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क्या समाज के लिए मज़दूर सीमेंट, ईंट और गारे की तरह संसाधन मात्र हैं?

मज़दूरों के हित निजी संपत्ति के मालिकों के हितों पर ही निर्भर हैं. सरकार सामाजिक व्यवस्था भी उन्हीं के लिए कायम करती है. अंत में यही कहा जाएगा कि उसने रेल भी मज़दूरों के हित में रद्द की हैं, उन्हें रोज़गार देने के लिए!

Thane: Migrant workers from Lucknow walk along Mumbai-Nashik highway to reach their native places, during a nationwide lockdown in the wake of coronavirus, in Thane, Wednesday, April 29, 2020. (PTI Photo/Mitesh Bhuvad) (PTI29-04-2020_000060B)

(फोटो: पीटीआई)

यह आज हमें तय करना ही पड़ेगा कि हम इंसानियत या इस सरकार में से एक को चुनें. सरकार कर्नाटक की है, लेकिन क्या केंद्र सरकार को बरी किया जा सकता है?

दूसरे, हमें यह भी तय करना पड़ेगा कि क्या हम मजदूर को सिर्फ उत्पादन का एक साधन या संसाधन मानते हैं या इंसान के तौर पर उससे रिश्ता बनाने को तैयार हैं?

कर्नाटक से श्रमिकों को उनके गृह प्रदेश ले जाने वाली रेलगाड़ियों को रद्द करने के कर्नाटक सरकार के फैसले पर अगर समाज खामोश रहता है तो उसे क्या कहा जाए?

पिछले 40 दिन से भी ज्यादा से हजारों-लाखों मजदूर किसी तरह समाज की दया के बल पर सरकार की असंवेदनशीलता झेलते रहे और इसका इंतजार करते रहे कि तालाबंदी में ढील मिलते ही पहले मौके पर वे अपने अपने घर लौटें, जहां उनके अपने हैं.

ठीक है कि जहां उनके घर हैं, वहां काम नहीं है और इस वजह से वे हजारों किलोमीटर दूर आकर कम खोजने पर मजबूर हैं. लेकिन इसका यह मतलब यह कतई नहीं है कि वे इस काम के स्रोत मात्र हैं और काम के मालिकों के लिए सीमेंट, ईंट और गारे की तरह के संसाधन मात्र हैं.

चूंकि उनकी जरूरत कर्नाटक की सड़कों, इमारतों के लिए है, उन्हें उनके घर नहीं जाने नहीं दिया जा सकता. कर्नाटक सरकार ने बड़ी ही ढिठाई से यह तर्क देकर उन्हें कैदी बना लिया है.

केंद्र सरकार ने जब बिना किसी चेतावनी के देशव्यापी तालाबंदी का ऐलान कर दिया तो ये सारे मजदूर कैद हो गए. काम ठप्प था और ये प्रायः असंगठित क्षेत्र में काम करने वाले लोग थे.

ये हमारे आपके या सरकार के रहमोकरम पर दिन काटने वाले परजीवी नहीं. दिनभर हाड़तोड़ मेहनत करके अपनी रोटी कमाना ये जानते हैं. लेकिन तालाबंदी के बाद काम नहीं रह गया.

मेहनत इनके शरीर में है लेकिन काम पर तो इनकी मिल्कियत नहीं. सो, तालाबंदी के बाद जब काम का जरिया नहीं रहा तो इनकी रोटी भी बंद हो गई.

फिर इनके लिए बची राहत… उसके लिए समाज के दिल में रहम का जगना जरूरी था. किसी तरह दो जून किसी भी किस्म का खाना, जिसे वे तय नहीं कर सकते थे, उनके लिए काफी माना गया.

सर्वोच्च न्यायालय ने भी कहा कि जब सरकार उन्हें खाना दे ही रही है, तो अलग से उन्हें पैसे या तनख्वाह की क्या जरूरत? मजदूरों की तनख्वाह के इंतजाम की अर्जी लेकर उसका दरवाजा खटखटाकर तंग करने पर अदालत खफा भी हुई.

जब मजदूरों ने यह देख लिया कि उन्हें ईंट-गारे से अधिक कुछ नहीं माना जाता, तो वे उस ठिकाने को निकले जहां वे इंसानी रिश्ता महसूस करते हैं.

लेकिन उन्हें धकेलकर वापस कर दिया गया क्योंकि समाज को अपनी सेहत की फिक्र थी और इन मजदूरों के आने-जाने से उसे वायरस के संक्रमण की आशंका थी.

अब 40 दिन गुजर जाने के बाद और चौतरफा हाहाकार के बाद और उससे भी ज्यादा इन मजदूरों से पीछा छुड़ाने के लिए बिना रुपये-पैसे के इन्हीं मजदूरों से किराया लेकर रेल चलाने का निर्णय लेने के बाद यह कहा गया कि सरकार मेहरबान है.

लेकिन एक ही दिन बाद सरकार ने अपनी मेहरबानी वापस ले ली, जब कॉन्फेडरेशन ऑफ रियल एस्टेट डेवलपर्स ऑफ इंडिया के प्रतिनिधियों ने सरकार से मिलकर कहा कि अगर मजदूर चले गए तो उनका धंधा कैसे चलेगा.

सरकार ने कहा कि राज्य में संक्रमण का खतरा कम है और बेकार ही मजदूर यात्रा क्यों करें!

यानी मजदूर इस समाज का गुलाम है क्योंकि मजदूर की तो सिर्फ देह है और उस देह में श्रम है. श्रम सामाजिक संपत्ति है. समाज के माध्यम से ही उसमें मूल्य पैदा होता है.

उसके अलावा न उसका कोई मन है, न वह एक संवेदना तंत्र है. उसकी देह के इस गुण पर भी उसका अधिकार नहीं है.

कार्ल मार्क्स ने गोथा कार्यक्रम की आलोचना में यही कहा था कि समाज को सबसे ऊपर रखने का मतलब यह है कि मजदूर पर पहला दावा सरकार और उससे जुड़ी हर संस्था का हो जाता है क्योंकि सरकार ही तो है जो सामाजिक व्यवस्था बनाए रखती है.

सरकार के बाद निजी संपत्ति के अलग-अलग तरह के मालिकों का दावा उन पर हो जाता है क्योंकि आखिर ये ही तो समाज की नींव हैं.

मजदूरों के हित निजी संपत्ति के मालिकों के हितों पर ही निर्भर हैं. सरकार सामाजिक व्यवस्था भी उन्हीं के लिए कायम करती है. अंत में यही कहा जाएगा कि उसने रेल भी मजदूरों के हित में रद्द की है, उन्हें रोजगार देने के लिए.

समाज के लिए उपयोगी होना जरूरी है या घर जाकर खाली वक्त काटना! यह फिर सरकार के इस फैसले के पक्ष में कहा ही जाएगा.

मार्क्स ने यही तो गोथा कार्यक्रम की आलोचना में कहा था कि ‘इंसान को सिर्फ कामगार की तरह देखना जैसे उनमें श्रम के अलावा कुछ और नहीं और बाकी सबको नज़रअंदाज करना,’ यह स्वीकार्य नहीं.

क्या हम भी महामारी का बहाना लेकर सरकार को इन मजदूरों पर कब्जा करते हुए खामोश देखते रहेंगे?

(लेखक दिल्ली विश्वविद्यालय में पढ़ाते हैं.)