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लॉकडाउन: भुखमरी के कगार पर पहुंच चुके बंगाल जूट मिल मज़दूरों की आपबीती

विशेष रिपोर्ट: विभिन्न कारणों से जूट मिलों में आए दिन तालाबंदी से ये मज़दूर वैसे ही परेशान थे, फिर भी किसी तरह जी रहे थे, लेकिन कोरोना वायरस की वजह से अचानक हुए लॉकडाउन के कारण मिलों की मशीनें जब खामोश हो गई हैं तो मजदूरों के सामने दाना-पानी का संकट पहाड़ की तरह खड़ा हो गया है.

पश्चिम बंगाल के नैहट्टी जूट मिल में लगा ताला. (सभी फोटो: उमेश कुमार राय)

पश्चिम बंगाल के नैहट्टी जूट मिल में लगा ताला. (सभी फोटो: उमेश कुमार राय)

‘लॉकडाउन के कारण जूट मिल (चटकल) बंद होने से बहुत-बहुत मुश्किल में हैं… क्या बताएं आपको… अगले 10-15 दिन में हम लोग भुखमरी के कगार पर जाने वाले हैं.’

45 साल के कृष्णा दास जब फोन पर ये बातें कहते हैं, तो वह बार-बार ‘बहुत’ शब्द पर जोर देकर लॉकडाउन के दौरान सामने आईं कठिनाइयों की भयावहता को महसूस कराना चाहते हैं.

कृष्णा दास पश्चिम बंगाल के उत्तर 24 परगना जिले के नैहट्टी में रहकर यहां के जूट मिल में काम करते हैं. वह अपने कुनबे में तीसरी पीढ़ी के हैं, जो नैहट्टी जूट मिल में काम करते हैं. एक समय उनके दादा-दादी यहां काम किया करते थे. फिर उनके पिताजी ने इस मिल में काम करना शुरू किया और 17 साल की उम्र में उन्होंने जूट मिल का लूम पकड़ा.

कृष्णा दास मूल रूप से बिहार के वैशाली के रहने वाले हैं, लेकिन उनके पिता नैहट्टी जूट मिल में काम करते थे, तो उनका बचपन नैहट्टी में ही गुजरा. जूट मिल में काम करते हुए उन्हें 28 साल हो चुके हैं.

वह बताते हैं, ‘जूट मिलें बंद तो पहले भी होती थीं, लेकिन तब हमें पता होता था कि जूट मिल बंद होने वाली है. हम इसके लिए तैयार रहते थे. फिर ऐसा भी होता था कि जूट मिल बंद हो जाती, तो कुछ दिन के लिए हम लोग दूसरी मिल में या कोई दूसरा काम कर लेते थे.’

कृष्णा आगे कहते हैं, ‘यह लॉकडाउन अचानक हो गया. हमें जरा भी अंदाजा नहीं था. लॉकडाउन है, तो दूसरे काम भी बंद हैं. हालत बहुत खराब है. जो राशन-पानी था, खत्म हो रहा है.’

पश्चिम बंगाल में जूट उद्योग की शुरुआत 17वीं शताब्दी में हुई थी. वर्ष 1850 के बाद इस उद्योग का व्यापक विस्तार हुआ. बंगाल से जूट का निर्यात यूरोप तक होने लगा था. हालांकि तब सिर्फ कच्चे जूट का निर्यात हुआ करता था और ये काम ईस्ट इंडिया कंपनी ही किया करती थी.

बाद में भारत में ही जूट मिलें खुलने लगीं. चूंकि बंगाल में जूट की खेती सबसे ज्यादा होती थी और हुगली नदी के किनारे कोलकाता बसा है, तो जूट से तैयार माल जलमार्ग से विदेशों में भेजना आसान था, तो जूट के कारोबारियों के लिए कोलकाता के आसपास जूट मिल स्थापित करना मुफीद लगा.

इन जूट मिलों में ही कई सारे पावरलूम लगे होते हैं.

देश की पहली जूट मिल कोलकाता से 25 किलोमीटर दूर हुगली ज़िले के रिसड़ा में जार्ज ऑकलैंड ने खोली और उसी के नाम पर इस जूट मिल को ऑकलैंड जूट मिल कहा जाने लगा. इसके बाद हुगली नदी के किनारे एक के बाद जूट मिलें खुलने लगीं. वर्ष 1939 तक बंगाल में 68,377 पावर लूम चलते थे.

उस दौर में जूट मिलों में काम करना शान की बात होती थी. 70 के दशक तक जूट उद्योग खूब फूला-फला, लेकिन इसके बाद इस उद्योग के दुर्दिन शुरू हो गए.

जूट मिलों में लॉक आउट और कार्यस्थगन की नोटिस बहुत आम बात हो गयी थी. कई जूट मिलें बंद स्थायी तौर पर बंद कर दी गईं तो कुछ में एक नियमित अंतराल पर तालाबंदी होने लगी. पिछले 22 सालों में 14 जूट मिलें बंद हो चुकी हैं.

पश्चिम बंगाल इंडस्ट्रियल डेवलपमेंट कॉरपोरेशन के मुताबिक, पश्चिम बंगाल में फिलहाल 59 जूट मिलें हैं, जिनमें 39,733 पालरलूम लगे हैं. फिलहाल, इनमें से 54 जूट मिलें चल रही हैं, जिन पर ढाई लाख परिवार निर्भर है.

जूट मिलों में आए दिन तालाबंदी से ये मजदूर वैसे ही परेशान थे, मगर फिर भी किसी तरह जी रहे थे, लेकिन कोरोना वायरस की वजह से अचानक हुए लॉकडाउन के कारण जूट मिलों की मशीनें जब खामोश हो गई हैं तो मजदूरों के सामने दाना-पानी का संकट पहाड़ की तरह खड़ा हो गया है.

किसी तरह कर्ज लेकर वे अभी गुजारा कर रहे हैं, लेकिन कब तक कर पाएंगे, उन्हें खुद पता नहीं है.

कृष्णा दास अब तक 8000 रुपये कर्ज ले चुके हैं.

उन्होंने कहा, ‘कुछ दिन पहले 8000 रुपये कर्ज लिया था. वो पैसा खत्म हो चुका है. पिछले दिनों हम लोगों ने आंदोलन किया तो मिल प्रबंधन ने 22 अप्रैल को 4000 रुपये एडवांस दिया था. मेरा पांच लोगों का परिवार है. खर्च ज्यादा होता है. एडवांस में मिला पैसा भी खत्म हो गया है.’

बिहार में हाजीपुर के रहने वाले 40 वर्षीय विनोद सिंह साल 2003 से ही नैहट्टी जूट मिल में काम कर रहे हैं.

उन्होंने कहा, ‘मेरे पिताजी जूट मिल में काम करते थे तो मैं भी इसी में काम करने लगा. मैंने कभी सोचा नहीं था कि ऐसा दिन कभी आएगा.’

विनोद सिंह के घर का चूल्हा भी कर्ज के पैसे से जल रहा है. वह कहते हैं, ‘हालत बहुत खराब है. इधर-उधर से कर्ज लेकर घर चला रहे हैं, लेकिन अब लोगों ने कर्ज देना भी बंद कर दिया है. मिल बंद है, इसलिए दिनभर घर में बैठा रहता हूं.’

पश्चिम बंगाल का हुकुमचंद जूट मिल.

पश्चिम बंगाल का हुकुमचंद जूट मिल.

वे कहते हैं, ‘समझ में नहीं आ रहा क्या करूं. किसी से कोई मदद नहीं मिल रही है. फैक्टरी की तरफ से स्टाफ क्वार्टर मिला हुआ है तो किराया नहीं देना पड़ रहा है, वरना और भी दिक्कत होती. ट्रेन वगैरह चलती, तो गांव चला जाता.’

जूट मिल मजदूरों को राहत देने के लिए केंद्र और पश्चिम बंगाल का रवैया बेहद उदासीन रहा है. केंद्र सरकार को लॉकडाउन के चलते बंद जूट मिलों की याद तभी आई, जब उसे लगा कि रबी फसल की कटाई के बाद अनाज को गोदाम रखने के लिए भारी संख्या जूट के बोरों की जरूरत पड़ेगी.

बीते 14 अप्रैल को केंद्रीय टेक्सटाइल मंत्रालय ने बंगाल सरकार को पत्र लिखकर कहा था कि वह जूट मिलों को आदेश दे कि सोशल डिस्टेंसिंग का पालन करते हुए मिल मालिक जूट बैग बनवाना शुरू करें.

टेक्सटाइल मंत्रालय ने 18 जूट मिलों में उत्पादन शुरू करने को कहा था, लेकिन पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने कहा था कि सिर्फ 18 जूट मिलों को खोलने की इजाजत देना पक्षपातपूर्ण होगा, इसलिए उन्होंने सभी जूट मिलों में 15 फीसदी मजदूरों के साथ 20 अप्रैल से उत्पादन शुरू करने की अनुमति दे दी.

पश्चिम बंगाल सरकार के आदेश के बावजूद जूट मिल मालिकों ने जूट मिलों का ताला नहीं खोला. जूट मिल मालिकों के संगठन इंडियन जूट मिल एसोसिएशन (इज्मा) के डायरेक्टर जनरल देवाशीष रॉय का कहना है कि एक मिल में 28 तरह की मशीनें होती हैं, जिन्हें 15 प्रतिशत श्रमिकों के बूते चलाना मुमकिन नहीं है.

उन्होंने कहा है कि सोशल डिस्टेंसिंग व अन्य शर्तों को मानते हुए वे शत-प्रतिशत कर्मचारियों के साथ मिल खोलने को तैयार हैं, लेकिन इसे लेकर अभी सरकार और जूट मिल मालिकों में आम सहमति नहीं बन पाई है. लिहाजा लॉकडाउन खत्म होने तक जूट मिल खुलने के आसार नजर नहीं आ रहे हैं.

पिछले दिनों प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने वीडियो संदेश में कंपनियों से अपील की थी कि वे लाकडाउन अवधि में कर्मचारियों का वेतन न काटें, लेकिन इस अपील को भी अमलीजामा नहीं पहनाया जा सका है. किसी भी जूट मिल के मालिक ने लॉकडाउन अवधि की तनख्वाह नहीं दी है. अलबत्ता एक-दो जूट मिलों ने कुछ एडवांस दिया है.

47 वर्षीय मनोज साव उत्तर 24 परगना के हुकुमचंद जूट मिल में काम करते हैं. उन्होंने कहा, ‘मोदीजी ने कहा था कि लॉकडाउन में कर्मचारियों का पैसा नहीं काटा जाए, लेकिन इस पर कोई बात नहीं कर रहा है. न जूट मिल मालिक और न सरकार.’

साव कहते हैं, ‘कर्ज लेकर घर चला रहे हैं. अभी तक 10 हज़ार रुपये कर्ज ले चुके हैं. एडवांस के रूप में 4000 रुपये मिले हैं, लेकिन 6 सदस्यों के परिवार में 4000 रुपए कितने दिन चलेगा. तिस पर भी ये एडवांस जूट मिल खुलने पर काम करके चुकाना पड़ेगा.’

वे आगे कहते हैं, ‘जूट मिल में 530 रुपये दिहाड़ी मिलता है. अगर जूट मिल मालिक उसका आधा भी दे दे, तो हम लोग लाकडाउन झेल लेंगे.’

मनोज साव 1994 से जूट मिल में काम कर रहे हैं. उन्होंने कहा, ‘शुरू में लगा था कि जूट मिल की नौकरी अच्छी है, लेकिन अब लगता है कि मैंने गलती कर दी. कोई और नौकरी कर लेता तो ठीक था.’

जूट मिल श्रमिकों के अधिकारों के लिए आंदोलन कर रहे श्रमिक वर्ग नागरिक अधिकार रक्षा समिति के सचिव अजय सिंह ने कहा, ‘जूट उद्योग एक लावारिस उद्योग बन गया है. किसी को भी इसकी फिक्र नहीं है. यही हाल जूट मिलों के श्रमिकों का भी है. उन्हें राहत देने की बात कोई नहीं कर रहा है, सभी राजनीति करने में लगे हुए हैं.’

लॉकडाउन की अवधि की तनख्वाह नहीं देने को लेकर पश्चिम बंगाल की डेढ़ दर्जन श्रमिक यूनियनों ने जूट मिल मालिकों के खिलाफ अलग-अलग थानों में आवेदन देकर एफआईआर दर्ज करने की अपील की है.

नैहट्टी जूट मिल के मालिक के खिलाफ नैहट्टी जूट मिल में दिए गए आवेदन में कहा गया है, ‘कोरोना वायरस महामारी के मद्देनजर केंद्र और राज्य सरकार ने कहा है कि लाकडाउन के दौरान कामगारों की तनख्वाह न काटी जाए, लेकिन नैहट्टी जूट मिल प्रबंधन इसकी अनदेखी कर रहा है, इसलिए श्रमिक यूनियनों की तरफ से अपील की जाती है कि प्रबंधन के खिलाफ एफआईआर दर्ज की जाए.’

मिल मजदूरों की तनख्वाह के सवाल पर इज्मा के चेयरमैन राघवेंद्र गुप्ता कहते हैं, ‘लाॅकडाउन के चलते जूट मिलों के बंद हुए दो महीना होने को है. हमारे पास उतनी आर्थिक क्षमता नहीं है कि हम लोग मजदूरों की तनख्वाह दें सकें. हालांकि इसको लेकर हम लोग बंगाल सरकार से बात कर रहे हैं.’

बंगाल चटकल मजदूर यूनियन के सचिव अनादि साहू ने कहा, ‘मिल मजदूरों के की तनख्वाह के सवाल पर सरकार और फैक्टरी मालिक दोनों खामोश हैं. हम लोगों ने थानों में आवेदन दिया है. अगर मजदूरों को पैसा नहीं मिला, तो आंदोलन के रास्ते पर जाएंगे.’

(लेखक स्वतंत्र पत्रकार हैं.)