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‘जब भी कोई दल बहुमत से सत्ता में होता है, तब प्रेस की आज़ादी पर हमले होते हैं’

9 जून को प्रेस क्लब ऑफ इंडिया में बोलते हुए वरिष्ठ अधिवक्ता फली एस नरीमन ने प्रेस की आज़ादी और लोकतंत्र की सुरक्षा के लिए स्वतंत्र न्यायपालिका द्वारा समर्थित प्रेस और मीडिया को ही एकमात्र उपाय बताया. उनका पूरा वक्तव्य.

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कार्यक्रम में बोलते फली एस नरीमन (फोटो: पीटीआई)

मैं यहां के लिए बिल्कुल अजनबी हूं, न ही मेरा कोई अख़बार है न कोई चैनल. मैं यहां अपने 30 साल से भी ज़्यादा पुराने दोस्त प्रणय रॉय के आमंत्रण पर आप सबसे कुछ बातें कहने आया हूं सिर्फ इसलिए नहीं कि मैं संविधान द्वारा दी गई प्रेस या मीडिया की आज़ादी पर पूरा भरोसा करता हूं, बल्कि इसलिए भी कि मुझे प्रणय की आज़ादी, सच्चाई और ईमानदारी पर पूरा भरोसा है.

आज हम यहां प्रेस की आज़ादी पर बात कर रहे हैं. वैसे बता दूं कि कि हम भारत के नागरिकों को ऐसी बहुत-सी बातों की आज़ादी मिली हुई है, जो एशिया के कई अन्य देशों में देखने को नहीं मिलती.

मुझे भी कुछ सालों पहले तक इस बात का एहसास नहीं था पर फिर एक बार अपनी पत्नी के साथ मुझे कुआलालम्पुर में एक कॉमनवेल्थ लॉ कांफ्रेंस में जाने का मौका मिला. वहां आए हुए प्रतिनिधियों में मलेशिया की अपील कोर्ट के एक रिटायर्ड जज भी थे. इन जज ने हज़ार से ज़्यादा प्रतिनिधियों के बीच वहां के प्रधानमंत्री महातिर मोहमद, जो उदारवादी नहीं थे, की उपस्थिति में बुलंद आवाज़ में कहा, ‘हमारा संविधान हमें बोलने की आज़ादी देता है; तालियों की गड़गड़ाहट, फिर कुछ देर रुककर अपने प्रधानमंत्री की ओर देखते हुए बोले, ‘पर इससे हमें बोलने के बाद की आज़ादी नहीं मिलती!’

बोलने के बाद की आज़ादी- बोलने की आज़ादी असल में इसी के बारे में तो होती है. यह कभी नहीं भूलिएगा. आपको बोलने की इजाज़त है, जितना आपको पसंद है उतना बोलिए, लेकिन ऐसा एक व्यक्ति होगा जो आप पर इस तरह हमला करेगा, जिससे आप फिर से कभी नहीं बोल सकेंगे. यही वो सुरक्षा है जिसकी हम मांग कर रहे हैं.

मैं एक बात बिल्कुल साफ कर देना चाहता हूं. अपराध करके कोई नहीं बच सकता, चाहे वो मैं हूं, आपमें से कोई, प्रणय रॉय या एनडीटीवी. हम में से किसी पर भी किसी अभियोग का मुकदमा चलाया जा सकता है.

लेकिन जिस तरीके और जिन परिस्थितियों में एनडीटीवी के मालिकों के यहां सीबीआई ने छापा मारा है, और उसके बाद जो स्पष्टीकरण दिया गया, उससे मुझे ऐसा लगता है कि ये सब (छापे और सीबीआई द्वारा दायर की गई एफआईआर) निश्चित तौर पर प्रेस और मीडिया की आज़ादी पर एक अनुचित हमला है.

मैं बताता हूं क्यों?

2 जून 2017 को सीबीआई ने प्रणय रॉय, उनकी पत्नी राधिका रॉय और आईसीआईसीआई बैंक के अज्ञात अधिकारियों के ख़िलाफ़ आपराधिक षड्यंत्र, धोखाधड़ी और एनडीटीवी के आपराधिक दुर्व्यवहार के आरोप में एफआईआर दर्ज करवाई. यह जिस घटना के बारे में थी, वो 2008-09 वित्तीय वर्ष में हुई थी. गौर कीजिए, सात साल बाद एफआईआर दर्ज हुई है.

ये एफआईआर सीबीआई द्वारा सीबीआई की अदालत में दर्ज करवाई गई पर इसका आधार सीबीआई की कोई जांच नहीं थी, बल्कि इसका एकमात्र स्रोत संजय दत्त नाम का एक व्यक्ति था. संजय द्वारा सीबीआई के निदेशक को 28 अप्रैल 2017 को भेजे गए एक शिकायती पत्र (जिस पर गोपनीय लिखा था) में उन्हें क्वांटम सिक्योरिटीज़ प्राइवेट लिमिटेड का डायरेक्टर बताया गया था.

हालांकि ऐसा कहा जा रहा है कि आपराधिक दुर्व्यवहार की यह घटना 2008-09 में हुई थी, पर 28 अप्रैल 2017 से पहले क्यों इसका कभी कोई ज़िक्र नहीं हुआ इस बारे में संजय द्वारा सीबीआई को  भेजी गई शिकायत में नहीं बताया गया है. न ही सीबीआई ने ही यह जानने की कोशिश की कि जो घटना 2008-09 में हुई थी, उस पर 28 अप्रैल 2017 से पहले सीबीआई या किसी क्रिमिनल कोर्ट या किसी और व्यक्ति की नज़र क्यों नहीं पड़ी.

यानी सीबीआई द्वारा सीबीआई कोर्ट में दायर की गई पूरी एफआईआर सिर्फ संजय दत्त द्वारा 28 अप्रैल 2017 की तारीख में भेजे गए पत्र में दर्ज जानकारी पर आधारित थी.

यहां गौर करने वाली बात यह है कि सीबीआई को शिकायत भेजने से पहले उन्होंने एनडीटीवी से ईमेल के ज़रिये हुए किसी भी बातचीत में सीबीआई को की गई शिकायत में लिखे किसी भी आरोप के बारे में नहीं बताया है न ही इस बात का कोई स्पष्टीकरण है कि एनडीटीवी द्वारा किए जा रहे क़ानून के उल्लंघन के बारे में उन्होंने ख़ुद क्रिमिनल कोर्ट में कोई एफआईआर क्यों दर्ज नहीं करवाई. (हालांकि उन्होंने विभिन्न मुद्दों से पर तकरीबन 200 से ज़्यादा ईमेल एनडीटीवी को भेजे थे)

मैं नहीं जानता कि किसी और मौके पर सीबीआई ने कभी किसी निजी कर्मचारी द्वारा की गई शिकायत में दी गई जानकारी के आधार पर बिना क्रिमिनल कोर्ट में दर्ज करवाए कोई एफआईआर दर्ज करवाई है- मैं सोचता हूं इस बात की जांच तो होनी ही चाहिए.

एक व्यक्ति जिसे किसी चैनल विशेष से कोई शिकायत है वो ख़ुद इस बारे में शिकायत दर्ज नहीं करवाता बल्कि सीबीआई के पास जाता है कि प्लीज़ इसकी जांच कीजिए. और सीबीआई उसका आभार व्यक्त करते हुए विशेष रूप से इस पर एक एफआईआर दर्ज करवाती है, जिसके आधार पर छापे मारे जाते हैं, जिनके बारे में खूब प्रचार किया जाता है.

यहां जानने वाली बात यह है कि ऐसी कोई शिकायत मिलने पर सीबीआई जैसी किसी प्रतिष्ठित जांच संस्था की क्या ज़िम्मेदारी बनती है?

ज़ाहिर है मेरे हिसाब से सीबीआई सबसे पहले जो करेगी और जो निष्पक्षता के आधार पर भी सही होगा, वो ये कि जिन पर आरोप हैं यानी एनडीटीवी और आईसीआईसीआई बैंक उनसे पूछना कि वे इस मुद्दे पर क्या कहेंगे- खासकर तब जब ये घटना 2008-09 में हुई और इस बारे में आरोप 2017 में लगाए गए.

पर 5 जून 2017 को छापे मारने या 2 जून को एफआईआर दायर करने से पहले सीबीआई द्वारा ऐसी कोई पूछताछ नहीं की गई. पर सीबीआई ने 28 अप्रैल को संजय दत्त के लगाए गए आरोपों के बारे में एनडीटीवी को एक पत्र भी नहीं भेजा.

क़ानून यह कहता है कि अगर सरकार या सीबीआई सहित किसी सरकारी संस्था द्वारा किसी प्रेस या मीडिया संस्थान (जिन्हें संविधान द्वारा प्रेस की आज़ादी मिली हुई है) पर किसी आपराधिक या ग़लत काम का कोई आरोप लगाया जाता है, तब सीबीआई जब भी कोई शिकायत (एफआईआर) दर्ज करवाएगी, जो किसी तीसरे पक्ष द्वारा दी गई जानकारी पर आधारित होगी, न कि उनकी जांच पर, तब यह संविधान के अनुच्छेद 19 (1) (ए) के तहत मिली प्रेस की आज़ादी के अनुकूल होनी चाहिए. यानी संस्थान में किसी भी तरह का छापा मारने और इस तरह की किसी जानकारी पर आपराधिक शिकायत दर्ज करने से उस संस्थान को चलाने वाली कंपनी या मीडिया संस्थान के मालिकों/प्रमोटरों या उस परिसर की ज़िम्मेदारी संभालने वाले व्यक्ति से इस मुद्दे पर पूछा जाना चाहिए कि उनका इस बारे में क्या कहना है. और ये ई शिष्टाचार या पक्ष लेने वाली बात नहीं है, ये अनिवार्य है, ये संवैधानिक ज़िम्मेदारी की बात है.

इस मामले में प्रणय रॉय ने मुझे पूरा भरोसा दिलाया है कि उनके और एनडीटीवी के पास 28 अप्रैल 2017 को संजय दत्त द्वारा भेजे गए पत्र, जिस पर गोपनीय और विशेषाधिकार प्राप्त लिखा था और जिसे 2 जून 2017 को एफआईआर दर्ज करवाते हुए सीबीआई ने प्रस्तुत किया था, में दर्ज हर बयान के जवाब हैं. वैसे प्रणय रॉय को अब तक इस पत्र को पढ़ने का मौका नहीं मिला है.

हालांकि यह संजय दत्त द्वारा सीबीआई को 28 अप्रैल को चिट्ठी लिखकर एनडीटीवी पर लगाए गए आरोपों की सच्चाई पर बहस करने की जगह और अवसर नहीं है, लेकिन इसके बाद और छापों से पहले हुई घटनाएं ज़्यादा महत्वपूर्ण हैं.

  • 1 जून 2017 को एनडीटीवी के एक टीवी कार्यक्रम में जब संजय हजारिका बोल रहे थे, तब भाजपा के प्रवक्ता संबित पात्रा ने उन्हें बीच में टोका. तब संजय ने पूछा कि क्या संबित को इस तरह लोगों को बीच में टोकने का अधिकार है. इस पर संबित ने जवाब दिया, ‘मैं एनडीटीवी पर ही लोगों को टोकता हूं क्योंकि एनडीटीवी का एक एजेंडा है इसलिए मुझे ये करने की ज़रूरत है.
  • इस बात पर एंकर ने संबित को माफ़ी मांगने या कार्यक्रम छोड़कर चले जाने को कहा.
  • संबित ने इस पर कहा, ‘मुझे क्यों जाना चाहिए? मैं एनडीटीवी के एजेंडे का पर्दाफ़ाश करूंगा. मुझे आपका और आपके चैनल के एजेंडे का खुलासा करना ही चाहिए.’
  • इस पर एंकर ने जवाब दिया कि इस तरह की भाषा और आरोप स्वीकार्य नहीं हैं.
  • पर संबित अपनी बात पर अड़े रहे, ‘मैं इस बहस के अंत तक इसका खुलासा करूंगा.’ इसके बाद एंकर ने कहा, ‘मैं आपके होते हुए अब इस बहस को जारी नहीं रख सकती.’
  • 1 जून 2017 को एक लाइव टीवी कार्यक्रम में भाजपा प्रवक्ता संबित पात्रा द्वारा एनडीटीवी पर लगाए आरोपों के बाद ही 5 जून 2017 को प्रणय रॉय के दिल्ली, देहरादून और मसूरी के घरों और दिल्ली में एनडीटीवी के दफ्तर और संस्थान के वित्तीय और लेखा कार्यालयों पर सीबीआई ने छापा मारा.

यहां मैं आग्रह करूंगा कि इस घटनाक्रम को ध्यान से समझें- ये आपको उसी तरह परेशान करेगा जैसे मुझे किया है.

प्रताप भानु मेहता ने दो दिन पहले इंडियन एक्सप्रेस में एक लेख लिखा है, जिसमें उन्होंने लिखा है, ‘कभी प्रेस नेताओं को धोखेबाज़ कहा करती थी, नेताओं ने अब उन्हें ‘प्रेस्टीट्यूट’ का नाम देकर अब ये बाज़ी पलट दी है. और परिणामस्वरूप बड़े स्तर पर मीडिया को अवैध घोषित किया जाने लगा.’

हम यहां आज इसीलिए मिल रहे हैं ताकि एनडीटीवी पर पड़े इन छापों का विरोध, इसकी निंदा करके मीडिया के ख़िलाफ़ बन रहे इस माहौल को आगे बढ़ने से रोक सकें. किसी की व्यक्तिगत शिकायत पर सीबीआई ने एक शिकायत दर्ज की, छापे मारे बिना आरोपी का पक्ष जानें. लेकिन ये सब सिर्फ एनडीटीवी के मामले से संबंधित है.

जब भी कोई एक दल बहुमत से सत्ता में होता, चाहे वो वर्तमान सरकार हो या जब इंदिरा गांधी और कुछ समय के लिए राजीव गांधी की सरकार थी, तब ऐसा ही होता है. ऐसी ही स्थिति थी और इसी तरह प्रेस की आज़ादी पर हमले हुआ करते थे.

किसी लोकतंत्र की सुरक्षा के लिए स्वतंत्र न्यायपालिका द्वारा समर्थित प्रेस और मीडिया ही एकमात्र उपाय हैं.

फिर वही सवाल उठता है कि इस सब का सामान्य तौर पर प्रेस से क्या लेना-देना है- क्या ये सिर्फ एनडीटीवी का ही मसला है?- इस तरह के सवाल का जवाब बहुत पहले ही दिया जा चुका है.

जर्मन पादरी मार्टिन निएमोलर ने नाजियों के सत्ता में आने और उसके बाद उनके द्वारा समूहों को  अपने निशाने पर लेने वाली पर जर्मन बुद्धिजीवियों की कायरता के बारे में एक कविता में लिखा था. यह कविता अब न्यूयॉर्क के होलोकॉस्ट मेमोरियल म्यूजियम में संजोकर रखी गई है:

‘पहले वे साम्यवादियों के लिए आए, मगर मैं चुप रहा

क्योंकि मैं साम्यवादी नहीं था.

फिर वो ट्रेड यूनियनों के लिए आए और मैं चुप रहा

क्योंकि मैं ट्रेड यूनियन में नहीं था.

फिर वो यहूदियों के लिए आए पर मेरी चुप्पी बनी रही

क्योंकि मैं यहूदी भी नहीं था.

फिर वो मेरे लिए आए

और तब मेरे लिए बोलने वाला कोई बचा ही नहीं था.’

एनडीटीवी को हटाकर सोचिये, क्या प्रेस के स्वतंत्र होने की सार्थकता क्या है? इस पर कई तरह के नज़रिए हैं पर मेरे पसंदीदा ये कुछ हैं:

पहला जो थोड़ा-सा जटिल है, वो हमारे अपने सुप्रीम कोर्ट ने 1950 में दिया था- जी हां, जिस साल हमारा संविधान आया था, तब जब किसी ने इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के बारे में सोचा तक नहीं था- तब जस्टिस पतंजलि शास्त्री और उनके साथ और चार जजों (चीफ जस्टिस कनिया, जस्टिस महाजन, बीके मुख़र्जी और दास) की एक संवैधानिक पीठ ने रोमेश थापर मामले में फैसला देते हुए संविधान में दिए गए अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और मुक्त भाषण के अधिकार पर विस्तार से चर्चा करते हुए कहा:

इस तरह की आज़ादी मिलने के इसके दुरूपयोग का जोखिम भी बढ़ जाता है. लेकिन संविधान निर्माता मैडिसन से इत्तेफ़ाक रखते थे. मैडिसन, जिसने संयुक्त राष्ट्र अमेरिका के संविधान में पहला संशोधन किया था, ने कहा था, ‘किसी पौधे की नुकसान पहुंचाने वाली शाखाओं को निकालकर फेंकने की बजाय उन्हें अच्छे फल दे रही शाखाओं की ताकत को चोट पहुंचाने के लिए बढ़ते रहने देना चाहिए.’ (Near v. Minnesotta, 233 U.S. 607 at 717-8 से)

दूसरा जवाब इतना जटिल नहीं है. ये एक अनुभवी राजनेता द्वारा दिया गया था- एक ऐसा नेता जो बाद में देश का राष्ट्रपति भी बना. कहने को तो यह बात बहित ही पुरानी है, पर इसे दोहराया जाना ज़रूरी है.

ये तब कि बात है जब मेरे दोस्त अरुण शौरी इंडियन एक्सप्रेस के संपादक हुआ करते थे. उस वक़्त उन्होंने तत्कालीन राष्ट्रपति जैल सिंह की के किसी कदम की आलोचना करता हुआ एक लेख लिखा था और ज्ञानी साहब इससे इतना नाराज़ हुए कि उन्होंने शौरी को लानत-मलामत के लिए राष्ट्रपति भवन बुलवाया. शौरी डरते हुए वहां पहुंचे. वैसे बता दूं कि अरुण लिखते वक़्त एकदम शेर की गरज-सा लिखते हैं पर बोलते वक़्त वे बेहद नरम रहते हैं.

अरुण जब राष्ट्रपति पहुंचे तो ज्ञानी जी ने मुस्कुराकर उन्हें बिल्कुल सामान्य तरीके से गले लगाकर हालचाल पूछा, ‘शौरी साहब, हालचाल क्या है?’

इस पर उनका सेक्रेटरी जो शौरी से उनकी नाराज़गी के बारे में जानते थे, ने उनके कान में कहा, ‘सर आपको उनसे ग़ुस्सा होना है.’

इस पर जैल सिंह ने कहा, ‘अरे उनको लिखने दो- पढ़ता कौन है?’

ये शायद प्रेस के विशेष अधिकारों के कभी-कभार होने वाले दुरूपयोग पर सबसे माकूल जवाब है.

पर मुझे मेरी बात एक आखिरी कहानी के ज़रिये पूरी करने दें. मारियो कूओमो बहुत सालों तक न्यूयॉर्क के गवर्नर थे. वो भी ज्ञानी साहब की तरह एक चालाक नेता थे. न्यूयॉर्क टाइम्स के उनके बेटे की लॉ फर्म को राजनीतिक संरक्षण देने का आरोप लगाए जाने के बाद उन्होंने न्यूयॉर्क प्रेस क्लब में एक भाषण दिया था.

यहां उन्होंने प्रेस की आज़ादी के बारे में बात की थी, जहां उन्होंने अमेरिकी संविधान में हुए पहले संशोधन के बारे में बोलते हुए कहा था:

‘संविधान निर्माता जानते थे कि वे क्या कर रहे हैं. उनके पास प्रेस थी और उनके समय की प्रेस न केवल अयोग्य और ग़लत झुकाव रखने वाली थी, बल्कि पक्षपाती, लापरवाह और भ्रष्ट भी थी. असल में संविधान निर्माता इसके ख़तरे जानते थे और कई बार तो खुद इसके निशाने पर होते थे. वे जानते थे कि इस तरह की व्यापक आज़ादी के साथ इसके दुरूपयोग का जोखिम तो होगा ही, जिससे निर्दोष लोगों को भी नुकसान पहुंचेगा. ये सारे ख़तरे जानते हुए भी उन्होंने आज़ादी के नाम पर एक दांव खेला. और इस दांव ने हम सबको अमीर और ख़ुश कर दिया. व्यापक रूप में देखा जाए तो प्रेस समाज की भलाई के कई कामों में मददगार साबित हुई- चाहे वो लोगों को शिक्षित करना हो, हमारी आज़ादी की रक्षा करना, सरकार पर नज़र बनाए रखना, उसे चुनौती देना, उस पर अंकुश लगाए रखना, उसे सच सामने रखने पर मजबूर करना.’

मेरा सुझाव है कि हमें आज ही गवर्नर कूओमो के संदेश और ‘आज़ादी के नाम पर दांव खेलने’  अपनाना चाहिए. इसके अलावा कोई लोकतांत्रिक तरीका नहीं है.

(फली एस नरीमन वरिष्ठ अधिवक्ता हैं.)