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विकास के लिए आदिवासियों और दलितों की ही बलि क्यों दी जाती है?

भारत के प्रधानमंत्री सबको घर उपलब्ध करवाने का वायदा करते हैं, वहीं मध्य प्रदेश सरकार आदिवासियों के बने बनाए घर तोड़ रही है.

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मध्य प्रदेश के रीवा ज़िले का छिपिया कोटा गांव, जहां रहने वाले लोगों के घर उजाड़ दिए गए.

रीवा ज़िले के छिपिया कोटा गांव की सरिता आदिवासी अपने दो छोटे बच्चों और पति के साथ रहती हैं. साल के चार महीने वे उत्तर प्रदेश में इलाहाबाद के पास शंकरगढ़ में पत्थर खदान में मज़दूरी करने जाते हैं.

तीन महीने गुजरात की आटा मिल में काम करने जाते हैं. बाकी समय यहीं मज़दूरी की खोज करते हैं. एक दिन (2 जून 2017 को) इन्हें एक सरकारी नोटिस मिलता है कि तीन जून को उनका घर गिरा दिया जाएगा.

इसी तरह राजकुमारी कोल के पति सूरत (गुजरात) में कपड़ा मिल में मज़दूरी करते हैं. चार महीने में उन्हें घर आने के लिए एक हफ्ते की छुट्टी मिलती है. इनका भी घर तीन जून को गिरा दिया गया.

भीषण गर्मी में अब ये परिवार अपने बच्चों के साथ पन्नी की छत बनाकर रह रहा है. भारी पुलिस बल का आतंक स्थापित करके इसी तारीख़ को छिपिया कोटा गांव के 39 घर गिरा दिए गए.

पुलिस अधिकारियों का कहना है कि हमें ज़िला कलेक्टर का आदेश मिला इसलिए हमने पुलिस बल उपलब्ध करवाया. यह घटना प्रमाण है कि कानूनी कार्यवाही न्यायपूर्ण कार्यवाही हो यह कतई ज़रूरी नहीं है.

रीवा ज़िले के जवा विकासखंड के गेदुरहा गांव के भूमिहीन जगलाल कोल आदिवासी को 30 जुलाई 2002 को 0.405 हेक्टेयर ज़मीन का कृषि पट्टा दिया गया था. जगलाल इसी ज़मीन पर एक झोपड़ी बनाकर जीवन जीने की जद्दोजहद कर रहे थे.

उन्हें जो पट्टा मिला था उसमें एक बिंदु लिखा हुआ था- किसी योजना के लिए आवश्यकता होने पर पट्टेधारी को नोटिस दिया जाकर, भूमि वापस ली जा सकेगी और पट्टा निरस्त किया जा सकेगा.

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छिपिया कोटा गांव में लोग खुले आसमान के नीचे रहने को मजबूर हैं.

समाज के ऐसे तबके, जिनका इतिहास ही जंगल और ज़मीन के इतिहास के साथ जुड़ा हुआ हो, जिनके जीवन में सम्पत्ति संग्रहण के सिद्धांत का कोई स्थान वास्तव में न रहा हो, जिनके पास रहने और रोज़गार की कोई वैकल्पिक व्यवस्था न हो, उनके लिए इस तरह के अमानवीय और निष्ठुर शर्तें तय होती हैं.

यहां भी वही सवाल उठ आता है कि अपने समाज के सबसे ऊंचे एक प्रतिशत तबके, जिनका 56 फीसदी संपदा पर नियंत्रण है, क्या उनके लिए इस तरह की शर्तें वास्तव में लागू होती हैं?

बहरहाल मध्य प्रदेश की संशोधित भू राजस्व संहिता (संशोधन) अधिनियम, 2015 के मुताबिक राज्य सरकार की भूमि पर अगर कोई अनाधिकृत कब्ज़ा है तब भी ज़िला कलेक्टर एक सीमा तक और तय राशि का भुगतान लेकर खेती और ग़ैर-खेती के प्रयोजन के लिए सरकारी पट्टेधारी हक में व्ययन कर सकता है. कानूनी प्रावधान तो साफ़ है, किन्तु सरकार और प्रशासन के नीयत में खोट है.

यहीं पास में एक और बसाहट है- खैरहा. 15 सालों से यहां 89 आदिवासी परिवार बसे हुए हैं. वर्ष 2012-13 में इन्हें अचानक इतवार की एक शाम एक सूचना पत्र प्राप्त हुआ कि सोमवार की सुबह इनके घर गिरा दिए जाएंगे, क्योंकि इन्होंने सरकारी ज़मीन पर ग़ैरक़ानूनी रूप से कब्ज़ा किया हुआ है.

पूरी बसाहट हडबड़ा गई. ये परिवार पहले भी विकास और ग़ैरक़ानूनी कब्ज़े के आधार पर दो मर्तबा उजाड़े जा चुके थे. इस बार 31 मई 2017 (इस पत्र पर 23 मई 2017 की तारीख़ डली हुई है) को इन्हें एक बार फिर सूचना पत्र दिया गया कि सभी परिवार अपने घर खाली कर दें क्योंकि 3 जून 2017 की सुबह 10 बजे से सभी घर गिराए जाएंगे और यदि उन्होंने घर खाली नहीं किया तो घर गिराने के लिए होने वाला पूरा ख़र्चा उनसे ही वसूल किया जाएगा.

यह प्रक्रिया गेदुरहा और खेरहा के साथ ही तीन अन्य गांवों में भी चलाई गई, जिनमें छिपिया, जिरौहा और कोटा शामिल हैं. स्पष्टता के लिए यह उल्लेख करना ज़रूरी है कि खेरहा और छिपिया को कोटा गांव का ही हिस्सा मान जाता है, जबकि इनकी आपसी दूरी 3 से 4 किलोमीटर है. कुल मिलकर इन्हें 15 से 20 साल गुज़र जाने के बाद भी अलग जनसांख्यिकीय-भौगोलिक पहचान नहीं मिली है.

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छिपिया गांव में खुले आसमान के नीचे रात गुज़ारने को मजबूर एक परिवार.

तीन दिन में ख़ुद अपना घर गिरा देने का नोटिस कौन खुशी से लेगा; या कभी भी कोई अपना आशियाना क्यों गिराना चाहेगा? मानवीय सभ्य समाज में सरकार ऐसे क़ानून कैसे बना सकती है, जो भूमि और आवासहीनों के द्वारा ज़मीन के छोटे से टुकड़े पर बनाए घरों को ‘ग़ैरक़ानूनी’ घोषित करे, उन्हें तहस नहस कर दे.

सभ्य सरकार से संवेदनशीलता की अपेक्षा की जाती है. रीवा के प्रकरण में ज़िला प्रशासन को यह दिखाई दिया कि ‘लोगों ने अनाधिकृत कब्ज़ा’ किया हुआ है, लेकिन वास्तविकता यह है कि छिपिया के 39 परिवारों को वर्ष 2001-02 में मध्य प्रदेश सरकार द्वारा पट्टा दिया गया था.

इसके बारे में कहा गया कि यह पट्टा वर्ष 2006 में कभी निरस्त किया जा चुका है. छिपिया के लोग कहते हैं कि न तो हमें इसकी कभी भी कोई सूचना मिली न ही हमें कभी सुनवाई का कोई अवसर दिया गया.

जिस क्षेत्र (गांव) में यह विध्वंसात्मक कार्यवाही की गई, वहां पूरी तरह से पुरानी जीवंत बसाहट है. इस बात का प्रमाण वहां मौजूद बिजली की व्यवस्था, शौचालयों के निर्माण से मिलता है.

यहां के परिवारों को प्रधानमंत्री आवास योजना में पंजीकृत किया गया है, जिसमें उन्हें घर बनाने के लिए 1.5 लाख रुपये की सहायता दिए जाने की व्यवस्था है.

वर्ष 2012 में भी यह कहा गया था कि जहां लोग बसे हुए हैं, वहीं उन्हें पट्टा दिया जाएगा. खैरहा गांव के लोग पांच साल पहले पट्टा देने के लिए आवेदन कर चुके हैं, पर पांच सालों में उनके आवेदनों का निराकरण नहीं किया गया. लोगों के हक को सुनिश्चित करने के लिए व्यवहारिक रूप से कोई समय सीमा नहीं होती है.

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भारत के प्रधानमंत्री ने सबको घर उपलब्ध करवाने का वायदा किया है, इसके उलट मध्य प्रदेश सरकार बसाहट को अतिक्रमण का अपराधी घोषित करके उनके बने बनाए घर तोड़ रही है.

पता नहीं कौन सी बात पर विश्वास करें और कौन सी पर नहीं? अप्रैल 2017 में मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने रीवा में घोषणा की थी कि भूमिहीन दलित और आदिवासियों को पांच डिसमिल जमीन का पट्टा दिया जाएगा. यह केवल घोषणा नहीं है.

राज्य में मध्य प्रदेश आर्थिक रूप से कमज़ोर और निम्न आय वर्ग को आवास गारंटी क़ानून, 2017 के तहत ज़मीन दिए जाने का प्रावधान किया गया है. क़ानून बनने के बाद घर तोड़ने का मक़सद क्या है? क्या इसका मतलब यह है कि मुख्यमंत्री के बात पर नौकरशाही भारी है.

बात थोड़ी बड़ी है. वर्ष 2001-02 में ग्रामीणों को एक से दो एकड़ ज़मीन के पट्टे दिए गए थे. जिन पर वे खेती करके अपने लिए कुछ उगाते भी रहे. रीवा में अब उजाड़े गए लोगों को उनकी एक से दो एकड़ ज़मीन से बेदख़ल करके उन्हें 1500 वर्ग फुट के भूखंड दिए जाने की प्रक्रिया शुरू कर दी गई है.

उन्हें केवल भूखंड मिलेगा, घर बनाने के लिए मदद का कोई आश्वासन भी नहीं है. अब उनके पास उगाने के लिए भी कुछ नहीं होगा, क्योंकि सरकार ने खेती की ज़मीन छीन ली है.

अब बात स्पष्ट होती जा रही है कि सरकारे क़ानून बनाकर वास्तव में लोगों के हक़ और उम्मीदों के दायरों को सीमित करती है. अब शोषण के लिए क़ानून को ज़रिया बनाया जा रहा है, ताकि न्याय को दबाया जा सके.

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छिपिया गांव में उजाड़ दिया गया एक परिवार.

मध्य प्रदेश में विकास के लिए आदिवासियों, दलितों और सबसे ग़रीब लोगों का विस्थापन और बेदख़ली पहली अनिवार्य शर्त है. यह अनिवार्यता इसलिए है ताकि पूंजी के उपासकों के लिए ज़मीन खाली करवाई जा सके.

मध्य प्रदेश में एक अजीब सा भ्रम फैलाया गया है. यह भ्रम है निवेश का; लोगों को बताया जाता है कि निवेश आने से बहार आ जाएगी. पलायन बंद होगा. हवा साफ़ हो जाएगी और पानी के लिए गांव के लोगों को रोज 2-4 किलोमीटर नहीं चलना पड़ेगा.

रीवा ज़िले के जवा विकासखंड में भी लोगों को यही कहा गया कि चार गांवों के करीब 200 परिवारों को सरकारी ज़मीन से बेदखल किया जाएगा. इस ज़मीन पर उद्योग लगेगा ताकि खुशहाली आए.

इन बेदख़ल लोगों को घर और रोज़गार का क्या विकल्प दिया जाएगा, इस पर ज़िला प्रशासन ने कहा- वह अभी तय नहीं है.

इस मामले की सुनवाई मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय में चल रही है. उच्च न्यायालय ने ज़िला कलेक्टर को निर्देश दिए हैं कि वे कई सालों पहले ग्रामीणों द्वारा दाख़िल किए गए आवेदनों को नियमानुसार निराकरण 30 दिन में करें. न्यायालय ने माना कि ग्रामीणों को ज़मीन से बेदख़ल करने के संबंध में कोई पूर्व सूचना भी नहीं दी गई थी.

नए विकास का यज्ञ बलिदान मांगता है. आंसू मांगता है. बच्चों को भूख से रुलाकर उसमें संगीत महसूसता है. जब भीषण गर्मी में लोग दिन बिताते हैं तो विकास की चमक बढ़ जाती है.

विकास के उपासक बलि का आह्वान करते हैं. दुखद यह नहीं है कि सरकार ऐसा कर रही है, दुखद यह है कि ऐसा होने पर हमारा समाज उन लोगों के पक्ष में खड़ा नहीं होता.

हमारे मध्यम वर्ग को यही शिक्षा मिली है कि किसान, मज़दूर, दलित और आदिवासी तो हैं ही उजाड़े जाने के लिए. यह धीमी आंच का वर्गभेद हमें आग का अभ्यस्त बना रहा है.

अभी ताप कम है. फफोले नहीं पड़ रहे हैं. आग अभी उन्हें जला रही है. एक वक़्त आएगा, जब यह आंच बहुत तेज़ हो जाएगी और बाकियों को भी जलाने लगेगी, पर तब कुछ करने का वक़्त नहीं बचेगा. धीमी आंच पर पकने वाले मेंढकों की तरह.

(लेखक सामाजिक कार्यकर्ता है.)

नोट: सभी फोटो अरविंद मिश्रा और यूसुफ़ बेग के सौजन्य से उपलब्ध हुए.