नॉर्थ ईस्ट

मणिपुर: कोविड-19 संकट के बीच सरकार की आलोचना पर लगातार हो रही हैं गिरफ़्तारियां

बीते दो सप्ताह में मणिपुर में कम से कम पांच ऐसे लोगों को हिरासत में लिया गया, जिन्होंने कोरोना संकट से निपटने को लेकर भाजपा के नेतृत्व वाली एन. बीरेन सिंह सरकार पर सवाल उठाए थे. सरकार की आलोचना पर खामियाज़ा भुगतने वालों में उपमुख्यमंत्री से लेकर सरकारी कर्मचारी और एक शोधार्थी भी शामिल हैं.

कोरोना वायरस के मद्देनजर लॉकडाउन के दौरान इम्फाल का ईमा मार्केट (फोटो: पीटीआई)

कोरोना वायरस के मद्देनजर हुए लॉकडाउन के दौरान इम्फाल का ईमा मार्केट (फोटो: पीटीआई)

देशभर में तेजी से फ़ैल रहे कोरोना संक्रमण से उत्तर पूर्व भी अछूता नहीं है, लेकिन इस संक्रमण के प्रसार को लेकर मणिपुर में सरकार से सवाल करने वाले लोग वायरस के साथ इन सवालों के नतीजे भुगतने के डर के साथ भी जी रहे हैं.

बीते दो सप्ताह में मणिपुर में कम से कम पांच ऐसे लोगों को हिरासत में लिया गया, जिन्होंने कोरोना संकट से निपटने को लेकर भाजपा के नेतृत्व वाली एन. बीरेन सिंह सरकार पर सवाल उठाए थे.

स्क्रॉल डॉट इन की रिपोर्ट के अनुसार सवालों का खामियाजा भुगतने वालों में उपमुख्यमंत्री से लेकर सरकारी कर्मचारी और एक शोधार्थी भी शामिल हैं.

बीते 9 अप्रैल को मणिपुर सरकार द्वारा उपमुख्यमंत्री युम्नाम जॉयकुमार सिंह से उनके सभी प्रभार वापस ले लिए गए.

आरोप है कि उन्होंने कोरोनावायरस के प्रसार को रोकने के लिए हुए लॉकडाउन के दौरान मुख्यमंत्री एन. बीरेन के राज्य में खाद्य सामग्री की सप्लाई को लेकर दिए आश्वासन को ‘झूठा’ बताया था.

स्क्रॉल  से बात करते हुए नेशनल पीपुल्स पार्टी (एनपीपी) के नेता जॉयकुमार सिंह ने कहा कि उन्हें भाजपा कार्यकर्ताओं द्वारा ऐसा कहने के लिए उकसाया गया, जिन्होंने छिपकर इसे रिकॉर्ड कर लिया.

उन्होंने कहा कि यह भाजपा की साजिश है. ज्ञात हो कि भाजपा एनपीपी के साथ गठबंधन में सरकार चला रही है.

जॉयकुमार सिंह का कहना है कि विधानसभा में उनके दल के चार विधायक हैं और अगर उन्हें 15 अप्रैल तक बहाल नहीं किया गया तो वे सरकार से समर्थन वापस ले लेंगे.

वहीं मुख्यमंत्री कार्यालय ने इस बात की पुष्टि की है कि मुख्यमंत्री के जॉयकुमार सिंह को हटाने के फैसले के पीछे उनका कथित बयान है.

एक अधिकारी ने गोपनीयता की शर्त पर बताया, ‘सार्वजनिक तौर पर उनका अपमान किया गया था, इसलिए भाजपा विधायकों ने जोर दिया कि कोई कदम तो उठाया जाना चाहिए.’

लेकिन जॉयकुमार सिंह के साथ जो हुआ है, वह अकेली घटना नहीं है, जहां कोरोना संकट और लॉकडाउन संबंधी आलोचना को लेकर सरकार की तरफ से इस तरह का कदम उठाया गया है.

बीते दो हफ़्तों में मणिपुर पुलिस ने कम से कम ऐसे पांच लोगों को हिरासत में लिया है, जिन्होंने सरकार, विशेष रूप से मुख्यमंत्री को लेकर सवाल या टिप्पणियां की थीं.

प्रेस विज्ञप्ति को लेकर हुई गिरफ़्तारी

1 अप्रैल को पुलिस ने मानवाधिकार कार्यकर्ता तखैनचांगबम शादिशकांता को गिरफ्तार किया. शादिशकांता ‘यूथ्स फोरम फॉर प्रोटेक्शन ऑफ ह्यूमन राइट्स नाम के संगठन से जुड़े हैं, जिसने इम्फाल के बाहरी इलाके में क्वारंटाइन सेंटर खोलने को लेकर एक विज्ञप्ति जारी की थी.

यहां उन लोगों को रखा जाना था, जो कोविड-19 के संदिग्ध के संपर्क में आए हैं, लेकिन उनमें अभी कोई लक्षण नहीं है.

संगठन से जुड़े यू. जेनिसन बताते हैं, ‘जिस जगह को उन्होंने चुना था, वह धान के खेतों के बीच में है. हम यहां के मूलनिवासियों के अधिकारों के लिए काम करते हैं, जो धन की खेती पर ही निर्भर हैं, इसलिए हमने कहा था कि वे पास ही एक इस्तेमाल न हो रही हवाईपट्टी में सेंटर बना सकते हैं.’

जेनिसन का आरोप है कि पुलिस ने शादिशकांता और उनके परिजनों को बिना आरोप बताए 1 अप्रैल की देर शाम उन्हें उनके घर से गिरफ्तार किया था. वे इस रात पोरोमपट थाने के लॉकअप में रहे.

इसके बाद 2 अप्रैल की दोपहर पुलिस इस संगठन के अध्यक्ष केपी मांगांग के घर पहुंची और उन्हें भी शादिशकांता के साथ हिरासत में रखा गया. जेनिसन का कहना है कि मांगांग को भी उनपर लगे आरोप बताए बिना गिरफ्तार किया गया.

जेनिसन ने यह भी आरोप लगाया है कि पुलिस ने इन दोनों से जिस अरेस्ट मेमो पर दस्तखत करवाए, उस पर कोई समय या गिरफ़्तारी की वजह नहीं लिखी थी.

इसके बाद 2 अप्रैल की ही शाम को जब संगठन की ओर से एफआईआर की मांग हुई, तब बताया गया कि पुलिस आरोप तय करने की प्रक्रिया में है.

इसके कुछ देर बाद पुलिस ने एफआईआर दी, जिसमें दोनों पर राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन अधिनियम, 2005 और आईपीसी की धारा 120 बी [आपराधिक साजिश] के तहत मामला दर्ज किया गया था.

इसी रात करीब 9.30 बजे इन दोनों को पूर्वी इम्फाल के सीजेएम की अदालत में पेश किया गया, जहां से करीब दस बजे प्रत्येक को 30 हजार रुपये के जमानती बॉन्ड भरने के बाद छोड़ा गया.

इम्फाल पूर्व पुलिस के प्रमुख जोगेशचंद्र हाओबीजम ने बताया कि इन दोनों पर हवाईपट्टी को क्वारंटाइन सेंटर के लिए इस्तेमाल की सलाह देने का आरोप है. उन्होंने कहा, ‘यह सेना की जमीन है. कोई भी ऐरा-गैरा सेना की जमीन के बारे में ऐसे नहीं कह सकता.’

फेसबुक पोस्ट के लिए हुई गिरफ्तारियां

1 अप्रैल की शाम को ही शादिशकांता के साथ इम्फाल के एक सरकारी कॉलेज में पढ़ाने वाले कोंसम विक्टर सिंह को भी उनके घर से हिरासत में लेकर पोरोमपट थाने में रखा गया था.

विक्टर ने बताया कि उनके अपराध बारे में पुलिस से पूछने पर जवाब दिया गया कि उन्होंने फेसबुक पर एक दिन पहले लिखे गए एक पोस्ट के संबंध गिरफ्तार किया गया है.

मेईतेई भाषा में लिखी इस पोस्ट में उन्होंने लिखा था कि ‘क्या कोई जानता है कि मुख्यमंत्री एन.बीरेन सिंह ने कोविड-19 मुख्यमंत्री राहत कोष में कितना योगदान दिया है.’

विक्टर का कहना है कि थाने में उन्हें पुलिसकर्मियों ने बताया कि उनके खिलाफ एक्शन लेने के लिए ‘मुख्यमंत्री की ओर से दबाव डाला गया था.’ वे कहते हैं, ‘मुझसे कहा गया कि मेरे पास कोई विकल्प नहीं है, मुझे रात लॉकअप में ही बितानी होगी.’

उनके खिलाफ आधिकारिक तौर पर कोई आरोप दर्ज नहीं किया गया था. विक्टर ने बताया कि अगली सुबह पुलिस ने उनसे कहा कि अगर वे सोशल मीडिया साइट से अपनी पोस्ट डिलीट कर दें और वहां माफी मांगे, तो उन्हें छोड़ दिया जाएगा.

वे कहते हैं, ‘मैं कोविड-19 के समय में एक छोटे-से लॉकअप में छह अन्य लोगों के साथ एक रात गुजार चुका था, इसलिए जैसा कहा गया, मैंने वो किया.’

उनके द्वारा फेसबुक पर यह लिखने कि ‘मैं यह पोस्ट डिलीट कर रहा हूं, मणिपुर के मुख्यमंत्री में प्रति मेरा कोई नकारात्मक उद्देश्य नहीं है’ उन्हें छोड़ दिया गया.

पुलिस से इस बारे में पूछने पर जोगेशचंद्र हाओबीजम ने इस पर कुछ कहने से इनकार कर दिया.

इसके दो दिन बाद 3 अप्रैल को सामाजिक कार्यकर्ता और डॉक्टर एल. देबब्रत रॉय को उनके घर से उठाया गया. थाने में उन्हें एक दिन पहले की गयी फेसबुक पोस्ट के बारे में बताने को कहा गया, जहां उन्होंने मुख्यमंत्री को लेकर एक टिप्पणी की थी.

पोस्ट में उन्होंने लिखा था, ‘मणिपुर के वर्तमान मुख्यमंत्री को संकट के इस समय में, किसी भी व्यक्तिगत राजनीतिक एजेंडा या प्रतिशोध के लिए राज्य के संसाधनों, समय और कर्मियों का दुरूपयोग करने से बचना चाहिए. यह उनके पद और उससे जुड़ी जिम्मेदारियों का अपमान करने जैसा है.’

रॉय का कहना है कि उन्होंने उनसे पूछताछ कर रहे पुलिसकर्मियों से कहा भी था कि उन्होंने मुख्यमंत्री या उनके सहकर्मियों पर कोई व्यक्तिगत टिप्पणी नहीं की है.

लेकिन इसके बावजूद उन्हें पुलिस की मांग के मुताबिक इस पोस्ट के बारे में स्पष्टीकरण लिखकर देना पड़ा, जिसके बाद उन्हें एक रात लॉकअप में बिताने के लिए कहा गया.

जब उनके वकील ने इस बारे में एफआईआर की मांग की, तब पुलिस ने कहा कि रॉय के खिलाफ आईपीसी की धारा 188 (सरकारी आदेश की अवज्ञा) के तहत मामला दर्ज किया जा रहा है, हालांकि एफआईआर दर्ज नहीं की गई थी.

अगले दिन पुलिस ने रॉय का एक वीडियो बनाया जिसमें वे मुख्यमंत्री से माफी मांग रहे थे, इसके बाद उन्हें छोड़ दिया गया.

इस बारे में पश्चिमी इम्फाल के एसपी के. मेघाचंद्र सिंह ने कहा कि रॉय ने ‘सरकार पर संसाधनों के दुरूपयोग’ का आरोप लगाया था इसलिए उनसे बातचीत की गयी और फिर निजी मुचलका भरने के बाद रिहा कर दिया गया.

लेख के लिए हुई गिरफ़्तारी

8 अप्रैल को मणिपुर के रहने वाले एक शोधार्थी मोहम्मद चिंगीज़ खान को उनके नाम से 5 अप्रैल को मणिपुर के एक स्थानीय अख़बार में छपे लेख के लिए गिरफ्तार किया गया.

उन पर आईपीसी की धारा 124 ए (राजद्रोह) 153 ए, 505 और 120 बी के तहत मामला दर्ज किया गया है. उनके लेख में मणिपुरी मुस्लिम, जिन्हें स्थानीय स्तर पर पंगल कहा जाता है, को हाशिये पर डालने की बात कही गई थी.

उनके भाई मोहम्मद सरवर रहमान का कहना है कि यह उनके एक पुराने लेख का अनुवाद था, जो दिल्ली के एक अख़बार में अप्रैल 2019 में प्रकाशित हुआ था.

खान ‘पैदा की जा रही असुरक्षा के शिकार होते पंगल’ [Pangals victim of manufactured insecurity] शीर्षक के इस लेख के सह-लेखक थे.

पुलिस की ओर से मेघचंद्र सिंह का कहना है कि लेख का शीर्षक ‘भड़काऊ’ है, खास तौर पर तब, जब कोरोना संक्रमण के मद्देनजर राज्य में दिल्ली से तब्लीगी जमात के कार्यक्रम से लौटे हुए लोगों द्वारा अपनी यात्रा की जानकारी छिपाये जाने को लेकर उनके खिलाफ कदम लेने का सोचा जा रहा है.

मेघचंद्र सिंह ने कहा, ‘लेख ने हद पार कर दी है- इससे समुदायों के बीच तनाव हो सकता है. मणिपुर के अख़बार के संपादक को भी इसका एहसास हुआ है और उन्होंने हमसे माफी मांगी है.’

मणिपुर में प्रकाशित हुए लेख के शीर्षक का मोटे तौर पर अनुवाद करें तो यह होता है ‘मुस्लिमों को खदेड़ने की राजनीतिक साजिश.’

हालांकि खान के भाई रहमान का कहना है कि खान ने यह अनुवाद नहीं किया है, न ही यह शीर्षक उनके द्वारा दिया गया. मणिपुरी अख़बार के संपादक ने खान से संपर्क किया था.

अख़बार के संपादक मोहम्मद अयूब खान से संपर्क नहीं हो सका है. हालांकि राज्य में हो रही इन घटनाओं से पत्रकारों में डर है.

राज्य के एक वरिष्ठ पत्रकार ने नाम न छापने की शर्त पर इस वेबसाइट को बताया, ‘हम बेहद अनिश्चितता की स्थिति में हैं- बोलने की आज़ादी कम हो चुकी है. यह सब किशोरचंद वांगखेम से शुरू हुआ था और अब आगे ही बढ़ रहा है.’

ज्ञात हो कि नवंबर 2018 में मणिपुर के एक टीवी पत्रकार किशोरचंद्र वांगखेम को सोशल मीडिया पर डाले एक वीडियो में प्रधानमंत्री मोदी, राज्य के मुख्यमंत्री एन. बीरेन सिंह और आरएसएस की आलोचना करने के लिए रासुका के तहत गिरफ़्तार किया गया था.

अप्रैल 2019 में किशोर को उच्च न्यायालय के आदेश के बाद रिहा किया गया था.

इन पत्रकार ने आगे कहा, ‘अपने कनिष्ठ को ही पद से हटा देना सबसे बड़ा उदाहरण है जो दिखाता है कि मुख्यमंत्री अपनी किसी भी तरह की आलोचना बर्दाश्त नहीं कर सकते हैं.’