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अदालतों ने मौत की सज़ा के अधिकतर फ़ैसले ‘समाज के सामूहिक विवेक’ के आधार पर लिए: रिपोर्ट

अपराध सुधार के लिए काम करने वाले एक समूह के अध्ययन में सामने आया है कि दिल्ली की निचली अदालतों द्वारा साल 2000 से 2015 तक दिए गए मृत्युदंड के 72 फीसदी फ़ैसले समाज के सामूहिक विवेक को ध्यान में रखते हुए लिए गए थे.

(फोटो: रॉयटर्स)

(फोटो: रॉयटर्स)

अपराध सुधारों के लिए काम करने वाले एक समूह प्रोजेक्ट 39ए के एक अध्ययन में सामने आया है कि दिल्ली के ट्रायल कोर्ट द्वारा साल 2000 से 2015 तक दिए गए सजा-ए-मौत के 72 फीसदी फैसले लेने में ‘समाज के सामूहिक विवेक’ को एक महत्वपूर्ण कारक के तौर पर लिया गया था.

अध्ययन के मुताबिक, ऐसा ही महाराष्ट्र में भी हुआ, जहां इसी दौरान 42% और मध्य प्रदेश में 51% मामलों में इस तथ्य ने प्रभावी भूमिका निभाई थी.

इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के अनुसार, निचली अदालतों द्वारा मृत्युदंड देने के मामलों के अध्ययन के लिए प्रोजेक्ट 39ए के कार्यकारी निदेशक और एनएलयू दिल्ली के असिस्टेंट प्रोफेसर डॉ. अनूप सुंदरनाथ की अगुवाई में एक टीम ने दिल्ली, मध्य प्रदेश और महाराष्ट्र के ट्रायल कोर्ट द्वारा दिए गए ऐसे 215 फैसलों को देखा है.

इन तीनों राज्यों को चुनने का कारण इनका मृत्युदंड देने वाले राज्यों की सूची में अग्रणी होना था, साथ ही निचली अदालतों के ये फैसले अधिकांश समय ऊपरी अदालतों- हाईकोर्ट या सुप्रीम कोर्ट द्वारा पलट दिए गए थे.

1983 के मच्छी सिंह और अन्य बनाम पंजाब सरकार मामले में पहली बार सुप्रीम कोर्ट ने मृत्यदंड देने के लिए तैयार रूपरेखा में ‘सामूहिक विवेक’ को शामिल किया था और पांच श्रेणियां बनाई थीं, जहां ‘समुदाय चाहता है कि क़ानूनी ताकत रखने वाले मौत की सज़ा सुनाएं क्योंकि सामूहिक तौर पर वे पर्याप्त रूप से नाराज है.’

अध्ययन में पाया गया कि ‘ऐसे मामलों में अदालत का मानना था कि अपराध इतना जघन्य था, जिसने समाज के सामूहिक विवेक को हिलाकर रख दिया, और इसलिए अपराधियों को कानून में मौजूद सबसे कड़ी सजा मिलनी चाहिए.’

112 ऐसे मामले, जहां अदालत के फैसलों को सामूहिक विवेक ने प्रभावित किया था, उनमें से 63 में इसके अलावा किसी और न्यायोचित कारक को नहीं माना गया.

1980 में बचन सिंह बनाम पंजाब सरकार मामले में सुप्रीम कोर्ट ने ऐसे मामलों के लिए जहां मौत की सजा दी गई है, के लिए तैयार की गई रूपरेखा में ‘रेयरेस्ट ऑफ रेयर’ (दुर्लभतम) को जोड़ा, ऐसा सिद्धांत जो मृत्युदंड देने के मामलों में सीमित रवैये की पैरवी करता है.

बचन सिंह मामले में निचली अदालतों को अपराध और अपराध की स्थिति का आकलन करना था, साथ ही सुधार की संभावना और उम्र कैद के विकल्प के बारे में भी सोचना था.

जहां बचन सिंह मामले में दोषसिद्धि के बाद सजा सुनाने के प्रासंगिक बिंदुओं को सुनने के लिए अलग सुनवाई की जरूरत थी, प्रोजेक्ट 39ए के अध्ययन के अनुसार दोष साबित होने वाले दिन पर ही सजा सुनाने का चलन काफी अधिक है- ऐसे 44 फीसदी मामले पाए गए, जहां आरोप साबित हो जाने वाली सुनवाई में ही सजा भी सुनाई गई.

अध्ययन में कहा गया है, ‘एक ही दिन सजा सुनाने पर उसी दिन की गई बहस और तर्कों की गुणवत्ता पर स्पष्ट प्रभाव पड़ता है जो आखिर में अदालत के सामने पेश की जाती हैं.’

जैसा कि फैसलों के आधार पर पता चलता है, बचाव पक्ष के वकीलों के द्वारा दी दलीलों के बेअसर होने का कारण यह भी है कि ऐसे मामलों में जहां कई आरोपी हैं, वहां व्यक्तिगत बहस हुई ही नहीं है.

तीन राज्यों के 52 मामलों में, जहां कई आरोपी थे, वहां केवल नौ मामलों में एक-एक दोषी की अलग-अलग परिस्थितियों को लेकर बहस हुई थी.

इस अध्ययन में यह भी बताया गया है कि मौत की सजा देने के लिए निचली अदालतें अधिकतर समय गंभीर परिस्थितियों [Aggravating Circumstances] पर ही निर्भर थीं.

मध्य प्रदेश में कुल 82 मामलों में 51 के फैसले देते समय कम गंभीर परस्थितियों [Mitigating Circumstances] के बारे में विचार ही नहीं किया गया था. महाराष्ट्र में 90 में से 41 मामलों में ऐसा हुआ था, वहीं दिल्ली में कुल 43 में से 18 मामलों में यही हुआ था.

संयोग से, दिल्ली में साल 2000 से 2013 तक निचली अदालतों द्वारा दिए गए सजा-ए-मौत के 80 मामलों में से 60 फीसदी को ऊपरी अदालतों द्वारा या तो आरोपी को बरी किया गया या फिर दिल्ली हाईकोर्ट द्वारा सजा तय की गई.

महाराष्ट्र में इसी दौरान निचली अदालतों ने 120 मामलों में मृत्युदंड दिया, जिसमें से आधों को बाद में बॉम्बे हाईकोर्ट ने या तो आरोपमुक्त किया या अलग सजा तय की.

रिपोर्ट के लेखकों का कहना है, ‘जब इस रिपोर्ट के बारे में योजना बनाई थी, तब मध्य प्रदेश के सटीक आंकड़े उपलब्ध नहीं थे. हालांकि हमने एक ट्रेंड पर ध्यान दिया है, खासकर यौन उत्पीड़न के मामलों में, जहां हाईकोर्ट द्वारा अल्पकालिक सुनवाई और त्वरित कार्यवाही की गई.’