भारत

‘सेंसर बोर्ड कॉरपोरेट की फिल्म तुरंत पास करता है पर छोटे बजट की फिल्मों पर अंकुश लगाता है’

‘राजनीति की तरह ही फिल्म जगत में भी कुछ परिवारों का कब्ज़ा है. दादाजी फिल्म बनाते थे, उनके बेटे बनाते थे. मेरा दोस्त हृतिक रोशन है, मैं डायरेक्टर बना तो हृतिक मेरी फिल्म में एक्टिंग करेगा. हम जैसे बाहर से आए हुए लोगों को दिक्कत होती है.’

aadar jain yrf

फोटो साभार: ट्विटर/ yash raj films

मैंने जब राग देश फिल्म की स्क्रिप्ट पढ़ी और इसपर शोध किया तो पता चला है कि ‘रेड फोर्ट ट्रायल’ अंग्रेज़ों को देश से भगाने का आख़िरी धक्का था. इससे पहले एक प्रणाली और राजनीतिक के तहत आज़ादी का संघर्ष चला था लेकिन सुभाष चंद्र बोस की आज़ाद हिंद फौज ने सशस्त्र संघर्ष किया था और इसमें 25 हज़ार के करीब आज़ाद हिन्द के फ़ौजी मरे थे.

देश को बनाने के पीछे यह भी एक कहानी है, जो लोगों को पता ही नहीं है. फिल्म का नाम रागदेश इसलिए क्योंकि राग मतलब गाना और देश यानी राष्ट्र, तो इसका मतलब सॉन्ग ऑफ द नेशन (देश का गीत) है. मुझे लगता है इससे देश जल्दी आज़ाद हुआ था, वरना 2-4 साल और लगते.

साफ तौर पर कहूं तो रागदेश जैसी कोई फिल्म बनाना कभी भी मेरे एजेंडे में नहीं थाऔर न ही मैंने कभी सोचा था कि में आईएनए या फिर सुभाष चंद्र बोस के ऊपर कोई फिल्म बनाऊंगा, क्योंकि श्याम बेनेगल पहले ही सुभाष चंद्र बोस पर फिल्म बना चुके थे. गुरदीप सिंह सप्पल, जो राज्यसभा टीवी के सीईओ हैं उनके मन में था कि वे इस तरह की फिल्म बनाना चाहते हैं.

वे मुझसे दिल्ली में मिले थे और उन्होंने कहा कि वे  सरदार पटेल और सुभाष चंद्र बोस के विषय पर फिल्म बनाने की सोच रहे हैं और मैंने सुभाष चंद्र बोस को चुना. सरदार पटेल पर फिल्म पहले भी बन चुकी थी और वो मेरी पहली फिल्म थी, जिसमे मैंने केतन मेहता के सहायक के रूप में काम किया था. मैंने फिर ‘रेड फोर्ट ट्रायल’ को चुना और इस विषय पर फिल्म बनानी चाहिए.

यह फ़िल्म सामान्य बॉलीवुड फिल्मों की तरह नहीं बनी है. मैं अगर इस विषय को लेकर किसी प्रोड्यूसर के पास जाता तो मुझे इस फिल्म के लिए कोई मौका नहीं देता. इसलिए मैंने इस मौके को खोना नहीं चाहता था, इसलिए मैंने यह करने का निर्णय लिया.

लोगों को ऐसा लग सकता है पर मैं यह बताना चाहूंगा कि रागदेश कल्पना पर आधारित नहीं है. यह फिल्म पूर्ण रूप से सत्य पर आधारित है, लेकिन ऐसा नहीं है कि यह फिल्म डॉक्यूमेंट्री है बल्कि इस फिल्म में काफ़ी मनोरंजन है. हमारे यहां जोधा-अकबर और मोईन जोदारो जैसी ऐतिहासिक विषय पर फिल्म बनती है जिसमें अकबर नाच रहा है, गाना गा रहा है. पता नहीं लोग ऐतिहासिक फिल्मों के नाम पर कुछ भी अनाप-शनाप बना रहे हैं.

रागदेश का हर एक दृश्य पूर्ण रूप से सत्य और लिखित दस्तावेज़ों पर आधारित है और इस पर कोई उंगली नहीं उठा सकता कि इसका कोई दृश्य ग़लत या कल्पना पर आधारित है. पूरी फिल्म में मैंने सिर्फ एक पत्रकार का किरदार बनाया जो असल में है नहीं क्योंकि उस समय प्रेस पर प्रतिबंध था और कोई कुछ लिख नहीं रहा था. मैंने उस किरदार को ऐसा दिखाया है कि वो पता कर रहा है और लिख रहा है.

रागदेश को लेकर ज़्यादा शोध नहीं करना पड़ा क्योंकि इसके बारे में बहुत ज़्यादा लिखित सामग्री थी. जैसे मैंने पान सिंह तोमर बनाई थी, तो उसको लेकर शोध करने में थोड़ी तकलीफ़ हुई थी क्योंकि पान सिंह तोमर को लेकर कहीं कुछ लिखा नहीं गया था. इंटरनेट पर भी कुछ नहीं मिला था, लेकिन शोध जल्द ख़त्म हुआ क्योंकि सामग्री बहुत ही कम थी.

रागदेश को लेकर बहुत सारी सामग्री थी. कितनी ही किताबें हैं और इंटरनेट पर बहुत कुछ है. आईएनए के लोग भी ज़िंदा है और सुभाष चंद्र बोस का परिवार भी है. इसमें बहुत कुछ था बस वक़्त उन्हें समेटने में लगा था.

शायद यही वजह है कि फिल्म में बहुत सारे आयाम है. तीन मुख्य किरदार हैं, उनकी कहानी है, साथ ही उनके परिवार की कहानी है. हुआ यूं था कि तब इन्हें कहा जा रहा था कि वे अंग्रेज़ों से माफ़ी मांग ले, तो उनको फौज में वापस लिया जाएगा. फिल्म में  मुख्य तीन किरदार हैं गुरबक्श सिंह (अमित साध), शाहनवाज़ खान ( कुणाल कपूर) और प्रेम सहगल (मोहित मारवाह). फिल्म में प्रेम सहगल और लक्ष्मी सहगल के जो किरदार हैं, वे आईएनए में मिले थे और फिर उनकी शादी हुई थी, तो फिल्म में उनके प्रेम संबंध को भी दर्शाया गया है. फिल्म में उनके निजी ज़िंदगी के साथ आज़ाद हिन्द फ़ौज का निर्माण और पूरा विवाद भी है.

ब्रिटिश सेना में से 40,000 लोगों ने बगावत कर आईएनए का गठन किया था. ऐसा हो गया था कि भाई भाई एक-दूसरे पर गोली चला रहे थे. एक रेजिमेंट में एक भाई तो दूसरे रेजिमेंट पर गोली चला रहा था. शुरुआत में लोगों को जब पता नहीं था तब लोग बोल रहे थे कि ये लोग तो ग़द्दार हैं. पूरी फिल्म इसी पर है कि क्या ये लोग हीरो थे या गद्दार.

यह राज्यसभा टीवी द्वारा बनाई गई पहली फिल्म है. इससे पहले किसी भी तरह की फिल्म में उन्होंने किसी भी प्रकार का योगदान नहीं किया है. गुरदीप ने कहा था कि इस तरह की फिल्मों में कोई और पैसा नहीं लगाएगा, क्योंकि इसमें मसाला नहीं है. इसे लिए सरकार का काम है कि वो अपने इतिहास को संजोने में योगदान करें.

अगर सरकार ये काम नहीं करेगी, तो कौन करेगा. हम म्यूज़ियम क्यों बनाते हैं ताकि इतिहास को आगे वाली पीढ़ी के लिए संभाल के रखे. आम आदमी यह सब काम नहीं करेगा, इसलिए सरकार का दायित्व है कि वो यह सब काम करे.

सरकारी संस्थान फिल्म के पीछे है, तो ऐसे में लोगों के दिमाग में सवाल उठ सकता है कि फिल्म की स्टोरी पर सरकार का नियंत्रण कितना है? तो मैं बता दूं कि जो लोग मुझे जानते हैं वो इस तरह की हिम्मत नहीं कर सकते. गुरदीप और मैं शुरुआत से एक ही पेज पर थे. मैंने यह विषय इसलिए चुना क्योंकि इसमें कोई ऐसी बात नहीं है जिस पर सरकार नियंत्रण करना चाहे.

आजकल जो कह रहे है कि सुभाष चंद्र बोस हमारे हैं, उनको दरअसल पता ही नहीं है कि वो कौन थे और किसके थे. इस फिल्म से उनकी भी आंखे खुलेंगी. फिल्म की कहानी पहले ही लिखी जा चुकी थी और जब उस पर सहमति बन गई है, तो शूट करने में क्या दिक्कत आती.

बोस के हिटलर से मिलने को लेकर कई सवाल उठते हैं, लोग इसे अच्छा नहीं मानते पर मैं यही कहूंगा कि वह बोस का एक राजनीतिक कदम था. अगर हम उनके उस कदम को उस दौर के ही संदर्भ में देखे तो किसी को ग़लत नहीं लगेगा. आज हम कहते हैं कि हिटलर के साथ जाना उनका ग़लत कदम था पर एक बात यह भी है कि हिटलर अंग्रेज़ों का दुश्मन था और दुश्मन का दुश्मन दोस्त होता.

तो इसे उसी संदर्भ में देखा जाना चाहिए. सुभाष चंद्र बोस को यह लगता था कि बिना सशस्त्र संघर्ष के आज़ादी नहीं मिल सकती है. उनको जापान का समर्थन मिला और उन्होंने सोचा कि वे ऐसा करके आईएनए बनाकर भारत में घुसेंगे.

ऐसी फिल्म के बाद मुझसे ये सवाल भी पूछा जाएगा कि क्या मैं मौजूदा आंदोलन को किसी फिल्म की शक्ल दर्ज करना चाहूंगा, तो मेरा जवाब है कि मुझे आज के भारत में ऐसा कोई हीरो नहीं नज़र आता है. काफी सालों से यह हो रहा है कि बहुत सारी बायोपिक बन रही हैं, पर मुझे आज की तारीख में कोई ऐसा हीरो नहीं नज़र आता है. आज का युवा एकदम मस्त है, उसे किसी भी चीज़ की चिंता नहीं है. लोग भले कहें कि देश तरक्की कर रहा है पर ऐसा नहीं है. देश में बहुत सारी समस्याएं हैं. मुझे लगता है कि इन समस्याओं के बीच कोई हीरो निकलकर आएगा या फिर हीरो का कोई जत्था दिखेगा. अगर ऐसा होता है तो मैं ज़रूर इस फ़िल्म के बारे में सोचूंगा.

देश की जिन समस्याओं की मैं बात कर रहा हूं, उसे बताता हूं. जबसे यह नई सत्ता आई है, तब से लोग एक-दूसरे से नाराज़ हैं. पहले जो लोग सामान्य थे, कभी विवाद नहीं करते थे, वो लोग आज सिर्फ झगड़ा कर रहे हैं. दो लोग जहां मिल रहे हैं, वहां झगड़ा कर रहे हैं. मैं कलाकार के बतौर नहीं देखता, मैं आम आदमी की ही तरह सड़क पर देखता हूं तो मुझे सब झगड़ा करते नज़र आ रहे हैं. और झगड़े का चलन है वो पिछले कुछ सालों में बढ़ गया है, पहले ऐसा नहीं था.

बदलते समय में सेंसरशिप को लेकर नजरिया भी बदला है. पर पहले ये समझना चाहिए कि सेंसरशिप लगती क्यों है? जब फिल्म में न्यूडिटी हो या हिंसा हो तब सेंसरशिप लगती है. या फिर ऐसा कुछ हो जब किसी समुदाय या मज़हब की भावना आहत करती हो, तब ये सेंसरशिप बीच में आती है.

निजी तौर पर मैं अपनी फिल्मों में गाली-गलौज करता नहीं हूं. मैंने अनुराग कश्यप की फिल्म में अभिनेता के रूप में काम किया, वो डायरेक्टर था, उसने मुझे गाली देने को कहा तो मैंने दी. मैं कोशिश करता हूं कि अपनी फिल्म में गाली का इस्तेमाल नहीं करूं. मैंने अभी तक जितनी भी फिल्म बनाई है, उसमे कभी भी गाली-गलौज नहीं रखी. मेरी पहली फिल्म थी हासिल, छात्र राजनीति पर आधारित थी, इलाहाबाद की पृष्ठभूमि थी पर उसमें एक गाली नहीं है. पान सिंह तोमर है, बाग़ी-डकैत सब है पर एक गाली नहीं है और मुझे लगता है वही चुनौती है मेरे लिए.

tigmanshu collage

फिर जब आप देशज भाषा फिल्म में रखते हैं तो गाली की ज़रूरत नहीं रहती. वो मैं करता नहीं. दूसरी बात है हिंसा . मुझे एक्शन फिल्में हमेशा से पसंद रही हैं, तो वो होता है. तीसरी बात जब कोई राजनीतिक बात करें तो ऐसी बात करने वाले डायरेक्टर हैं ही कहां? वो एक ऐसा मुद्दा है जो बहुत कम ही लोग कर पाते हैं.

मुझे अन्य लोगों की तरह सेंसर बोर्ड से दिक्कत नहीं है. मेरी परेशानी दूसरी है. मुझे उनके द्वारा किए गए भेदभाव से है.  जो बड़े कॉरपोरेट, ताकतवर निर्माता हैं, उनकी फिल्म वो तुरंत पास कर देते हैं, लेकिन बाकी जो नई, छोटी बजट की फिल्में हैं, उन पर वे अंकुश लगाते हैं.  मुझे लगता है इस विषय पर कोई भी मीडिया बात नहीं करता है.

इसका कारण क्या है. कई कारण हो सकते हैं. मुझे लगता है कि राजनीति की तरह ही फिल्म जगत में कुछ परिवारों का कब्ज़ा है. दादाजी फिल्म बनाते थे, उनके बेटे बनाते थे, वहां सब परिवार है. जितने मुख्य पावरफुल लोग हैं, वो परिवार वाले लोग हैं. ‘बचपन से उनके स्कूल में हम लोग पढ़े, मेरा दोस्त हृतिक रोशन है, मैं डायरेक्टर बन गया हृतिक मेरी फिल्म में एक्टिंग करेगा.’ यही सब हो रहा है. तो जो हम बाहर से आए हुए लोग हैं, उन्हें होती है दिक्कत.

अच्छा सेंसरशिप से जुड़ी एक बात और है.  मैंने जब ‘साहब बीवी और गैंगस्टर’ बनाई तो मुझे ‘ए’ सर्टिफिकेट दिया गया. इस श्रेणी की फ़िल्म का टीवी पर आना संभव नहीं होता और टीवी पर आने से ही बहुत बड़ी आमदनी होती है. तो मैंने जब साहब बीवी और गैंगस्टर रिटर्न्स’ बनाई तो मैंने सोचा कि पहली फिल्म की तरह इसमें कोई न्यूडिटी नहीं रखी. एकदम साफ-सुथरी फिल्म थी पर बावजूद इसके इसे ‘ए’ सर्टिफिकेट दिया गया.

जब मैंने कारण पूछा तो उन्होंने कहा आपका थीम एडल्ट है. अरे! अब बताइए ये कहां का न्याय है?

ये तो सेंसरशिप के नए नियम-क़ानून हैं और भारत जैसा कोई और देश पूरी दुनिया में नहीं है. मतलब ऐसा जटिल ताना-बाना कहीं और नहीं दिखेगा. एकदम मधुमक्खी का छत्ता है और उसमें उंगली नहीं करनी चाहिए. वरना सब तकलीफ़ में आ जाएंगे. सब जी रहे हैं, सब मस्त हैं.

तो यहां पर अगर आप कोई फिल्म बना रहे हैं तो मैं ये मानता हूं कि ऐसी फिल्म नहीं बनानी चाहिए जिससे आप किसी समुदाय को ठेस पहुंचाएं या दंगे की स्थिति पैदा हो जाए, लोग मार-काट पर उतर आएं. ऐसा संभव है इसलिए बतौर कलाकार, फिल्मकार इस बात का निश्चित रूप से ही ख़्याल रखना चाहिए और उस पर सेंसरशिप होनी चाहिए ये मैं मानता हूं.

ये सब संविधान में ही लिखा है कि धार्मिक भावनाओं का ख़्याल रखा जाना चाहिए, देश हित का ध्यान रखा जाना चाहिए और वो इसी का ध्यान रखने के लिए हैं पर फिल्मकार या कलाकार की भी अपनी समझ होती है, उसका भी ध्यान रखा जाना चाहिए.

इतनी सेंसरशिप नहीं होनी चाहिए, और हम आज किस सदी में जी रहे हैं. इंटरनेट पर सब उपलब्ध है, जिसको देखना है वो देख सकता है. हम क्यों इसके पीछे पड़े हैं! और आजकल सेंसर बोर्ड से फिल्म पास करवाना बड़ी हुज्जत का काम होता है. अगर आपकी फिल्म ‘शावा शावा’ टाइप की नहीं है तो बहुत दिक्कत हो जाती है.

बहरहाल, रागदेश को लेकर मेरी बहुत उम्मीदें हैं. मेरा अब तक इस देश से विश्वास उठा नहीं है. जिन्हें इस बारे में पता है वे ज़रूर देखेंगे.  कई लोग तो रो दिए टीज़र देख के. जिन्हें इतिहास के इस पन्ने के बारे में पता है वे ज़रूर देखेंगे. और जिन लोगों पता चलेगा मीडिया के ज़रिये, वे भी ज़रूर देखेंगे.

tigmanshu

फिल्म गैंग्स आॅफ वासेपुर में तिग्मांशु धूलिया के एक्टिंग को खूब सराहा गया.

मैं ख़ुद इतिहास का छात्र था, तब भी मुझे इतना नहीं पता था आईएनए के बारे में. मुझे लगता था कि आज़ादी मिल गई जिंदाबाद-मुर्दाबाद करके, मेज़ पर बैठके बात करके. हमने तो खून बहाया ही नहीं है आज़ादी के लिए. मैं भी ऐसा सोचा करता था लेकिन जब पढ़ा तो पता चला कि कितने लोगों ने अपना ख़ून दिया है इसकी आज़ादी में. सोचिए 25,000 सैनिक मारे गए थे आईएनए के. तो लोगों को ये पता चलना चाहिए कि आज़ादी मुफ़्त में नहीं मिली है. इतना खून बहा के आज़ादी जो मिली है, हमें उसे अहमियत देने की ज़रूरत है.

उस वक़्त की देशभक्ति, राष्ट्रवाद और आज की बात एकदम अलग है. आजकल तो लोग यह भी कह देते हैं कि 1857 (की क्रांति) भी किसी की चाल थी. मुझे लगता है कि आईएनए का काम या सुभाष चंद्र बोस जी ने जो कुछ भी किया वो 1857 का ही दोहराव था. हिंदू-मुसलमान सब मिलकर लड़े.

और मुझे नहीं पता कि राष्ट्रवाद की क्या परिभाषा है, क्या मायने हैं? और आज ऐसा क्यों हो गया है कि मुझे राष्ट्रवाद की परिभाषा को समझना-समझाना पड़े.

फिल्म के संदर्भ में बात करूं तो फिल्म में एक दृश्य है जहां सुभाष चंद्र बोस चेट्टियार मंदिर में अपने अफसरों के साथ जाते हैं और उनके साथ कुछ मुसलमान अफ़सर भी थे. वहां के पंडित ने उन्हें अंदर से आने से रोका तो 2-3 मुस्लिम बाहर आ गए, जब सुभाष चंद्र बोस को ये पता चला तो वे ख़ुद बाहर आ गए.

उन्होंने कहा है कि मुझे तो पूरे हिंदुस्तान के लिए प्रार्थना करनी है, हिंदुस्तान में तरह- तरह के लोग रहते हैं. लगता है कि हम आपके भगवान के लायक नहीं हैं. पंडित ऐसा सुनकर सबको अंदर ले गए और फिर सबको टीका लगाया लगाया. जब वे  बाहर आए तो उन्होंने अपने माथे से टीका हटा दिया और कहा कि अगर हमारे चेहरे में हमारा धर्म नज़र आएगा तो हिंदुस्तान बनने से पहले ही बंट जाएगा.

(अखिल कुमार से बातचीत पर आधारित)