भारत

कृतज्ञता का भाव ग़ैर-बराबरी और नाइंसाफी की स्थिति से जुड़ा हो, तो हिंसा पैदा होती है

कृतज्ञता के साथ जब अपनी लाचारी का एहसास जुड़ जाए तो मनुष्य उससे मुक्त होना चाहता है. एक समुदाय ही रहम, कृपा, राहत का पात्र बनता रहे यह वह कबूल नहीं कर सकता. वह बराबरी हासिल करना चाहता है.

New Delhi : A group of migrant workers walk to their native places amid the nationwide complete lockdown, on the NH24 near Delhi-UP border in New Delhi, Friday, March 27, 2020. (PTI Photo/Ravi Choudhary)(PTI27-03-2020 000194B)

देशव्यापी लॉकडाउन के बाद दिल्ली-उत्तर प्रदेश सीमा के पास पैदल अपने गांवों-घरों को लौटते श्रमिक. (फोटो: पीटीआई)

अभी कुछ रोज़ पहले जब सरकारी आह्वान पर राष्ट्रीय कृतज्ञता का कोलाहल सुना तो एक कविता याद हो आई.

हम भारतीय हैं

धन्यवाद, धन्यवाद, क्षमा कीजिएगा, नहीं कहते हैं

हम सिर्फ देखते हैं अपनी आंखों से

और ले लेते हैं पानी भरा गिलास

फिर से उधर एक बार देख कर.

रघुवीर सहाय की ‘भारतीय’ शीर्षक यह कविता जाने कब से मन में अटकी रह गई है. आज जब कृतज्ञता के भाव पर विचार कर रहा हूं, यह उभर आई है.

इस कविता को जब पढ़ा था तब समझ में आया कि हमारे लिए धन्यवाद कहना क्यों दुष्कर हुआ करता था. कवि भारतीयता के इस लक्षण या गुण की प्रशंसा कर रहा है या उसे अपनी न्यूनता बताकर व्यंग्य कर रहा है, कहना कठिन है.

लेकिन जो कह रहा है वह उसे हम अपने रोजाना के आचरण से जानते हैं कि सच है. पानी का गिलास लेकर दोबारा उस ओर देख भर लेना ही धन्यवाद का पर्याय है. सिर्फ अपनी आंखों से देखना और पानी का गिलास लेकर फिर से एक बार उधर देखा लेना ही कृतज्ञता ज्ञापन है.

धन्यवाद दिया जाता है या किया जाता है? इसे लेकर बोलने वालों में हमेशा दुविधा देखी जाती है. इसलिए शुद्ध हिंदी में उसे ज्ञापित कर दिया जाता है.

धन्यवाद ज्ञापन के लिए आयोजन करना पड़ता है. धन्यवाद हमेशा ही कृत्रिम जान पड़ता था, ऐसा जो बहुत औपचारिक है. बल्कि कहने वाले और जिसे संबोधित किया जा रहा हो, उनके बीच एक दूरी का आभास देने वाला.

धन्यवाद कहने में मानो जीभ को श्रम करना होता है और झेंप-सी होती है. हिंदी क्षेत्र की ही भाषा जो उसकी बहन मानी जाती है, यानी उर्दू उसमें शुक्रिया बोलना उतना संकोच का विषय नहीं.

शुक्रिया कहें या ‘बड़ी मेहरबानी’ या सिर्फ ‘मेहरबानी’, शब्द सहजता से जुबान पर चढ़ते हैं. ऐसा क्यों?

हिंदी और उर्दू विभाग अगल-बगल हैं, लेकिन दोनों के शिष्टाचार में फर्क है. शुक्रिया, मेहरबानी ये शब्द अक्सर एक जगह आपके कानों में पड़ेंगे लेकिन धन्यवाद अपवादस्वरूप ही.

वैसे शुक्रिया भी हिंदी का शब्द है. हिंदी वाले मानेंगे कि वह अधिक स्वाभाविक भी लगता है. धीरे-धीरे हिंदी के औपचारिक शिक्षण में जिस तरह का बाहरी-भीतरी का भेद गहरा हुआ है, उसके चलते हो सकता है उसे कई हिंदी भाषी अपना न मानें.

हिंदी में धन्यवाद को लेकर इस संकोच को लेकर मैंने अपनी मलयालम भाषी मित्र देविका से बात की तो उन्होंने स्वीकार किया कि मलयालम में भी इसके लिए जो शब्द है, वह बनाया हुआ है: नंदी.

यह भी औपचारिक है रोजाना शायद ही इस्तेमाल होता हो. दूसरा प्रयोग है, वलिया उपकार. यह बड़ी मेहरबानी  का ही समतुल्य है.

मलयालम की करीबी भाषा तमिल में यह शब्द है नंद्री. सत्या शिवरमन ने कहा कि यह भी मनुष्य समाज के धीरे धीरे परिष्कृत होने के क्रम में ही विकसित हुआ है.

भारतीय स्वभाव में यह जो संकोच है उसे तोड़ देता है थैंक्स या थैंक यू. जिनसे धन्यवाद बोला नहीं जाता, वे थैंक्स धड़ल्ले से बोलते हैं.

कृतज्ञता को लेकर भारतीय संकोच की व्याख्या कैसे करें? क्या इस तरह कि हम मानते हैं कि हर किसी का काम बंधा है, वह दैवी विधान है.

सामाजिक हैसियत में जो नीचे की सीढ़ी पर है, वह अपना कर्तव्य कर रहा है. उसके लिए कृतज्ञता क्यों? एक हलवाहे को या बेगार खटने वाले को कब धन्यवाद की एक निगाह भी मिली?

ईश्वर के प्रति कृतज्ञता के भाव के अलावा शायद हम सिर्फ डॉक्टरों के प्रति ही कृतज्ञ होते रहे हैं. लेकिन जब अस्पताल पैसा न होने के कारण या डॉक्टर किसी और घृणा के चलते इलाज न करे तो इस पेशे के प्रति कृतज्ञता बिना शर्त कैसे हो?

बाहर से आने वालों को भारतीयों के इस व्यवहार से धक्का लगता है और इसका आदी होने में उन्हें समय लग जाता है.

बस या ट्रेन में किसी को बैठने के लिए जगह देने पर बिना कुछ कहे उसे स्वीकार कर लेना या दुकान में सामान लेने पर दुकानदार का बिना अनुरोध के सीधे पैसे तलब करना, इन चीज़ों को विदेशी नोट करते हैं.

लेकिन फिर उनमें से कुछ यह मानते हैं कि इन औपचारिकताओं के अभाव से यह नहीं मानना चाहिए कि भारतीयों में धन्यवाद या कृतज्ञता का भाव है ही नहीं.

प्रत्येक प्रकार के भारतीयों में भी संसार के अन्य लोगों की तरह ही यह रिवाज रहा है कि भोजन आरंभ करने के पहले ईश्वर को धन्यवाद दें. भोजन मंत्र प्रत्येक धर्म में हैं.

भोजन के लिए ईश्वर को क्यों शुक्रिया अदा करें, यह सवाल रघुवीर सहाय का है. वह तो अनावश्यक ही श्रेय लेने आ जाता है.

भोजन क्या है, उसका रस या महत्त्व क्या है, यह मनुष्य के अलावा कौन जानता है? अगर ऐसा न था तो वह उसके लिए कृतज्ञ ही क्यों होता?

‘अन्न का रस’ शीर्षक कविता का अलग से अर्थ करने की ज़रूरत ही नहीं:

खाने के पहले कृतज्ञ होता हूं मैं

खाने के बाद भी

कहां आ जाते हो श्रेय लेने को

हर बार

ईश्वर

क्या तुम नहीं जानते

कि अन्न जो तुमने उगाया है

उसमें एक रस है

जो मैं ही जानता हूं?

विधाता के प्रति इस जीवन के लिए और उसमें अन्न, जल, वायु और दूसरे वरदानों के लिए कृतज्ञ होने की परंपरा लेकिन प्रत्येक संस्कृति में है. लेकिन खाना मिलना क्या सिर्फ ईश्वर की कृपा पर निर्भर है? सबका खाना क्या एक जैसा है?

कोरोना वायरस के वक्त जिसका काम छूट गया और जो सड़क पर भटक रहा है, उसे सरकारें या हमदर्द शहरी जो खाना दे रहे हैं उसके लिए वह किसे धन्यवाद दे?

मुस्तफाबाद में दंगा पीड़ितों के लिए बना राहत शिविर. (फोटो: पीटीआई)

मुस्तफाबाद में दंगा पीड़ितों के लिए बना राहत शिविर. (फोटो: पीटीआई)

जो हिंसा में बेघर होकर राहत शिविरों में हैं, उनके लिए जब खाना राहत के तौर पर आता है तो उसे कबूल करते वक्त वे किसे शुक्रिया अदा करें?

‘खाने से पहले’ बहुत छोटी कविता है लेकिन शायद ऐसे ही अवसरों के लिए है:

सामने थाली को देखकर

पहले मैं ईश्वर को धन्यवाद करता था

आज मुझे अपमान याद आता है.

यह जो अपमान है, वह खाने या भोजन के एक असाधारण घटना में बदल जाने और अपने जैसे ही किसी और की मेहरबानी के एहसास से जुड़ा हुआ है.

ऐसे किसी के आगे हाथ फैलाना पड़े जिसका आपसे कोई रिश्ता नहीं आपके और उसके बीच एक गैर-बराबरी का रिश्ता बना देती है.

वह साधारण भोजन नहीं, राहत है. ऐसी राहत लेते हुए अपनी कमतरी का एहसास होता है. जो देता है, वह क्या इस अपमान या संकोच को वैसे ही समझ पाता है?

अविनाश पिछले एक महीने से भटक रहे हैं भजनपुरा, कोंडा, खजूरी, मुस्तफाबाद, चमन पार्क, शिव विहार की गलियों में. कल उन्होंने एक कारखाना मालिक के बारे में बताया जिनका सब कुछ फरवरी की हिंसा में ख़ाक हो गया.

अब वे लोनी में अपने परिवार के कई सदस्यों के साथ एक कमरे में सिर छुपाए हुए हैं. यह जगह जहां उन्हें पनाह मिली है, वह उनकी हैसियत के लोगों के लिए नहीं.

यहां उनके कामगार और मजदूर रहते हैं. उनके बीच रहने में ज़िंदा बचे रहने और सुरक्षित रहने का आश्वासन तो है, लेकिन यह कहते-कहते वे रो पड़े.

वे ज़रूर कृतज्ञ हैं उनके जिनके कारण वे इस खोली में भी रह पा रहे हैं, लेकिन इसमें उस अपमान का दंश है जो रघुवीर सहाय की कविता में है.

अविनाश जब यह बता रहे थे मुझे 1984 में पटना के तख़्त श्री हरमंदिर साहब की याद हो आई. पटना भर के सिखों का आश्रयस्थल आखिरकार यही गुरुद्वारा रह गया था.

हम पटनावासी अपने ही हमशहरों से मिलने उस जगह गए, जो था तो तीर्थस्थल लेकिन इस बार हम तीर्थयात्रियों की तरह वहां नहीं गए थे.

हमारे पास थी शर्म… सहानुभूति के साथ. वहां मैंने उन सरदारजी को देखा जो पटना मेडिकल कॉलेज के राजेन्द्र सर्जिकल वार्ड की कैंटीन चलाते थे.

कल तक जो अपनी बारी आने पर ही समोसे और चाय देते थे, आज इस अवस्था में हमें देखकर उन्होंने आंखें झुका लीं. उन्होंने जीवन में कभी न सोचा होगा कि इस तरह वे किसी का एहसान लेने को मजबूर हो जाएंगे.

कृतज्ञता के लिए देने और लेने का रिश्ता होना चाहिए. एक जिसके कुछ करने से दूसरे के जीवन में किसी भी तरह की, बड़ी या छोटी, बेहतरी आ रही हो.

इस रिश्ते में एक कृतज्ञता का अधिकारी है और दूसरा एहसानमंद बने रहने के लिए अभिशप्त है. उन दोनों के बीच इस रिश्ते के बदलते रहने की या इसके दोतरफा होने की ज़रूरत है.

अगर ऐसा न हो पाए तो मान लेना चाहिए कि नाइंसाफी ही इस तरह के जीवन का नियम है.

कोरोना वायरस का एक परिणाम दुर्भिक्ष (अकाल) भी हो सकता है. खुद को अपने घरों में बंद करके जिन्हें सड़क पर भटकते रहने के लिए हमने छोड़ दिया है, वे संभव है भूख से मारे जाएं.

यह जो दुर्भिक्ष सामने मुंह बाए खड़ा है, इसमें कृतज्ञता जैसे मानवीय भाव की क्या जगह होगी?

यह जो एक झटके से जीवन से बाहर कर दिए जाने का सदमा है, वह क्यों एक ख़ास तरह की आबादी के हिस्से ही क्यों हो?

इस दुर्भिक्ष में जो न तो हवा के पहले से हल्के हो जाने का एहसास कर पाएं, न जिन्हें मोर के बोलने का आनंद अपने कमरे के भीतर से मिल पाए क्योंकि वे शहरबदर कर दिए गए हैं, वे किनके प्रति एहसानमंद हों?

अगर उन्हें रास्ते में कुछ भलेमानस खाना खिलाएं तो वे उनके प्रति किस हद कृतज्ञ हों? और कैसे?

रघुवीर सहाय की ‘दुर्भिक्ष’ शीर्षक कविता इस समान रिश्ते को एक निजी प्रकरण के माध्यम से व्यक्त करती है:

वह आया और चबूतरे पर खड़ा हुआ

जंगले को खटखटा कर उसने बुलाया

और अपना बरतन वाला हाथ उठाया

मैंने कहा अरे, और फिर सकता खा गया

वह मुझसे कुछ बड़ा था उसी इस्कूल में था

कुछ बरस पहले यह सुना था कि

कहीं चला गया था.

उस स्कूली मित्र को देखकर पहला ख्याल यह आया,

कि मुझे शर्म लगती है

और इसे लगेगी पहचाने जाने पर

ऐसा लेकिन होता नहीं. वह मित्र वाचक को पहचानता है और निःसंकोच कहता है,

जाओ कुछ ला दो न

देने और लेने का यह एक नया रिश्ता इन दोनों के बीच बना है, वह कैसा है?

मैं बैठक में लौटा

दो रोटी लाया था, भीतर बुलाकर परस दिया

उसने उठाया वह परोसा और रख लिया बूढ़े बाप के लिए

और वह चला गया आदर से झुक प्रणाम करके जो हाल में सीखा था

यह कृतज्ञता ज्ञापन देने वाले को असहज कर देती है, लेकिन तभी जब वह इस असमान रिश्ते को स्वाभाविक न माने. अगली पंक्ति मारक है,

जाते वक्त हमको धकेल कर छोड़ गया जहां हम पहले थे

जब कृतज्ञता का भाव गैर-बराबरी और नाइंसाफी की स्थिति से जुड़ा हो तो हिंसा पैदा होती है. अक्सर लोग यह शिकायत करते मिलते हैं कि जिसकी भलाई करो, वह पहला मौका मिलते ही पीठ में छुरा घोंप देता है.

कृतज्ञ लोग हैं लेकिन कृतघ्न भी हैं. कृतज्ञता के साथ जब अपनी लाचारी का एहसास जुड़ जाए तो मनुष्य उससे मुक्त होना चाहता है.

एक समुदाय ही रहम, कृपा, राहत का पात्र बनता रहे यह वह कबूल नहीं कर सकता. वह बराबरी हासिल करना चाहता है.

कृतज्ञता पर यह बातचीत शायद रास्ता भटक गई है. लेकिन उसमें हर्ज ही क्या है?

(लेखक दिल्ली विश्वविद्यालय में पढ़ाते हैं.)