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लॉकडाउन डायरी: यह मानवीय क्षुद्रताओं का दौर है…

लॉकडाउन शुरू होने के कुछ रोज़ में ही एक मैसेज मिला, ‘लगता है कलयुग समाप्त हो गया, सतयुग आ गया है, प्रदूषण रहित वातावरण, कोई नौकर नहीं, घर में सब मिलकर काम कर रहे हैं, उपवास-कीर्तन हो रहा है.’ ठीक इन्हीं दिनों हज़ारों कामगारों का हुजूम भूखे-प्यासे एक बीमारी और अनिश्चित भविष्य के डर से महानगरों की सड़कों पर अपनी टूटी चप्पल और फटा बैग संभाले निकल रहा था.

Migrant Workers Petals PTI

(फोटो: पीटीआई)

यह मानवीय क्षुद्रताओं का दौर है…

आज शायद लॉकडाउन के चालीस दिन से ज़्यादा हो आए हैं. लोग कह रहे हैं कि इस समय के बाद सब बदल जाएगा, प्री-कोरोना और पोस्ट कोरोना सोच में ज़मीन-आसमान का अंतर होगा, लेकिन मुझे ऐसा नहीं लगता.

इस पूरे दौर में जो चीज़ सबसे स्पष्ट होकर सामने आई है, वो है मानवीय क्षुद्रता… shallowness, Meanness…

कहा जाता है ओनली चेंज इज़ परमानेंट, लेकिन हिंदुस्तानी समाज के परिप्रेक्ष्य में ये shallowness स्थायी है. इसका स्वरूप और मात्रा घट-बढ़ सकती है, लेकिन मौजूदगी हमेशा रहेगी.

लॉकडाउन शुरू होने के कुछ रोज़ में ही नवरात्रि थे, एक ग्रुप में मैसेज मिला कि ‘लगता है कलयुग समाप्त हो गया, सतयुग आ गया है, प्रदूषण रहित वातावरण, समानता आ गई है, कोई नौकर नहीं, सब घर में मिल-जुलकर काम कर रहे हैं, उपवास-भजन-कीर्तन-रामायण का पाठ हो रहा है वगैरह-वगैरह.’

ठीक इन्हीं दिनों में हज़ारों-हज़ार कामगारों का हुजूम भूखे-प्यासे एक बीमारी और अनिश्चित भविष्य के डर से महानगरों की सड़कों पर अपनी टूटी चप्पल और फटा बैग संभाले निकल रहा था. लेकिन सालों-साल गांव-घर न जाने वाले ये मजदूर चुपचाप घरों में क्यों नहीं बैठ रहे थे! राशन खरीदते दो महीने का और बैठते घर में, ऐसी क्या याद सताने लगी गांव की!

नौकरी ऐसी है कि अख़बार और ख़बरें न भी पढ़ना चाहें तो पढ़ने पड़ेंगे. इस दौरान सैंकड़ो रिपोर्ट्स पढ़ीं, पचासियों एडिट कीं.

हर ख़बर में मज़दूरों की पहले से चुनौतीपूर्ण ज़िंदगी में जुड़ती और चुनौतियां… ठेले और रेहड़ी पर काम करने वालों को मालिक ने कहा हालात ठीक हों, तब आना.

न रहने का ठौर था, न खाने का भरोसा, वो पैदल ही निकल पड़े. बस अड्डे पर कैमरा के सामने रोते हुए उस नाबालिग मज़दूर की सिसकियां शायद ही कभी भूल सकूं…

न जाने कितने परिवार दुधमुंहे बच्चों को लेकर सड़कों पर चले, नन्हें बच्चों को बैग, कंधे और गोद में बैठाकर ले जा रहे उन मां-बाप की तस्वीरें कोई ममत्व नहीं जगातीं.

दिल्ली की एक बस्ती में यूपी के एक मजदूर की गर्भवती बीवी बच्चों के साथ अकेली थी, मानसिक रूप से कमज़ोर पति ठेकेदार के साथ काम पर गया था, वहीं फंस गया. इसी दौरान प्रसव पीड़ा हुई, पड़ोसियों ने डॉक्टर्स से मिन्नत कर जैसे-तैसे डिलीवरी करवाई.

घर में न अन्न है न पैसा, नवजात को पड़ोसन की गोदी में देकर उसी के कंधे के सहारे पैदल अस्पताल से चली आई इस मां के पास बच्चे के जन्म पर ख़ुश होने की वजह नहीं है! फोन नहीं है उसके पास, पति को जाने पता भी है कि नहीं कि घर में बेटी हुई है.

इस अफ़रा-तफ़री के बाद आनन-फानन ने मजदूरों को राहत शिविरों में पहुंचाया गया, लेकिन यहां भरपेट खाना नहीं, बुनियादी सुविधा नहीं. दोपहर के खाने के लिए भोर से लाइन में लगने वाली ख़बरें शायद ही किसी की नज़र से छूटी हैं.

मजदूरों का एक समूह हरियाणा से यूपी के अपने गांव की करीब 800 किलोमीटर की दूरी भूखे-प्यासे कहीं पैदल तो कहीं ऑटो, कहीं पानी के टैंकर व ट्रक से पूरी करता है.

पैरों में छाले लिए गांव पहुंचे ये मज़दूर सरकारी मेहरबानी पर क्वारंटीन सेंटर में रहेंगे, जहां न खाने-पीने की सुविधा है, न शौचालय की.

गांव पहुंच रहे इन मजदूरों की जांच का ज़िम्मा एक प्रदेश में जिन रोज़गार सेवकों पर है उन्हें मास्क और प्रोटेक्टिव गियर छोड़िए, डेढ़ साल की तनख़्वाह नहीं मिली है.

इस बीच रास्ते में जाने कितने मज़दूरों ने दम तोड़ दिया, कुछ की पुरानी बीमारियां काल बन गईं. अपनों से दूर चल बसे इन मज़दूरों का प्रशासनिक अधिकारियों के रहम पर अंतिम संस्कार हो सका.

ऐसी ही एक ख़बर एडिट थी कि कैसे एक मज़दूर बीमार भाई को एम्बुलेंस में लेकर हज़ार किलोमीटर दूर अपने गांव के लिए निकला, पर गांव से चंद किलोमीटर पहले उसकी आंखों के सामने भाई ने दम तोड़ दिया.

इस ख़बर को एडिट करते हुए एक मज़दूर की फोटो देखकर लगा कि चेहरा कहीं देखा है, पर जिस जगह की बात थी, वहां जाना तो दूर कोई पहचान भी नहीं है.

याद पड़ा कि ऐसी ही एक ख़बर और थी जहां एक और मज़दूर घर से दूर अकेले अस्पताल में बीमारी के चलते चल बसा था और गांव में उसका पुतला बनाकर अंतिम संस्कार किया गया.

शायद किसी प्लंबर का काम करता था, लेकिन घर-पत्नी-बच्चों से दूर रह रहे इन दोनों कामगारों की असहाय आंखों में समानता थी… उस वक़्त सोचा था कि मेरे घर आने वाले प्लंबर का चेहरा कैसा है? ये वो तो नहीं हो सकता, क्या मैं उसे कहीं देखूं तो पहचान सकती हूं?

मेरे घर में कोई कामवाली नहीं आती, पिछले घर में आने वाली दीदी को फोन किया तो उन्हें इस समय राशन मिल रहा था, कौन दे रहा है ये नहीं पता उन्हें.

लाइन में जाकर लगने में शर्म आती है, इसलिए जो घर पर दे जा रहा है वो उसकी मदद ले ले रही हैं. वो इस बात से बिल्कुल संतुष्ट हैं कि वो काम पर नहीं जा रहीं, तो पगार नहीं मिलेगी, भले ही घर में फ़ाके पड़ जाएं.

उन जैसी एक और से बात हुई, बड़ी गाड़ी वाली भाभीजी के यहां काम करती हैं वो. उनको भी मलाल नहीं है कि तनख़्वाह नहीं मिलेगी, ‘काम नहीं कर रही हूं तो काये को पइसे देंगे?’ पर मोदी जी ने तो कहा है? ‘उनकी मान ही कोन रा दीदी.’

जिस बस्ती में वो रहती हैं वहां 300 के करीब झुग्गियां हैं और अधिकतर के यहां टॉयलेट नहीं है. ‘बो सरकारी वाले में जाते हैं सभी जने,’ मैं सोशल डिस्टेंसिंग के concern के चलते उनसे पूछती हूं कि वहां दूर-दूर खड़े रहते हैं क्या, और फिर अपने ही सवाल पर शर्मिंदा हो जाती हूं.

वो झेंपी-सी आवाज़ में कहती हैं, ‘तीन बाथरूम हैंगे और सब घरों के लोग, आप ख़ुद से ही समझ लो.’

ऐसी कितनी ही कहानियां नज़रों से गुज़री, जिनकी किरचें मन में कहीं चुभी रह गई हैं. पर मैं उस मैसेज को याद करती हूं… कलयुग नहीं सतयुग है!

जिस अपेक्षाकृत पॉश कॉलोनी में मैं रहती हूं, वहां जनता कर्फ्यू वाले समय दो दिन दूध नहीं था. दुकानदार ने बताया उसने बीस मिनट में 40 लीटर दूध बेचा है, मैं लिम्का बुक रिकॉर्ड वालों को फोन करना चाहती हूं उनकी इस उपलब्धि पर!

इस बीच एक समानांतर दुनिया चल रही है, जहां सोशल मीडिया के विभिन्न चैलेंज हैं, डालगोना कॉफी है, नेटफ्लिक्स, प्राइम, हॉटस्टार है, नहीं है तो सिर्फ पॉज़िटिविटी.

इस पैरेलल यूनिवर्स के लोग उनकी दुनिया के बारे में कोई भी टिप्पणी सुनकर नाराज़ हो जाते हैं. हर किसी को अपने मनमुताबिक करने का हक़ है. ये सब पॉज़िटिविटी लाएगा, सभी दुखी हैं तो कोई तो ख़ुश रहे. (मैं भी इसी लीग का एक छोटा हिस्सा हूं.)

एक दोपहर मेरे कीबोर्ड ने काम करना बंद कर दिया, उसका ख़राब हो जाना मेरा सबसे बड़ा डर था. सैंकड़ों किताबें-फिल्में देखने का विकल्प होते हुए बोरियत का रोना रो सकना मेरा प्रिविलेज है.

मेरे पास महीने भर का राशन है और ख़राब स्थिति आ जाने पर और दो महीने का जमा करके रखने का ऑप्शन भी. हम प्रिविलेज्ड लोगों के पास शिक्षा के अवसर थे, किताबें थी, सो हम अपनी हर बात और किए के लिए तर्क दे सकते हैं. वैसे भी हम तो आर्गुमेंटेटिव इंडियंस हैं…

एक दिन एक दोस्त से बातचीत में मैंने कहा कि हम वो जनरेशन हैं जिसकी priorities बहुत फ** अप हैं. उसका कहना था अपनी ख़ुशी के लिए कुछ भी करना ग़लत नहीं है.

मैं कुछ ऐसे लोगों को जानती हूं, इस समय जिनका सबसे बड़ा दुख वीकेंड पर बाहर न निकल पाना है, मैं इसके बरक्स जब वॉलेंटियर्स के सामने खाने की लाइन में हाथ फैलाए, सड़कों, पटरियों, फुटपाथ या फ्लाईओवर के नीचे literally पड़े हुए लोगों को देखती हूं तो मुझे अपराधबोध होता है.

शायद हम दुखी होना भी नहीं जानते. दुख के समय में सकारात्मकता ढूंढना अपराध सरीखा लगता है मुझे.

मास्टर्स में क्लास लेने वाले एक सर कहा करते थे कि पढ़ा-लिखा आदमी अनपढ़ के मुकाबले ज़्यादा शातिर होता है इसलिए नहीं कि शिक्षित है, बल्कि इसलिए कि उसके पास अपनी बात को सही ठहराने के तमाम (कु) तर्क होते हैं. तब लगता था क्या बकवास करते हैं ये भी, आज शायद थोड़ा समझ सकती हूं.

एक बहुत बड़े पत्रकार इस समय इस्तेमाल की जा रही भाषा और शब्दों को लेकर नाराज़ हैं… क्वारंटाइन या क्वारंटीन, वे इसमें सही-ग़लत बता रहे हैं.

मुझे उनकी बात सही लगती है, लेकिन फिर मुझे क्वारंटीन सेंटर में रहने वाले मजदूर और उनकी दशा वाली रिपोर्ट याद आ जाती है.

हज़ारों मील से जैसे-तैसे आए मज़दूर, गंदे कमरे, उससे भी ख़राब टॉयलेट, ज़मीन के कोने में पड़ा बिस्तर, न खाने का पता, न पानी का ठिकाना. वो क्वारंटीन का मतलब भी जानते हैं क्या?

असगर वजाहत की कहानी ‘लिंचिंग’ की बूढी काकी का चेहरा मन में उभरता है. उसको लगता था कि अंग्रेजी के शब्द अच्छे होते हैं. उसे ‘पास’ होना, ‘जॉब’ पता था और ‘सैलरी’ भी, जिसे सुनते ही उसकी नाक में तवे पर सिकती रोटी की सुगंध आ जाया करती थी.

मैं शब्द-चयन और भाषाई शुद्धता, साथ ही काम के स्तर में उन सज्जन के आस-पास भी नहीं हूं, बात काटना या आलोचना तो दूर की बात है.

मैं उनकी बात, उनके concerns समझना भी चाहती हूं, लेकिन सुदूर ज़िलों के गांवों के स्कूलों में क्वारंटीन में रह रहे मज़दूरों के रूखे चेहरे, पीला पानी देता हैंडपंप, खाने के नाम पर गुड़ की भेली भेजता प्रशासन, बिना दरवाजों के झाड़ियों के बीच बने बालू के कट्टे भरे टॉयलेट मेरी समझने की क्षमता शून्य कर देते हैं.

इस समय एक काम जो धड़ल्ले से हो रहा है वो है लिखना. सबके पास लिखने को बहुत कुछ है पर मैं ऐसे कई लोगों को जानती हूं जो रोज़ ट्रेंडिंग टॉपिक्स पर सोशल मीडिया एकाउंट रंगने से बहुत बेहतर लिखते हैं पर अभी ख़ामोश हैं, बिल्कुल ख़ामोश.

उनकी चुप्पी इस समय का प्रतीक है, मुझे भी लगता है कि चुप्पी भली होती है, ये समय सिर्फ समझने का है. हम कुछ कर सके या नहीं, empathaise कर सकते हैं.

एक बिन मांगी सलाह भी है कि सोशल मीडिया पर पॉज़िटिविटी तलाश रहे लोगों को सड़क किनारे किसी पत्थर या होर्डिंग पर लिखी बात शायद ज़्यादा प्रभावित कर सके, लेकिन इस जगह सकारात्मकता ढूंढना ‘भूस के ढेर में राई का दाना’ वाला एफर्ट है.