भारत

मीडिया बोल, एपिसोड 03: भारतीय मीडिया में दलित पत्रकार कहां हैं?

मीडिया बोल की तीसरी कड़ी में वरिष्ठ पत्रकार उर्मिलेश, जेएनयू में समाजशास्त्र के प्रोफेसर विवेक कुमार और वरिष्ठ पत्रकार तवलीन सिंह के साथ मीडिया में दलित पत्रकारों की स्थिति पर चर्चा कर रहे हैं.

  • Innusa Pathan

    तवलीन जी ने आरक्षण के मुद्दे को पत्रकारिता मे दलितोंके कम प्रतिनिधित्व से क्यों जोड़ा ये मेरे समझ मे नही आया। तवलीन जी की जड़ें पिछड़े तबके से कटी हूयी है।

  • govind rajarwal

    आज की यह डिस्कशन निसंदेह बहुत अच्छा था, क्योंकि इसमें वरिष्ठ पत्रकार उर्मिलेश जी ने जो प्रश्न उठाया, वह इस बात को पुष्ट करता है कि बहुजन समाज के लोग सदियों से अपनी पीढ़ा, दर्द एवं व्यथा को किसी के समक्ष प्रस्तुत नहीं कर सकें और वर्तमान में भी यही घट रहा है. मुख्यधारा का मीडिया आज भी बहुजन समाज के ऊपर हो रहे अत्याचारों को नहीं दिखाता है, जो यह स्पष्ट करता है कि ये लोग अब भी मनुवादी एवं सामंतवादी सोच में लिप्त है. इनकी मानसिकता बहुत जातिवादी है. यह अब भी बहुजनों को उनके अधिकारों को प्राप्त करने से दूर रखना चाहते है. किन्तु बहुजन समाज के लोग धीरे-धीरे अपनी सामर्थ्यता को प्रदर्शित कर रहे है. माफ़ कीजियेगा सर यह बात मैं बिना किसी पूर्वाग्रह से ग्रसित होकर लिख रहा हूँ, निसंदेह प्रो. विवेक कुमार ने आज के विषय पर अपनी बात स्पष्टता से रखी है. क्योंकि उन्होंने उस पीड़ा, दर्द एवं कष्ट झेला है. इसलिए उनके शब्दों से वह मुखर भी हो रहा था किन्तु वही पैनल में दूसरी ओर वरिष्ठ पत्रकार तवलीन जी को वास्तव में पता ही नहीं है कि आरक्षण का बहुजन समाज के लोगों के उद्धार में कितना योगदान है? या तो वे इसे जानबूझकर ऐसा बोल रही थी या फिर वे भी उसी मनुवादी सोच से ग्रसित है. आज की बहस में वे किसी भी बिंदु को अच्छे से स्पष्ट नहीं कर पायी.
    बहरहाल उर्मिलेश जी को एवं उनकी पूरी टीम को बहुत-बहुत साधुवाद इस तरह के विषय पर बहस करवाने के लिए….