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जीएसटी: ‘नई आज़ादी’ के आधी रात के जश्न में गुम न हो जाएं ये सवाल

जीएसटी को लागू किए जाने से पहले सरकार ने छोटे कारोबारियों की चिंताओं को नज़रअंदाज़ किया. किसी को जीएसटी के जटिल प्रारूप के कारण छोटे व्यापारियों पर पड़नेवाले प्रभावों का आकलन करने की फुर्सत नहीं है, जिन पर वक़ील और सीए अभी से ही शिकारी बाज़ की तरह झपट पड़े हैं.

फोटो: रॉयटर्स

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धूम-धड़ाके और प्रचार की शौक़ीन नरेंद्र मोदी सरकार हमें यह यकीन दिलाना चाहती है कि वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) कई दशकों पहले भारत द्वारा  मध्य रात्रि में अनुभव किये गए ‘नियति से साक्षात्कार’ के बराबर है. अगर आप मानना चाहें तो आपको यह कहा जायेगा कि यह एक नयी आज़ादी के समान है.

उत्सवों को लेकर मोदी के उत्साह और सुर्ख़ियों के मैनेजमेंट के उनके कौशल  को देखते हुए नियति से इस नए साक्षात्कार का समारोह मध्य रात्रि के संसद सत्र से ही मनाया जाना चाहिए. विपक्ष इस बात को लेकर सकते में है कि आखिर इस पर वह किस तरह से प्रतिक्रिया दे.

एक ऐसे समय में जब लाखों छोटे कारोबारियों की नींद यह सोचकर उड़ी हुई है कि जीएसटी के डिजाइन (प्रारूप) और इसके क्रियान्वन से उनके जीवन और जीविका पर क्या असर पड़ेगा, मध्य रात्रि के संसद सत्र का हासिल इसके अलावा और क्या होगा कि यह प्रधानमंत्री को आत्मप्रचार का एक और जन-संपर्क  मंच उपलब्ध कराने का मौका बनेगा.

कई छोटे कारोबारियों का कहना है कि वे अभी नोटबंदी से उबर ही रहे थे कि उन पर समस्याओं से भरे जीएसटी का वार कर दिया गया है. मुझे शक है कि तैयारियां पूरी न होने के बावजूद 1 जुलाई को जीएसटी को पूरी तरह से लागू करने के पीछे की जिद की एक वजह मोदी की यह इच्छा थी कि डोनाल्ड ट्रंप इस कर-सुधार की सार्वजनिक मंच से प्रशंसा करें. आखिर क्यों न हो, आखिर यह मोदी के निजी ब्रांड निर्माण की पूरी कवायद का एक हिस्सा जो है.

मोदी ने अमेरिका में जीएसटी की सफलतापूर्व मार्केटिंग की, लेकिन उन्होंने अब तक घबराए हुए लाखों छोटे कारोबारियों की इन चिंताओं को दूर नहीं किया है कि आखिर इसका उन पर क्या असर पड़ेगा. हकीकत यह है कि वाशिंगटन में बंद कमरे की बातचीत में ग्लोबल सर्विस कंपनियों के कई सीईओ ने मोदी से कहा कि वे इस बात को लेकर निश्चिंत नहीं हैं कि यह जटिल और अनेक स्लैबों वाला कर सुधार अमेजॉन जैसी ई-कॉमर्स कंपनियों पर क्या असर डालेगा.

मोदी ने उन्हें भरोसा दिलाया कि सारी चीजें सकारात्मक नतीजे देनेवाली साबित होंगी. यह कोई पक्के तौर पर नहीं कह सकता कि क्या यह महज एक संयोग था कि इसके ठीक बाद, जब प्रधानमंत्री वाशिंगटन में ही थे, वित्त मंत्रालय ने ई-कॉमर्स की प्रमुख कंपनियों को ध्यान में रखते हुए कुछ राहतों की घोषणा की, जो अमेजॉन को काफी फायदा पहुंचाएंगी.

निश्चित तौर पर इससे फ्लिपकार्ट जैसी घरेलू ई-कॉमर्स कंपनियों को भी फायदा पहुंचेगा. लेकिन यह दर्ज किया जाना चाहिए कि इसके लिए दबाव मोदी के दौरे के दौरान अमेरिका की तरफ से डाला गया.

जाहिर है अमेजॉन और दूसरी बड़ी ग्लोबस सर्विस कंपनियों को अपना काम कराने का तरीका मालूम है. और वे राज़ी-खुशी 1 जुलाई को जीएसटी को लागू करने से पहले मध्य रात्रि को संसद द्वारा ”नियति से साक्षात्कार’ यानी नई आर्थिक आज़ादी’ के जश्न में भाग लेंगे.

लेकिन इन सबके बीच किसी को जीएसटी के जटिल प्रारूप के कारण छोटे कारोबारियों और व्यापारिक समुदायों पर पड़नेवाले प्रभाव का आकलन करने की फुर्सत नहीं है, जिन पर वकील और सीए अभी से ही शिकारी बाज़ की तरह झपट पड़े हैं.

जीएसटी को लागू किए जाने से पहले वित्त मंत्रालय के अधिकारियों ने छोटे कारोबारियों और व्यापारियों के प्रति आश्चर्यजनक ढंग से सहानुभूति की कमी का प्रदर्शन किया है. हर मौसम में मोदी की नैया के खेवनहार राजस्व सचिव हसमुख अधिया ने एक बड़ा दावा करते हुए कहा कि सरकार तो जीएसटी को लागू करने के लिए पूरी तरह से तैयार है, मगर व्यापारी वर्ग की तैयारी अधूरी है.

कुछ दिनों के बाद जीएसटीएन नेटवर्क, जिस पर एक करोड़ व्यापारिक इकाइयों के टैक्स रिटर्न्स के आकलन की जिम्मेदारी है, के चेयरमैन नवीन कुमार ने कहा कि लॉन्च से पहले सिस्टमों को पूरी तरह से परखा नहीं गया है. और आपको आगाह कर दें, उन्होंने ये बात जीएसटी के आधिकारिक लांच से महज पांच दिन पहले कही. इसी पृष्ठभूमि में सरकार भारत की अर्थव्यवस्था के नए युग की शुरुआत का जश्न मनाने के लिए एक मध्य रात्रि के सत्र का आयोजन कर रही है.

क्या जीएसटी सचमुच में ऐसा महान सुधार है? नौसिखियों के फायदे के लिए हमारी चेतना पर मल्टी मीडिया के हमले के कारण प्रकट हुए विस्मृति के इस युग में पाठकों की याददाश्त को ठीक करना जरूरी है. जाने-माने आर्थिक टिप्पणीकार टीएन निनान ने ध्यान दिलाया है कि पिछले दो दशकों से वैल्यू एडेड टैक्स के मूलभूत सिद्धांत को चरणबद्ध तरीके से कई रूपों में लगातार अपनाया गया.

मसलन, स्टेट वैल्यू एडेड टैक्स, सेंट्रल वैल्यू एडेड टैक्स, मोडिफाइड वैल्यू एडेड टैक्स, जिसमें इनपुट पर लगे टैक्स को रिफंड करने का प्रावधान है. इसलिए हमें पूर्ववर्ती वित्त मंत्रियों यशवंत सिन्हा, पी चिदंबरम, जसवंत सिंह और कई प्रतिबद्ध अधिकारियों और अर्थशास्त्रियों को भी वैल्यू एडेड टैक्स के सिद्धांत को लगातार मांजते रहने के लिए शुक्रिया कहना चाहिए.

जीएसटी के विचार की बुनियाद केंद्र और राज्य स्तर पर अप्रत्यक्ष कर के क्षेत्र में अतीत के इन सुधारों पर पड़ी है. जीएसटी इन सुधारों को एक समग्र रूप देता है, जिसके लिए एक संविधान संशोधन की दरकार थी. अतीत की प्रगतियों और 13 साल पहले वैट के प्रयोग को लेकर राज्यों के सकारत्मक अनुभवों की रोशनी में इसे एक ऐसा विचार कहा जा सकता है, जिसका समय आ गया था.

अतीत में भाजपा का विरोधी रुख़

यह सबको पता है कि यूपीए ने 2013 में संसद के शीतकालीन सत्र में ही जीएसटी कानून लाने की कोशिश की थी. तब तक मोदी 2014 के लोकसभा चुनाव के लिए भाजपा के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार बन चुके थे और संसद में भाजपा की रणनीति पर उनका निर्णायक प्रभाव कायम हो चुका था.

सुषमा स्वराज और अरुण जेटली जैसे नेता 2013 के अंत में जीएसटी को पारित करने को लेकर सकारात्मक रुख रखते थे, मगर मोदी ने इसके विरोध में फैसला लिया. बाद में मनमोहन सिंह ने सार्वजनिक तौर पर यह बात कही कि एक भाजपा सांसद उनके पास यह प्रस्ताव लेकर आया था कि अगर केंद्रीय एजेंसियां अमित शाह के ख़िलाफ़ आपराधिक आरोपों को कमजोर कर दें, तो विपक्ष (मोदी पढ़ें) सहयोग देगा.

जीएसटी की यात्रा की यह अनैतिक पृष्ठभूमि इसे एक मध्य रात्रि के संसदीय उत्सव में तब्दील करने के लिए पर्याप्त वजह कही जा सकती है. लेकिन, जश्न पर ध्यान लगाने की जगह बेहतर यह होता कि सरकार जीएसटी के डिजाइन और इसे लागू करने के ब्यौरों पर ज्यादा ध्यान लगाती, जिसके बगैर देश का सबसे बड़ा कर-सुधार अर्थव्यवस्था के सबसे बड़े दु:स्वप्न में बदल सकता है.

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भारत में 10 करोड़ के करीब छोटे कारोबारी और दुकानदार हैं. इनमें से करीब 60 फीसदी कंप्यूटर के मामले में निरक्षर हैं. (फोटो: रॉयटर्स)

बेहद अहम है जीएसटी का डिजाइन

और यह चेतावनी किसी और ने नहीं, भारत के मुख्य आर्थिक सलाहकार अरविंद सुब्रमण्यम ने दी है, जिन्होंने 4 अप्रैल, 2017 को इंडियन एक्सप्रेस में लिखा था, यह जीएसटी के लिए एक संवैधानिक क्षण है. यह महत्वकांक्षाओं और दूरदर्शी फैसले लेने के लिए एक मुफीद समय है, जिसे दोनों हाथों से लपका जाना चाहिए… भविष्य में जड़ता और मृत आदतें फिर सिर उठाएंगी. जो यथास्थिति को मजबूती से बनाए रखेंगी.

इस रोशनी में यह अहम है कि यथास्थिति से दूर जाने से बचना, हमारा पथ-प्रदर्शक सिद्धांत नहीं होना चाहिए. अगर ऐसा होता है, और अगर इस तरह जीएसटी दरों को मौजूदा दरों के करीब रखा जाता है, तो यह सवाल वैध तरीके से उठेगा कि आखिर जीएसटी के लिए इतनी सिरदर्दी लेने की जरूरत ही क्या थी?’

सुब्रमण्यम ने सवाल किया था कि जीएसटी के लिए इतनी परेशानी मोल लेने की जरूरत ही क्या थी अगर अंत में कर की दरें यथास्थिति का ही प्रदर्शन करें. उन्होंने तब उम्मीद जताई थी कि 28 फीसदी के टैक्स स्लैब को पूरी तरह से खत्म कर दिया जाएगा या फिर इसे 18 फीसदी के टैक्स स्लैब से मिलाकर एक नया 20 फीसदी का टैक्स स्लैब बनाया जाएगा, जो सर्वाधिक कर दर होगी.

शुरू में जेटली ने भी 20 फीसदी के उच्च्तम कर दर के विचार का समर्थन किया था, क्योंकि किसी भी देश में इससे ज्यादा जीएसटी दर नहीं है. पूर्वी एशियाई अर्थव्यवस्थाओं के लिए यह दर 10 से 12 प्रतिशत तक है और यूरोपीय अर्थव्यवस्थाओं के लिए करीब 19 फीसदी.

अंत में यथास्थिति को बरकरार रखा गया. जिसका एक कारण राज्यों को खुश रखना था और असामान्य ढंग से बड़ी संख्या में उपभोक्ता वस्तुओं को 28 फीसदी के टैक्स स्लैब के भीतर ले आया गया, जिसके ख़िलाफ़ सुब्रमण्यम और अनुमान के मुताबिक जेटली भी थे. इसलिए सुब्रमण्यम का सवाल ‘जीएसटी हो ही क्यों?’ आज भी अहम बना हुआ है.

इस सबके अतिरिक्त एक तथ्य यह भी है कि ऊर्जा, जो कि अर्थव्यवस्था के सारे उत्पादनों में अहम इनपुट है, उसे जीएसटी के दायरे से बाहर रखा गया है. डीजल पर लगनेवाला कुल कर, जिसका इस्तेमाल किसान भी करते हैं, 45 फीसदी से ज्यादा है.

इसे जीएसटी की परिभाषा के मुताबिक तंबाकू, लग्ज़री कार के साथ ‘सिन गुड्स’ यानी नुकसानदेह वस्तु की श्रेणी में रखा गया है. रियल एस्टेट, जो कि काले धन का सबसे बड़ा उत्पादक है, उसके लेनदेन को जीएसटी के दायरे से बाहर रखा गया है. यह तब है, जब मोदी काले धन पर हमला करने के लिए अपनी भाषण कला का उपयोग करने में कभी पीछे नहीं रहते.

ऐसे में सवाल है कि क्या जीएसटी वाकई मध्य रात्रि के संसद सत्र में जश्न मनाए जाने के लायक है? विपक्षी पार्टियों को सरकार को यह जरूर कहना चाहिए कि जीएसटी कराधान के सिद्धांत को सभी राजनीतिक दल संसद में समर्थन दे चुके हैं. अब यह सरकार का काम है कि वह एक अच्छे प्रारूप वाले जीएसटी को सही तरीके से लागू करे, ताकि देश के छह करोड़ छोटे कारोबारी को इससे ज्यादा तकलीफ न हो. सही समय से पहले भारत के नए ‘नियति से साक्षात्कार’ का जश्न मनाना, बुद्धिमानी नहीं है.

जनता को यह फैसला करने दीजिए कि जीएसटी को लेकर उनका अनुभव कैसा है. अगर वे वास्तव में नई तरह की आज़ादी का अनुभव करते हैं, जो यह 2019 के आम चुनावों में दिखाई देगा.

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