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डीडी कोसंबी: एक अनोखी प्रतिभा की ज़िद्दी धुन

डीडी कोसंबी एक अनोखे रोल मॉडल के तौर पर हमारे सामने आते हैं, जिनकी गणितीय प्रतिभा उनके इतिहास ज्ञान और अटल राजनीतिक विचारों पर छा गई थी. प्रतिभाओं का ऐसा मिलन किसी सपने की तरह है.

DD-Kosambi
अगर कोई व्यक्ति मुद्राशास्त्री, इतिहासकार और भारतविद डीडी कोसंबी से ज़्यादा परिचित हो और गणितज्ञ डीडी कोसंबी से कम, तो इसे निश्चित तौर पर उसकी ज्ञान की सीमा ही माना जा सकता है. राम रामस्वामी द्वारा संपादित किताब डीडी कोसंबी: सिलेक्टेड वर्क्स इन मैथमैटिक्स एंड स्टैटिस्टिक्स (स्प्रिंगर, 2017), अज्ञान के इस कोहरे को हटाने का वादा करती है. मगर ऐसा करने से पहले रामस्वामी किताब की प्रस्तावना में इस अज्ञान के लिए आपकी खिंचाई करने से भी नहीं चूकते:

यह तर्क दिया जा सकता है कि दूसरे क्षेत्रों में उनके महत्वपूर्ण योगदानों के पीछे गणित के उनके ज्ञान और उसकी शैली का योगदान था- चाहे सिक्कों के बड़े भंडार के विस्तृत सांख्यिकीय विश्लेषण के सहारे मुद्राशास्त्र को इतिहासलेखन के एक रूप के तौर पर स्थापित करना हो, या फिर अनुमान और तर्क के मिलान से करासम्भले गुफाओं की संभावित अवस्थिति का पता लगाना हो…कोसंबी की बौद्धिक विरासत पर पूरेपन में विचार किए जाने की ज़रूरत है; उनके चिंतन और विश्लेषण से गणित को अलग नहीं किया जा सकता है. न ही गणित को मुद्राशास्त्र के क्षेत्र में किए गए उनके काम से अलग किया जा सकता है, बल्कि इसे इतिहास से भी अलग नहीं किया जा सकता है.

आगे रामस्वामी, लिखते हैं

1930 से 1958 तक और उसके आसपास तक डीडी कोसंबी एक बड़े पेशेवर संसार में सम्मान और प्रशंसा का केंद्र बने रहे. 1940 और 950 के दशक में प्राचीन भारत के इतिहास, संस्कृत पुरालेख, भारत विद्या (इंडोलॉजी) आदि के क्षेत्रों में उनका योगदान और साथ-साथ राजनीतिक और शांतिप्रिय ढंग का उनका लेखन न सिर्फ़ मात्रा बल्कि गुणवत्ता में भी इतना ज़्यादा है कि इसने उनके गणितज्ञ व्यक्तित्व को ढंक लिया है. जबकि गणित के क्षेत्र में उनका योगदान स्थायी क़िस्म का कहा जा सकता है…उनके (गणित के) पर्चे दुनिया के बेहतरीन जर्नलों में प्रकाशित हुए. उस समय के कुछ नामी गणितज्ञों ने इन पर्चों की चर्चा की या उन पर समीक्षाएं लिखीं. यह सोचकर हैरत हो सकती है कि जिस दौर में यह सब हो रहा था, कोसंबी की ख्याति एक बिल्कुल अलहदा क्षेत्र में बढ़ती जा रही थी. इसे कोसंबी की जटिल मगर किसी सृष्टि रचयिता ब्रह्मा या प्रमथ्यु (यूनानी मिथक में मानवता की रचना करने वाले देवता) जैसी प्रतिभा का सबूत ही माना जा सकता है.

इस किताब में तीन खंड हैं. पहले खंड में चार लेख हैं, जिनके सहारे कोसंबी के पेशेवर कॅरियर का जायज़ा लिया जा सकता है. इनमें से एक अध्याय रामस्वामी द्वारा लिखा गया है, बाक़ी तीन खुद कोसंबी के लिखे हुए हैं. एक लेख, एक लेक्चर और एक रिपोर्ट की शक्ल में. दूसरे खंड में नंबर थ्योरी (संख्या सिद्धांत), सांख्यिकी और रेखागणित से संबंधित कोसंबी के 70 के क़रीब उल्लेखनीय पेपर्स हैं (जिनमें से करीब 25 को रीप्रिंट किया गया है). तीसरे खंड में दूसरी भाषाओं में लिखे गए उनके कुछ और पर्चों को संकलित किया गया है.

एक दुर्भाग्यूपर्ण जुनून

पहले खंड में रामस्वामी का लेख विशेष तौर पर उल्लेखनीय है, क्योंकि इसमें कई दिलचस्प छोटी-मोटी जानकारियां हैं, जो हमें कोसंबी के चिंतन-संसार के अंदर दाख़िल होने का मौक़ा देती हैं. इनमें से जिन जानकारियों ने सबसे ज़्यादा मेरा ध्यान खींचा, वे अभाज्य संख्याओं (प्राइम नंबर्स) के वितरण से संबंधित रीमैन हाइपोथेसिस पर लिखे गए उनके पर्चे से संबंधित थीं. 1859 में जर्मनी के गणितज्ञ बर्नहार्ड रीमैन ने यह दावा किया था कि एक समीकरण के उनके द्वारा किए गए सभी हलों को एक ही सामान्य तरीक़े से अभिव्यक्त किया जा सकेगा. इसलिए रीमैन हाइपोथैसिस को हल करने का मतलब यह साबित करना था कि रीमैन का दावा सही था या ग़लत. और जवाब पक्ष में मिले या विपक्ष में, इससे गणितज्ञों को यह समझने में काफ़ी मदद मिलती कि अभाज्य संख्याएं संख्या-रेखा पर पाई जा सकती हैं या नहीं.

रामस्वामी, याद करते हैं कि कैसे 1959 से एक सम्मानित गणितज्ञ के तौर पर कोसंबी की प्रतिष्ठा पर ग्रहण लगने लगा, जब उन्होंने रीमैन हाइपोथेसिस को हल करने के लिए प्रोबेबलिटी के सहारे एक विवादित किस्म के समाधान पर काम करना शुरू किया. बदक़िस्मती से यह उतार उस समय आया जब कोसंबी टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ फंडामेंटल रिसर्च में अपनी अगुआई वाले स्थान को लेकर असुरक्षित हो गए थे. और इन दोनों का मिलाजुला नतीजा यह रहा कि होमी भाभा का आशीर्वाद उन पर नहीं रह सका और आख़िरकार उन्हें डिपार्टमेंट ऑफ एटॉमिक एनर्जी से बाहर कर दिया गया.

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यूं तो इस पेपर की मुख्य बातों का ज़िक्र यहां संक्षेप में किया गया है (पृ. 25; पर्चों को दूसरे खंड में शामिल किया गया है. संख्या. 60, 61, 64, 65), लेकिन रामस्वामी ने इस विषय पर कोसंबी के पर्चे की समीक्षाओं का काफ़ी विस्तार से हवाला दिया है. इसमें से एक टिप्पणी डब्लू.जे. लेवेक की है, जिससे हमें कोसंबी की असफल कोशिश को समझने में मदद मिलती है: ‘‘लेखक ने महत्वपूर्ण प्रमेयिका (लेम्मा- प्रमेय या थीअरम को साबित करने के लिए इस्तेमाल में लाई जाने वाली सहयोगी मान्यता) 1.2 के पक्ष में जो दो प्रमाण दिए हैं, उनमें से पहला समीक्षक की समझ में नहीं आया. यह काफ़ी मेहनत से दिया गया एक कमज़ोर प्रमाण है, जिसे वर्तमान प्रमेय से कम महत्वपूर्ण प्रमेयों को साबित करने के लिए भी आसानी से स्वीकार नहीं किया जा सकता. दूसरा प्रमाण गलत नज़र आता है. समीक्षक न तो इस प्रमाण को स्वीकार करने की स्थिति में है, न ही इसे निर्णायक ढंग से ख़ारिज ही कर रहा है. अगर लेखक यह दावा करना चाहता है कि उसने रीमैन हाइपोथेसिस जैसे महत्वपूर्ण प्रमेय को साबित कर दिया है, तो उसे मौखिक वर्णनों, गुणात्मक तुलनाओं (क्वालिटेटिव कंपैरिजंस) और अनुमानों (इंट्यूशंस) की जगह सटीक परिभाषाओं, समीकरणों, असमानताओं (इनिक्वलिटीज) और दृढ़ तर्कों का इस्तेमाल करना चाहिए.’’

लेवेक ने मैथमैटिक्स रिव्यूज नाम जर्नल के लिए जिस पर्चे की समीक्षा की, वह 1959 में प्रकाशित दो पर्चों में से एक है. दोनों पर्चे जर्नल ऑफ द इंडियन सोसाइटी फॉर एग्रीकल्चरल स्टैटिस्टिक्स (जिसैस) में प्रकाशित हुए थे. रामस्वामी के मुताबिक जिसैस में पर्चे का प्रकाशन कोई असाधारण बात नहीं थी, लेकिन वे इस तथ्य की ओर भी ध्यान दिलाते हैं कि जिसैस कोई पियर रिव्यूड जर्नल नहीं था. इसलिए रीमैन हाइपोथेसिस पर कोसंबी के पर्चे के प्रकाशन से पहले उसकी बड़ी कमियों के बारे में नहीं जान सकता था. संभवतः इस जर्नल में पर्चे को छपवाने के फ़ैसले के पीछे इस तथ्य का हाथ रहा हो.

लेकिन, इसके काफ़ी पहले, यानी 1950 के दशक के पूर्वाद्ध में ही भारत के परमाणु कार्यक्रम के जनक और टीआईएफआर के संस्थापक निदेशक होमी भाभा के साथ उनके संबंध बिगड़ने लगे थे. राजनीतिक मतभेदों के बावजूद दोनों के बीच रिश्ते 1940 के दशक के अंत तक काफ़ी मित्रतापूर्ण रहे थे. वे अक्सर काफ़ी नज़दीकी रूप से मिलकर काम करते थे और उनमें एक-दूसरे के वैज्ञानिक कार्यों के लिए गहरा सम्मान था. उन दोनों की एक साझी महत्वाकांक्षा थी, भारत में ‘स्कूल ऑफ मैथमैटिक्स’ की स्थापना करने की. लेकिन जिन दो युवा वैज्ञानिकों- के चंद्रशेखरन और केजी रामनाथन को टीआईएफआर में नियुक्त कराने में कोसंबी ने मदद की थी, उन्होंने इस स्कूल की स्थापना में कोसंबी का स्थान ले लिया. रामस्वामी लिखते हैं, ‘‘अगले कुछ सालों में भाभा और कोसंबी के रिश्तों में दरार आने लगी. पहले छात्रों को लेकर, फिर धीरे-धीरे दफ़्तर में हाजिरी जैसे ब्यौरों और उनके कामकाज के दूसरे पहलुओं को लेकर.’’

कोसंबी के रुतबे पर आख़िरी चोट तब पहुंची, जब कुछ गणितज्ञों ने एक ख़त पर दस्तख़त करके कोसंबी के ख़िलाफ़ अभियान छेड़ दिया. इसमें दावा किया गया था कि रीमैन हाइपोथेसिस का कोसंबी द्वारा सुझाया गया हल, ‘दुनिया भर में प्रसारित किया जा रहा है’ जो ‘प्रतिष्ठित संस्थान के लिए शर्मिंदगी का सबब’ है. यह ख़त भाभा को भेजा गया. ये सारी घटनाएं मोटे तौर पर उस समय हो रही थीं, जब कोसंबी परमाणु ऊर्जा की जगह सौर ऊर्जा की वकालत कर रहे थे, जिससे उनके और उनके ताक़वतर नियोजक- डिपार्टमेंट ऑफ एटॉमिक एनर्जी के बीच संघर्ष की स्थिति पैदा हो गई थी.’

आज़ादख़्याली और उत्कट इच्छा

इस सबके बावजूद कोसंबी आज भी प्रेरणा बने हुए हैं. जैसा कि रामस्वामी कहते हैं, एक इतिहासकार और गणितज्ञ के तौर पर कोसंबी का तीन दशकों का एक शानदार कॅरियर रहा. मानविकी (ह्यूमैनिटीज) और विज्ञान में एक साथ ऐसा सम्मान हासिल करना आसान नहीं है. ख़ासतौर पर इस बात को ध्यान में रखते हुए कि दोनों क्षेत्र दिन-ब-दिन और ज़्यादा विशेषज्ञता वाले हो गए हैं और उनके समुदाय कहीं ज़्यादा क़रीब आ गए हैं. कोसंबी को ख़ुद इस बात का एहसास था.

जुलाई, 2008 में इकोनॉमिक एंड पॉलिटिकल वीकली के लिए लिखे गए एक लेख में इरफ़ान हबीब ने कोसंबी की किताब, ‘एन इंट्रोडक्शन टू द स्टडी ऑफ इंडियन हिस्ट्री (1956)’ में व्यक्त विचारों पर चर्चा करते हुए कोसंबी के अपने ऐतिहासिक विश्लेषण पद्धति में यक़ीन का ज़िक्र किया था:

कोसंबी से पहले, भारत में तकनीक के इतिहास पर काफ़ी कम काम किया गया था;… उपलब्ध प्रमाणों को तब तक न जमा किया गया था, न ही उनका आलोचनात्मक विश्लेषण ही किया गया था. कोसंबी ने औज़ारों और उत्पादों के अनगिनत संदर्भ देकर इतिहास के इस पहलू के महत्व को रेखांकित किया. मसलन, उन्होंने दिखाया कि कैसे छेद वाली कुल्हाड़ी (शाफ्ट होल एक्स) का इस्तेमाल देर से शुरू हुआ और ईसा की पहली सदी से पहले नारियल का आगमन नहीं हुआ था. इस वैचारिक इंद्रधनुष के दूसरे सिरे पर धर्म था…धर्म….वह साधन था, जिसके सहारे शोषित तबकों को उन पर होने वाले शोषण को दैवी आदेश मानकर स्वीकार करने के लिए तैयार किया जाता था. ऐसी सहमति के द्वारा हिंसा की मात्रा को कम कर दिया गया (साथ में ख़र्च भी शामिल है.). अगर धर्म नहीं होता तो उन्हें [शोषित तबकों को] काबू में रखने के लिए ज़्यादा हिंसा की ज़रूरत पड़ती. कोसंबी के हिसाब से धर्म की यह भूमिका जाति प्रथा के उदय को सही तरीक़े से समझने की चाबी देती है.

जैसा जगज़ाहिर है, इस किताब ने एक नई और अहम ज़मीन तोड़ने का काम किया. कोसंबी के मित्र, सहयोगी और बौद्ध दर्शन के विद्वान वीवी गोखले ने 1967 में लिखा था, ‘‘-कोसंबी- विश्लेषण और समाज को बदलने में मार्क्सवादी तरीक़े में यकीन करते थे, मगर आधुनिक रिसर्च की रोशनी में वे मार्क्स के आंकड़ों को भी संशोधित करने से नहीं हिचकते थे’’

फिर भी अपने लेख ‘एडवेंचर इनटू अननोन’ (जिसे रामस्वामी की किताब के दूसरे अध्याय में संकलित किया गया है), जिसका प्रकाशन 1966 में उनकी मृत्यु के बाद हुआ, कोसंबी लिखते हैं, ‘प्रकाशित निष्कर्षों को लेकर…मिलीजुली प्रतिक्रिया रही, क्योंकि इसमें मार्क्स का संदर्भ था., जो इसे स्वाभाविक तौर पर कइयों की नज़र में एक ख़तरनाक राजनीतिक आंदोलन बना देता है, वहीं दूसरी तरफ़ आधिकारिक मार्क्सवादी भी एक बाहरी की रचना को संदेह की निगाह से देखते हैं.’

इस मोड़ पर हम चाह कर भी दो मौक़ों पर कोसंबी के व्यवहार के बीच समानता खोजने से ख़ुद को नहीं रोक सकते हैं. कोसंबी ने जिस तरह भारतीय इतिहास-अध्ययन के स्थापित नज़रिए की मुख़ालफ़त की और जिस तरह से वे रीमैन हाइपोथेसिस के अपने हल पर अडिग रहे, वह दरअसल उनके व्यक्तित्व के बारे में काफ़ी कुछ कहता है. इन दोनों कोशिशों के लिए एक ज़बरदस्त समर्पण, ज्ञान और अध्ययन के नए क्षितिज की तलाश के प्रति पूरी प्रतिबद्धता और ‘‘मदद के अभाव और लगातार उपेक्षा’’ के बीच भी हार न मानने वाले हौसले की ज़रूरत थी. (पृ. 25). गोखले उसी लेख में आगे लिखते हैं, ‘‘वैज्ञानिक रिसर्च के प्रति जुनूनी समर्पण वाले एक आज़ाद चिंतक के तौर पर [कोसंबी] पूरी तरह अपने बौद्धिक लक्ष्यों को पाने की तपस्या में डूबे हुए नज़र आते हैं. यही कारण है कि कभी-कभी उन पर रुखाई और असहिष्णुता का आरोप तक लगाया जाता है…’’

‘एडवेंचर इनटू अननोन’ में भी यह गुण दिखाई देता है, जहां कोसंबी बनावटी ढंग से अपनी आलोचना करते हुए दरअसल अपने विरोधियों की जमकर धुनाई करते हैं.

[मेरे] क्रांतिकारी ढंग से नये और मौलिक नतीजों को देखने वाले हर योग्य जज ने सहज तौर पर यह महसूस किया कि यह सही होने के साथ-साथ मौलिक ढंग से महत्पपूर्ण है. दुर्भाग्यवश रीमैन हाइपोथेसिस एक साधारण परिणाम के तौर पर प्रकट हुआ. क्या दुनिया के महानतम गणितज्ञ एक सदी से ज़्यादा वक़्त से गणित की जिस समस्या को हल नहीं कर पाने के दुख में डूबे हुए थे, उस समस्या का समाधान भारत के जंगलों में इतने अनौपचारिक ढंग से किया जा सकता था?… प्रमाण के मुख्य बिंदु को देख पाने वाले अच्छे गणितज्ञों की तलाश करना गणित की एक मौलिक खोज करने से कहीं ज़्यादा मुश्किल साबित हुआ. इसका कितना लेना-देना मेरे अपने झगड़ालू व्यक्तित्व से है और कितना उस कठोर मध्ययुगीन गिरोहों की भावना से जो संपन्न समाजों वाले कुछ देशों की गणितीय मंडलियों पर राज करते हैं, इस पर विचार करने की यहां ज़रूरत नहीं है. विज्ञान की सफलता का संबंध दरअसल ख़ास तरह के समाज से है, इस मान्यता के पक्ष में काफ़ी कुछ कहा जा सकता है.

इस उद्धरण की आख़िरी दो पंक्तियां काफ़ी कुछ कहती हैं. इनसे यह पता चलता है कि वे जिस आलोचना का शिकार हुए, उसने कहीं न कहीं विज्ञान की दुनिया को लेकर उनके विचारों को गढ़ने में भूमिका निभाई. साथ ही रीमैन हाइपोथेसिस को लेकर उनके विचारों को ख़ारिज करने के पीछे वर्गीय राजनीति के हाथ को लेकर भी उनके अंदर बनी समझ के पीछे के कारणों का भी इससे पता चलता है. यह ज़रूर है कि रामस्वामी ने कोसंबी के पेपर के बारे में सकारात्मक और नकारात्मक, दोनों तरह की समीक्षाओं को आमने-सामने रखा है, मगर यह भी सच है कि रीमैन हाइपोथेसिस का हल आज तक नहीं निकल पाया है और कोसंबी द्वारा सुझाई गई पद्धति का ज़िक्र इस हाइपोथेसिस को सुलझाने के दावों में कहीं नहीं किया जाता है.

यह तथ्य हमें रामस्वामी के इस आकलन को यह स्वीकार करने के लिए मजबूर करता है कि जिन लोगों ने कोसंबी के विचारों की आलोचना नहीं की, वे ज़रूर कोसंबी के प्रति उदार रहे होंगे और विभिन्न कारणों से ईमानदारीपूर्वक इसके समर्थन में नहीं आए होंगे. इससे हम यह सोचने पर भी बाध्य होते हैं कि क्या अपनी पद्धतियों की आलोचनाओं के बावजूद कोसंबी को यह लगता था कि वे उन पद्धतियों को वैधता दिए जाने के हक़दार थे?

आख़िरकार, यह दुर्भाग्यपूर्ण था कि ‘आज़ादख़्याल’ और ‘जुनूनी’ होने के कारण उन्हें एक उद्यम में तो सराहना और सफलता मिली, मगर इसी ख़ासियत ने जीवन के आख़िरी वर्षों में उनकी अकादमिक साख़ पर चोट पहुंचाने का काम किया. (इस अंतर्विरोध के कारण उन्हें ग़लत क़रार देना और मुश्किल हो जाता है.) इससे भी बढ़कर इस बात पर ज़ोर दिए जाने की ज़रूरत है कि 1959 ईस्वी तक उन्होंने एक सांख्यिकीविद, संख्या सिद्धांतकार (नंबर थियरिस्ट) और मुद्राशास्त्री के साथ-साथ एक इतिहासकार, व्याख्याकार (हर्मनूटिस्ट), भारतविद और राजनीतिक वैज्ञानिक के तौर पर जितना हासिल कर लिया था, उसके लिए वे कहीं ज़्यादा श्रेय और सम्मान के हकदार हैं. रामस्वामी की किताब के चौथे अध्याय में जेआरडी ट्रस्ट को जमा किए गए एक आत्ममूल्यांकन रिपोर्ट में कोसंबी लिखते हैं कि कैसे छह महीने में वे कंप्यूटिंग मशीनों, संस्कृत अध्ययन (जिसमें भतृहरि का अनुवाद शामिल है), हेल्थ स्टैटिस्टिक्स, पाथ जियोमेट्री और प्राचीन भारतीय मुद्राओं- इन छह क्षेत्रों में काम करने लगे थे. और इनमें से आख़िरी दो पर तो कोई अतिरिक्त ख़र्च भी नहीं आया था.

इस तरह अगर सारी चीज़ों को मिलाकर देखें, तो कोसंबी एक अनोखे रोल मॉडल के तौर पर हमारे सामने आते हैं, जिनकी गणितीय प्रतिभा उनके इतिहास ज्ञान और अटल राजनीतिक विचारों पर छा गई थी. प्रतिभाओं का ऐसा मिलान किसी सपने की तरह है. रामस्वामी की किताब ऐसे ही नज़रिए को सामने लाती है, जो हमारे समय के लिए दोगुने महत्व की है, जब वैज्ञानिक राजनीति और व्यापक समाज में कोई रुचि नहीं लेते हैं और वैज्ञानिक विचारों के प्रति आंखें मूंद कर रखना ही बेहतर मानते हैं.

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