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यह कहना कितना सही है कि क्रिकेट ने दूसरे खेलों का गला घोंटा है?

क्रिकेट में लाख अनियमितताओं के बावजूद खेल का स्तर बना रहा, जबकि अन्य खेल जो सरकार के अधीन रहे, वहां अनियमितताएं इस कदर हुईं कि खेल ही रसातल में चले गए.

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फाइल फोटो: रॉयटर्स/दानिश सिद्दीक़ी

लंबे समय से भारत में क्रिकेट की लोकप्रियता को अन्य खेलों के लिए खतरा बताया जाता रहा है. एक तबका ऐसा भी है जो मानता है कि क्रिकेट की लोकप्रियता कॉरपोरेट घरानों की देन है. क्रिकेट कॉरपोरेट और सत्ता का खेल है और इन्हें ही लाभ पहुंचाने के लिए खेला जाता है. इसलिए इस खेल से परहेज किया जाये और इसकी लोकप्रियता को नशा न बनने दिया जाये, अन्यथा कॉरपोरेट और सत्ताधारियों की चांदी कटती रहेगी.

लेकिन अगर विचार करें तो कॉरपोरेट के खेल में हर खेल ही तब्दील हो चला है. फुटबॉल से लेकर हॉकी, बैडमिंटन, कुश्ती, टेनिस, कबड्डी सभी खेलों में कॉरपोरेट घरानों की दखल है. प्रीमियर बैडमिंटन लीग, प्रो कबड्डी लीग, प्रो रेसलिंग लीग क्या बिना कॉरपोरेट के दखल के आयोजित हो रही हैं?

फिर सिर्फ क्रिकेट में कॉरपोरेट के दखल का विरोध क्यों?

देश के विभिन्न खेल संघ जो सरकार के अधीन हैं, सभी में कॉरपोरेटर और नेताओं का हस्तक्षेप है. हर संघ में वे बड़े पदों पर काबिज हैं. खेल संघ के अंदर आर्थिक धांधली के आरोप उन पर अदालतों में चल रहे हैं. भारतीय ओलंपिक संघ (आईओए) में भ्रष्टाचार किसी से छिपा नहीं. कहते हैं कि बीसीसीआई को भ्रष्टाचार का रोग लगा है, पर रोग तो वो भी है कि छह सालों से अब तक खेल मंत्रालय स्पोर्टस कोड अपने अधीन खेल संघों में लागू नहीं करा पाया. क्योंकि खेल संघ करना नहीं चाहते, उनके पदाधिकारियों के निहित स्वार्थ इसके आड़े आ रहे हैं. देश के आधे से ज्यादा खेल संघ इसी के चलते भंग पड़े हैं.

बॉक्सिंग फेडरेशन का हाल देखिए. ओलंपिक में खिलाड़ी उतरते हैं पर भारतीय ध्वज के साथ नहीं, क्योंकि हमारे संघ के पास अंतर्राष्ट्रीय मुक्केबाजी संघ की मान्यता ही नहीं रहती. ऐसा सिर्फ इसलिए क्योंकि यहां भ्रष्टाचार है, सरकारी हस्तक्षेप है, अपारदर्शिता है.

आपको शिकायत है कि कॉरपोरेटर एन. श्रीनिवासन बीसीसीआई के अध्यक्ष रहे. लेकिन श्रीनिवासन के ही भाई एन. रामचंद्रन भी तो आईओए के अध्यक्ष हैं. जिन पर हॉकी इंडिया के अध्यक्ष नरिंदर बत्रा ने कई संगीन आरोप लगाए हैं. वहीं आईओए पर आए दिन अंतर्राष्ट्रीय ओलंपिक संघ प्रतिबंध लगाता ही रहा है.

इसलिए क्रिकेट में कॉरपोरेट के दखल के चलते क्रिकेट को अछूता बनाने के बजाय जरूरत यह समझने की है कि यह बदलाव क्यों आया! आखिर क्यों कॉरपोरेट घराने खेलों में एंट्री पाने में सफल रहे और खेल उन पर निर्भर हो गये! ऐसा सिर्फ इसलिए हुआ क्योंकि सरकारें खेलों को प्रोत्साहन देने में नाकामयाब रहीं.

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फुटबॉल को सरकारी छाते का सहारा रहा. भारतीय फुटबॉल टीम ने ओलंपिक खेला, लेकिन आज कहां खड़ा है भारत. पांच दशक से अधिक लंबा सफर तय कर लिया. ओलंपिक में भाग लेने के बाद हमें जमीन से उठकर आसमान में पहुंचना था, पर हम पाताल पहुंच गये. सरकारी तंत्र खा गया फुटबॉल को.

बास्केटबॉल आज देश में कांग्रेस-भाजपा की कुश्ती का अखाड़ा बना है. खिलाड़ी देश के बाहर भविष्य खोज रहे हैं. खेल मंत्रालय की भूमिका स्वयं पूरे मामले में संदिग्ध है.

वेटलिफ्टिंग नशे की गिरफ्त में है. और खुद एसोसिएशन इसमें लिप्त है, ऐसा वेटलिफ्टिंग एसोसिएशन से जुड़े रहे एक कोच खुद बताते है. लेकिन सरकार ने वेटलिफ्टिंग में डोपिंग की रोकथाम की क्या नीति बनाई? एक कोच ने ऐसे संगीन आरोप लगाये, तो क्या उनकी जांच कराई?

ऐसी ही व्यवस्था हॉकी को खा गयी. स्पोर्ट्स अथॉरिटी ऑफ इंडिया (साई) में अनियमितताएं भी उजागर हैं. कॉमनवेल्थ घोटाला भी कौन भूल सकता है!

कह सकते हैं कि जब सरकारें खेलों को संभाल न सकीं, तब कॉरपोरेटर खेलों में दखल बना सके. खेलों को अपना स्तर उठाने के लिए उनकी जरूरत हुई. आज लगभग हर नामी एथलीट किसी न किसी कॉरपोरेटर के रहमो-करम पर खेल रहा है. वे उन्हें स्पांसर कर रहे हैं और उनकी लोकप्रियता के जरिए कमा रहे हैं. इसलिए सिर्फ क्रिकेट ही सत्ता और कॉरपोरेट का खेल नहीं, सारे खेल ही सत्ता और कॉरपोरेट के खेल बन गये हैं.

बस क्रिकेट के साथ एक अच्छी बात यह रही कि यहां लाख अनियमितताओं के बावजूद खेल का स्तर बना रहा. जबकि अन्य खेल जो सरकार के अधीन रहे, वहां अनियमितताएं इस कदर हुईं कि खेल ही रसातल में चले गये.

हालिया उदाहरण ओलंपिक में बॉक्सिंग और कुश्ती में पिछले ओलंपिक की अपेक्षा प्रदर्शन में आई गिरावट है. अब क्या ऐसी व्यवस्था के हवाले क्रिकेट को भी इसलिए कर दिया जाये कि वो सरकारी टीम कहलाए, न कि बीसीसीआई की.

इसलिए भले ही क्रिकेट पर कॉरपोरेट का कब्जा हो, पर जरा दूसरे खेलों पर नजर गड़ाइए, वहां दशकों से किनका कब्जा है! क्या चल रहा है! तब ज्ञात होगा सच. लेकिन क्रिकेट की आलोचना आसान है क्योंकि हमें क्रिकेट की ही तो जानकारी है बस.

दूसरे खेलों में भी यही चल रहा है. लेकिन जो मीडिया है वो क्रिकेट पर ही फोकस करता है क्योंकि क्रिकेट लोकप्रिय है. तो किसी को अन्य खेलों का पता नहीं चलता. वहीं जिन लोगों को क्रिकेट से आपत्ति है, वे दूसरे खेलों की लोकप्रियता बढ़ाने के लिए क्या कर रहे हैं? क्यों उन खेलों को देखने नहीं जाते? सवाल यह भी है.

बात यह भी होती है कि एक क्रिकेटर पैसों के लिए खेलता है, देश के लिए नहीं. तो बात क्रिकेट के इतर दूसरे खिलाड़ियों की भी हो जाये. उन्हें पदक या देश के सम्मान की कितनी चिंता है! ये तब ही साबित हो गया था जब खेल मंत्रालय द्वारा चलाई गई टारगेट ओलंपिक पोडियम (टॉप) योजना के तहत उन्होंने पैसा लेने में और अपने परिजनों पर खर्च करने में धांधली की. इस पर देश के अंग्रेजी के एक प्रतिष्ठित अखबार ने बाकायदा एक श्रृंखला चलाई थी.

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भारतीय फुटबाल टीम. (फाइल फोटो: पीटीआई)

वहीं क्रिकेट की लोकप्रियता ने दूसरे खेलों को खाया नहीं, बल्कि खेलों के लिए भारतीय समाज में स्पेस कायम रखा. क्रिकेट का तो हमें शुक्रगुजार होना चाहिए कि अस्सी के दशक में जब हॉकी रसातल में जा रही थी, हॉकी के स्वर्णिम दौर को इसी व्यवस्था ने खा लिया था और खेलों से भारतीयों का मोह भंग हो रहा था, तब क्रिकेट ने ही देश में खेल संस्कृति को जीवित रखा.

हॉकी से खाली हुआ स्पेस क्रिकेट ने भरा. खेलों में हमारा रुझान जिंदा रखा. हमें खेल प्रेमी बनाए रखा. वरना खेलों का अस्तित्व ही मिट जाता इस मुल्क से. आज जब दूसरे खेल अच्छा कर रहे हैं तो खेलों के प्रति यही रुझान उन्हें दर्शक दिला रहा है. क्रिकेट की लोकप्रियता ही है जो दूसरे खेलों को बचाए हुए है, अन्यथा आज खेलविहीन समाज में होते हम.

अंत में यह भी जानना जरूरी हो जाता है कि क्रिकेट को लोकप्रिय कॉरपोरेट घरानों ने नहीं, इस खेल के सरल स्वरूप ने बनाया.

अगर बल्ला भी नहीं है तो लकड़ी की फट्टी से 5 रुपये की बॉल खरीद कर, पत्थरों का स्टम्प बनाकर कहीं भी क्रिकेट खेल सकते हैं. घर की छत पर, धूल भरे मैदान में, धूप में, बरसात में, सड़क पर, कीचड़ में, समुद्र किनारे, तालाब के मुहाने.

इसके उलट हॉकी, फुटबॉल, बास्केटबॉल, टेनिस, बैडमिंटन, वेटलिफ्टिंग, कुश्ती, गोल्फ, निशानेबाजी, तीरंदाजी जैसे खेल आप इतनी सहजता से कहीं भी, कैसे भी मौसम में, कभी भी नहीं खेल सकते. अपेक्षाकृत ये खेल मंहगे भी हैं और इन्हें खेलने के लिए विशेष खेल सामग्री की जरूरत होती है. निशानेबाजी के लिए आप लाखों की बंदूक नहीं खरीद सकते.

क्रिकेट की यही सरलता भारतीयों के दिल में इस खेल को गहराई तक उतारने में कामयाब रही. दूसरे खेल क्रिकेट के चलते नहीं, अपने जटिल स्वरूप के चलते पिछड़े. गरीब देश में अधिकांश लोगों के पास इतना पैसा नहीं था कि वह उन मंहगे खेलों से खुद को जोड़ पाता. क्रिकेट उम्मीद से अधिक सस्ता था तो भारतीयों को भा गया. अगर क्रिकेट नहीं होता तो भारत में खेल संस्कृति का खात्मा होते देर नहीं लगती.

सच तो यह है कि हर लोकप्रिय चीज के पीछे कॉरपोरेटर भागते हैं. क्रिकेट ने अपने सरल स्वरूप के चलते जो लोकप्रियता हासिल की, कॉरपोरेटर तो उसे भुनाने के लिए बाद में आये.

(लेखक स्वतंत्र पत्रकार है)