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जम्मू कश्मीर में परिसीमन को लेकर मोदी सरकार को क्यों करना पड़ रहा चौतरफा विरोध का सामना?

केंद्र शासित प्रदेश जम्मू कश्मीर की विधानसभा सीटों के पुनर्निर्धारण के लिए केंद्र सरकार द्वारा घोषित की गई परिसीमन प्रक्रिया का राज्य की मुख्यधारा की पार्टियों के अलावा कश्मीरी पंडित सहित कई हितधारकों ने विरोध करना शुरू कर दिया है.

जम्मू कश्मीर विधानसभा. (फोटो: पीटीआई)

जम्मू कश्मीर विधानसभा. (फोटो: पीटीआई)

नई दिल्ली: पिछले साल पांच अगस्त को अनुच्छेद 370 के अधिकतर प्रावधानों को रद्द कर पूर्ववर्ती जम्मू कश्मीर राज्य को दो हिस्सों में बांटने का विरोध खत्म होने से पहले ही केंद्र शासित प्रदेश बनाए गए जम्मू कश्मीर की विधानसभा सीटों के पुनर्निर्धारण का विरोध शुरू हो गया है.

केंद्र शासित प्रदेश जम्मू कश्मीर की विधानसभा सीटों के पुनर्निर्धारण के लिए केंद्र सरकार द्वारा घोषित की गई परिसीमन प्रक्रिया का राज्य की मुख्यधारा की पार्टियों के अलावा कश्मीरी पंडित सहित कई हितधारकों ने विरोध करना शुरू कर दिया है.

जम्मू कश्मीर के परिसीमन के लिए गठित आयोग में दो भाजपा सांसदों के साथ पूर्व मुख्यमंत्री फारूक अब्दुल्ला के नेतृत्व वाली नेशनल कॉन्फ्रेंस के तीन नेताओं को भी शामिल किया गया है. लेकिन नेशनल कॉन्फ्रेंस ने राज्य के परिसीमन का बहिष्कार कर दिया है.

नेशनल कॉन्फ्रेंस ने एक बयान जारी कर कहा, ‘यह परिसीमन आयोग जम्मू कश्मीर पुनर्गठन अधिनियम, 2019 का हिस्सा है, जिसे नेशनल कॉन्फ्रेंस सुप्रीम कोर्ट के अंदर और बाहर चुनौती दे रही है. इस परिसीमन आयोग में भाग लेना पांच अगस्त, 2019 की घटनाओं को स्वीकार करना होगा जिसके लिए नेशनल कॉन्फ्रेंस तैयार नहीं है.’

नेशनल कॉन्फ्रेंस के प्रवक्ता रहुल्लाह मेहदी ने कहा कि पार्टी परिसीमन प्रक्रिया में हिस्सा नहीं लेगी.

नेशनल कॉन्फ्रेंस ने यह भी कहा कि केंद्र शासित प्रदेश के पूर्ववर्ती जम्मू कश्मीर प्रांत के संविधान के मुताबिक, जम्मू कश्मीर के निर्वाचन क्षेत्रों का परिसीमन देश के शेष राज्यों के साथ 2026 में किया जाना था.

लोकसभा स्पीकर ओम बिरला ने परिसीमन आयोग के सहयोगी सदस्यों के रूप में श्रीनगर से सांसद फारूक अब्दुल्ला, दक्षिणी कश्मीर से सांसद हसनैन मसूदी और उत्तरी कश्मीर से मोहम्मद अकबर लोन को नामित किया था. इसके साथ ही जम्मू क्षेत्र से भाजपा सांसदों जितेंद्र सिंह और जुगल किशोर शर्मा को भी आयोग में सदस्य बनाया गया था.

वहीं, परिसीमन पर नेशनल कॉन्फ्रेंस के रुख का पूर्व मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती के नेतृत्व वाली पीडीपी, कांग्रेस, सज्जाद लोन की पार्टी पीपुल्स कॉन्फ्रेंस समेत बाकी दलों ने समर्थन किया है.

इन सभी पार्टियों का कहना है कि 5 अगस्त, 2019 के बाद यहां किसी भी तरह का कार्य अवैध और असंवैधानिक है और इसे किसी भी रूप में स्वीकारा नहीं जाएगा.

वहीं, हाल ही में गठित जम्मू कश्मीर अपनी पार्टी और पैंथर्स पार्टी ने परिसीमन के समय की आलोचना की और आयोग में जम्मू कश्मीर के नेताओं को शामिल करने की मांग की.

केंद्र सरकार के इस कदम का विरोध कश्मीरी पंडित नेताओं और जम्मू समर्थित संगठनों ने भी करना शुरू कर दिया है. उनका कहना है कि इसमें कश्मीरी पंडितों को छोड़ दिया गया है जो कि आंतरिक तोड़फोड़ का काम है.

प्रवासियों की वापसी और पुनर्वास के अध्यक्ष सतीश महालदार ने मांग की कि इस प्रक्रिया को रोक दिया जाना चाहिए क्योंकि साल 2011 की जनगणना में बड़ी संख्या में कश्मीरी पंडितों की गिनती नहीं की गई थी.

उन्होंने कहा कि दो लाख कश्मीरी पंडित प्रवासियों के नाम चुनावी रिकॉर्ड से मिटा दिए गए हैं और उनके नाम प्रवासियों और राहत विभाग में भी पंजीकृत नहीं हैं. उन्होंने सवाल उठाया कि मौजूदा आंकड़ों का इस्तेमाल करते हुए परिसीमन की प्रक्रिया निष्पक्ष कैसे हो सकती है.

परिसीमन आयोग में कश्मीरी पंडितों का प्रतिनिधित्व मांगते हुए उन्होंने कहा, ‘हम इस धोखाधड़ी की कवायद की निंदा करते हैं जिसमें लोगों के अधिकारों की रक्षा नहीं की जा रही है.’

अनंतनाग सीट से लोकसभा का चुनाव लड़ने वाले एक कश्मीरी पंडित नेता संजय धर ने परिसीमन आयोग के गठन में समुदाय को लगातार नजरअंदाज किए जाने पर केंद्रीय और स्थानीय दोनों सरकार के खिलाफ रोष प्रकट किया. उन्होंने समुदाय के कम से कम एक सदस्य को परिसीमन आयोग में शामिल करने और उनके लिए दो संसदीय और विधानसभा सीटें आरक्षित करने की मांग की.

दक्षिणपंथी संगठन इक्कजुट जम्मू के अध्यक्ष अंकुर शर्मा ने दावा किया कि यह फैसला जम्मू क्षेत्र की गुलामी को बरकरार रखेगा क्योंकि 2011 की जनगणना में कश्मीर के पक्ष में फर्जीवाड़ा किया गया था. उन्होंने परिसीमन प्रक्रिया को आगे बढ़ाने से पहले केंद्र सरकार से 2021 की जनगणना का इंतजार करने की मांग की. उन्होंने दावा किया कि यह फैसला अनुच्छेद 370 और अनुच्छेद 35ए पर केंद्र सरकार के फैसले के प्रभाव को खत्म कर देगा.

बता दें कि पिछले साल पांच अगस्त को अनुच्छेद 370 के अधिकतर प्रावधानों को खत्म कर पूर्ववर्ती जम्मू कश्मीर राज्य को दो केंद्र शासित प्रदेशों जम्मू कश्मीर और लद्दाख में बांट दिया गया था.

पांच अगस्त के फैसले में केंद्र सरकार ने लद्दाख को बिना विधानसभा का केंद्र शासित प्रदेश बनाया था जबकि जम्मू कश्मीर में विधानसभा का प्रावधान किया गया था. हालांकि, अब जम्मू कश्मीर में चुनाव कराने से पहले विधानसभा सीटों के पुनर्निर्धारण के लिए परिसीमन की प्रक्रिया अपनाई जा रही है. राज्य में आखिरी बार निर्वाचन क्षेत्रों का परिसीमन 1990 के दशक में किया गया था.

उल्लेखनीय है कि जनप्रतिनिधित्व कानून की धारा 60 के तहत केंद्र शासित क्षेत्र जम्मू कश्मीर की विधानसभा की सीटों की संख्या 107 से बढ़ाकर 114 करनी है. इनमें से 24 सीटें पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर में हैं. जम्मू कश्मीर में विधानसभा की सीटों की संख्या परिसीमन के बाद प्रभावी तौर पर 83 से बढ़कर 90 हो जाएगी.

केंद्र सरकार ने इस साल छह मार्च को सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश आरपी देसाई की अध्यक्षता में परिसीमन आयोग का गठन किया था जिसे केंद्र शासित क्षेत्र जम्मू कश्मीर और पूर्वोत्तर के राज्य असम, अरुणाचल प्रदेश, मणिपुर और नगालैंड के लोकसभा और विधानसभा क्षेत्रों का परिसीमन करना है.

निर्वाचन आयुक्त सुशील चंद्रा और जम्मू कश्मीर तथा चार राज्यों के प्रदेश निर्वाचन आयुक्त इसके पदेन सदस्य हैं. हालांकि, इन आयोगों के कामकाज में मदद के लिए उन क्षेत्रों के संसद और विधानसभा सदस्यों को आयोग के सहायक सदस्य के रूप में शामिल किया जाता है.

विधि मंत्रालय द्वारा पूर्व में जारी अधिसूचना के मुताबिक, आयोग जम्मू कश्मीर पुनर्गठन अधिनियम के मुताबिक जम्मू कश्मीर के विधानसभा क्षेत्रों का परिसीमन करेगा जबकि परिसीमन अधिनियम, 2002 के प्रावधानों के मुताबिक असम, अरुणाचल प्रदेश, मणिपुर और नगालैंड के संसदीय व विधानसभा क्षेत्रों का परिसीमन किया जाएगा.

(समाचार एजेंसी भाषा से इनपुट के साथ)