भारत

अधिक जानलेवा बनते जा रहे हैं भू-स्खलन

भू-स्खलन ख़तरनाक है ही पर यदि बाढ़, भूकंप आदि अन्य आपदाओं को साथ मिलाकर देख जाए तो यह और भी जानलेवा हो जाते हैं, तिस पर अपनी लापरवाहियों से हमने इस संभावना को और बढ़ा दिया तो इसकी बहुत महंगी कीमत चुकानी पड़ेगी.

Landslide PTI

(फाइल फोटो: पीटीआई)

हाल ही में चीन में मात्र एक दिन में भू-स्खलन से माओशिन काऊंटी के शिनमो गांव में लगभग 100 लोग भू-स्खलन व पहाड़ टूटने से दबकर मर गए. इससे पहले बांग्लादेश के चटगांव क्षेत्र में भू-स्खलनों से मौतों का दर्दनाक सिलसिला कई दिनों तक चलता रहा.

वैसे भी नए ‘डरहम फेटल लैंडस्लाईड डेटाबेस’ के आधार पर विश्व स्तर पर यह कहा गया है कि भूस्खलन से होने वाली मौतों की संख्या पहले के अनुमानों की अपेक्षा पांच से दस गुना अधिक हैं. साल 2004 और 2010 के बीच जहां पहले विश्व में भूस्खलन से 3,000 से 5,000 मौतें मानी जाती थीं, वहां अब 32,300 मौतों का आंकड़ा दिया जा रहा है.

जिन्होंने भी किसी पहाड़ से बड़े-बड़े पत्थरों को भयंकर तेज़ी से गिरते हुए देखा है, वे जानते-समझते हैं कि यह हादसे कितने ख़तरनाक हो सकते हैं. तिस पर यदि कोई मलबे के नीचे दब ही जाए तो जानलेवा हादसे की संभावना और बढ़ जाती है. हमारे देश के पर्वतीय क्षेत्रों विशेषकर हिमालय क्षेत्र से भी भू-स्खलनों के अधिक विकट होने के समाचार मिलते रहे हैं.

कभी तवाघाट से तो कभी उत्तरकाशी से ऐसे गंभीर हादसों के समाचार मिलते रहे हैं. इसके बावजूद प्रायः उन सावधानियों की उपेक्षा की जाती है, जिनका पालन करने से भू-स्खलन की समस्या को कम किया जा सकता है.

कालका-शिमला हाईवे के फोरलेन बनने की प्रक्रिया में हाल में सावधानियों की उपेक्षा से व पेड़ों के बड़े पैमानों पर कटान से अनेक गांवों जैसे सनवारा व मंगोटी में भू-स्खलन व खेतों में दरारें पड़ने की गंभीर समस्या उत्पन्न हो गई हैं. इन भू-स्खलनों से बड़े-छोटे कई पत्थर बड़ी तेज़ी से गिरते रहे हैं व कई वाहन इस कारण दुर्घटनाओं का शिकार बने हैं.

कुछ जगह बोर्ड लगा दिए हैं कि गिरते पत्थरों से सावधान रहें पर अचानक तेज़ी से गिरते पत्थर के लिए वाहन चालक क्या करे यह स्पष्ट नहीं किया गया है. इस तरह जो मलबा सड़क पर एकत्र हो रहा है वह अधिक वर्षा की स्थिति में नीचे गांवों की ओर बहकर और तबाही मचा सकता है.

असावधानी से व नियमों को ताक पर रखकर निर्माण कार्यों से, विस्फोटकों के अधिक उपयोग से व पहले से नियोजन ठीक न होने से बहुत से नए भू-स्खलन स्थान बढ़ जाते हैं या पुराने भू-स्खलन स्थल कहीं अधिक सक्रिय हो जाते हैं. इसके अतिरिक्त अत्यधिक खनन से बहुत भयंकर भू-स्खलन आ सकते हैं, जैसे कि एक समय दून घाटी के अनेक गांवों में देखा गया था. यहां जाने पर लोगों ने बताया था कि भू-स्खलन से बड़े पत्थर गिरने के समय ऐसा लगता था जैसे गांव में बमबारी हो रही हो.

भू-स्खलन के रक्षा के बेहतर तरीके भी विकसित हो रहे हैं पर यदि पहले लापरवाही से जगह-जगह भू-स्खलन के ख़तरे को बढ़ा दिया जाए तो फिर इस तरह की बेहतर तकनीकी की सीमित भूमिका ही हो सकती है. अतः भू-स्खलन से रक्षा की पहली पंक्ति तो यह है कि अनावश्यक छेड़छाड़़ व तबाही से भू-स्खलन के ख़तरे को बढ़ने न दिया जाए.

ध्यान रहे कि भू-स्खलन अपने आप में तो ख़तरनाक है ही पर यदि बाढ़, भूकंप आदि अन्य आपदाओं को साथ मिलाकर देख जाए तो यह और भी जानलेवा हो जाते हैं. जहां भू-स्खलन पहले से अधिक हो रहे हैं, वहां निश्चित तौर पर बाढ़ और भूकंप से भी अधिक तबाही होगी. दूसरी ओर कई बार भू-स्खलन स्वयं भीषण बाढ़ का कारण भी बनते हैं. कभी-कभी वह नदी का प्रवाह रोक कर कृत्रिम झील बना देते हैं, जिसके फूटने से भयंकर बाढ़ आ सकती है.

अतः पर्वतीय विकास के नियोजन में इस ओर समुचित ध्यान देना चाहिए कि गंभीर भू-स्खलनों की संभावनाओं को न्यूनतम किया जाए तथा जहां पहले से यह संभावनाए मौजूद हैं वहां की सुरक्षा पर विशेष ध्यान दिया जाए. सभी अधिक सक्रिय व ख़तरनाक भू-स्खलन की मैपिंग होनी चाहिए ताकि उनसे सुरक्षा प्रदान करने का कार्य योजनाबद्ध ढंग से हो सके. जिन गांवों या अन्य आवास-स्थानों पर स्थिति असहनीय हद तक ख़तरनाक हो चुकी है, वहां गांववासियों के जीवन की रक्षा के लिए उनके संतोषजनक पुनर्वास की व्यवस्था होनी चाहिए.

वैसे भू-स्खलन से सुरक्षा की तकनीक ने भी अच्छी प्रगति की है, पर यदि लापरवाही भरी नीतियों, विशेषकर संवेदनशील क्षेत्रों में अनियंत्रित खनन व निर्माण कार्यों से नए भू-स्खलन क्षेत्र बनते जाएं व पुराने भू-स्खलन क्षेत्र अधिक सक्रिय होते जाएं तो फिर स्थिति केवल बेहतर तकनीक से संभल नहीं सकेगी.

जलवायु बदलाव के इस दौर में कम समय में अधिक वेग की वर्षा केंद्रित होने की संभावना वैसे भी बढ़ गई है. इस स्थिति में भू-स्खलन वैसे भी पहले से अधिक विनाशक हो सकते है. हिमालय क्षेत्र तो इस दृष्टि से बहुत ही संवेदनशील है तिस पर अपनी लापरवाहियों से हमने इस संभावना को और बढ़ा दिया तो इसकी बहुत महंगी कीमत चुकानी पड़ेगी. अतः इस संदर्भ में अब बहुत सावधानी बरतने की ज़रूरत है.

(लेखक स्वतंत्र पत्रकार हैं और अनेक सामाजिक आंदोलनों व अभियानों से जुड़े रहे हैं)

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