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कोरोना की आड़ में प्रतिरोध का दमन नहीं किया जाना चाहिए: संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार प्रमुख

यूएन मानवाधिकार प्रमुख मिशेल बैचलेट ने कहा कि इस महामारी से सामना करने के लिए राज्यों को अतिरिक्त शक्तियों की आवश्यकता है. हालांकि अगर कानून के शासन को बरकरार नहीं रखा जाता है तो ये महामारी एक मानवाधिकार आपदा में तब्दील हो जाएगी.

संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार प्रमुख मिशेल बाचेलेत. (फोटो: रॉयटर्स)

संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार प्रमुख मिशेल बैचलेट. (फोटो: रॉयटर्स)

नई दिल्ली: संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार उच्चायुक्त मिशेल बैचलेट ने कोरोना महामारी से लड़ने की आड़ में लोगों के बुनियादी मानवाधिकारों के उल्लंघन के खिलाफ सरकारों को आगाह किया है.

इस सप्ताह के शुरू में एक बयान में बैचलेट ने कहा था कि सरकारों द्वारा आपातकालीन शक्तियों का इस्तेमाल ‘विरोध को दबाने, लोगों को नियंत्रण में रखने और यहां तक कि सत्ता में अपने आप को बनाए रखने के लिए’ नहीं इस्तेमाल किया जाना चाहिए.

27 अप्रैल को उन्होंने कहा, ‘इनका इस्तेमाल महामारी से प्रभावी रूप से निपटने के लिए किया जाना चाहिए- न तो इससे ज्यादा और न इससे कम.’

नागरिकों को लॉकडाउन नियमों का पालन कराने के लिए अत्यधिक फोर्स का इस्तेमाल करने की रिपोर्टों का उल्लेख करते हुए, उन्होंने कहा कि अधिकांश उल्लंघन अक्सर सबसे गरीब और सबसे कमजोर आबादी वाले लोगों के खिलाफ किए गए हैं.

बैचलेट ने कहा, ‘भोजन का इंतजाम करने के चक्कर में कर्फ्यू तोड़ने वालों पर गोली चलाना, हिरासत में लेना या गाली देना स्पष्ट रूप से अस्वीकार्य और गैरकानूनी प्रतिक्रिया है. इसके चलते किसी महिला को जन्म देने के लिए अस्पताल ले जाना मुश्किल या खतरनाक हो रहा है. कुछ मामलों में लोग इसलिए मर रहे हैं क्योंकि उन्हें बचाने के लिए राहत कार्यों को उचित तरह से लागू नहीं किया गया है.’

उन्होंने कहा कि कर्फ्यू उल्लंघन के आरोप में कुछ देशों में हजारों लोगों को हिरासत में लिया गया है, जो कि ‘अनावश्यक और असुरक्षित’ है. ‘जेलों में काफी जोखिम भरा वातावरण हैं और राज्यों को सावधानीपूर्वक कैदियों को रिहा करने के बारे में सोचना चाहिए, न कि अतिरिक्त लोगों को हिरासत मे लेना चाहिए.’

कोविड-19 का सामना कर रहे देशों के लिए जारी एक नई नीति मार्गदर्शन दस्तावेज में जिनेवा स्थित संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार कार्यालय ने जोर दिया है कि कानून व्यवस्था लागू करने वाले अधिकारियों को सामान्य स्थिति में कानून, आवश्यकता, समानता और एहतियात के सिद्धांतों का पालन करना चाहिए.

कार्यालय ने कहा कि राज्य मानवाधिकार कानून के तहत सार्वजनिक स्वास्थ्य कारणों के लिए कुछ अधिकारों को प्रतिबंधित कर रहे हैं, लेकिन ये प्रतिबंध बिना भेदभाव के और समानतावादी होने चाहिए और इन्हें सुरक्षा उपायों के साथ सीमित समय तक के लिए लागू किया जाना चाहिए.

संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार कार्यालय की प्रेस विज्ञप्ति में कहा गया, ‘जीवन के अधिकार, अत्याचार के खिलाफ निषेध और अन्य दुर्व्यवहार के खिलाफ और मनमाने ढंग से हिरासत में नहीं लिए जाने सहित सभी अधिकार लागू रहेंगे.’

संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार प्रमुख ने कहा कि ऐसे कई सारे बेहद चिंताजनक मामले आए हैं जहां सरकारें कोरोना महामारी की आड़ में संवैधानिक आजादी का दमन कर रही हैं. उन्होंने कहा कि किसी भी तरह की विशेष परिस्थिति या अपाताकालीन स्थिति में उठाया गया कदम उचित संसदीय, न्यायिक और सार्वजनिक निगरानी के दायरे में होगा.

बैचलेट ने कहा, ‘इस महामारी की असाधारण प्रकृति को देखते हुए यह स्पष्ट है कि राज्यों को इसका सामना करने के लिए अतिरिक्त शक्तियों की आवश्यकता है. हालांकि अगर कानून के शासन को बरकरार नहीं रखा जाता है तो सार्वजनिक स्वास्थ्य आपातकालीन जोखिम एक मानवाधिकार आपदा में तब्दील हो जाएगा.’