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असम: तिनसुकिया में छह दिन से हो रहा है तेल के कुएं से गैस रिसाव, 2,000 लोग विस्थापित

27 मई को तिनसुकिया के बाघजान गांव के पास ऑयल इंडिया लिमिटेड के एक तेल के कुएं में विस्फोट होने के बाद गैस रिसाव शुरू हुआ था. राज्य सरकार और कंपनी का कहना है कि इसे नियंत्रित करने के प्रयास जारी हैं. वहीं किसी भी नुकसान के डर से क्षेत्र के हज़ारों लोगों को यहां से हटाकर राहत कैंपों में पहुंचा दिया गया है.

(फोटो साभार: ट्विटर/NE Voice)

(फोटो साभार: ट्विटर/NE Voice)

गुवाहाटी: कोरोना वायरस और बाढ़ के खतरे से जूझ रहे असम में एक और संकट सिर उठा चुका है. ऊपरी असम के तिनसुकिया जिले में बीते छह दिनों से ऑयल इंडिया लिमिटेड (ओआईएल) के एक तेल के कुएं से गैस लीक हो रही है.

एनडीटीवी की रिपोर्ट के अनुसार सूत्रों ने बताया कि अब तक कंपनी इस रिसाव को बंद नहीं कर सकी है. राजधानी गुवाहाटी से करीब 450 किलोमीटर दूर तिनसुकिया के बाघजान गांव में स्थित इस प्लांट में बीते बुधवार 27 मई को विस्फोट (ब्लोआउट) हो गया था, जिसके बाद इस कुएं से रिसाव शुरू हुआ.

इसके बाद से कुएं के डेढ़ किलोमीटर के दायरे में रहने वाले करीब दो हजार लोगों को यहां से ले जाया गया है और अब वे राहत कैंपों में रह रहे हैं. राहत कार्य के लिए एनडीआरएफ की टीम को भी बुलाया गया है.

ब्लोआउट वह स्थिति होती है, जब तेल और गैस क्षेत्र में कुएं के अंदर दबाव अधिक हो जाता है और उसमें अचानक से विस्फोट के साथ और कच्चा तेल या प्राकृतिक गैस अनियंत्रित तरीके से बाहर आने लगते हैं. कुएं के अंदर दबाव बनाए रखने वाली प्रणाली के सही से काम न करने से ऐसा होता है.

असम सरकार के आग्रह के बाद केंद्र सरकार और ऑयल इंडिया द्वारा इस स्थिति को काबू करने के लिए विशेषज्ञ भेजे गए हैं. ऑयल इंडिया का कहना है कि वे अभी नहीं बता सकते कि इसे कब तक नियंत्रित किया जा सकेगा. उन्होंने कहा कि वे अमेरिकी विशेषज्ञों से भी बात कर रहे हैं और उनकी भी मदद ली जा सकती है.

छह दिनों से लगातार हो रहे इस रिसाव से आसपास के संवेदनशील वेटलैंड, एक राष्ट्रीय उद्यान और लुप्त हो रही प्रजातियों पर संकट के बादल मंडरा रहे हैं. बाघजान के रहवासियों ने बताया है कि उन्होंने पास के मागुरीबिल झील में डॉल्फिंस के शव पड़े देखे हैं.

यह क्षेत्र हूलॉक गिबोन जानवर के प्रवास का इलाका भी है. यह इको-सेंसिटिव ज़ोन है, जहां डिब्रु सैखोवा राष्ट्रीय उद्यान भी है, जो प्रवासी पक्षियों और जंगली घोड़ों [Feral Horse] के लिए जाना जाता है. गांव वालों का कहना है कि उन्हें गैस की महक आ रही है और इस उद्यान में कई जगहों पर तेल फैल चुका है.

इस बारे में सोशल मीडिया पर ढेरों वीडियो साझा किए जा रहे हैं. कथित तौर पर मछलियों और डॉल्फिन की मौत होने के बाद राज्य के वन विभाग ने इस कंपनी को नोटिस जारी किया है. अधिकारियों के अनुसार मुख्यमंत्री सर्वानंद सोनोवाल ने राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के अध्यक्ष को घटनास्थल का दौरा करके तत्काल इस बारे में रिपोर्ट सौंपने का निर्देश दिया है.

एक अधिकारी ने बताया कि गैस रिसाव से पर्यावरण को हुए नुकसान के बारे में तिनसुकिया के प्रभागीय वन अधिकारी के माध्यम से ओआईएल को नोटिस भेजकर विस्तृत रिपोर्ट तलब की गई है.

शनिवार को असम सरकार के मंत्री और प्रवक्ता चंद्रमोहन पटवारी ने बताया, ‘जिस दिन यह हुआ था, उसी दिन केंद्रीय पेट्रोलियम मंत्री और केंद्र ने इसे गंभीरता से लिया. केंद्र और विशेषज्ञों को भेज रहा है. ओआईएल के निदेशक खुद इसे देख रहे हैं. आने वाले समय में और विशेषज्ञ आएंगे.’

सूत्रों के अनुसार ओआईएल की एक पांच सदस्यीय टीम ने घटना की जांच शुरू कर दी है. कंपनी के प्रवक्ता त्रिदीप हजारिका ने बीबीसी से बातचीत में कहा कि वे आगामी बुधवार को इस रिसाव को नियंत्रित करने के बारे में आखिरी प्रयास किया जाएगा.

उन्होंने बताया, ‘हमारी ऑयल इंडिया की टीम के अलावा ओएनजीसी से आठ विशेषज्ञ आए हैं जो बीते तीन-चार दिनों से इस काम में लगे हैं. हमें लग रहा है कि इस काम में जल्द ही सफलता मिलेगी. अगर हमें ज़रूरत पड़ी तो तीन अमेरिकी विशेषज्ञों से भी संपर्क किया जा रहा है. इस काम में सरकार पूरी मदद कर रही है.’

गैस रिसाव से हुए नुकसान के बारे में एक स्थानीय युवक ने बीबीसी को बताया कि इस घटना के बाद से यह इलाका रहने लायक नहीं बचा है. पर्यावरण को तो क्षति पहुंची ही है, गांव के लोग भी बेघर हो गए हैं.

उन्होंने यह भी कहा, ‘यहां ज़्यादातर लोग किसान हैं और कुछ पास की नदियों में मछलियां पकड़कर गुजारा करते हैं, लेकिन रिसाव के कारण यहां से गुजरने वाली डिब्रू और लोहित नदियों का पानी पूरी तरह प्रदूषित हो गया है. कई लोगों के मवेशी मर गए, पेड़-पौधे बर्बाद हो गए हैं. रिसाव तो देर-सबेर बंद कर दिया जाएगा लेकिन हम लोगों को सामान्य तरह से फिर बसाने में कितना समय लगेगा, कोई नहीं जानता.’

हजारिका ने यह भी कहा कि इस रिसाव से कोई रसायन नहीं निकल रहा है, जिससे किसी के बीमार पड़ने की आशंका हो. उन्होंने कहा, ‘जहां तक किसी के बीमार पड़ने की बात है तो यह प्राकृतिक गैस है जिसमें कोई रसायन नहीं होता जिससे सीधे कोई नुकसान हो.’

हालांकि पर्यावरण पर इसके दुष्प्रभाव पड़ सकने की बात उन्होंने मानी है. उनका कहना है कि इसके लिए स्थानीय प्रशासन और वन और पर्यावरण विभाग यह जांचने में लगे हैं कि इससे अब तक पर्यावरण पर कितना प्रभाव पड़ा. जांच के बाद जो नुकसान हुआ होगा, उसकी भरपाई ओआईएल की ओर से की जाएगी.

इससे पहले साल 2005 में डिब्रूगढ़ के डिकोम में एक बड़ा ब्लोआउट हुआ था, जिसे 45 दिन बाद अमेरिकी विशेषज्ञों की मदद से बंद किया जा सका था.

(समाचार एजेंसी भाषा से इनपुट के साथ)