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तबलीग़ी जमात की ग़लती पर बिना दुर्भावना के बात होती, तो बेहतर होता

तबलीग़ी जमात की आलोचना सही है, लेकिन ज़रूरी है कि उनके इतिहास को पढ़ा जाए और सोच समझकर उनके बारे में कोई राय बनाई जाए.

New Delhi: People who came for ‘Jamat’, a religious gathering at Nizamuddin Mosque, being taken to LNJP hospital for COVID-19 test, after several people showed symptoms of coronavirus, during a nationwide lockdown, in New Delhi, Tuesday, March 31, 2020. (PTI Photo/Vijay Verma)(PTI31-03-2020 000142B)

तबलीग़ी जमात के कार्यक्रम में शामिल हुए लोगों में कोरोना संक्रमण मिलने के बाद दिल्ली के निजामुद्दीन मरकज़ से लोगों को ले जाकर अस्पताल और क्वारंटाइन सेंटर में भर्ती कराया गया था. (फोटो: पीटीआई)

बात तबलीग़ी जमात की ‘ग़लती’ से शुरू हुई और फिर टांग वहीं टूटी जहां मुसलमानों के लिए नफ़रत बच जाती है.

मरकज़ के एपिसोड के बाद जमात से हर तरह की नफ़रत को हम अपने जैसे इंसानों की मासूमियत भी कह सकते थे, लेकिन इस नफ़रत को सुलगाकर मुसलमानों को दहशत में डाल दिया गया.

मुसलमान पहले से ही कई तरह की दहशत में हैं. इसके बावजूद यहां उनकी बात ग़ैरज़रूरी है इसलिए थोड़ा-सा फर्क करते हुए उस तबलीग़ी जमात का स्केच पेश करता हूं जो कोरोना जैसी महामारी के वाहक बनकर अपना ‘परिचय’ दे रहे हैं.

मरकज़ की भूमिका की जांच ज़रूरी है, लेकिन ये किसी दुर्भावना के बिना मुमकिन होता तो कुछ और बात होती. जांच से पहले ही दुर्भावना की ख़ूब सारी नुमाइश हो चुकी और जमातियों को गोली मार देने तक की बात कही गई.

इस बीच ख़ुद को सेकुलर कहने वाले बुद्धिजीवी और धर्मनिरपेक्षता के अलमबरदारों ने भी जमात को अपनी-अपनी नीयत के हिसाब से आईना दिखा दिया.

उनकी नीयत जमात को जानने-समझने की नहीं थी. इसलिए जमात क्या है? ये कौन लोग हैं? ये बताने के बजाय कहा गया कि ये बुनियादपरस्त और अंधविश्वासी हैं.

मैं इस पर सवाल नहीं करना चाहता, लेकिन यक़ीन से कह सकता हूं कि बुनियादपरस्त और अंधविश्वासी होने की मान्यताओं में जमात को फिट नहीं किया जा सकता.

आम तौर पर मुसलमानों की जिस विचारधारा को प्रगतिशील समझा जाता है, वहीं से इसकी उत्पत्ति हुई है. मुसलमानों का एक स्कूल ‘सूफ़ी जमात’ कहते हुए इनकी आलोचना करता रहा है और तरह-तरह के आरोप लगाता रहा है.

एक बड़ा आरोप ये है कि ये लोग सहाबा (जो पैग़म्बर से मिला हो और मुसलमान मरा हो) से ज़्यादा सूफ़ियों को अहमियत देते हैं. ऐसे में इनको बुनियादपरस्त कैसे कह सकते हैं?

यह भी कहा गया कि मुसलमानों के एक छोटे-से हिस्से में ही इनका प्रभाव है और ये दुनिया से सरोकार नहीं रखते.

अब इस तथ्य को सामने रखना चाहता हूं कि भारत में शायद ही कोई ऐसी जगह हो जहां इनका प्रभाव नहीं है और खेती-किसानी से लेकर स्कूल, कॉलेज, प्रशासन, आर्ट-लिटरेचर हर जगह ये दुनिया से सरोकार रखते हुए मौजूद हैं.

अब से पहले ज़रूरी नहीं लगा कि इनको जाना जाए और जब ये लाज़मी हो गया तब इनके लिए दकियानूसी और तर्कहीन धर्मांधता जैसे शब्दों का बेजा इस्तेमाल किया गया.

मैं मज़हब को नहीं मानता लेकिन कोई अगर ग़लत तरीक़े से किसी की आस्था पर उंगली रखना चाहे, तो बोलना ज़रूरी समझता हूं.

उनको दकियानूसी कैसे कह सकते हैं जो 14 सौ साल पहले के इस्लाम से आगे बढ़कर ख़ुद को सूफ़ियों से भी जोड़ते हैं और धर्म के पेचीदा मामलों में हाथ डालने के बजाय ‘फ़ज़ाएल’ यानी काम की अच्छाई के बारे में बताते हैं.

यहां काम का अर्थ धर्म और दुनिया दोनों है. उसकी एक छोटी-सी मिसाल ये है कि जमात में दांत साफ रखने तक के फ़ज़ाएल के बारे में तालीम दी जाती है.

इसको बढ़ाकर देखना चाहें तो रोज़गार के हलाल होने से लेकर बीवी-बच्चे और पड़ोसी के अधिकारों तक की तालीम को यक़ीनी बनाते हैं.

ये दुनिया के त्याग को इस तरह से सुनिश्चित करते हैं कि अपने काम से वक़्त निकाल कर जमात को वक़्त दें. उदाहरण के लिए ये छात्रों को छुट्टी में अपने साथ जुड़ने की दावत देते हैं. बीवी-बच्चे वालों को बताते हैं कि जब जमात में जा रहे हों तो पीछे से अपने घर वालों की व्यवस्था ज़रूरी है.

प्रसंगवश जमात को याद करते हुए लोगों को इल्हाम हुआ कि जमात-ए-इस्लामी और जमीयत-ए-उलेमा-ए-हिंद जैसे संगठनों की तरह राजनीतिक प्रश्नों पर कभी इसकी आवाज़ सुनाई नहीं पड़ी.

वहीं, एक बड़ा आरोप ये लगाया गया कि ये दुनिया को तुच्छ समझते हैं और कहते हैं कि असली जिंदगी मरने के बाद है.

इस पर आने से पहले कहूंगा कि ऐसी बात करने वाले उनसे ज़रा भी अलग नहीं जो इसको ‘कोरोना जिहाद’ तक कह चुके हैं.

दूसरे शब्दों में कहें, तो बात राष्ट्रीय सुरक्षा की थी, सरकारों की ज़िम्मेदारी की थी, जमात के रोल की जांच की थी, पर आप करने लगे हिंदू-मुसलमान.

अब हाल ये है कि मुल्क का मुसलमान कोरोना से शायद उतना डरा हुआ नहीं है जितना अपने मुसलमान होने से डर गया है या कहें डरा दिया गया है.

सरकार भी इस डर को बहाल रखते हुए हेल्थ बुलेटिन में अलग से जमात के आंकड़े पेश कर रही थी. मीडिया को भी मौक़ा निला.

जमात को उसके अपराध के लिए जवाबदेह बनाना ठीक है. लेकिन इस बहाने कुछ कहने से पहले उनका लिटरेचर पढ़िए और नहीं तो कम से कम उनकी अच्छाई-बुराई को अपने अनुभव से कितना जानते हैं इस पर बात कीजिए.

इन सबसे अलग जमात से उनकी सही पहचान छीन लेने की होड़ मची हुई है.

क्या ये इस्लाम से अलग हैं? जवाब है नहीं, ये लोग धार्मिक काम को सही से करने की तबलीग़ करते हैं, लोगों को छोटी-छोटी बातों की तालीम देते हैं.

इनके बीच इस्लाम की तालीम से अलग कोई तालीम नहीं है, इसके बावजूद यहां कुछ बिंदुओं को उनके लिए पेश करना ज़रूरी है जो समझते हैं कि इनको दुनिया से मतलब नहीं है.

वो अपनी किताब ‘फ़ज़ाएल-ए-आमाल’ में कहते हैं:

जाएज़ तरीक़ों से हलाल रोज़ी हासिल करे और किफ़ायत शेआरी के साथ इसको ख़र्च करे और अपने अहल-ओ अयाल और दिगर अक़रबा के शरई हुक़ूक़ को अदा करे.

यानी गलत तरीक़े से पैसे कमाना ग़लत है, फिजूल-ख़र्ची ग़लत है. हलाल पैसे से ही घर की ज़रुरत, अपने बच्चे की तालीम और दूसरे रिश्तेदारों की मदद सही है.

सवाल है आख़िर कुछ किए बिना रोज़ी कैसे कमाया जा सकता है? क्या सिर्फ़ मस्जिद में अल्लाह-अल्लाह करके रोज़गार हासिल हो जाएगा?

ये आलोचक देख नहीं पा रहे कि उन्हीं के साथ पढ़ने-पढ़ाने वाले, कारोबारी, किसान यहां तक कि मज़दूर सब कुछ करते हुए जमात को समय देते हैं.

ये सही है कि कुछ लोग ज़्यादा तरजीह दीन को देते हैं और घर का ख़याल नहीं रखते पर इसके लिए भी जमात को दोष देना ग़लत है.

जमात में जाने वालों को कहा जाता है कि वो अपने पैसे से ही जा सकते हैं. बुनियादी बात ये है कि बिना कोई काम किए पैसा कहां से आएगा. ये कोई संगठन तो है नहीं जिसे चंदा मिलता है.

यहीं पर ये बात समझने की है कि जब जमात संगठन ही नहीं है तो एक संगठन के तौर पर उसकी सियासी राय क्यों होगी?

हां, उसमें शामिल होने वालों की एक व्यक्ति के तौर पर ख़ूब सियासी और समाजी राय होती है. आम आदमी की तरह ये लोग भी सियासी होते हैं.

बस एक फर्क है कि जब वो जमात में होते हैं उस वक़्त सियासी बातें नहीं करते लेकिन यहां से लौटकर इनसे परहेज़ भी नहीं करते.

रही बात दुनिया को तुच्छ समझने की और ये कि असली जिंदगी मरने के बाद है तो ये उनकी मान्यता नही है. वो इस्लाम के मुताबिक़ ये ज़रूर मानते हैं कि दुनिया एक इम्तिहान की जगह है और असल ज़िंदगी मरने के बाद है.

ये सब जानते हैं कि मुस्लिम समुदाय फिरकों में बंटा हुआ है. ऐसे में जमात का स्ट्रक्चर ऐसा है कि वो फिरकों की बुनियाद पर फर्क नहीं करता और सबको अपने साथ आने की दावत देता है.

हां, जमात के काम करने के तरीक़े और उद्देश्यों को लेकर मुसलमानों का आपस में विवाद है. विवाद पर कई किताबें लिखी गई हैं.

आरोप-प्रत्यारोप का दौर चला है. लेकिन यहां एक दूसरे से सही-ग़लत होने को लेकर तर्क के साथ बात की गई है. हालांकि इसके लिए भी धर्म के स्कॉलर मौजूद हैं. जमात आम तौर से इसमें सीधे-सीधे हिस्सा नहीं लेती.

फिर भी अगर कोई जमात को संगठन के तौर पर देखता है तो कहा जा सकता है कि भारत के तमाम दूसरे इस्लामी संगठनों की तुलना में जमात सेकुलर है.

और अगर आप सूफ़ी को सेकुलर तबक़ा समझते हैं तो जान लीजिए कि इसकी आलोचना करते हुए और कमतर दिखाने की कोशिश में एक तबक़ा जमात को ‘सूफ़ी जमात’ कहता है और बाक़ायदा इनके तौर-तरीक़ों की तुलना सूफ़ियों से करता है.

ये बात इस हद तक सही भी है कि वो अपनी तालीम में कई सूफ़ियों का नाम लेते हैं और उनकी शिक्षाओं के बारे में बताते हैं. जिस किताब से तालीम दी जाती है उसका नाम फ़ज़ायल-ए-आमाल है जो दो हिस्सों में है.

ये बुनियादी तौर पर संपादित किताब है जिसमें ऑथेंटिक किताबों से धर्म की उन बातों को जमा किया गया है जो किसी न किसी तरह से ये बताते हैं कि नमाज़ कैसे पढ़ना चाहिए, रमज़ान में क्या करना चाहिए, क़ुरान पढ़ने का तरीक़ा क्या है, लोगों के साथ कैसे पेश आना चाहिए.

कुल मिलाकर यह तालीम कि धर्म के हिसाब से मुसलमान की ज़िंदगी कैसी होनी चाहिए. यहीं पर संविधान की बात करें तो जमात का ये काम असंवैधानिक नहीं है.

उनकी इसी किताब में दीन के काम को ज़रूरी बताते हुए लिखा गया;

इसका ये मतलब हरगिज़ नहीं  कि अपना तमाम कारोबार छोड़कर बिलकुल इस काम में लग जाए, बल्कि मक़सद ये है जैसे और दुनियावी ज़रुरत इंसान के साथ लगी हुई है और उनको अंजाम दिया जाता है, इस काम को भी ज़रूरी और अहम् समझकर इसके वास्ते वक़्त निकाला जाए, जब चंद आदमी इस मकसद के लिए तैयार हो जाएं तो हफ़्ते में चंद घंटे अपने मोहल्ले में, और महीने में तीन दिन आसपास में और साल में चालीस दिन और पूरी ज़िंदगी में एक बार चार महीना दूर जाकर इस काम को करें और कोशिश करें कि हर मुसलमान अमीर हो या ग़रीब, ताजिर हो या मुलाज़िम, ज़मींदार हो या काश्तकार, आलिम हो या जाहिल इस काम में शरीक हो जाए.

इसी तरह बताया गया कि;

देखो किसी मशगूल आदमी को न छेड़ना.
जो काम आप पर वाजिब है उसको छोड़कर जमात में मत जाओ.

बात आरोपों की है तो बताते चलें कि एक ज़माने में कहा गया कि जमात असल में इस्लाम के ख़िलाफ़ हिंदुओं की साज़िश है.

ये बात शायद इसलिए कही गई कि वो इस्लाम के नाम पर शिद्दत पसंदी के ख़िलाफ़ हैं. इस तरह के आरोपों के बीच जमात ने अपना काम किया है.

ये भी दुनिया को आम लोगों की तरह ही मानते हैं और किसी भी बीमारी के इलाज के लिए डॉक्टर के पास जाते हैं. बच्चों की अच्छी शिक्षा के पक्षधर हैं.

उनको भी जान की परवाह है और इस्लाम की नज़र से देखें तो उनको मालूम है कि इंसानी जान से बढ़कर कुछ भी नहीं है. यहां शायद समझना हमें है कि जमात ऐसे किसी मिशन पर नहीं है कि उसको किसी कथित दुश्मन से जिहाद करना है.

आलोचना सही है, लेकिन ज़रूरी है कि उनके इतिहास को पढ़ा जाए और सोच समझ कर कोई राय बनाई जाए.