भारत

सामूहिकता के बिना मूर्खता का जीवित रहना संभव नहीं है

भारत एक सांस्कृतिक इकाई है. बावजूद भिन्न भाषाओं, पहनावों और खानपान के हम सब मूर्खता के एक सूत्र में बंधे हैं. राष्ट्रीय एकता का यह प्रदर्शन और प्रमाण दिल को तसल्ली देता है.

कोरोना वायरस के संक्रमण के मद्देनज़र 22 मार्च 2020 को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के आह्वान पर हुए जनता कर्फ्यू के दौरान सड़क पर निकले विभिन्न शहरों के लोग. (फोटो साभार: ट्विटर)

कोरोना वायरस के संक्रमण के मद्देनज़र 22 मार्च 2020 को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के आह्वान पर हुए जनता कर्फ्यू के दौरान सड़क पर निकले विभिन्न शहरों के लोग. (फोटो साभार: ट्विटर)

नेता ने एक जांच सुझाई. सबने न सिर्फ़ बिना न-नुकुर, बल्कि ख़ुशी-ख़ुशी ख़ुद को उसके लिए पेश किया और सब पॉज़िटिव पाए गए.

जांच अहमकपन की थी. राष्ट्रव्यापी जांच थी और किसी क्षेत्र ने निराश नहीं किया. इससे सिद्ध हुआ कि भारत एक सांस्कृतिक इकाई है.

बावजूद भिन्न भाषाओं, पहनावों और खानपान के हम सब मूर्खता के एक सूत्र में बंधे हैं. राष्ट्रीय एकता का यह प्रदर्शन और प्रमाण दिल को तसल्ली देता है.

अहमकपन, मूर्खता और मूढ़ता का ध्वनि प्रभाव भिन्न-भिन्न है, लेकिन इन्हें समानार्थी माना जाना चाहिए. भारतीय भाषाओं में इडियट शब्द ने भी घुसपैठ कर ली है और अपना ही लगने लगा है!

मूर्खता साक्षर, निरक्षर का भेद नहीं करती. गरीब, अमीर के बीच अंतर उसके लिए बेमानी है. वह धर्मनिरपेक्ष, रंगभेद से मुक्त, जाति निरपेक्ष भी है.

मूर्खता एक ऐसा कवच है जो आपको हर आपदा की चिंता से सुरक्षित रखती है. मूर्ख पॉज़िटिव होता है. हर मायने में.

वह कबीर नहीं है और न बुद्ध है. ज्ञान की खोज भटकाती है, नींद उड़ा देती है. मूर्ख चैन से सोता है. जागते-जागते भी सोता रहता है.

दास कबीर जागता है और रोता है. क्यों रोता है? क्यों जागता है? जब नेता तेरे लिए रतजगा कर रहा है तो तू भी जगकर क्यों राष्ट्रीय ऊर्जा व्यर्थ कर रहा है?

मूर्ख मूर्खता के वरदान के लिए विधाता का या जिसे भी वह विधाता मनाता है, उसका कृतज्ञ होता है और उसके लिए कुछ भी बलिदान करने को तत्पर होता है.

इसलिए संभवतः प्रत्येक प्रकार के ईश्वर को मूर्ख प्रिय होता है. नेता की छवि में ईश्वर की झलक मिलती है, उसी से वह निहाल रहता है.

मूर्खता शुद्ध मानवीय गुण है. इस जीव जगत में मनुष्य अन्य प्राणियों से इस गुण के कारण भिन्न और श्रेष्ठ है. सृष्टि के हीनतर प्राणी चाहकर भी मनुष्य के समान मूर्ख नहीं हो सकते.

इसका एक प्रमाण यह है कि कोई प्रजाति स्वयं को और खुद को बचाए रखने वाले पर्यावरण को नष्ट करने के लिए अपनीं ऊर्जा नहीं लगाती. यह मात्र मानव प्रजाति की विशेषता है.

मूर्खता लेकिन अकेले जीवित नहीं रहती. उसका पर्यावरण होता है और श्रृंखला होती है. जैसे पोलियो अगर किसी एक देश में, किसी एक भूभाग में बचा रह गया तो उसके संक्रमण की आशंका बनी रहती है.

वैसे ही मूर्खता का मामला है, इसलिए अमेरिका हो या तुर्की, चीन हो या इंगलिस्तान, बुद्धि से शुद्धि या मुक्ति का टीकाकरण लगातार चलता रहता है.

मूर्खता आकर्षक है, लुभावनी है. वह अनायास प्रतीत होती है, लेकिन प्रायः प्रयत्नपूर्वक उपलब्ध की जाती है, इसलिए उसकी सतत शिक्षा दी जाती है.

शिक्षा के चौतरफा अभियान के बिना मूर्खता वैयक्तिक से सामाजिक गुण में परिवर्तित नहीं होती. मूर्खता का अहर्निश अभ्यास करते-करते हम ऐसी अवस्था में संक्रमण कर जाते हैं कि पैदाइशी अहमक दिखलाई पड़ने लगते हैं.

यह मूर्खता का शिखर बिंदु है. कुछ प्राणी और समाज इस चढ़ाई में रास्ते में खेत रहते हैं. कुछ उसका ताप बर्दाश्त नहीं कर पाते.

मूर्खता को संपूर्ण होना होता है. नीरंध्र… कहीं भी फांक रह जाए तो मूर्खता के बिखर जाने का ख़तरा रहता है, इसलिए मूर्खता की परियोजना में निरंतर जागरूकता की आवश्यकता होती है.

शिक्षा का अनिवार्य अंग है परीक्षा, जांच. बिना उसके शिक्षित होने का प्रमाण पत्र नहीं मिलता. परीक्षा जितनी विद्यार्थी के लिए आवश्यक है, उससे अधिक अध्यापक के लिए.

छात्र को परीक्षा में खुद तैयार किए गए प्रश्नों का खुद चाहा हुआ उत्तर देखकर शिक्षक की सत्ता प्रमाणित होती है.

‘सिंहन के लेहड़े’ (सिंह के समूह) नहीं होते लेकिन मूढ़ों के होते हैं. मूर्ख समूह खोजते हैं और मूर्खता की सामूहिकता का प्रदर्शन भी करते हैं. सामूहिकता के बिना मूर्खता का जीवित या जीवंत रहना संभव नहीं.

क्या मूर्खता और हिंसा में कोई रिश्ता है?

अमेरिका में 2006 में बनी फिल्म ‘ईडियोक्रेसी‘ के निर्देशक माइक जज ने एक इंटरव्यू में अपने बचपन की याद करते हुए बताया कि स्कूल में एक बार गणित की कक्षा में जब उन्होंने सवाल हल कर लिए, तो जो छात्र असफल रह गए थे उनको देखकर बालक जज को भय लगा, मानो वे उन्हें पीट डालेंगे!

तुम हम जैसे क्यों नहीं? मूर्ख अब तक अमूर्ख रह गए लोगों से यह सवाल करते हैं.

मुक्तिबोध की कविता ‘कहने दो‘ की ये पंक्तियां मानो उन्हीं की ओर से हैं, ‘कटवा चुके हैं हम पूंछ सिर/ तो तुम ही यों/ हमसे दूर बाहर क्यों जाते हो?’

माइक जज की इस फिल्म को 2006 में बनने के बाद न तो बहुत शोहरत मिली और न पैसा, लेकिन दस साल बाद अमेरिका के लोगों को इसकी याद आई और इसके विशेष प्रदर्शन का इंतजाम किया गया.

तब तक डोनाल्ड ट्रंप के रूप में अमेरिका ने अपनी असलियत देख ली थी. ट्रंप के राष्ट्रपति चुने जाने के बाद अमेरिका में एक वर्ग में हैरानी छा गई थी. अमेरिका यह भी कर सकता था!

जज ने कहा कि उन्हें इसका अंदाज नहीं था कि इतनी जल्दी उनकी फिल्म का दु:स्वप्न वास्तविकता में बदल जाएगा.

‘ईडियोक्रेसी’ एक काल्पनिक भविष्य का चित्र है जिसमें एक बचा रह गया बुद्धिमान 500 वर्ष बाद खुद को एक मूढ़तंत्र में पाता है.

इस फिल्म की आलोचना इसकी उस युक्ति की वजह से हुई जिसमें बुद्धिमान बच्चे पैदा न करने का निर्णय करते हैं और मूर्ख प्रजजन करते ही जाते हैं. धीरे-धीरे पृथ्वी मूर्खों से भर जाती है और उस पर मूर्ख या मूढ़तंत्र स्थापित हो जाता है.

एक बार मूढ़तंत्र काबिज हो जाए तो उसे हटाना तकरीबन नामुमकिन हो जाता है. प्रश्न यह है कि मूर्ख कौन है. शासक या जनता?

यह भ्रम कई बार होता है कि शासक ही मूर्ख है. आलोचक उसकी मूर्खता की खिल्ली उड़ाकर संतुष्ट हो रहते हैं. लेकिन शासक अपनी इस आलोचना को जनता की आलोचना में बदल देता है.

मूर्खता की आलोचना से जनता में क्रोध पैदा होता है और बढ़ती है आलोचकों के प्रति हिंसा. यह समझना भ्रम है कि शासक मूर्ख है. वह मूर्खता का प्रसारक है.

धीरे-धीरे और लगातार वह मूर्खता का डोज़ जनता को देता जाता है, बढ़ाता जाता है. जनता फिर उसकी आदी हो जाती है और नई-नई मूर्खता की मांग करती रहती है.

शासक मूर्खता को हमेशा एक नई शक्ल में, एक नई नाटकीयता के साथ जनता को पेश करता है. वह जनता के साथ मूर्खता के इस सार्वजनिक प्रदर्शन में शामिल होता है. जनता की पीठ थपथपाता है, उसे शाबाशी देता है.

मूढ़ता है क्या? माइक जज की फिल्म से लग सकता है कि यह आई क्यू के कम या बेशी होने का मामला है, गणित के कठिन सवाल हल करने की योग्यता से जुड़ा है, लेकिन यह इतना भर नहीं है. थियोडोर अडोर्नो के मुताबिक़ वह वास्तव में एक नैतिक श्रेणी है.

यह यथार्थ के प्रति एक सीखी हुई असंवेदनशीलता है. शरीर में मांसपेशियों और दिमाग के बीच एक रिश्ता है.

मांसपेशियों को शारीरिक चोट की आशंका से शिथिल किया जा सकता है और दिमाग भय से जड़ किया जा सकता है. अपने मूल में दोनों को एक दूसरे से अलग करना मुमकिन नहीं है.

अडोर्नो के अनुसार मूर्खता एक दाग है या ज़ख्म है. मूर्खता आंशिक भी हो सकती है. जिस दिशा में शरीर या दिमाग या मन की उत्सुकता को दबा दिया जाए, मांशपेशियों को जाग्रत करने की जगह जब जड़ कर दिया जाए, मूर्खता जगह बनाने लगती है.

जैसे बच्चे को बहुत ज़्यादा सवाल करने पर उसे सज़ा देना- यहां मूर्खता पैदा होती है.

अडोर्नो स्पष्ट करते हैं, ‘ऐसे ज़ख्म विकृतियों को जन्म देते हैं. वे ख़ास तरह के ‘चरित्रों’ को जन्म दे सकते हैं, सख्त और काबिल- वे मूर्खता पैदा कर सकते हैं, कुछ कमियों के लक्षणों के रूप में, अंधता या नपुंसकता, अगर वे सिर्फ गतिहीन हो रहें तो कलुष, नफरत और कट्टरता, अगर भीतर ही भीतर नासूर बन जाएं.’

इस मूर्खता से छुटकारा पाने का तरीका क्या है? उस भय से खुद को आज़ाद करना, जो आपकी उत्सुकता को जड़ कर देता है.

उसका तरीका क्या है? ईमानदारी और भावनात्मक खुलापन. आदमी को आदमी मानना.

‘वह आखिरकार पदार्थ है. खिड़की से उसे फेंको तो वह नीचे गिरेगा, उसमें आग लगाओ तो वह जलेगा, उसे गाड़ दो तो वह किसी भी कचरे की तरह सड़ेगा.’

यह बुनियादी सत्य है. इसे समझने के लिए तकलीफ़ की साझेदारी ज़रूरी है. उससे संवेदनशीलता पैदा होती है और शरीर और दिमाग की जड़ता टूटती है. यह जड़ता ही तो मूर्खता है.

(लेखक दिल्ली विश्वविद्यालय में पढ़ाते हैं.)