भारत

कोविड-19 संक्रमण की आपराधिक जवाबदेही तबलीग़ी जमात के माथे ही क्यों है?

डब्ल्यूएचओ कहता है कि नागरिकों का स्वास्थ्य सरकारों की प्राथमिक ज़िम्मेदारी है. लेकिन भारत सरकार के यात्राओं पर प्रतिबंध, हवाई अड्डों पर सबकी स्क्रीनिंग के निर्णय में हुई देरी पर बात नहीं हुई, न ही कोविड जांच की बेहद कम दर की बात उठी. जमात ने ग़लती की है पर क्या सरकारों को कभी उनकी नाकामियों के लिए जवाबदेह ठहराया जाएगा?

नई दिल्ली का निज़ामुद्दीन मरकज इलाका (फोटो: पीटीआई)

नई दिल्ली का निज़ामुद्दीन मरकज इलाका. (फोटो: पीटीआई)

कोविड-19 के बाद दुनिया पहली जैसी नहीं रहेगी. ऐसे में जबकि अपने अत्याधुनिक स्वास्थ्य ढांचे के बावजूद पश्चिम के विकसित देशों पर इसका सबसे ज्यादा असर पड़ा है.

यह जाहिर है कि मानवता को सार्वजनिक स्वास्थ्य आपातकाल की स्थिति से निपटने के नए तरीकों की खोज करनी होगी.

ख़ासतौर पर संयुक्त राज्य अमेरिका को इस बात का एहसास जरूर हो रहा होगा कि आतंकवाद के खिलाफ युद्ध पर इसके द्वारा किया गया बेशुमार खर्च कितना गलत और भटका हुआ कदम था.

आरोप-प्रत्यारोप का खेल

शुरू में किसी ने भी चीन पर मामलों की संख्या को छिपाने और विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) के साथ सूचना साझा करने में देरी लगाने का आरोप नहीं लगाया.

किसी ने भी हफ्तों तक यात्रा पर प्रतिबंध लगाने की सलाह देने से इनकार करने के लिए डब्ल्यूएचओ की तरफ उंगली नहीं उठाई.

किसी ने भी नए वायरस के ख़तरे को स्वीकार करने से पहले अहम हफ्ते गंवाने के लिए अमेरिका की गलती नहीं निकाली- राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप यह कहते रहे कि सब कुछ ठीक रहेगा और उन्होंने अपने ही विशेषज्ञों की सलाह को नजरअंदाज किया. (अब उन्होंने डब्ल्यूएचओ को आर्थिक सहायता रोककर एक दूसरा ही संकट खड़ा कर दिया है).

इतना ही नहीं, किसी ने एक महामारी को वैश्विक महामारी का रूप देने में कुछ यूरोपीय देशों द्वारा निभाई गई बड़ी भूमिका के लिए उनकी आलोचना नही की- अगर चीन से वायरस 27 देशों में पहुंचा, तो अकेले इटली से यह 46 देशों में पहुंचा.

भारत सरकार और मुख्तार अब्बास नकबी ने क्रमशः 13 मार्च और 18 मार्च को बयान देकर यह कहा कि ‘भारत में कोई स्वास्थ्य आपातकाल नहीं है’, लेकिन इस बयान के लिए किसी ने उनकी आलोचना नहीं की.

फ्रांस, इटली, जर्मनी और स्पेन जैसे देश अपने यहां लॉकडाउन लगाने का फैसला काफी पहले कर चुके थे, लेकिन लॉकडाउन का फैसला करने में अच्छी-खासी देरी करने के लिए किसी ने भारत सरकार की आलोचना नहीं की.

डब्ल्यूएचओ का संविधान कहता है कि अपने लोगों के स्वास्थ्य का ख्याल रखना सरकारों की प्राथमिक जिम्मेदारी है. सवाल है कि क्या सरकारों को कभी भी उनकी नाकामियों के लिए जवाबदेह ठहराया जाएगा?

बाद में जब कई देशों से लोगों के कोविड-19 से संक्रमित होने की खबरें आने लगीं, तब एक-दूसरे पर आरोप मढ़ने का खेल शुरू हो गया.

अमेरिका ने इसे चायना वायरस कहना शुरू कर दिया, अमेरिका में कुछ लोगों ने धर्मनिष्ठ यहूदियों पर आरोप लगाया.

अफ्रीकी लोगों ने गोरे नस्ल पर उंगली उठाई, पाकिस्तान को शियाओं की गलती दिखाई दी और भारत में हमने नोवेल कोरोना वायरस के प्रसार की पूरी जिम्मेदारी तबलीगी जमात पर डाल दी है.

हालांकि, तेलंगाना ने 18 मार्च को ही तबलीगी जमात के पहले मामले के बारे में सूचना दे दी थी, लेकिन इस बारे में एक सप्ताह से ज्यादा समय तक कुछ भी नहीं किया गया. (संसद मे मुख्तार अब्बास नकवी के 18 मार्च के उस बयान को याद कीजिए, जिसमें उन्होंने कहा था कि घबराने की कोई जरूरत नहीं है.)

किसी ने भी भारत सरकार द्वारा यात्राओं पर प्रतिबंध लगाने और हवाई अड्डों पर सबकी स्क्रीनिंग करने का फैसला लेने में गैर मुनासिब देरी करने को लेकर कोई बात नहीं की.

न ही किसी ने मास्क, पीपीई किटों, और वेंटिलेटरों की अपर्याप्त आपूर्ति, धार्मिक जमावड़ों पर देर से लगाई गई पाबंदी और सबसे बढ़कर कोरोना की जांच की बेहद कम दर को लेकर कोई बात नहीं की.

यहां तक कि लॉकडाउन के लगभग दो हफ्ते बाद भी 8 अप्रैल को हम प्रति 1000 की आबादी पर सिर्फ 0.092 टेस्ट ही कर रहे थे, जर्मनी प्रति 1000 की आबादी पर 15.96 टेस्ट कर रहा था.

हम कनाडा से 10 गुना कम और अमेरिका से छह गुना कम टेस्ट कर रहे थे. 16 अप्रैल को चीन से 5.5 लाख एंटीबॉडी टेस्टिंग और 1 लाख रैपिड टेस्टिंग किट चीन से भारत पहुंचने वाले थे. इनसे हमारी टेस्टिंग दरों में सुधार होने की उम्मीद थी.

लेकिन इन तथ्यों को इतना महत्वपूर्ण नहीं माना गया कि वे खबर बन सकें. इसकी जगह टीवी न्यूज चैनल और उनके सनसनी प्रेमी पत्रकारों को तबलीगी जमात के प्रमुख मौलाना साद का गैरजिम्मेदार रवैया किसी तोहफे के रूप में मिल गया.

उन्होंने इसका इस्तेमाल नफरत और धर्मांधता की आग में घी डालने के लिए किया. और इस तथ्य के बावजूद कि तबलीगी जमात देवबंद स्कूल का बस एक छोटा-सा हिस्सा है, पूरे मुस्लिम समुदाय को खलनायक के तौर पर पेश किया गया.

आपराधिक कानून के तहत जवाबदेही व्यक्तिगत होती है. पूरे मुस्लिम समुदाय की बात तो जाने दीजिए, तबलीगी जमात के सभी सदस्य या जमात की मस्जिद- चूड़ीवाली मस्जिद या निजामुद्दीन मरकज से जिन्हें निकाला गया- उन्हें जमात प्रमुख की गलतियों या अपराध के लिए जवाबदेह नहीं ठहराया जा सकता.

Agartala: Attendees of a religious congregation in Delhi's Nizamuddin area board an ambulance for mandatory COVID-19 tests during a nationwide lockdown in the wake of the coronavirus outbreak, in Agartala, Saturday, April 4, 2020. (PTI Photo)(PTI04-04-2020_000040B)

(फोटो: पीटीआई)

एक अखबार ने तो एक ‘बैड एप्पल्स इन द बास्केट’ (टोकरी में खराब सेब) शीर्षक से एक संपादकीय भी प्रकाशित किया जिसमें अपनी पहचान सड़े हुए सेब की तरक कराने वाली भारत की इस 18 फीसदी आबादी का जिक्र किया गया था और यह निष्कर्ष निकाला गया था कि ‘खराब सेबों द्वारा पैदा की गई समस्या का समाधान उनसे छुटकारा पा लेना है.’

तथ्य यह है कि देवबंद स्कूल का भी तबलीगी जमात के साथ गंभीर मतभेद है और इसने मौलाना साद को ‘भटका हुआ’ बताते हुए उनके खिलाफ फतवा जारी किया था और उनकी व्याख्याओं को खारिज कर दिया था.

वे वास्तव में एक विवादित शख्स हैं और मुस्लिम समुदाय के भीतर कई लोग उनका समर्थन नहीं करते हैं. हिंदुओं की तरह मुस्लिम भी कोई समरूपी समुदाय नहीं हैं. इसमें कई पंथ, उप-पंथ और उप-पंथों के भीतर तबलीगी जमात जैसे कई समूह हैं.

एक ऐसे समय मे जब वास्तविक कारोबार दशकों के अपने सबसे बुरे दौर से गुजर रहे हैं, भारत में फर्जी खबरों के कारोबार में जबरदस्त तेजी आई है.


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14 अप्रैल को कुछ न्यूज चैनलों ने मुंबई में प्रवासी मजदूरों की बड़ी भीड़, जो प्रधानमंत्री द्वारा लॉकडाउन को 3 मई तक बढ़ाए जाने की घोषणा के बाद अपने घरों को जाना चाहती थी, के जमा हो जाने के लिए मुस्लिमों को जिम्मेदार ठहराने की कोशिश की.

जल्द ही ऐसी भीड़ कई दूसरे शहरों में भी दिखाई दी. जहां तक ठोस आंकड़ों का सवाल है, तो अभी तक न तो भारत सरकार और न ही इंडियन काउंसिल ऑफ मेडिकल रिसर्च (आईसीएमआर) ने तबलीगी जमात मस्जिद में मौजूद लोगों की संख्या या उनके संपर्क में आने वाले और जांच किए गए और पॉजिटिव पाए गए लोगों संख्या के संबंध में जानकारी को सार्वजनिक किया है.

कुछ समझदार रिपोर्ट में कहा गया कि भारत के 30 फीसदी मामलों का रिश्ता तबलीगी जमात के कार्यक्रम (13-15 मार्च) से जोड़ा जा सकता है.

लेकिन इनमें भी बचे हुए 70 प्रतिशत मामलों और उनके संक्रमण के स्रोत के बारे में जानकारी नहीं दी गई. कुछ भी हो, निजता के अधिकार का सम्मान नहीं किया गया और कई लोगों के नाम, उनके फोन नंबर और यहां तक कि पासपोर्ट नंबर को भी सार्वजनिक कर दिया गया.

तबलीगी जमात का मूल विचार और सांगठनिक ढांचा

तबलीगी जमात की स्थापना 1927 ईस्वी मे मौलाना मोहम्मद इलियास कंधलावी ने की थी. यह सही अर्थों में संगठन भी नहीं है, जिसकी एक निर्धारित या पहचानी हुई सदस्यता होती है.

वास्तव में इसका कोई औपचारिक दफ्तर या शाखाएं नहीं हैं और इसका संचालन मस्जिदों से किया जाता है. हालांकि दुनियाभर में इसकी गतिविधियों की सूचना निजामुद्दीन मस्जिद को दी जाती है.

तबलीगी जमात का कोई नामांकन रजिस्टर नहीं है, न यह कहीं भी एक ट्रस्ट, एक एनजीओ या सेक्शन 8 के तहत कंपनी के तौर पर रजिस्टर्ड है. न ही यह किसी तरह से धर्मांतरण की गतिविधियों में शामिल है.

इसकी मुख्य गतिविधि सिर्फ मुस्लिमों के बीच, इबादत की उनकी आदतों को सुधारने के लिए काम करना है और इसकी चिंता का विषय इस लोक के परे परलोक का जीवन है. यह कभी कोई फतवा नहीं देती, न ही कभी यह किसी राजनीतिक मसले पर कोई पक्ष चुनती है.

और हकीकत यह है कि मुस्लिम समुदाय के भीतर तबलीगी जमात की सबसे ज्यादा आलोचना इस बात को लेकर होती है कि इस दुनिया के मसले उसकी चिंता के दायरे में नहीं आते हैं.

तबलीगी जमात द्वारा किसी तरह के साहित्य या लिखित सामग्री का प्रकाशन नही किया जाता है.

इसके सत्रों में तबलीगी जमात के संस्थापक के भतीजे मौलाना ज़कारिया कंधलावी द्वारा लिखा गया फज़ल-ए-अमाल का काफी श्रद्धा के साथ पाठ किया जाता है.

इस्लामिक विद्वान अच्छे कर्मों के फायदों के बारे में बताने वाली इस किताब की आलोचना यह कहते हुए करते हैं कि इसमें पैगंबर साहब के कई ऐसे वचनों का हवाला दिया गया है, जो अप्रामाणिक हैं. इसे प्रामाणिक और विद्वतापूर्ण कार्य नहीं माना जाता है.

MAulana Saad Kandhlawi Twitter

मौलाना साद कंधलावी. (फोटो साभार: ट्विटर/वीडियोग्रैब)

तबलीगी जमात के सत्र मस्जिद में नमाज पढ़ने के लिए जाने वाले सभी व्यक्ति के लिए खुले होते हैं.

नमाज के बाद एक घोषणा की जाती है कि जो लोग धर्म और परलोक के जीवन को लेकर चर्चा मे दिलचस्पी रखते हैं, वे अगर चाहें, तो कुछ मिनट रुककर वक्ता को सुन सकते हैं.

ये वक्ता पेशेवर उपदेशक नहीं होते हैं, बल्कि मौजूद लोगों के बीच सलाह-मशविरा करके चुने जाते हैं. यहां वक्ताओं की फेहरिस्त जैसी कोई चीज नहीं होती है.

एक समय ऐसा भी था जब तबलीगी जमात की निर्णय प्रक्रिया काफी विकेंद्रीकृत और परामर्श आधारित थी. छोटे से छोटे फैसलों के लिए कई लोगों से मशविरा लिया जाता था.

आज भी निजामुद्दीन मस्जिद में यह सलाह-मशविरा रोज सुबह दस बजे होता है, लेकिन अंतिम फैसला मौलाना साद का ही होता है. ऐसा मालूम होता है कि इसका रिकॉर्ड जैसा कुछ एक डायरी में रखा जाता है.

तबलीगी जमात के संस्थापक के बाद उनकी जगह मौलाना मोहम्मद यूसुफ कंधलावी ने ली और उनके बाद आए मौलाना इनामुल हसल कंधलावी, जिनकी मृत्यु 1995 में हुई.

उन्होंने अपना कोई उत्तराधिकारी तय नहीं किया था, इसकी जगह उन्होंने तबलीगी जमात के कामकाज का प्रबंधन करने के लिए एक 10 सदस्यीय सलाहकार परिषद को नियुक्त किया था.

ऐसा लगता है कि मौलाना साद, जो तबलीगी जमात के संस्थापक के परपोते हैं, को छोड़कर इस परिषद के बाकी सभी सदस्य अगले दो दशकों में धरती से रुखसत हो गए.

2016 में तक मौलाना साद ने तबलीगी जमात के कामकाज को अपने नियंत्रण में ले लिया. इससे संगठन में दोफाड़ हो गया और बुजुर्गों ने मौलाना इब्राहिम देवला और मौलाना अहमद लाट के नेतृत्व में एक प्रतिस्पर्धी तबलीगी जमात का गठन कर लिया.

उनको मौलाना साद के तानाशाही तौर-तरीकों से गंभीर ऐतराज था. हो सकता है मौलाना साद को अपनी तानाशाही नेतृत्व शैली और योग्य सलाहकार न होने की भारी कीमत चुकानी पड़े.

यहां यह जिक्र करना महत्वपूर्ण है कि तबलीगी जमात के इस प्रतिस्पर्धी समूह (इब्राहिम और लाट) जो दिल्ली के तुर्कमान गेट के फैज इलाही मस्जिद से काम करता है, ने राष्ट्रीय राजधानी के साथ ही मुंबई की अपनी सभाओं को रद्द कर दिया था.

तथ्य यह है इसने मार्च के पहले हफ्ते में ही अपनी सारी गतिविधियों को स्थगित कर दिया था.

New Delhi: A driver, in yellow protective suit along with healthcare workers, walks towards a bus to carry the people who attended Tabligh-e-Jamaat congregation in Nizamuddin West to the LNJP Hospital for their screening and COVID-19 test, in New Delhi, Tuesday, March 31, 2020. 24 people who took part in the congregation have tested COVID-19 positive. (PTI Photo/Vijay Verma) (PTI31-03-2020 000053B)

(फोटो: पीटीआई)

आपराधिक जवाबदेही का पहलू

हम अब तबलीगी जमात के मुखिया मौलाना साद और निजामुद्दीन पश्चिम, नई दिल्ली के मरकज के जमावड़े में (13-15 मार्च) शामिल होने वालों की आपराधिक जवाबदेही की जांच करते हैं.

चूंकि धार्मिक जमावड़ों पर 15 मार्च तक प्रतिबंध नहीं लगाया गया था, इसलिए यह सभा करना, भले ही निश्चित तौर पर मूर्खता और गैर-जिम्मेदाराना हो, लेकिन आपराधिक कृत्य के दायरे में नहीं आता है.

लेकिन इसमें कोई शक नहीं है कि यह इस्लाम के पैगंबर के निर्देशों के उलट था, जिन्होंने ऐसे हालातों में मुसलमानों को अपने घरों से नमाज पढ़ने और मस्जिद नहीं जाने का निर्देश दिया था.

इसके अलावा कुरान यह साफतौर पर कहता है कि एक जिंदगी को बचाना, पूरी मानवता को बचाने के समान है और एक जिंदगी लेना, पूरी मानवता की हत्या करने जैसा है.

इस्लाम इंसानी जिंदगी को सबसे ज्यादा कीमती मानता है इसलिए इंसानी जिंदगी की हिफाजत के लिए सभी एहतियात बरती जानी चाहिए.

कट्टरपंथी सउदी अरब समेत पूरी मुस्लिम दुनिया ने मस्जिदों में नमाज पढ़ने पर पाबंदी लगा दी थी. ऐसे समय जब मक्का-मदीना की मस्जिदें को भी जनता के लिए बंद कर दिया गया था, मौलाना साद ने समझदारी भरे मशविरों के खिलाफ जाने का फैसला किया.

बाद में निजामुद्दीन मस्जिद को बंद किए जाने के बाद उन्होंने खुद तबलीगी जमात के अनुयायियों को घर में रहने की सलाह दी.

ऐसा करते हुए वे खुद अपनी ही बात को काट रहे थे क्योंकि अपने पहले के भाषणों में उन्होंने सोशल डिस्टेंसिंग की खिल्ली उड़ाई थी.

पैगंबर के सुन्नत (पैगंबर के उपदेश एवं उनके कर्म) के खिलाफ जाकर वे कुरान के ख़िलाफ भी गए हैं, जो यह साफतौर पर कहता है कि मुसलमानों के लिए सबसे अच्छे उदाहरण खुद पैगंबर हैं.

अपने अनुयायियों के जीवन को बेवजह खतरे में डालकर उन्होंने अपने समूह का नेतृत्व करने का अधिकार कम से कम तब तक गंवा दिया है, जब तक कि वे अपनी गलतियों को स्वीकार करके अल्लाह के सामने प्रायश्चित न करें और इतने के बाद भी उनके अनुयायी उनमें एक बार फिर अपना भरोसा जताएं.

निश्चित तौर पर उनका इरादा किसी को नुकसान पहुंचाना नहीं था और इसलिए हो सकता है कि उनके अनुयायी उन्हें शायद आखिरकार माफ कर दें.

यह सम्मेलन वास्तव में हर दो साल मे होने वाली एक रूटीन बैठक था, जिसकी तारीख 2 साल पहले तय हो गई थी. इसका मकसद तेलंगाना और आंध्र प्रदेश में तबलीगी जमात की गतिविधियों का मूल्यांकन करना था.

दिल्ली के कार्यक्रम के बाद तबलीगी जमात के तमिलनाडु के कार्यकर्ताओं को 22-24 मार्च तक मिलना था. यही कारण है कि तबलीगी जमात के मरकज में मौजूद ज्यादातर लोग इन तीन राज्यों से ही थे.

हमेशा की तरह किसी को कोई निमंत्रण नहीं दिया गया था. इसमें शमिल होनेवाले खुद अपने पैसे खर्च करके आए. तबलीगी जमात किसी का खर्च नहीं उठाता. यहां तक कि विदेशियों को भी अपना खर्च खुद उठाना पड़ता है.


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कुछ भी हो, 15 मार्च तक घरेलू यात्रा पर कोई पाबंदी नहीं थी. जहां तक निजामुद्दीन मरकज में मौजूद लोगों का सवाल है, तो उन्हें वीजा की शर्तों का उल्लंघन करने का जिम्मेदार ठहराया जा सकता है, लेकिन बड़ा सवाल यह है कि मलेशिया और इंडोनेशिया के लोगों के वीजा को रद्द क्यों नहीं किया गया?

और उन्हें दिल्ली एयरपोर्ट पर वापस अपने देशों को भेजने या क्वारंटीन मे रखने की जगह- अगर 15 मार्च तक सरकार ने ऐसा नियम बना दिया था- तो दिल्ली एयरपोर्ट पर छोड़ क्यों दिया गया?

ये बात हमें दिमाग में रखनी चाहिए कि अनुच्छेद 25 ‘सभी व्यक्तियों’ को धार्मिक स्वतंत्रता देता है, इसलिए विदेशी, चाहे वे टूरिस्ट वीजा पर ही भारत क्यों न आए हों, वे धार्मिक मामले में नागरिकों के बराबर हैं और उनके पास किसी भी धर्म को मानने, उसके अनुरूप आचरण करने और उसका प्रसार करने का अधिकार है.

Prayagraj: Police personnel during a search operation for devotees who had recently attended the religious congregation at Tabligh-e-Jamaats Markaz in Delhis Nizamuddin area, in Prayagraj, Wednesday, April 1, 2020. 24 people who attended the Markaz were found positive for COVID-19 as Nizamuddin area became countrys hotspot for the disease. (PTI Photo)(PTI01-04-2020 000087B)

(फोटो: पीटीआई)

निस्संदेह, यह आजादी लोक-व्यवस्था, स्वास्थ्य और नैतिकता की शर्तों और अन्य मौलिक अधिकारों के अधीन है.

मिसाल के लिए अब सरकार ने सभी धार्मिक स्थलों को बंद किया हुआ है इसलिए अब विदेशी नागरिक समेत किसी को भी किसी भी धार्मिक स्थलों पर पूजा करने का मौलिक अधिकार नहीं है.

चूंकि तबलीगी जमात धर्म के प्रचार-प्रसार या धर्मांतरण के काम में शामिल नहीं है, टूरिस्ट वीजा पर यह वैसे भी निषिद्ध है, इसलिए यहां यह कोई मसला नहीं है.

विदेशी नागरिक निश्चित तौर पर दैनिक प्रार्थना आदि में शामिल हो सकते हैं और मस्जिद जैसी धार्मिक जगहों पर जा सकते हैं और अपने धर्म के अनुरूप आचरण कर सकते हैं.

जहां तक मुझे जानकारी है, तबलीगी जमात से संबंधित विदेशी मस्जिदों में नमाज पढ़ने के अलावा और कुछ नहीं करते हैं.

निश्चित तौर पर अगर उनके वीजा में उन्हें सिर्फ कुछ शहरों तक ही जाने की इजाज़त थी, तो उन शहरों के अलावा किसी अन्य शहर में जाना कानून का उल्लंघन होगा और इस आधार पर उन्हें आपराधिक तौर पर जवाबदेह ठहराया जा सकता है.

जमात का सम्मेलन क्या एक आपराधिक साजिश था?

अगर कुछ टीवी चैनलों ने तबलीगी जमात के गैर जिम्मेदारी भरे कदमों को ‘कोरोना जिहाद’ करार दिया, तो दूसरों ने सीधे तौर पर यह घोषणा कर दी कि यह कोविड-19 को फैलाने की आपराधिक साजिश के लिए जिम्मेदार है.

इन्होंने दर्शकों को एक नए पद ‘सुपरस्प्रेडर’ से परिचित कराया.

आपराधिक साजिश के लिए आरोपियों के बीच किसी अपराध को करने के लिए करार या सहमति का होना जरूरी है. तबलीगी जमात की तरफ से यह करार किसने किया?

मोहम्मद अमीन (2008) वाले मामले में सुप्रीम कोर्ट ने यह कहा कि धारा 120-बी के तहत किसी साजिश को साबित करने के लिए मुख्य मकसद की जानकारी होना और एक समान लक्ष्य से संचालित होना जरूरी है.

इस बात का कोई सबूत होने की शायद कोई संभावना नहीं है कि मोहम्मद साद ने पहले अपने सात सलाहकारों के साथ लोगों को 15 मार्च के बाद भी मरकज में रोकने को लेकर आपसी सहमति बनाई, ताकि वे पहले खुद वहां मौजूद विदेशियों से संक्रमित हों और उसके बाद जानबूझकर पूरे देश में जानलेवा वायरस का संकमण फैलाएं,

यह ध्यान रखना महत्वपूर्ण है कि निजामुद्दीन मरकज से आखिरकार 30 मार्च को निकाले गए सभी 1500 लोग, खुद अपने आप में पीड़ित हैं, न कि अपराधी या दोषी.

मौलाना साद की अदूरदर्शिता, मेडिकल साइंस का तिरस्कार और इस्लाम की उनकी दोषपूर्ण और गलत व्याख्या के कारण इनमें से कई लोग संक्रमित हो गए और उनमें से कुछ की मौत भी हुई.

दिल्ली सरकार द्वारा राष्ट्रीय राजधानी में 22 मार्च से लगाए गए लॉकडाउन और उसके बाद 24 मार्च से लागू किए गए 21 दिन के राष्ट्रव्यापी लॉकडाउन के कारण लोग निजामुद्दीन में फंस गए और वहां से बाहर नहीं निकल पाए.

तथ्यों को अगर दुरुस्त किया जाए, तो पंजाब के करीब 4,000 सिख तीर्थयात्री नांदेड़ (महाराष्ट्र) में फंसे थे.

जम्मू-कश्मीर उच्च न्यायालय को वैष्णो देवी में फंसे लोगों के लिए हस्तक्षेप करना पड़ा. इस बात की कोई जानकारी नहीं मिली है कि उनमें से कितने लोगों की जांच कराई गई और इन जांचों का परिणाम क्या रहा?

इसके साथ ही गुजरात से 1,800 लोगों को 28 लग्जरी बसों में बैठाकर अप्रैल की शुरुआत में हरिद्वार से निकाला गया. यह सुविधा निजामुद्दीन के लोगों को क्यों नहीं दी गई?

यह इस तथ्य के बावजूद है कि वे पुलिस के पास गए थे और उन्होंने वहां फंसे सभी लोगों की सूची सौंपी थी और खुद बसों और ड्राइवरों का इंतजाम करके यात्रा के लिए सिर्फ ई-पासों की दरख्वास्त की थी. यह बात रिकॉर्ड में दर्ज है.

Lucknow: Volunteers spray disinfectants on the building of Ali Jan mosque, after some people staying there were tested positive of coronavirus, at Sadar Bazar area of Lucknow, Friday, April 3, 2020. (PTI Photo/Nand Kumar)(PTI03-04-2020_000251B)

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जमात के मुखिया और सलाहकारों के पर लगे आरोप

निजामुद्दीन पुलिस स्टेशन के एसएचओ मुकेश वालिया की शिकायत पर 31 मार्च को तबलीगी जमात (साद वाला धड़ा), मौलाना साद और सात अन्यों पर महामारी रोग कानून (एपिडेमिक डिजीजेज एक्ट) (1897) की धारा 3 और धारा 269, 270 और धारा 271 – आईपीसी की धारा 120 बी के साथ, लोक सेवक के आदेशों का पालन न करने और संक्रामक बीमारी फैलाने का आरोप लगाया गया है.

15 अप्रैल को एक और आरोप जोड़ा गया: तबलीगी जमात प्रमुख पर हत्या की श्रेणी में न आने वाले गैर इरादतन हत्या का मामला दर्ज किया गया. (अनुच्छेद 304, आईपीसी). इस आरोप के सिद्द होने पर आजीवन कैद या 10 साल की कैद की सजा हो सकती है.

आईपीसी की धारा 299 में गैर इरादतन हत्या को परिभाषित किया गया है- इसमें कहा गया है, यदि कोई व्यक्ति किसी की जान लेने के इरादे या किसी को इस तरह से शारीरिक तौर पर जख्मी करने के इरादे से, जिससे उसकी जान जा सकती है, कोई ऐसा काम करता है, या उसे जानकारी है कि उसका कृत्य किसी की मृत्यु का कारण बन सकता है, कोई काम करता है, तब वह गैर इरादतन हत्या का अपराध करता है.

दोषी दिमाग या कोई गलत काम करने का इरादा या उसकी जानकारी (मेन्स रिया- mens rea), न कि वास्तविक संलिप्तता, गैर इरादतन हत्या के केंद्र में है.

धारा 299 के तहत यह जरूरी है कि आरोपी का इरादा किसी पीड़ित की जान लेना रहा हो. यह कहना पूरी तरह से बेतुका और हास्यास्पद है कि मौलाना साद ने किसी की जान लेनी चाही. न ही उन्होंने किसी को इस तरह से जख्मी किया, जिससे किसी की मृत्यु की संभावना हो.

उनके द्वारा 13-15 मार्च के कार्यक्रम को रद्द न करना, या पहले दिल्ली में और बाद में देशव्यापी लॉकडाउन के कारण फंसे हुए लोगों को शरण देने को कानूनी रूप से किसी की मृत्यु की वजह बनने की जानकारी के साथ किया गया काम कहा जा सकता है.

जानकारी का मतलब है चेतना या बोध और यह किसी को उसके आचरण के नतीजों की जानकारी होने के बारे में बताता है.

मौलाना साद के साथ पूरी समस्या यह थी कि अपने अतार्किक ओर दोषपूर्ण धार्मिक मान्यताओं के कारण, उन्हें निजामुद्दीन मस्जिद में सामुदायिक नमाज के संभावित परिणामों का कोई बोध नहीं था.

लोकसेवक के आदेश का उल्लंघन

महामारी रोग कानून, 1897 एक गुजरे जमाने का उपनिवेशी कानून है, जो और कुछ नहीं बस राज्य सरकारों और केंद्र सरकार को खतरनाक महामारी के समय सामान्य कानूनों के अपर्याप्त महसूस होने पर अस्थाई नियम बनाने की शक्ति देता है.

यह सिर्फ आईपीसी की धारा 188 के तहत लोकसेवकों द्वारा निकाले गए आदेशों का उल्लंघन करने के लिए लोगों को सजा देता है. ऐसी एफआईआर को मजिस्ट्रेट के सामने शिकायत के बाद दायर करना होता है.

हालांकि, मेन्स रिया या दोषी दिमाग इस अपराध का अनिवार्य घटक है, लेकिन धारा 188 की व्याख्या से यह साफ है कि यह जरूरी नहीं है कि अपराधी का इरादा नुकसान पहुंचाने या नुकसान पहुंचाने के इरादे से आदेश का उल्लंघन करने का हो.

इतना ही काफी है कि उसे उस आदेश के बारे मे पता हो, जिसका उसने उल्लंघन किया है और उसका यह उल्लंघन नुकसान पहुंचाता है, या उससे नुकसान पहुंचने की संभावना है. (यहां इस नुकसान का संबंध, जैसा कि धारा 188 में बताया गया है, इंसानी जीवन, स्वास्थ्य या सुरक्षा से है)

Ghaziabad: A patient waits outside the emergency ward of Ghaziabad District MMG hospital, where attendees of a recent religious congregation in Nizamuddin are admitted for quarantine in the wake of coronavirus outbreak, in Ghaziabad (UP), Saturday, April 4, 2020. (PTI Photo/Vijay Verma)(PTI04-04-2020_000056B)

(फोटो: पीटीआई)

राम समुझ और अन्य बनाम राज्य (1967) वाले मामले में, यह व्यवस्था दी गई थी कि जब आपराधिक प्रक्रिया संहिता, 1973 (सीआरपीसी) की धारा 144 के तहत आदेश दिया गया है, तब ऐसे आदेशों का उल्लंघन आईपीसी की धारा 188 के तहत दंडनीय होगा.

अगर मौलाना साद का कथित ऑडियो क्लिप असली है, तो उनके धारा 188 के तहत दोषी करार दिए जाने की संभावना है क्योंकि इससे यह साफ है कि उन्हें कोविड-19 और सोशल डिस्टेंसिंग की एडवाइजरी की जानकारी थी, लेकिन फिर भी अपनी नासमझी और गलत धार्मिक विश्वास के कारण उन्होंने निजामुद्दीन में मौजूद लोगों से अल्लाह के घर यानी मस्जिद आना बंद न करने की गुजारिश की.

मौलाना साद दोषपूर्ण तरीके से यह यकीन करते थे कि इस्लाम में संकट के समय में भी लोगो को सामूहिक तौर पर नमाज पढ़ने का आदेश दिया गया है. वे सोशल डिस्टेंसिंग के विचार को समझ नहीं पाए.

वास्तव में वे अपने कार्यों की प्रकृति और स्वरूप को नहीं समझ पाए. गैर जिम्मेदार ढंग से व्यवहार करनेवालों में वे अकेले नहीं हैं.

फ्रांस, दक्षिण कोरिया और फ्लोरिडा के चर्च और लंदन का इस्कॉन मंदिर लोगों के लिए खुला रहा और इसी तरह से कोरोना वायरस के प्रसार में इन्होंने अपना योगदान दिया. यहां तक कि 12 अप्रैल को अमेरिका के कई चर्चों ने ईस्टर की प्रार्थनाओं का आयोजन किया.

धारा 188 के तहत अधिकतम सजा एक महीने की जेल या जुर्माना-जिसे बढ़ाकर 200 तक किया जा सकता है-  या दोनों है.

कोरोना वायरस फैलाने का दोषी दिमाग!

अब हम दूसरे आरोपों के बारे में चर्चा करते हैं. आईपीसी की धारा 269 यह कहती है कि गैर कानूनी ढंग से या लापरवाहीपूर्वक कोई ऐसा काम करने वाले को, जिसके बारे में उसे ज्ञान है या उसके पास ऐसा विश्वास करने का कारण है, कि इससे किसी जानलेवा रोग का संक्रमण फैल सकता है, छह महीने की कैद या जुर्माना या दोनों हो सकता है.

‘ज्ञान है’ के साथ-साथ ‘विश्वास करने का कारण है,’ इन दो अभिव्यक्तियों का प्रयोग एक ‘दोषी दिमाग’ की शर्त की ओर इंगित करता है.

‘ज्ञान होने’ का क्या मतलब है? ज्ञान का मतलब आरोपी को उसके कार्य के परिणाम की जानकारी होना है, जो उसके दिमाग की तरफ इशारा करता है.

सामान्य बुद्धि यह कहती है कि मौलाना साद को निश्चित ही इस बात की जानकारी नहीं होगी कि वहां जमा उनके श्रोताओं में से कुछ पहले से ही संक्रमित हैं और उसके बगल में बैठा हुआ या उनके साथ खा रहा कोई व्यक्ति रोग का वाहक है और वह उन्हें या दूसरों को संक्रमित कर सकता है.

वास्तव में वह, दूसरे धर्मों के अन्य उपदेशकों की तरह अपने मजहबी विश्वासों से इतने अंधे हो गए थे कि उन्होंने सोचा कि मस्जिद में आने से लोग वास्तव में निरोग हो जाएंगे या यह कोरोना वायरस से उनकी रक्षा करेगा.

हकीक़त यह है कि उन्होंने अपनी जान को भी खतरे में डाला और उन्हें सेल्फ क्वारंटीन में जाना पड़ा. आदर्श स्थिति में उन्हें अपनी जांच खुद कराने के लिए आगे आना चाहिए था.

आईपीसी की धारा 270 ज्यादा गंभीर अपराध से संबंधित है और लगभग पूरी तरह से धारा 269 के समान है, सिवाय ‘विद्वेषपूर्ण ढंग से’ (मैलिगनेंटली) अभिव्यक्ति के. इसमें सजा बढ़कर दो साल की कैद या जुर्माना या दोनों हो जाती है.

‘विद्वेषपूर्ण ढंग से’ पद भी ‘दोषी दिमाग’ या ‘मेन्स रिया’ से संदर्भित है क्योंकि इसकी शर्त यह है कि आरोपी ने किसी जानलेवा रोग का संक्रमण फैलाने का काम खराब नीयत या विद्वेष से यानी जानबूझकर एक इरादे के साथ किया हो.

इरादा क्या है? जयप्रकाश (1991) वाले मामले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि ‘इरादा’ किसी उद्देशय को पूरा करने या संतुष्ट करने के मकसद से कोई काम करने के लिए किसी व्यक्ति की मानसिक क्षमता का सचेत प्रयोग है.

एक परिणाम का इरादा तब किया जाता है, जब आरोपी का मकसद वैसा करना होता है या परिणाम सीधे तौर पर उसके कार्य का निश्चित नतीजा होता है और आरोपी यह जानता है कि ऐसा नतीजा निकलना निश्चित है.

मौलाना साद के दिमाग में निश्चित तौर पर कोरोना वायरस का प्रसार करने का ‘मकसद’ नहीं था. इसी तरह से वे इसके प्रसार के परिणाम को लेकर, जिस तरह से यह पूरे भारत में फैल गया है, भी निश्चित नहीं थे.

किसी नतीजे के संदर्भ में किसी व्यक्ति का इरादतन काम करना तब होता है, जब वह या तो उस परिणाम के निकलने के लिए काम करता है, या उसे इस बात की जानकारी होती है कि साधारण घटनाक्रम में ऐसा होगा.

मौलाना साद के मामले में ऐसी संभावना नहीं थी. अपने अनुयायियों या सलाहकारों को संक्रमित करा देना निश्चित तौर पर मौलाना साद का मकसद या इरादा नहीं था.

लेकिन फिर कानून यह भी कहता है कि यह माना जाना चाहिए कि हर व्यक्ति अपने कार्यों के स्वाभाविक या संभावित नतीजों का इरादा रखता है.

क्या मौलाना साद अपने अंध धार्मिक विश्वासों के आधार पर यह अपने बचाव में यह दलील दे सकते हैं कि मस्जिद में इबादत के लिए आने से रोग ठीक हो जाते हैं?

इसे अगर दूसरी तरह से रखा जाए, लापरवाही वाले पहलू के संदर्भ में, तो क्या जज किसी आरोपी की संभावित नुकसान का आकलन करने की व्यक्तिगत अक्षमता पर विचार कर सकते हैं?

शास्त्रीय कानून में, एक सामान्य समझदार व्यक्ति से कम दूरदर्शिता दिखाना आरोपी की मदद नहीं करेगा.

ब्रिटिश कानूनी दार्शनिक एचएलए हार्ट किसी आरोपी की विशिष्ट मानसिक व शारीरिक क्षमता पर भी ध्यान देने की वकालत करते हैं, लेकिन अदालतों ने इसे स्वीकार नहीं किया है इसलिए यह बचाव उनकी मदद नहीं करेगा.

इसी तरह से मौलाना साद के लिए खुद को आईपीसी की धारा 79 के तथ्य की भूल (मिस्टेक ऑफ फैक्ट) अपवाद के तहत मिलने वाली छूट से आपराधिक जवाबदेही से बरी करना मुश्किल होगा.

तथ्य की भूल अपवाद दोषी इरादे या जानकारी को शून्य कर देती है.

इसका इस्तेमाल उस स्थिति में किया जा सकता है, जब आरोपी भारतीय साक्ष्य कानून, 1872 की धारा 105 के तहत सबूतों की प्रचुरता के द्वारा यह साबित कर सके कि उसे प्रासंगिक तथ्यों की जानकारी नहीं थी या उससे तथ्यों को समझने में भूल हुई और न तो उसका ऐसा इरादा था और न वह देख सका कि उसके कार्य का गैरकानूनी परिणाम होगा.


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ऐसी स्थितियों में न्यायालय आमतौर पर इस कल्पना के आधार पर आगे बढ़ता है कि तथ्य वे थे, जैसे आरोपी ने गलती से मान लिया था, न कि वैसे जैसे वे वास्तव में थे.

इस तरह से चिरंगी (1952) वाले मामले में एक व्यक्ति, जिसने अपने ही बेटे की हत्या गलती से यह समझकर कर दी थी कि वह दरअसल शेर को मार रहा है, को तथ्य की भूल के अपवाद का फायदा दिया गया.

तबलीगी जमात के मामले मे, इसलिए कोर्ट विश्वास किए गए तथ्य- कि ऊपरवाला उन्हें कोरोना वायरस से सुरक्षित रखेगा, जो उसकी शरण में और इबादत के लिए मस्जिद में आते हैं, पर विचार कर सकता है.

लेकिन तथ्य की भूल के अपवाद का फायदा मिलने के लिए मौलाना साद को यह साबित करना होगा कि उन्होंने ‘सद्भाव’ या ‘नेक नीयती’ (गुड फेथ) के साथ काम किया.

आईपीसी की धारा 52 ‘सद्भाव’ को परिभाषित करती है. इसमें कहा गया है कि ऐसा कोई भी काम सद्भावपूर्वक किया गया या विश्वास किया गया नहीं माना जाता है, जो समुचित सतर्कता और ध्यान के बगैर किया या विश्वास किया गया हो.

मौलाना साद ने सतर्कता और ध्यान के साथ काम नहीं किया इसलिए उनका काम ‘सद्भाव’ के अंतर्गत नहीं आता है. वास्तव में आईपीसी ‘सद्भाव’ की महज एक नकारात्मक परिभाषा देता है.

जनरल क्लाउजेज एक्ट, 1897 की धारा 3(22) ‘सद्भाव’ की एक सकारात्मक परिभाषा देता है. इसमें कहा गया है कि कोई बात सद्भाव में की गई मानी जाएगी, जब यह वास्तव में ईमानदारी के साथ की गई हो, भले यह लापरवाही के साथ की गई हो या न की गई हो.’

आईपीसी के उलट यहां ईमानदारी या सही इरादे पर जोर दिया गया है, इसलिए अगर आरोपी का इरादा सही है, तो अगर उसने लापरवाह ढंग से भी काम किया है, तो इसे सद्भाव में किया गया माना जाएगा.

नई दिल्ली का निज़ामुद्दीन मरकज इलाका. (फोटो: पीटीआई)

नई दिल्ली का निज़ामुद्दीन मरकज इलाका. (फोटो: पीटीआई)

मीडिया ने तबलीगी जमात पर लापरवाही का आरोप लगाया है और मौलाना साद को दोषपूर्ण इरादे और दोषी जानकारी वाला करार दिया है, बिना यह समझे कि लापरवाही में एक मानसिक अवस्था या मेन्स रिया (दोषपूर्ण कार्य का इरादा या उसकी जानकारी) शामिल नहीं है.

लापरवाही को आरोपी की मानसिक अवस्था के परीक्षण के बगैर साबित किया जा सकता है. किसी का दोषपूर्ण इरादा नहीं हो, मगर फिर भी उसे लापरवाही के लिए सजा दी जा सकती है.

लापरवाही क्या है? जिम्मेदारपूर्ण व्यवहार के जिस मानक का पालन करना आरोपी का कर्तव्य है, उस मानक का पालन न करना लापरवाही है.

लापरवाही के लिए जवाबदेही उपयोगितावादी तर्क पर आधारित है- यह एक तर्कशील या आम बुद्धिमान व्यक्ति के तौर पर आचरण करने की नाकामी है.

यह एक अलग बात है कि कानून में यह साधारण समझदार व्यक्ति सड़क पर चलता हुआ कोई व्यक्ति नहीं है बल्कि एक ऐसा शख्स है, जिससे सचेत, आदर्श, संयमी और अनुकरणीय व्यक्ति होने की उम्मीद की जाती है.

अफसोस की बात है कि इस पूरे प्रकरण में मौलाना साद अनुकरणीय व्यक्ति के तौर पर सामने नहीं आए हैं.

वे जिस व्यक्ति के तौर पर सामने आए हैं, उसने न सिर्फ अपना जीवन, बल्कि अपने सलाहकारों, अनुयायियों और व्यापक मानवता का जीवन खतरे में डाल दिया है.

साथ ही इस क्रम में तबलीगी जमात के मकसद को ऐसा नुकसान पहुंचाया, जिसकी कोई भरपाई नहीं की जा सकती है.

कानून को अपना रास्ता लेने देना चाहिए. जहां तक मौलाना साद का सवाल है, तो उन्हें खुद सामने आना चाहिए और पुलिस के सामने आत्मसमर्पण करना चाहिए.

कानून के राज वाले समाज में हर व्यक्ति को कानून की समुचित प्रक्रिया में यकीन होना चाहिए. मौलाना साद की जवाबदेही पर फैसला निष्पक्ष मुकदमे के द्वारा होना चाहिए.

हमारी आपराधिक न्याय प्रणाली में हर आरोपी को तब तक निर्दोष माना जाता है, जब तक कि इसके उलट साबित न हो जाए.

अगर अभियोजन की कहानी के दो रूप संभव हैं, जिसमें से एक आरोपी के पक्ष में हो और दूसरा अभियोजन के पक्ष में, तो कहानी के पहले वाले रूप को स्वीकार किया जाना होता है.

जो भी हो, एक व्यक्ति या सात अन्य की आपराधिक जवाबदेही का विस्तार पूरे मुस्लिम समुदाय तक नहीं किया जा सकता है.

सच्चा आपराधिक कानून राज्य का औजार होता है, लेकिन आदर्श रूप में इसका इस्तेमाल कभी भी जवाबी कार्रवाई के तौर पर या सरकारी फैसलों की नाकामी को छिपाने या फैसले लेने में की गई बेवजह की देरी पर लीपापोती करने के लिए नहीं किया जाना चाहिए.

अभूतपूर्व संकट का सामना करने में हमारी मदद हमारी एकता ही करेगी. किसी समुदाय को खलनायक के तौर पर पेश करने से यह लड़ाई मजबूत नहीं होगी.

कुछ लोगों की गलती के कारण व्यापक मुस्लिम समुदाय का बहिष्कार या उनका उत्पीड़न करना न सिर्फ अनुचित होगा, बल्कि अनैतिक और गैर कानूनी भी होगा.

फैज़ान मुस्तफा नालसार यूनिवर्सिटी ऑफ लॉ, हैदराबाद के वाइस चांसलर हैं.

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