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क्या गोरक्षा के नाम पर हिंसा करने वाले प्रधानमंत्री की भी नहीं सुन रहे?

जिस दिन प्रधानमंत्री ने बयान दिया कि गाय और गोरक्षा के नाम पर किसी को क़ानून हाथ में लेने का हक़ नहीं है, उसी दिन झारखंड में एक और व्यक्ति की गाय के नाम पर हत्या कर दी गई.

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झारखंड के रामगढ़ एक गोमांस ले जाने के शक में भीड़ ने एक व्यक्ति की हत्या कर दी और उसकी वैन को आग लगा दी.

भीड़ द्वारा किसी को भी पीट-पीट कर मार देने की बढ़ती घटनाओं के विरोध में 28 जून को देश भर के कई शहरों में प्रदर्शन हुए. इसके अगले दिन प्रधानमंत्री मोदी ने बयान दिया कि गाय के नाम किसी भी इंसान को क़ानून हाथ में लेने का हक़ नहीं है. ऊना में मरी गाय की खाल उतारने वाले दलित युवकों की पिटाई के बाद भी प्रधानमंत्री ने बयान दिया था, जिसमें उन्होंने कहा था कि 80 प्रतिशत गोरक्षक फ़र्ज़ी हैं. सरकारों को इन पर कार्रवाई करनी चाहिए.

प्रधानमंत्री को दो बार गोरक्षकों पर बयान दे चुके हैं, लेकिन लगता नहीं है कि प्रधानमंत्री की बात को गोरक्षा दल के गुंडे सुनने को तैयार हैं. जब प्रधानमंत्री ने यह बयान दिया, उसी दिन झारखंड में एक और व्यक्ति की गाय के नाम पर हत्या कर दी गई.

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने गुरुवार को कहा था कि गोरक्षा के नाम पर लोगों की हत्या स्वीकार नहीं है. गुजरात में साबरमती आश्रम के शताब्दी वर्ष समारोह में मोदी ने कहा कि दूसरों के ख़िलाफ़ हिंसा करना राष्ट्रपिता महात्मा गांधी के आदर्शों के विरुद्ध है.

प्रधानमंत्री ने जो कहा वह बात तो क़ाबिलेगौर है कि ‘गोभक्ति के नाम पर लोगों की हत्या स्वीकार नहीं है. इसे महात्मा गांधी कभी स्वीकार नहीं करते. गाय की रक्षा, गोभक्ति महात्मा गांधी और विनोबा भावे से बढ़कर कोई नहीं करता था. गांधी जी और विनोबा जी ने हमें उत्तम राह दिखाई है, उसी रास्ते पर देश को चलना ही पड़ेगा. वो निर्दोष है कि गुनाहगार है, वो क़ानून काम करेगा, इंसान को क़ानून हाथ में लेने का हक़ नहीं है. मैं देशवासियों से आग्रह करूंगा कि हिंसा समस्याओं का समाधान नहीं है. अगर आपको कोई शिकायत हो तो उसके लिए क़ानून है.’

जिस दिन प्रधानमंत्री यह बयान दिया, उसी दिन झारखंड के रामगढ़ ज़िले में गोमांस ले जाने की आशंका में एक व्यक्ति को पीटा गया और उसकी मौत हो गई. रामगढ़ में बाजार टांड इलाके में मोहम्मद अलीमुद्दीन वैन में मांस ले जा रहा था. कुछ लोगों को आशंका हुई कि वैन में गाय का मांस है. इसी आशंका के आधार पर लगभग तीन दर्जन लोगों ने अलीमुद्दीन पर हमला बोल दिया. बुरी तरह पिटाई के बाद अलीमुद्दीन को अस्पताल ले जाया गया, जहां उसकी मौत हो गई.

घटना के बाद इलाक़े में तनाव फैल गया, जिसे देखते हुए पूरे ज़िले में अतिरिक्त बलों की तैनाती की गई. रामगढ़ के पुलिस अधीक्षक कौशल किशोर ने मीडिया को बताया कि लगभग तीस से चालीस लोगों ने बाज़ार टांड इलाक़े में एक वैन में गोमांस ले जाने की आशंका में हमला बोल दिया और चालक मोहम्मद अलीमुद्दीन की गाड़ी से खींचकर बुरी तरह पिटाई की, जिससे वह गंभीर रूप से घायल हो गया.

सूचना पाकर पहुंची पुलिस ने चालक को अस्पताल पहुंचाया जहां उसे मृत घोषित कर दिया गया. अलीमुद्दीन हज़ारीबाग का निवासी था. हमलावरों ने वैन में भी आग लगा दी. पुलिस ने आग बुझाकर गाड़ी में लदे मांस को जांच के लिए भेजा है. अभी इस मामले में किसी की गिरफ़्तारी नहीं हुई है.

इसके पहले मंगलवार को झारखंड के ही गिरिडीह में दर्जनों लोगों ने एक व्यक्ति मोहम्मद उस्मान अंसारी को पीटकर घायल कर दिया था और उसके घर में आग लगा दी थी. उसके घर के पास एक गाय का कटा हुआ शव देखा गया था. शव देखते ही गांव वालों की भीड़ एकत्र हुई और उस्मान पर हमला बोल दिया. पुलिस ने इस मामले में दस लोगों को हिरासत में लिया है.

उस्मान अंसारी डेयरी संचालक हैं. पुलिस सूत्रों के हवाले से लिखी गई द टेलीग्राफ की रिपोर्ट मुताबिक, किसी ने बीमारी के कारण मरी हुई अंसारी की गाय का गला रेत कर उसके शव को उनके घर के बाहर छोड़ दिया जिससे ऐसा लगे कि उस गाय को अंसारी ने मार दिया है. भीड़ से उस्मान को बचाने के लिए पुलिस को हवाई फायरिंग करनी पड़ी.

ग़ौरतलब है कि अब तक तीन साल से ऐसी कई दर्जन घटनाओं पर प्रधानमंत्री ने तब अपनी चुप्पी तोड़ी जब भीड़ द्वारा लोगों की पीट-पीटकर हत्या किए जाने के विरोध में 28 जून को देशभर के कई शहरों में ‘नॉट इन माई नेम’ नाम से प्रदर्शन हुए थे.

इसके बावजूद प्रधानमंत्री के बयान में राज्य सरकारों, प्रशासन और गाय के नाम पर आतंक फैलाने वालों के लिए कोई कड़ा संदेश नहीं है. ऐसा लगता है कि प्रधानमंत्री ने लोगों का गुस्सा शांत करने की गरज़ से यह बयान दिया है, जिसमें वे लोगों से अपील करते दिखते हैं कि गोरक्षा करो, लेकिन गांधी के बताए तरीक़े से.

केंद्र और राज्यों में भाजपा सरकारों की तरफ से जो गोरक्षा कानून लाए गए हैं, क्या वे गांधी के बताए तरीक़े पर खरे उतर रहे हैं? गांधी ने तो गोरक्षा क़ानून तक का विरोध किया था. गांधी तो गोरक्षा पर किसी भी तरह की क़ानूनी सख़्ती या कार्रवाई के विरोध में थे. क्या प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ख़ुद और उनकी पार्टी की राज्य सरकारें और भाजपा गांधी के मार्ग पर चल रही है?

महात्मा गांधी ने हिंद स्वराज में (पेज नंबर 32 से 34, प्रकाशक-नवजीवन ट्रस्ट) में लिखा है, ‘मैं ख़ुद गाय को पूजता हूं यानी मान देता हूं. गाय हिंदुस्तान की रक्षा करने वाली है, क्योंकि उसकी संतान पर हिंदुस्तान का, जो खेती प्रधान देश है, आधार है. गाय कई तरह से उपयोगी जानवर है. वह उपयोगी जानवर है इसे मुसलमान भाई भी कबूल करेंगे. लेकिन जैसे मैं गाय को पूजता हूं, वैसे मैं मनुष्य को भी पूजता हूं. जैसे गाय उपयोगी है वैसे ही मनुष्य भी फिर चाहे वह मुसलमान हो या हिंदू, उपयोगी है.’

‘तब क्या गाय को बचाने के लिए मैं मुसलमान से लड़ूंगा? क्या मैं उसे मारूंगा? ऐसा करने से मैं मुसलमान और गाय दोनों का दुश्मन हो जाऊंगा. इसलिए मैं कहूंगा कि गाय की रक्षा करने का एक ही उपाय है कि मुझे अपने मुसलमान भाई के सामने हाथ जोड़ने चाहिए और उसे देश की ख़ातिर गाय को बचाने के लिए समझाना चाहिए. अगर वह न समझे तो मुझे गाय को मरने देना चाहिए, क्योंकि वह मेरे बस की बात नहीं है. अगर मुझे गाय पर अत्यंत दया आती है तो अपनी जान दे देनी चाहिए, लेकिन मुसलमान की जान नहीं लेनी चाहिए. यही धार्मिक क़ानून है, ऐसा मैं तो मानता हूं.’

महात्मा गांधी आगे लिखते हैं, ‘मेरा भाई गाय को मारने दौड़े तो उसके साथ मैं कैसा बरताव करूंगा? उसे मारूंगा या उसके पैरों में पड़ूंगा? अगर आप कहें कि मुझे उसके पांव पड़ना चाहिए तो मुसलमान भाई के पांव भी पड़ना चाहिए. गाय को दुख देकर हिंदू गाय का वध करता है; इससे गाय को कौन छुड़ाता है? जो हिंदू गाय की औलाद को पैना भोंकता है; उस हिंदू को कौन समझाता है? इससे हमारे एक राष्ट्र होने में कोई रुकावट नहीं आई है.’

महात्मा गांधी गोरक्षा क़ानून बनाने के भी विरोध में थे. उन्होंने 07.07.1927 को यंग इंडिया में लिखा था, ‘मैं फिर से इस बात पर ज़ोर देता हूं कि… क़ानून बनाकर गोवध बंद करने से गोरक्षा नहीं हो जाती. वह तो गोरक्षा के काम का छोटे से छोटा भाग है… लोग ऐसा मानते दीखते हैं कि किसी भी बुराई के विरुद्ध कोई क़ानून बना कि तुरंत वह किसी झंझट के बिना मिट जाएगी. ऐसी भयंकर आत्म-वंचना और कोई नहीं हो सकती. किसी दुष्ट बुद्धि वाले अज्ञानी या छोटे से समाज के ख़िलाफ़ क़ानून बनाया जाता है और उसका असर भी होता है. लेकिन जिस क़ानून के विरुद्ध समझदार और संगठित लोकमत हो, या धर्म के बहाने छोटे से छोटे मंडल का भी विरोध हो, वह क़ानून सफल नहीं हो सकता.’

क्या नरेंद्र मोदी की अगुआई वाली भाजपा सरकार ने ख़ुद गांधी के इन विचारों पर अमल किया है? जिस आदर्श का अनुसरण सरकार ख़ुद नहीं कर सकी, प्रधानमंत्री जनता से अपील कर रहे हैं कि वह उस आदर्श पर चले. शायद इस विरोधाभास के कारण ही प्रधानमंत्री की चेतावनी भरी ‘अपील’ का गोरक्षकों पर कोई असर नहीं पड़ा है.