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19 साल पुराने मामले में सामाजिक कार्यकर्ता निखिल डे समेत पांच को सज़ा

आरटीआई कार्यकर्ता निखिल डे के अलावा चार अन्य लोगों पर अजमेर के एक गांव के सरपंच ने मारपीट करने का आरोप लगाया था.

RTI Activist Nikhil Dey

आरटीआई कार्यकर्ता निखिल डे.

मजदूर किसान शक्ति संगठन (एमकेएसएस) के कार्यकर्ता निखिल डे और पूर्व सरपंच रहीं सामाजिक कार्यकर्ता नौरती बाई को अजमेर के किशनगढ़ की एक निचली अदालत ने मंगलवार को 4 महीने के कारावास की सज़ा सुनाई है.

हालांकि इन कार्यकर्ताओं द्वारा अतिरिक्त जिला एवं सत्र न्यायालय में अपील के चलते न्यायालय ने सज़ा पर ने रोक लगा दी है.

मामला 6 मई 1998 का है जब आरटीआई कार्यकर्ता निखिल डे अपने साथी नौरती बाई, छोटू लाल, रामकरण और बाबूलाल के साथ हरमाड़ा गांव के सरपंच प्यारेलाल टाक से विकास कार्यों में हो रहे भ्रष्टाचार से जुड़ी जानकारी लेने के उद्देश्य से मिलने गए थे.

प्यारेलाल शराब का ठेकेदार है, जिस पर शौचालय बनवाने, इंदिरा आवास योजना और विकास कार्यों के लिए मजदूरों के दिए जाने वाले भुगतान में भ्रष्टाचार के आरोप लगे थे.

एमकेएसएस द्वारा जारी एक विज्ञप्ति में कहा गया है, ‘क्योंकि सरपंच का दफ्तर उस समय बंद था इसलिए कार्यकर्ता खंड विकास अधिकारी (बीडीओ) का एक पत्र उन्हें देने उनके घर गए थे. तब सरपंच घर से बाहर आए और कार्यकर्ताओं से मारपीट की.’

टाइम्स ऑफ इंडिया से बात करते हुए निखिल डे ने बताया, ‘सरपंच के पास शराब की दुकान का भी लाइसेंस था, इसलिए शायद ही कभी वो अपने दफ्तर में मिलता. हमने ज़रूरी दस्तावेज़ों के रिकॉर्ड को लेकर कई बार उनसे संपर्क किया, सात महीनों में कार्यकर्ता 73 बार उनके पास गए. जब स्थानीय कार्यकर्ताओं को रिकॉर्ड नहीं मिले तब मैं उनके साथ सरपंच के घर गया. जब हम वहां पहुंचे तो वो अपने घर के बाहर अपनी मोटरसाइकिल धो रहा था. हमने उन्हें बुलाया पर उसने अपने रिश्तेदारों को बुलाया और हमसे धक्कामुक्की की. नौरती महिला है और दलित भी हैं, इसलिए उन्हें उन लोगों ने अपशब्द भी कहे. सरपंच के एक रिश्तेदार ने हाथ से पिस्तौल का इशारा करते हुए हमसे ख़बरदार रहने और वापस न आने को कहा.’

बावजूद इसके एमकेएसएस ने सरपंच पर कोई एफआईआर नहीं दर्ज करवाई लेकिन एमकेएसएस की कार्यकर्ता अरुणा रॉय ने भ्रष्टाचार से संबंधी सूचना मुहैया करवाने के लिए ज़िला कलेक्टर को पत्र लिखा था. इसके दो दिन बाद सरपंच ने कार्यकर्ताओं के ख़िलाफ़ उससे मारपीट करने की एफआईआर दर्ज करवाई. ठीक उसी दिन नौरती देवी ने भी अनुसूचित जाति एवं जनजाति अत्याचार निवारण अधिनियम के तहत सरपंच प्यारेलाल पर मुकदमा दायर किया था.

मीडिया में आई रिपोर्टों के  मुताबिक दोनों ही मुक़दमे बाद में बंद कर दिए गए और पुलिस ने फाइनल रिपोर्ट सौंप दी थी. पर सरपंच प्यारेलाल द्वारा दायर किया मुकदमा 30 जून 1998 को बंद हुआ था पर 5 जुलाई 2001 में इसे दोबारा खोला गया.

इसी मामले में मंगलवार को किशनगढ़ की एक निचली अदालत ने फैसला सुनाते हुए आईपीसी की धारा 323 (जानबूझकर चोट पहुंचाने) और 451 (अपराध करने के उद्देश्य से बिना इजाज़त प्रवेश) के तहत निखिल डे समेत पांचों आरोपियों को 4 महीने की जेल की सज़ा और सौ रुपये का जुर्माने की सज़ा सुनाई.

इस पूरे मसले पर एमकेएसएस का कहना है कि उन्हें झूठे आरोपों में फंसाया जा रहा है. उन्होंने कहा है कि वे सच को सामने लायेंगे.

निखिल डे ने मीडिया से बात करते हुए कहा, ‘फर्ज़ी गवाहों के ज़रिये ये दावा किया गया था कि मैंने किसी को मुक्का मारा. पर हमने नहीं सोचा था कि ऐसा कोई फैसला आएगा. ये दिखाता है कि देश में कोई जानकारी जुटाना कितना मुश्किल है. आरटीआई कार्यकर्ताओं को धमकाया जाता है, उन पर हमले होते हैं, मारपीट होती है. कितने ही तो मारे जाते हैं. अगर इस मामले में दोष सिद्ध नहीं भी होता तब भी इसमें वक़्त, पैसे और मेहनत की बर्बादी तो हुई ही होती.’

कोर्ट के इस फैसले से अन्य सामाजिक कार्यकर्ताओं के बीच भी खासा रोष है. पीपुल्स यूनियन फॉर सिविल लिबर्टीज़ (पीयूसीएल) ने इस निर्णय की निंदा की है. उनकी ओर से जारी एक बयान में कहा गया, ‘पीयूसीएल कोर्ट के इस फैसले से सहमत नहीं है. ऐसा लगता है कि बचाव पक्ष द्वारा पेश किए गए तथ्यों और सबूतों को कोर्ट ने कोई तवज्जो ही नहीं दी है. हम इसके ख़िलाफ़ अपील करेंगे और हमें विश्वास है की सच्चाई की जीत होगी.’

पीयूसीएल की प्रदेश अध्यक्ष कविता श्रीवास्तव और महासचिव अनंत भटनागर ने कहा है कि इस फैसले से न तो कार्यकर्ताओं के मनोबल को गिराया जा सकता है न ही उनके आंदोलन को कमज़ोर किया जा सकता है. उन्होंने कहा, ‘इससे हम और ज़्यादा हिम्मत से लड़ने के लिए प्रोत्साहित होंगे.’