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महाराष्ट्र में हर साल कुपोषण से मरते हैं 11,000 बच्चे

मुंबई हाईकोर्ट ने महाराष्ट्र सरकार को फटकारते हुए कहा है कि वो कुपोषण पर गंभीर नहीं है.

प्रतीकात्मक तस्वीर (फोटो: रॉयटर्स)

प्रतीकात्मक तस्वीर (फोटो: रॉयटर्स)

मुंबई हाईकोर्ट ने महाराष्ट्र की फड़नवीस सरकार को फटकार लगाते हुए कहा है कि वो कुपोषण को लेकर बिल्कुल भी चिंतित नहीं है. अदालत ने यह टिप्पणी डॉ अभय बंग द्वारा पेश एक रिपोर्ट पर की जिसमें यह कहा गया था कि राज्य में कुपोषण से हर साल 11,000 लोगों की मौत हो जाती है.

अदालत का यह भी कहना है कि किसानों की आत्महत्या का मुख्य कारण कुपोषण और कर्ज़ है.

एबीपी माझा की एक रिपोर्ट के अनुसार जस्टिस विद्यासागर कनाडे की अध्यक्षता वाली खंडपीठ ने कहा है कि जानकारों की देख-रेख में अगर रिपोर्ट पर अमल किया गया तो पोलियो के साथ कुपोषण की समस्या को ख़त्म किया जा सकता है. अदालत ने राज्य सरकार को डॉ बंग की रिपोर्ट को गंभीरता से लेने को कहा है.

अदालत ने राज्य सरकार को कहा है कि 14 अगस्त से पहले सभी आदेशों पर अमल होना चाहिए, वरना अदालत इसके लिए जिला अधिकारी और मुख्य सचिव को ज़िम्मेदार मानते हुए आगे का कदम उठाएगी.

अपनी रिपोर्ट पर डॉ बंग ने अदालत में कहा है कि 2004 के समय जो कुपोषण के मामले नंदुरबार, धुले और मालघाट जिले में थे, आज 13 साल बाद भी परिस्थिति में कोई बदलाव नहीं आया है.

उन्होंने कहा,’जो कुपोषण से होनी वाली मौतें रुक जानी चाहिए थी, आज भी रुकने का नाम नहीं ले रही है. राज्य में कुपोषण से हर साल मरने वालों की संख्या अब 11,000 हो चुकी है.’

बंग आगे कहते हैं कि कुपोषण से मरने वालों पर सबसे अधिक संख्या नवजात बच्चों की हैं, जिनकी पैदा होने के एक महीने के भीतर ही मौत हो जाती है. उसके अलावा मलेरिया, निमोनिया और दस्त जैसी भी समस्या है.

बंग अदालत में यह भी बताते हैं कि लगभग 2,000 चिकित्सा छात्र हर वर्ष पलायन कर दूसरे शहरों में चले जाते हैं. देहात और ग्रामीण इलाकों में कोई भी काम नहीं करना चाहता. सरकारी बॉन्ड का उल्लंघन पर जुर्माना भी वसूला नहीं जाता, जिसके चलते राज्य सरकार 900 करोड़ रुपये के नुकसान में है.

अपनी रिपोर्ट में डॉ बंग ने कुछ सिफ़ारिश की है. उन्होंने कहा है कि राज्य में आश्रम स्कूलों को और सशक्त बनाया जाए.

उन्होंने यह भी कहा है कि चिकित्सा छात्रों को ग्रामीण क्षेत्रों में काम करने और उनके बॉन्ड को लेकर कठोर क़ानून बने. हर गांव में होम बेस केयर सेवा उपलब्ध कराई जाए, आदिवासी क्षेत्रों में शराब और तंबाकू पर प्रतिबंध लगे.

वो आगे कहते हैं कि आदिवासी गांव जो कुपोषण और शराब मुक्त है, उसे सम्मानित किया जाए.

आदिवासी महिलाओं को भोजन की जगह उनके बैंक खातों में पैसे जमा किए जाए, दूरदराज के क्षेत्रों में महामारी रोग के लिए सस्ती दवाओं की व्यवस्था की जाय. आदिवासी क्षेत्रों में सरकार की योजना की समय-समय पर जांच होनी चाहिए.