवासी तो लंबे समय से अंग्रेजों से लड़ते आए थे. लेकिन जब 1857 में देश के मैदानी इलाके के एक हिस्से में अंग्रेजों के खिलाफ क्रांति हुई, तो इस दौरान हिंदू राजाओं ने आखिरी मुगल बादशाह बहादुर शाह जफर को अपना नेता बनाया और उनके नेतृत्व में भारतीय सैनिकों ने अंग्रेजों के खिलाफ युद्ध का ऐलान कर दिया.

अंग्रेजों की सेना में भी बहादुर शाह जफर ने इसकी कीमत मुगल वंश के खात्मे से चुकाई. अंग्रेजों ने न सिर्फ बहादुर शाह जफर के दो बेटों और पोते को दिल्ली में स्थित खूनी दरवाजे (दिल्ली  गेट के पास बने) पर नंगा कर सरेआम गोली मार मुगल खानदान को खत्म कर दिया, बल्कि बहादुर शाह जफर बर्मा में निर्वासित कर दिए गए, जहां वो अपने वतन भारत वापस लौटने की इच्छा करते-करते मर गए. जबकि हमें बताया गया कि मुगलों ने कैसे भारत को लूटा.

इस हिंदू-मुस्लिम एकता को देखकर अंग्रेज घबरा गए. उन्होंने सेना में विद्रोह के कारण समझने के लिए पील कमीशन बनाया. इस कमीशन के सामने 47 ब्रिटिश अफसरों ने अपनी बात रखी, जिसने 7 मार्च 1859 को औपनिवेशिक भारत की सेना कैसी हो, इस बारे में अपनी रिपोर्ट सौंपी.

इसमें सबने एक स्वर में कहा, जब अलग-अलग धर्म और जाति के सैनिक एक दूसरे से कंधे से कंधा मिलाकर लड़ते हैं, तो उनके बीच के विवाद, पूर्वाग्रह, मतभेद धीरे-धीरे मिट जाते हैं. मुम्बई के गवर्नर लार्ड एल्फिन्स्टन ने 14 मई, 1859 को लिखा, ‘डिवाइड एट एम्पेरा (divide et Impera) जो रोमन शासकों का मंत्र था, वो ही अब हमारा भी मंत्र होना चाहिए.’

इसके बाद, अंग्रेजों ने अधिकारिक तौर पर न सिर्फ सेना में बल्कि नागरिक प्रशासन में भी ‘फूट डालो और राज करो’ की नीति अपनाई. इसका परिणाम पहले 1905 में, धर्म के आधार पर बंगाल के विभाजन के रूप में सामने आया.

बिस्मिल, भगत सिंह, गांधी, मौलाना आजाद, सुभाष चन्द्र बोस आदि के नेतृत्व में हुए आजादी के आंदोलन में एक बार फिर हिंदू-मुस्लिम एक होकर लड़े. लेकिन इस दौर में मुस्लिम और हिंदू दोनों में कुछ संगठन और विचारधारा ऐसी भी थी, जो इस एकता के खिलाफ थी. समय-समय पर अंग्रेज इन्हें बल देते थे.

जिन्ना की टू नेशन थ्योरी के काफी पहले सावरकर भी द्विराष्ट्र के सिद्धांत का प्रतिपादन कर चुके थे, जिसका परिणाम और 1947 में देश के विभाजन के रूप में देखने को मिला. ऐसी ही एक ताकत के प्रतिनिधि नाथूराम गोडसे ने गांधीजी की जान ली.

90 के दशक में राम मंदिर के लिए शुरू हुई रथयात्रा से गुजरात में हुए 2002 के दंगो तक हमने वोटों के ध्रुवीकरण का एक खेल देखा. पिछले कुछ सालों से  हम चुनाव दर चुनाव वोटों के ध्रुवीकरण के लिए किए जा रहे नए-नए खेल देख रहे हैं.

यह अब हमारी जवाबदारी है कि हम गांधी की शाहदत को बेकार न जाने दें और हिंदू-मुस्लिम एकता को बरकरार रखे और इस फूट डालो और राज करो की नीति को पूरी तरह नकारे.

(लेखक समाजवादी जन परिषद के कार्यकर्ता हैं.)