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पिता को साइकिल पर लेकर गुड़गांव से दरभंगा पहुंची ज्योति का ट्रायल लेगा साइकिलिंग फेडरेशन

15 साल की ज्योति कुमारी लॉकडाउन के बीच दस दिनों में क़रीब 1,200 किलोमीटर तक साइकिल चलाकर गुड़गांव से बिहार के दरभंगा में अपने गांव पहुंची थीं. साइकिलिंग फेडरेशन ऑफ इंडिया के अध्यक्ष का कहना है कि यह मामूली बात नहीं है. अगर ज्योति चाहें तो साइकिलिंग का ट्रायल देकर ट्रेनिंग ले सकती हैं.

ज्योति कुमारी. (फोटो: Special Arrangement)

ज्योति कुमारी. (फोटो: Special Arrangement)

अपने चोटिल पिता को साइकिल पर बैठाकर हरियाणा के गुड़गांव से दरभंगा अपने गांव लाने वाली 15 वर्षीय ज्योति कुमारी को साइकिलिंग प्रतियोगिता में मौका देने के लिए ट्रायल लिया जाएगा.

साइकिलिंग फेडरेशन ऑफ इंडिया के चेयरमैन ओंकार सिंह ने द वायर  को बताया कि ट्रायल को लेकर ज्योति कुमारी से गुरुवार को उनकी बातचीत हुई है. उन्होंने कहा, ‘मैंने कहा कि अगर वो चाहती है कि ट्रायल में हिस्सा ले, तो हम लोग इसका इंतजाम करेंगे. ज्योति कुमारी ने हमें बताया कि वह फिलहाल क्वारंटीन में है. क्वारंटीन खत्म होता है, वो दिल्ली आएगी.’

ज्योति कुमारी ने भी द वायर  को इसकी पुष्टि की है, ‘मैंने कहा है कि एक महीने बाद मैं दिल्ली जाऊंगी ट्रायल के लिए.’

ज्योति कुमारी ने अपने चोटिल पिता मोहन पासवान को साइकिल के पीछे कैरियर पर बिठा कर 8 मई को गुड़गांव से रवाना हुई थीं और पूरा सफर उन्होंने साइकिल से तय किया. वह 10 दिन तक साइकिल चलाकर 17 मई की रात करीब 9 बजे दरभंगा में अपने गांव सिरहुल्ली पहुंची थी.

ज्योति के पिता मोहन पासवान 26 जनवरी को गुड़गांव में एक हादसे में जख्मी हो गए थे. वह उनकी देखभाल के लिए 31 जनवरी को मां फूलो देवी के साथ गुड़गांव गई थी. फूलो देवी आंगनबाड़ी में काम करती हैं जिस कारण वह 10 दिन बाद लौट गईं और ज्योति को पिता के पास छोड़ दिया था.

ज्योति का कहना था कि पहले सबकुछ ठीक चल रहा था, लेकिन लॉकडाउन होने के बाद दिक्कत बहुत बढ़ गई थी. ज्योति ने बताया था, ‘मकान मालिक कमरे से निकालना चाह रहा था. किराया नहीं दिए थे, तो दो बार बिजली भी काट दी थी. दूसरी तरफ, चावल-आटा भी खत्म हो गया था. हम लोग खाते कहां से. पिताजी की कमाई तो बिल्कुल रुकी हुई थी, इसलिए सोचे कि किसी तरह घर चले जाएंगे.’

उनकी इस यात्रा के बारे में ओंकार सिंह कहते हैं, ‘अपने पिता को बिठाकर 7-10 दिन में 12-1300 किलोमीटर साइकिल चला लेना कोई मामूली बात नहीं है, कुछ टैलेंट तो जरूर है.’

उन्होंने आगे कहा, ‘हम लोग लंबी रेस की ट्रेनिंग देते हैं. इस रेस के लिए हम उसे ट्रेन कर सकते हैं. लेकिन पहले उसका ट्रायल होगा और अगर ट्रायल में पास हो जाएगी और हमारे मानकों में फिट बैठेगी, तो हम उन्हें अकादमी में रखेंगे और ट्रेनिंग देंगे.’

‘हमारे यहां अकादमी है. यहां बच्चों को सालभर रखते हैं और ट्रेनिंग देते हैं. खाना-पीना, रहना सब इंतजाम हम लोग करते हैं. पढ़ाई-लिखाई का भी ध्यान रखा जाता है यहां. अगर उसमें टैलेंट है तो हमलोग जरूर उसे अपने यहां रखना चाहेंगे’, उन्होंने कहा.

ज्योति में वह कितनी संभावनाएं देख रहे हैं, इस सवाल सिंह ने कहा, ‘देखिए वैसे साइकिल चलाना और प्रतियोगिता में साइकिल चलाना दो अलग बातें हैं, लेकिन ज्योति ने जो कहानी हमें बताई, उससे एक बात पक्की है कि साइकिलिंग का बुनियादी हुनर तो उसमें है. सामान्य साइकिल पर अपने पिता को बिठाकर 7 से 10 दिन में 1300 किलोमीटर दूरी नाप लेना असामान्य बात है.’

ट्रायल के संबंध में उन्होंने कहा, ‘हमारे यहां कम्प्यूटर बाइक होते हैं. उस पर हम लोग वजन वगैरह मापते हैं, इससे ये भी हमें पता चल जाता है कि किसी व्यक्ति में कितनी क्षमता है.’

ज्योति ने पिछली बातचीत में बताया था कि वे आठवीं तक पढ़ीं हैं, आगे पढ़ना चाहती थीं, लेकिन आर्थिक कारणों के चलते ऐसा हो नहीं सका. एनडीटीवी की रिपोर्ट के मुताबिक अब स्थानीय प्रशासन ने कहा है कि वे उनका नौवीं में दाखिला करवाएंगे और सरकारी योजनाओं का लाभ भी दिलवाएंगे.

इधर ज्योति को मिल रही वाहवाही से उनके पिता मोहन सिंह पासवान भी खुश हैं. वह कहते हैं, ‘मुझे बहुत खुशी हो रही है कि लोग उसके बारे में पूछ रहे हैं, उसकी तारीफ कर रहे हैं.’

‘मैंने तो पहले उसे मना किया था कि वह मुझे साइकिल पर बिठाकर गुड़गांव से दरभंगा नहीं ले जा पाएगी, लेकिन वह जिद पर अड़ गई. मुझे नहीं मालूम था कि उसकी इतनी तारीफ होगी. लोग उसे इतना सम्मान देंगे’, उन्होंने कहा.

मोहन पिछले 20 साल से गुड़गांव में ऑटो चला रहे थे, लेकिन 26 जनवरी के हादसे बाद वह बिस्तर पर पड़े हुए थे. कमाई का कोई जरिया भी नहीं था. मोहन पासवान ने कहा, ‘हम लोग वहां और कुछ दिन ठहर जाते, तो भूखे मर जाते.’

मोहन पासवान की एक बड़ी बेटी भी है, जिसकी शादी 5 साल पहले ही हो गई है और बेटे अभी छोटे हैं.

उन्होने कहा, ‘बड़ी बेटी की शादी हुई थी, तब ज्योति महज 10 साल की थी. उसी समय से वह घर के काम के लिए साइकिल से इधर-उधर आना-जाना करती थी.  साइकिल से ही बाजार से सामान वगैरह लाती थी. मेरे घर में मैं इकलौता पुरुष हूं और मैं गुड़गांव में रहता था, तो मेरी गैरमौजूदगी में ज्योति ही सब काम करती थी. खूब साइकिल चलाती थी.’

इस कष्टप्रद यात्रा के बाद ज्योति की तबीयत खराब हो गई है. लंबे समय तक साइकिल चलाने से घाव हो गए हैं.

इस सफर को लेकर मोहन कहते हैं, ‘दिन में बहुत गर्मी पड़ती थी, इसलिए हम लोग दिन में ज्यादा देर तक आराम करते थे, फिर रात में 11 बजे तक ज्योति साइकिल चलाती थी. इसके बाद हम लोग कहीं किसी पेट्रोल पंप में ठहर जाते थे. चूंकि रास्ते में बहुत सारे लोग साइकिल व पैदल चल रहे थे, इसलिए हमें किसी तरह का डर नहीं लगा.’

भारत में साइकिलिंग को खेल का दर्जा 1930 में मिला और साल 1946 में साइकिलिंग फेडरेशन ऑफ इंडिया की स्थापना हुई थी. भारत अब तक ओलंपिक गेम्स, एशिया गेम्स समेत दूसरी अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में हिस्सा ले चुका है.

भारत में साइकिलिंग के भविष्य पर ओंकार सिंह कहते है, ‘दिल्ली में हमने 4 साल पहले साइकिलिंग अकादमी शुरू की है. यहां हम 12 से 15-16 साल तक के 70 से 80 बच्चों को अंडमान निकोबार द्वीप समूह पूर्वोत्तर के राज्यों व जगहों से लेकर आए. उनमें साइकिल चलाने का हुनर बिल्कुल नहीं था. हमलोग कई अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में पदक जीत चुके हैं.  अभी जूनियर साइकिलिंग में भारत विश्व चैंपियन है. हमारा फोकस 2024 में होने वाले ओलंपिक खेलों पर है.’

(लेखक स्वतंत्र पत्रकार हैं.)