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दिल्ली विश्वविद्यालय के ओपन बुक एग्जाम मोड का विरोध क्यों हो रहा है?

दिल्ली विश्वविद्यालय ने घरेलू परीक्षाओं को ‘ओपन बुक एग्जाम’ मोड में लेने के निर्देश दिए हैं, जिसके लिए तकनीकी संसाधन अनिवार्य हैं. लेकिन असमान वर्गों से आने वाले छात्रों के पास ये संसाधन हैं, यह कैसे सुनिश्चित किया गया? अगर विश्वविद्यालय ने उन्हें दाखिले के समय लैपटॉप या स्मार्ट फोन मुहैया नहीं करवाया तो वह इनके आधार पर परीक्षा लेने की बात कैसे कर सकता है?

(फाइल फोटो: रॉयटर्स)

(फाइल फोटो: रॉयटर्स)

कोरोना के बाद की शिक्षा की स्थितियों पर अभी विस्तार से कुछ नहीं कहा जा सकता. आने वाले समय में पठन-पाठन के माध्यमों में किस तरह के बदलाव देखने को मिलेंगे, यह वक्त ही बताएगा.

भारत जैसे विकासशील देश में यह एक बड़ी चुनौती के रूप में हमारे सामने मौजूद है. इससे निबटने के तमाम उपायों पर लगातार बहस जारी है.

फिलहाल जो बात है वह यह कि देश का प्रतिष्ठित दिल्ली विश्वविद्यालय (डीयू) अभी तक प्रवेश परीक्षा ही ऑनलाइन माध्यम से लेता था लेकिन कोरोना के इस दौर में उसने घरेलू परीक्षाएं भी ऑनलाइन लेने का आदेश जारी कर दिया है, जिसके बाद से ही लगातार इसके खिलाफ विरोध के स्वर दिखाई देने लगे हैं.

ट्विटर पर हजारों की संख्या में विद्यार्थी और शिक्षकों ने ‘डीयूअगेंस्टऑनलाइनएग्जाम’ हैशटैग के साथ ट्वीट कर विरोध दर्ज कराया. शिक्षक, छात्र और कर्मचारियों ने एकस्वर से इसका विरोध करना शुरू कर दिया. ऐसा क्यों हो रहा है? यह समझना बेहद ज़रूरी है.

डीयू देश के सबसे प्रतिष्ठित विश्वविद्यालयों में से एक है, भारत में पढ़ाई करने वाले अधिकतर बच्चों का सपना होता है कि वह डीयू में दाखिला पा लें, यहां से वह अपने स्वर्णिम भविष्य की नींव तैयार करता है.

चूंकि यह एक प्रतिष्ठित और केंद्रीय विश्वविद्यालय है इसीलिए देश के हर कोने के बच्चे यहां अध्ययन करते मिल जाते हैं, चाहे वह सुदूर पूर्वोत्तर भारत से हों या दक्षिण भारत से.

कोरोना महामारी के कारण जो समस्या उत्पन्न हुई है उससे पूरे देश का शैक्षणिक सत्र फिलहाल थोड़ा परिवर्तित होता हुआ नजर आ रहा है, लेकिन डीयू ने अपनी श्रेष्ठता को ध्यान में रखते हुए, शायद अन्य विश्वविद्यालयों से ऊपर बनी छवि को बरकरार रखने के लिए, घरेलू परीक्षाएं भी ओपन बुक एग्जाम मोड में लेने की बात कही है.

इसके तहत जुलाई के प्रथम सप्ताह से ऐसी परीक्षाएं शुरू हो जाएंगी. परीक्षा विभाग के डीन प्रो. विनय गुप्ता के पत्र में यह बात उल्लिखित है कि प्रश्न पत्र तैयार करने की कमेटी से संबंधित जिम्मेदार लोग 3 जून तक सभी प्रश्न पत्रों की 3-3 प्रतियां विश्वविद्यालय को भेज दें.

यदि प्रश्न पत्र के प्रारूप की बात करें, तो विश्वविद्यालय द्वारा जारी दिशानिर्देशों के अनुसार प्रत्येक प्रश्न पत्र के लिए दो घंटे का समय निर्धारित किया जाएगा, कुल छह प्रश्न होंगे, जिसमें से विद्यार्थियों को चार प्रश्न हल करने होंगेऔर उसे एक घंटे के अंदर उसे वापस भेज देना होगा.

विश्वविद्यालय में मानविकी, वाणिज्य और विज्ञान शाखा के अनेक विषयों का अध्ययन-अध्यापन होता है. प्रश्न पत्र का यह प्रारूप जो विश्वविद्यालय द्वारा निर्धारित किया गया है, मानविकी शाखा के विद्यार्थियों के अनुरूप तो ठीक ही है क्योंकि कमोबेश उनका परंपरागत प्रारूप ही यही है.

लेकिन वाणिज्य और विज्ञान शाखा के लिए यह एक ठीक प्रारूप नहीं है क्योंकि उनमें छोटे-छोटे सवालों से लेकर बड़े सवालों का प्रारूप रहा है. इस प्रकार जिस तरह के प्रारूप के साथ उन बच्चों को पढ़ाया गया था, अब उसमें एक परिवर्तन देखने को मिल रहा है.

क्या सभी छात्र इस प्रारूप के लिए तैयार हैं? अचानक इस तरह का बदलाव उनके मन में परीक्षा को लेकर एक प्रकार का भय पैदा कर देगा. साथ ही क्या परीक्षा प्रणाली में अचानक बदलाव के लिए क्या सभी अध्यापक तैयार हैं?

क्योंकि काम केवल परीक्षा लेना ही नहीं  है बल्कि उत्तर-पुस्तिका का मूल्यांकन भी करना है. इसकी क्या प्रणाली है, अध्यापकों की राय को जाने बिना ही यह निर्णय ले लिया गया. इसके अलावा जिन विषयों में प्रायोगिक परीक्षाएं होती हैं, उनके बारे में कोई भी स्पष्टीकरण नहीं दिया गया है.

फिलहाल अध्यापकों का समूह,दिल्ली विश्वविद्यालय शिक्षक संघ और तमाम छात्र संगठन एक साथ इसका कड़ा विरोध जता रहे हैं. आखिर इस तरह की परीक्षा को पूरा करा लेने की यह ज़िद क्यों है? क्या हमें कोई कोरम पूरा है? यदि वह न किया गया, तो सब गड़बड़ हो जाएगा.

देश में इसके समतुल्य अन्य भी बड़े विश्वविद्यालय हैं, लेकिन वहां इस तरह की कोई जल्दबाजी देखने को नहीं मिल रही है, तो फिर यहां यह जल्दबाजी क्यों है? इन सवालों के जवाब तलाश करने होंगे.

यदि विश्वविद्यालय के कैलेंडर को देखें तो 9 से 15 मार्च तक इस सेमेस्टर के मध्यावधि अवकाश का दौर था, ठीक इसी समय कोरोना का प्रकोप भी भारत में बढ़ता जा रहा था. 1

6 मार्च से जब विश्वविद्यालयों को खोला जाना था, तब इस प्रकोप के कारण विद्यार्थियों के लिए नहीं खोला जा सका और शिक्षकों को यह निर्देशित किया गया कि अब ऑनलाइन क्लास व अन्य माध्यमों से बच्चों के साथ जुड़कर पठन-पाठन के गतिविधि को सुचारू रूप से चलाएं.

बिना स्मार्ट फोन या लैपटॉप वाले बच्चे पढ़ाई की इस गतिविधि से पहले ही बाहर हो चुके थे. अब जिन बच्चों को पढ़ाया ही नहीं गया, उनसे भी परीक्षा लेने की बात कितनी ठीक है, इसका अनुमान स्वयं लगाइए.

एक अन्य महत्वपूर्ण बात यह कि जिस ‘ओपन बुक एग्जाम’ की बात हो रही है, सेमेस्टर की इन छुट्टियों में बहुत से विद्यार्थी घर चले गए थे और कोरोना के बढ़ते संक्रमण और असमंजस की स्थिति में वापस लौटे नहीं.

ऐसे में ज़ाहिर सी बात है कि वे अपने घर जाते समय सभी विषयों की सभी पुस्तकें ले नहीं गए होंगे, तो उनसे ओपन बुक एग्जाम किस आधार पर कराया जा सकता है?

अंत में सबसे महत्वपूर्ण सवाल यह है कि हम जिस परीक्षा प्रणाली को अपनाए जाने की बात कर रहे हैं, उस परीक्षा प्रणाली में कितने छात्र-छात्राएं शामिल हो सकते हैं?

बिना इस सवाल के उत्तर को जाने इस पूरे विषय पर बात करना बेईमानी होगी. देश के इस विश्वविद्यालय में आधे से भी अधिक विद्यार्थी अनुसूचित जाति,अनुसूचित जनजाति,अन्य पिछड़ा वर्ग,आर्थिक रूप से कमज़ोर वर्गों से ताल्लुक रखते हैं.

जिस परीक्षा प्रणाली को लागू कर हम इस परीक्षा को संचालित करने की बात कर रहे हैं, उसमें बच्चों के पास लैपटॉप, लैपटॉप न होने पर एक ठीक-ठाक स्मार्ट फोन और अच्छी गति से संचालित इंटरनेट की आवश्यता तो अनिवार्य तत्व है.

हमने यह कैसे सुनिश्चित कर लिया कि यहां पढ़ने वाले सभी विद्यार्थी इस तरह के संसाधनों से युक्त हैं? यह एक विकासशील देश हैं जहां लोग आज भी ठीक से पेट भरने के उपाय में लगे रहते हैं, क्या उन बच्चों के दाखिले के समय विश्वविद्यालय ने उन्हें कोई लैपटॉप या स्मार्ट फोन मुहैया कराया था, जिस पर आज वह इन परीक्षाओं को संचालित करने की बात कर रहा है?

इसका उत्तर है नहीं. यदि विश्वविद्यालय ने अपने स्तर पर ऐसी सुविधाएं मुहैया नहीं कराई हैं तो उसे ऐसी परीक्षा लेने का कोई अधिकार नहीं है जिसमें ये संसाधन एक अनिवार्य तत्व के रूप में शामिल हों.

दूर-दराज के ऐसे क्षेत्रों में जहां नेटवर्क की समस्या है, उनसे निबटने का क्या कोई ब्लूप्रिंट है? यदि वे समय से उत्तर न भेज पाएं तो क्या उनकी परीक्षा को निरस्त मान लिया जाएगा?

यह उन बच्चों की अन्य बच्चों के साथ असमानता को प्रदर्शित करता है जो ऐसे संसाधनों से अक्षम हैं. यह उन विद्यार्थियों के साथ क्रूर मजाक है, उनका ही नहीं बल्कि उनकी गरीबी का भी क्रूर मजाक है. हमें एक स्वर में इस व्यावहारिक समस्या को समझकर इसका विरोध करना चाहिए.

(लेखक दिल्ली विश्वविद्यालय में पढ़ाते हैं.)