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दक्षिणपंथियों को ‘समाजवादी’ शब्द से इतनी चिढ़ क्यों है?

भाजपा और शिवसेना की ओर से कई बार संविधान की प्रस्तावना से समाजवादी शब्द हटाने की मांग उठ चुकी है. बीते दिनों संघ के विचारक और राज्यसभा सांसद राकेश सिन्हा ने इसे हटाने के लिए सदन में प्राइवेट मेंबर बिल लाने की बात कही है.

(फोटो साभार: विकीमीडिया कॉमन्स)

(फोटो साभार: विकीमीडिया कॉमन्स)

18 मार्च को संघ विचारक राकेश सिन्हा ने कहा कि वे 20 मार्च को राज्यसभा में संविधान की प्रस्तावना से ‘समाजवादी’ शब्द हटाने के लिए एक प्राइवेट मेंबर बिल लेकर आएंगे.

इसके कुछ हफ्ते पहले उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने कहा था कि प्रदेश में समाजवाद नहीं चलेगा, यहां रामराज्य है.

समाजवादी शब्द का विरोध भाजपा और संघ द्वारा पहली बार नहीं हो रहा है. 2014 में नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भाजपा सरकार ने अपने पहले गणतंत्र दिवस (26 जनवरी, 2015) पर संविधान की प्रस्तावना का जो प्रारूप अखबारों में जारी किया था, उसमें भी समाजवादी शब्द नहीं था.

इस बारे में स्पष्टीकरण देते हुए सरकार ने कहा था कि उसने संविधान की मूल प्रस्तावना का इश्तेहार दिया है.

इसी साल भाजपा की सहयोगी रही शिवसेना ने भी समाजवादी शब्द को हटाने की मांग की थी. 2017 में भी भाजपा की तरफ से यह मांग दोहराई गई.

अब जब मामला राज्यसभा में बिल तक आ गया है, तब सवाल उठता है कि भाजपा, संघ और अन्य हिंदुत्ववादी दलों को समाजवादी शब्द से इतनी दिक्कत क्यों है?

कुछ बुद्धिजीवियों की आशंका है कि भाजपा संघ की स्थापना के शताब्दी वर्ष (2025) में भारत को हिंदू राष्ट्र घोषित करना चाहती है इसीलिए वह लगातार संविधान की मूल भावना पर प्रहार कर रही है.

उल्लेखनीय है कि सुप्रीम कोर्ट ने केशवानंद भारती मामले (1973) में प्रस्तावना को संविधान का मूल ढांचा घोषित करते हुए कहा था कि इसमें परिवर्तन करने का अधिकार संसद को नहीं है.

बावजूद इसके भाजपा और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ संविधान की मूल स्थापनाओं को मिटाना चाहते हैं. संविधान विशेषज्ञ प्रो.फैजान मुस्तफा का मानना है कि भाजपा सरकार समाजवादी शब्द को इसलिए हटाना चाहती है ताकि वह सेकुलर शब्द को आसानी से हटा सके.

वस्तुतः असली खतरा धर्मनिरपेक्षता पर है. लेकिन सच तो यह है कि धर्मनिरपेक्षता को सार्वजनिक पटल में पहले ही महत्वहीन बनाया जा चुका है.

2019 का लोकसभा चुनाव जीतने के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बड़े गर्व के साथ कहा था कि इस चुनाव में धर्मनिरपेक्षता की बात करने की हिम्मत किसी पार्टी में नहीं हुई.

दरअसल मोदी के न्यू इंडिया में धर्मनिरपेक्षता की बात करने वाले को देशद्रोही बना दिया गया है. भाजपा और आरएसएस द्वारा ऐसा कथन तैयार किया गया है कि धर्मनिरपेक्षता की बात करने वाले को उदारवादी (लिबरल) एक्टिविस्ट, एनजीओखोर, वामपंथी, नक्सल या कांग्रेसी मुस्लिमपरस्त समझ लिया जाता है.

अब सामान्य लोगों को सांप्रदायिक कहलाने में कोई संकोच नहीं है. उग्र हिंदू होना उनके लिए गर्व की बात है और इसका कारण भाजपा की बहुसंख्यकवादी राजनीति है.

उसने सांप्रदायिकता के दाग को हमेशा तमगे की तरह इस्तेमाल किया है. सांप्रदायिक राजनीति से भाजपा ने खुद को हिंदू हितैषी के रूप में प्रदर्शित किया है. इसी के बलबूते भाजपा बड़े बहुमत के साथ सत्ता में आई है.

अब सेकुलर शब्द की तरह समाजवाद को भी बदनाम करने की साजिश हो रही है. प्राइवेट मेंबर बिल के माध्यम से सदन के पटल पर ऐसी दलीलें पेश की जाएंगी जिनसे जनमानस को यह संदेश दिया जा सके कि संविधान की प्रस्तावना में उल्लिखित समाजवादी शब्द गैर-जरूरी है.

सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के परिप्रेक्ष्य में समाजवाद की ऐसी व्याख्या की जा सकती है जिससे विशेषकर मध्यवर्ग को भ्रमित किया जा सके.

इसके माध्यम से भाजपा आईटी सेल को अधकचरा ज्ञान परोसने का मौका भी मिल जाएगा. इतिहास गवाह है कि पहले भी इस तरह के कारनामे होते रहे हैं.

गांधी के हत्यारे नाथूराम गोडसे ने अदालत में यह स्वीकार कर लिया कि उसने गांधी की हत्या की है, लेकिन उसने अदालत से यह मांग की कि उसे गांधी ‘वध’ के कारणों पर अदालत में विचार रखने का मौका दिया जाए.

गोडसे अदालत में कुल मिलाकर करीब नौ घंटे बोला. इसमें उसने गांधी की हत्या को न्यायोचित ठहराने वाले ढेरों कुतर्क दिए. इन्हीं बयानों को बाद में एक किताब में संकलित किया गया- ‘मैंने गांधी वध क्यों किया?’

इस किताब को जब आज का युवा पढ़ता है तो वह गांधी को खलनायक और गोडसे को देशभक्त समझने लगता है.

भाजपा और आरएसएस द्वारा राष्ट्रीय आंदोलन के चरित्रों को लांछित करने का प्रोजेक्ट आजादी के समय से ही चल रहा है. अब वे संविधान को महत्वहीन बनाना चाहते हैं.

आरएसएस ने संविधान का शुरुआत से ही विरोध किया है. अपने मुखपत्र ‘ऑर्गनाइजर’ के 30 नवंबर 1949 के संस्करण में लिखा गया था, ‘भारत के नये संविधान में सबसे बुरी बात यह है कि उसमें कुछ भी भारतीय नहीं है… उसमें भारत की प्राचीन संवैधानिक विधि का एक निशान तक नहीं है. न ही उसमें प्राचीन भारतीय संस्थाओं, शब्दावली या भाषा के लिए कोई जगह है… उसमें प्राचीन भारत में हुए अनूठे संवैधानिक विकास की तनिक भी चर्चा नहीं है. मनु के नियम, स्पार्टा के लाईकरगस और फारस के सोलन के बहुत पहले लिखे गए थे. आज भी मनु के नियम, जिन्हें मनुस्मृति में प्रतिपादित किया गया है, पूरी दुनिया में प्रशंसा के पात्र हैं और भारत के हिंदू स्वतःस्फूर्त ढंग से उनका पालन करते हैं और उनके अनुरूप आचरण करते हैं. परंतु हमारे संवैधानिक पंडितों के लिए इस सबका कोई अर्थ नहीं है.’

संघ हमारे राष्ट्रध्वज तिरंगा में तीन रंगों के कारण अशुभ मानता रहा है. चूंकि हिंदू धर्मशास्त्रों के अनुसार तीन का अंक अशुभ होता है इसलिए तिरंगा झंडा भी अशुभ है.

इसीलिए दशकों तक संघ ने अपने नागपुर कार्यालय पर राष्ट्रीय दिवसों पर भी तिरंगा नहीं फहराया. गुरुदेव रवीन्द्रनाथ टैगोर द्वारा रचित राष्ट्रगान का भी संघ इस आधार पर लंबे समय तक विरोध करता रहा कि इसमें अधिनायक शब्द इंग्लैंड के राजा के लिए प्रयुक्त हुआ है. जबकि इसमें कोई सच्चाई नहीं है.

आज अपने विरोधियों को ठिकाने लगाने के लिए यही राष्ट्रीय प्रतीक संघ- भाजपा के उग्र राष्ट्रवाद के हथियार हैं. समाजवादी शब्द के विरोध में भाजपा के अपने तर्क हैं.

पहला, संविधान की मूल प्रस्तावना में ‘समाजवादी’ शब्द नहीं है. इसे आपातकाल के दौरान 1976 में हुए बयालीसवें संविधान संशोधन द्वारा जोड़ा गयाथा, इसलिए यह मूल संविधान का हिस्सा नहीं है.

लेकिन इस संशोधन में दो अन्य शब्द- पंथनिरपेक्ष और अखंडता, भी जोड़े गए थे. पंथनिरपेक्षता पर भाजपा का नजरिया सर्वविदित है, लेकिन इस आधार पर भाजपा क्या अखंडता शब्द को भी हटाना चाहती है?

दूसरा तर्क यह है कि समाजवाद विदेशी विचार है. भाजपा के लिए समाजवाद का मतलब मार्क्सवाद है.

दूसरे सरसंघचालक गोलवलकर ने अपनी किताब ‘बंच ऑफ थॉट्स’ में हिंदू राष्ट्र के तीन शत्रु बताए हैं- मुस्लिम, ईसाई और कम्युनिस्ट. इसलिए भाजपा और संघ के लिए वामपंथ विदेशी ही नहीं शत्रु विचार भी है.

लेकिन भाजपा और संघ क्या इस बात से बेखबर हैं कि भगत सिंह जैसे क्रांतिकारियों का सपना समाजवादी भारत बनाना था. वे क्रांतिकारी रूस की वोल्शेविक क्रांति और मार्क्सवाद से बहुत प्रभावित थे.

फांसी लगने से पहले भगत सिंह लेनिन की जीवनी पढ़ रहे थे. क्या भाजपा भगत सिंह और अन्य क्रांतिकारियों को अपना वैचारिक शत्रु घोषित करेगी?

दूसरी बात यह है कि मार्क्सवादी समाजवाद से इतर गांधी से लेकर लोहिया तक भारतीय समाजवाद के अपने मौलिक संस्करण हैं.

इस विदेशी तर्क के आधार पर संघ से भी क्यों न पूछा जाए कि उसका गणवेश और संगठन का प्रारूप देशी है या विदेशी? कौन नहीं जानता कि संघ की पूरी परिकल्पना और वेशभूषा मुसोलिनी और हिटलर की सोच पर आधारित है.

समाजवादी शब्द को हटाने के लिए एक अन्य तर्क यह भी हो सकता है कि भारतीय राष्ट्र-राज्य अब समाजवादी रहा ही नहीं. 1991 में लागू नई आर्थिक नीति से भारत पूंजीवादी राष्ट्र बन गया है. इसका एक प्रभाव यह हुआ है कि आज एक फीसदी लोगों के पास सत्तर फीसदी धन संपदा है.

असमानता और शोषण बेढब तरीके से बढ़े हैं. जितनी तेजी से गरीब बढ़े हैं उतनी ही तेजी से अरबपतियों की संख्या में भी वृद्धि हुई है, लेकिन पिछले कुछ सालों से पूँजीवाद संकट में है.

मंदी के दौर ने हमें सिखाया है कि समाजवाद कितना मूल्यवान और जरूरी फलसफा है. बेरोजगारी, गरीबी, भुखमरी, कुपोषण और पर्यावरण विनाश के मुहाने पर खड़े भारत और दुनिया को समाजवाद से ही बचाया जा सकता है.

पूंजीवादी धनतंत्र तो कोरोना जैसी महामारी के समय भी लूटने से नहीं चूकता.

(लेखक लखनऊ विश्वविद्यालय में हिंदी पढ़ाते हैं.)