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प्रधानमंत्री की आर्थिक सलाहकार परिषद की सदस्य ने कहा- बजट में दूरदर्शिता का अभाव

प्रधानमंत्री की आर्थिक सलाहकार परिषद की अंशकालिक सदस्य आशिमा गोयल ने इंदिरा गांधी इंस्टीट्यूट फॉर डेवलपमेंट रिसर्च में कहा कि वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण के करीब तीन घंटे के भाषण में आर्थिक नरमी का एक बार भी जिक्र नहीं होना हैरान करने वाली बात है.

Ashima Goyal. Photo: Youtube/SKOCH TV

प्रधानमंत्री की आर्थिक सलाहकार परिषद की सदस्य आशिमा गोयल. (फोटो: Youtube/SKOCH TV)

मुंबई: प्रधानमंत्री की आर्थिक सलाहकार परिषद की अंशकालिक सदस्य आशिमा गोयल का मानना है कि आम बजट में दूरदर्शिता का अभाव दिखता है. हालांकि, राजकोषीय घाटे के लक्ष्य में ढील देना तथा आयकर को सरल बनाना सकारात्मक कदम है.

गोयल ने इंदिरा गांधी इंस्टीट्यूट फॉर डेवलपमेंट रिसर्च में कहा कि वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण के करीब तीन घंटे के भाषण में आर्थिक नरमी का एक बार भी जिक्र नहीं होना हैरान करने वाली बात है.

उन्होंने कहा हालांकि बजट में आर्थिक वृद्धि को गति देने के लिए राजकोषीय मोर्चे पर उपाय किया जाना तथा खर्च को लेकर जिम्मेदारी बरतना इसे संतुलित बनाता है.

उन्होंने कहा, ‘कुल मिलाकर बजट निराश करने वाला है क्योंकि नई सरकार के पहले बजट में जो दृष्टिकोण होने चाहिए थे, इसमें उनका अभाव है. भविष्य को लेकर दृष्टिकोण दिखना चाहिए था.’

गोयल ने कहा, ‘हैरान करने वाली बात रही कि ऐसे समय में जब हर कोई आर्थिक नरमी को लेकर हलकान है, करीब तीन घंटे के लंबे बजट भाषण में इसका एक भी बार जिक्र नहीं किया गया. इस बात की कोई चर्चा नहीं हुई कि बजट किस तरह से आर्थिक नरमी से जूझने वाला है.’

उन्होंने कहा, हालांकि वित्त मंत्री ने अपने कदमों से संतुलन साधने का काम किया है. उनका बजट में आर्थिक नरमी से जूझने के लिए 2008-09 की तरह के उपायों का सहारा नहीं लेना सराहनीय है. तब राजकोषीय घाटे में चार प्रतिशत तक की वृद्धि हो गयी थी और ब्याज दर सर्वकालिक निचले स्तर पर आ गई थी.

इनके अलावा कराधान के मोर्चे पर भी बजट में सकारात्मक उपाय किए गए हैं.

गोयल ने कहा कि बजट में सरकार ने प्रत्यक्ष व्यय का अधिक जोर पूंजीगत व्यय पर रखा है, जिससे पता चलता है कि राजकोषीय मोर्चे पर गुणवत्ता पहले से बेहतर है.

बजट में छोटी गैर-बैंकिंग वित्तीय कंपनियों की मदद के उपाय किए गए हैं, जो अर्थव्यवस्था को आगे बढ़ाने में मदद करेंगे क्योंकि अभी भी इस तरह की ज्यादातर कंपनियों के साथ तरलता का संकट है.

समाचार एजेंसी पीटीआई के अनुसार, उन्होंने कहा, ‘पारदर्शिता के स्तर पर सरकार अवसरवादी है. भारतीय खाद्य निगम जैसी संस्थाओं के माध्यम से ऑफ-बजट ऋणों को बताते हुए विश्वसनीयता को जोड़ा गया है.’

आरबीआई की दरों में कटौती के बारे में बैंकों की अनिच्छा को उन्होंने छोटी बचत दरों के दबाव और ब्याज आय पर एक बड़ी आबादी की निर्भरता का हवाला दिया.

उन्होंने कहा, ‘हम एक अर्थव्यवस्था के रूप में कम ब्याज दर, कम मुद्रास्फीति की अर्थव्यवस्था में जाने के इच्छुक नहीं हैं.’

(समाचार एजेंसी भाषा से इनपुट के साथ)