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निदो तानिया मामले के एक दोषी को दिल्ली हाईकोर्ट से ज़मानत मिली

2014 में अरुणाचल प्रदेश के एक पूर्व विधायक के बीस वर्षीय बेटे निदो की दिल्ली में हत्या कर दी गई थी, जिसके चार आरोपियों को बीते साल सितंबर में दोषी मानते हुए दस और सात साल क़ैद की सज़ा सुनाई गई थी.

निदो की मौत के बाद गुवाहाटी में हुआ एक प्रदर्शन. (फाइल फोटो: पीटीआई)

निदो की मौत के बाद गुवाहाटी में हुआ एक प्रदर्शन. (फाइल फोटो: पीटीआई)

नई दिल्ली: दिल्ली उच्च न्यायालय ने जनवरी 2014 में अरुणाचल प्रदेश के एक छात्र निदो तानिया की पीटकर हत्या मामले में निचली अदालत द्वारा दोषी करार दिए गए चार लोगों में से एक को जमानत दे दी.

जस्टिस सुरेश के. कैत ने मुख्य आरोपी फरमान को दस हजार रुपये के निजी मुचलके पर तीन महीने की अंतरिम जमानत दी है.

फरमान को इस मामले में 10 साल की सजा सुनाई जा चुकी है. अदालत ने कहा कि दोषी ‘पहले ही निचली अदालत द्वारा पिछले साल सितंबर में सुनाए गए 10 साल की सजा में से सात साल की सजा काट चुका है.’

इस मामले की जांच करने वाली सीबीआई ने हालांकि इस जमानत का यह कहते हुए विरोध किया कि दोषी की नियमित जमानत याचिका उच्च न्यायालय ने 23 मार्च को खारिज कर दी थी.  आरोपी के खिलाफ गंभीर आरोप हैं और उसकी याचिका खारिज होनी चाहिए.

सितंबर 2019 में साकेत जिला अदालत ने फरमान के अलावा अन्य आरोपी पवन, सुंदर और सनी उप्पल को गैर इरादतन हत्या की धारा में दोषी ठहराते हुए सजा सुनाई थी.  अदालत ने फरमान को 10 साल कैद, पवन और सुंदर को 7-7 साल कैद तथा सनी उप्पल को 3 साल कैद की सजा गई थी.

सीबीआई ने इस मामले में सात लोगों लोगों को आरोपित किया था, जिनमें से तीन नाबालिग थे. उन पर किशोर न्याय बोर्ड द्वारा सुनवाई की गई थी.

अरुणाचल प्रदेश में कांग्रेस के पूर्व विधायक के बेटे निदो की पर 29 जनवरी, 2014 को लाजपत नगर में कुछ दुकानदारों ने उनके बाल रखने के तरीके को लेकर टिप्पणी की थी.

जिसके बाद उन सबकी बहस हुई और फिर दुकानदारों ने उनके साथ मारपीट की. इसके बाद अगले दिन एम्स के डॉक्टरों ने निदो को मृत घोषित कर दिया.

निदो की मौत के बाद देशभर में नस्लीय भेदभाव, खास तौर पर पूर्वोत्तर भारत के लोगों के साथ होने वाले भेदभाव और दुर्व्यवहार को लेकर बड़ी बहस छिड़ गई थी.

इसके बाद दिल्ली स्टेट लीगल सर्विस अथॉरिटी द्वारा उत्तर पूर्व के सात वकीलों को दिल्ली में रह रहे उत्तर-पूर्व के लोगों को मुफ्त क़ानूनी सहायता देने के लिए रखा गया था.

(समाचार एजेंसी भाषा से इनपुट के साथ)