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सामाजिक कार्यकर्ता जितने दिन जेल में रहेंगे, भारतीय जनतंत्र की आयु उसी अनुपात में घटती जाएगी

जेल में बंद वरवरा राव शुक्रवार शाम बेहोश हो गए, जिसके बाद उन्हें अस्पताल ले जाया गया. महामारी के दौर में भी अदालत ने उन्हें वे रियायत देने की ज़रूरत नहीं समझी है, जो अन्य बुज़ुर्ग क़ैदियों को दी जाती हैं.

वरवर राव. (फोटो साभार: फेसबुक/@VaravaraRao)

वरवरा राव. (फोटो साभार: फेसबुक/@VaravaraRao)

वरवरा राव 28 मई की शाम महाराष्ट्र की तालोजा जेल में बेहोश हो गए और उन्हें अस्पताल ले जाना पड़ा. वे 81 साल के हैं. यह खबर मीडिया को अपने पाठकों या दर्शकों के लिए जरूरी नहीं लगी.

हम यह भी नहीं जानते कि यह बुजुर्ग पिछले दो साल से जेल में है और पुलिस या सरकार किसी भी कीमत पर उन्हें जमानत नहीं लेने दे रही. अदालतें भी सरकार की दलील से सहमत होती आ रही हैं और मानती हैं कि वरवरा राव का जेल से बाहर रहना खतरनाक होगा.

यह बात भी राव जैसे कैदियों के पक्ष में नहीं कि अभी बुजुर्गों के कोरोना वायरस के संक्रमण से ग्रस्त होने की आशंका सबसे अधिक है और इसीलिए जेल से उन कैदियों को अस्थायी तौर पर रिहा किया जाना चाहिए जिनके मुकदमे चल रहे हैं. आखिरकार ये कैदी कहीं भाग तो नहीं जा सकते और कोई यह भी नहीं कह रहा कि उन पर पुलिस की चौकसी कम कर दी जाए.

हम भारत की पुलिस की योग्यता भी जानते हैं कि वह जिन्हें गिरफ्तार करना चाहती है, कर ही लेती है. इसलिए वरवरा राव पुलिस या सरकार की निगाह से छिपकर किसी गुप्त कार्रवाई की योजना बना सकेंगे, इसकी गुंजाइश नहीं.

वरवरा राव कवि हैं. वे माओवादी विचारों के समर्थक भी हैं. माओवादी विचार से पूरी असहमति हो सकती है लेकिन इस विचार का हामी होना आपको अपराधी नहीं बनाता, यह तो भारत के उस सर्वोच्च न्यायालय ने ही कहा है जिस पर यह आरोप नहीं लगाया जा सकता कि वह हिंसक और दहशतगर्द विचारों से प्रभावित है.

न तो माओवाद पर यकीन और न किसी प्रतिबंधित संगठन से जुड़ाव जुर्म है. जब तक किसी हिंसक कार्रवाई में शिरकत न हो, अपराध नहीं होता. सरकारें और पुलिस कह सकती है कि वरवरा राव को उसने हिंसा के षड्यंत्र में शामिल होने की वजह से ही गिरफ्तार किया है. वह हिंसा क्या थी?

हिंसा की गई थी उन लोगों पर जो पुणे के करीब शनिवारवाड़ा में 31 दिसंबर 2017 और 1 जनवरी 2018 को भीमा कोरेगांव के एलगार परिषद में भाग लेकर लौट रहे थे. यह दलितों की तरफ से किया गया आयोजन था और शिरकत भी दलितों की ही थी.

200 साल पहले 1 जनवरी, 1818 को पेशवा फौज को अंग्रेजों की सेना की उस टुकड़ी ने पराजित किया जिसमें दलितों की संख्या ज्यादा थी. इस घटना को भीमराव आंबेडकर ने भी दलित गौरव के प्रतीक के रूप में चित्रित किया.

इस व्याख्या पर बहस हो सकती है लेकिन हमें मालूम है कि उत्पीड़ित समुदाय अपने ‘इतिहास’ का निर्माण हमेशा ऐसे नहीं कर सकते कि वे दमित और पराजित होते ही दिखलाए जाएं. विजय और संघर्ष की क्षमता की कल्पना के अवसरों का इतिहास उन्हें आज लड़ने के लिए चाहिए.

भीमा कोरेगांव एक ऐसी ही ऐतिहासिक कल्पना है. ठेठ राष्ट्रवादी नजरिए से यह आयोजन राष्ट्र विरोधी ठहराया जा सकता है. उसी राष्ट्र के सदस्य दलित समुदाय के एक हिस्से की इस राष्ट्रमत से असहमति होगी. यह स्वस्थ तनाव और बहस है. वह राष्ट्र असुरक्षित है जो ऐसी बहस नहीं होने देता.

एलगार परिषद एक सार्वजनिक आयोजन था. पूर्व घोषित और उसके आयोजकों में पूर्व न्यायाधीश शामिल थे. आयोजन के बाद वहां से लौट रहे लोगों के खिलाफ हिंसा की गई. हिंसा जाहिर तौर पर उन्होंने की, जो इस आयोजन से नाराज थे.

इस हिंसा के संगठन का आरोप दो स्थानीय हिंदुत्ववादी नेताओं पर लगा. एलगार परिषद के कुछ दिन पहले वढू बुद्रुक नामक गांव में दलितों के द्वारा लगाए गाए एक प्रतीक चिह्न पर हमला किया गया. इससे तनाव हुआ.

इस घटना का जिक्र एलगार परिषद में हुआ. इसके वक्ताओं में जिग्नेश मेवाणी, उमर खालिद और राधिका वेमुला शामिल थीं. वक्तव्य सार्वजनिक थे. अब भी उनकी रिकॉर्डिंग मौजूद है. उनमें किसी में किसी हिंसा का उकसावा नहीं था. फिर हिंसा क्यों हुई?

महाराष्ट्र अगर दलित आंदोलन का गढ़ रहा है तो वह दलित विरोधी हिंसा का भी गढ़ रहा है. गांधी की हत्या का प्रयास भी यहां किया गया क्योंकि वे दलितों के पक्षधर माने जाते थे. मराठवाड़ा विश्वविद्यालय का नाम बदल कर आंबेडकर के नाम पर करने के सवाल पर हिंसा की याद हम सबको है.

दलितों की किसी भी प्रकार की प्रतिष्ठा को अनिवार्यतः ‘उच्च जाति’ और मराठा समुदाय का अपमान माना जाता है. एलगार परिषद के बाद की हिंसा इस दलित विरोधी विचार की अभिव्यक्ति ही थी. जांच इस हिंसा की होनी थी. लेकिन पुणे पुलिस ने किया कुछ और.

उसने एलगार परिषद को ही हिंसा का स्रोत बना दिया. कहा कि उसके भाषणों में हिंसा का उकसावा था. अगर इस बात को भी मान लिया जाए तो परिषद में शामिल वक्ताओं से पूछताछ करनी चाहिए थी. उसके आयोजकों से बात करनी थी.

यह न करके पुलिस ने भारत के अलग अलग हिस्सों में मानवाधिकार कार्यकर्ता, माओवादी कार्यकर्ताओं और अध्यापकों के घरों पर छापे मारे और उन्हें गिरफ्तार किया. इनमें से किसी का संबंध एलगार परिषद के आयोजन से नहीं था.

बल्कि आनंद तेलतुम्बड़े ने तो इस आयोजन के विचार से अपनी असहमति जाहिर की थी. वरवरा राव की गिरफ्तारी भी यही आरोप लगाकर की गई है. उनका भी एलगार परिषद से कोई लेना-देना नहीं था. लेकिन पुलिस ने एक भयानक तस्वीर खींची.

वरवरा राव, सुधा भारद्वाज, आनंद तेलतुम्बड़े, शोमा सेन, अरुण फरेरा, वरनन गोंसाल्विस, रोना विल्सन आदि पर आरोप लगाया गया कि वे इस परिषद के आयोजन के पीछे थे. यही नहीं, पुलिस ने यह रहस्योद्घाटन किया कि ये लोग प्रधानमंत्री की हत्या की साजिश भी कर रहे थे. इन पर यूएपीए थोप दिया गया.

वरवरा राव कवि हैं. वे कवि हैं, इसलिए उनके साथ रियायत बरती जाए, यह विनती नहीं की जा रही. उनकी गिरफ्तारी सिरे से गलत है. यह अपने आप में राजकीय षड्यंत्र है एक झूठे षड्यंत्र की कथा रचने का.

वरवरा राव का माओवादी होना या दूसरे लोगों का भिन्न-भिन्न प्रकार का वामपंथी होना ही पर्याप्त माना जाता है कि उन्हें प्रताड़ित किया जाए और जेल में बंद रखा जाए. वह रियायत जो बाकी बुजुर्ग कैदियों को है, वरवरा राव को नहीं दी जा सकती, यह अदालत का भी खयाल है.

इसी समय सुधा भारद्वाज की जमानत की अर्जी खारिज होने की खबर भी आई है. जिस समय यह हो रहा था, दिल्ली में एक और नाटक खेला गया. दिल्ली की अदालत में गौतम नवलखा के मामले पर सुनवाई के दौरान ही गुपचुप उन्हें मुंबई ले जाया गया.

यह अदालत को सरासर अंगूठा दिखाना था. लेकिन वह अपनी नाराजगी दर्ज करने के अलावा कुछ नहीं कर सकी. चूंकि अदालतों ने भीमा कोरेगांव में नंगी आंख से दिखने वाले सच से आंखें मोड़कर सरकारी रोशनी में ही साजिश के सच को देखना कबूल किया है, सरकार अब हर हिंसा की व्याख्या में अपना सच गढ़ रही है.

दिल्ली में फरवरी में हुई हिंसा के बारे में भी वैसे ही साजिश की कहानी गढ़ी जा रही है जैसे भीमा कोरेगांव के मामले में गढ़ी गई.

यह सिर्फ मानवाधिकार कार्यकर्ताओं का काम नहीं कि वे वरवरा राव की रिहाई की मांग करें. यह दायित्व हर छात्र, अध्यापक, कवि, शिक्षण संस्थान और सबसे ज्यादा राजनीतिक दलों का है.

वरवरा राव, आनंद, गौतम, शोमा, सुधा, महेश आदि जितने दिन अधिक जेल में रहते हैं, भारतीय जनतंत्र की आयु उसी अनुपात में घटती जाती है.

(लेखक दिल्ली विश्वविद्यालय में पढ़ाते हैं.)