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‘हिंदू-मुस्लिम दंगे और जाति आधारित संघर्षों को पाठ्यक्रम में शामिल नहीं करना चाहिए’

भारतीय सामाजिक विज्ञान अनुसंधान परिषद के प्रमुख ब्रज बिहारी कुमार ने कहा कि जेएनयू शिक्षा का नहीं बल्कि कार्यकर्ता तैयार करने का स्थान बनता जा रहा है.

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आईसीएसएसआर प्रमुख ब्रज बिहारी कुमार. (फोटो साभार: न्यूज 18)

भारतीय सामाजिक विज्ञान अनुसंधान परिषद (आईसीएसएसआर) के प्रमुख ब्रज बिहारी कुमार के अनुसार आज के समय में पाठ्यपुस्तकों का उद्देश्य कार्यकर्ता तैयार करना हो गया है, शिक्षित विद्यार्थी नहीं.

उन्होंने कहा कि स्कूली पाठ्यक्रम में हिंदू-मुस्लिम दंगे और जाति आधारित संघर्ष जैसे विषयों को शामिल नहीं किया जाना चाहिए.

सामाजिक विज्ञान के क्षेत्र में शोध करने वाले प्रमुख संस्थान का कार्यभार संभालने वाले मानवविज्ञानी कुमार का मानना है कि जवाहरलाल नेहरू जैसे विश्वविद्यालय कार्यकर्ताओं (एक्टिविस्ट)को पोषित-पल्लवित करने का स्थान बनते जा रहे हैं.

76 वर्षीय कुमार का यह भी मानना है कि जाति आधारित संघर्ष और देश में असहिष्णुता जैसे विषय सतही हैं और इन्हें भारतीय समाज के प्रतिबिंब के तौर पर नहीं देखा जा सकता.

उन्होंने पीटीआई को दिए इंटरव्यू में कहा,‘पाठ्यपुस्तकें छात्रों को कार्यकर्ता (एक्टिविस्ट) बनाने के लिए नहीं बल्कि उन्हें शिक्षित करने के लिए होती हैं. दुर्भाग्य से आज पुस्तकें एक एजेंडा के साथ तैयार की जाती हैं और पाठ्यक्रमों में बदलाव जरूरी हो गया है.छात्रों की सोच और उनके विकास में हिंदू-मुस्लिम दंगे और जाति आधारित टकराव जैसे विषय नहीं होने चाहिए.’

कुमार ने कहा,‘आज पाठ्यपुस्तकें बुरी स्थिति में हैं. मैंने सामाजिक विज्ञान की किताब में एक नक्शा देखा जिसमें जम्मू कश्मीर को भारत के बाहर दिखाया गया, वहीं एक और नक्शे में पूर्वोत्तर को भारत में नहीं दिखाया गया. हमारी पाठ्यपुस्तकों में कई खामियां हैं.’

उन्होंने बताया,‘मैंने इस मुद्दे को रेखांकित करते हुए पूर्व एचआरडी मंत्री स्मृति ईरानी को दो पत्र भी लिखे थे लेकिन मुझे कोई जवाब नहीं मिला.

उन्होंने जेएनयू जैसे विश्वविद्यालयों पर निशाना साधते हुए कहा,‘जब छत्तीसगढ़ में एक ही परिवार के कई लोगों का सामूहिक संहार कर दिया जाता है और जेएनयू में उल्लास मनाया जाता है और हत्यारों के समर्थन में मार्च निकाला जाता है तो इस बारे में ज्यादा कुछ नहीं कहा जा सकता कि यह किस तरह का विश्वविद्यालय है.’

कुमार ने जेएनयू के संदर्भ में कहा कि वे खुद को सर्वश्रेष्ठ विश्वविद्यालयों में से एक दिखाते हैं लेकिन जब वे राष्ट्रीयता की भावनाओं को आहत कर रहे हैं और शिक्षा का नहीं बल्कि कार्यकर्ताओं को तैयार करने का स्थान बनते जा रहे हैं तो वे उत्कृष्ट होने का दावा नहीं कर सकते. करदाता इसलिए अपना पैसा नहीं देते कि कार्यकर्ता तैयार किये जाएं.