भारत

क्या नरेंद्र मोदी सरकार ने कोरोना से जंग का मोर्चा छोड़ दिया है?

प्रधानमंत्री कह रहे हैं कि इस कठिन समय में उनकी सरकार के फ़ैसलों से गांवों में रोजगार, स्वरोजगार और लघु उद्योग से जुड़ी विशाल संभावनाएं खुली हैं, लेकिन वे यह नहीं बता रहे कि जिसे ज़िंदा रहने के लिए तत्काल मदद की ज़रूरत हो, उसे मुंगेरीलाल जैसे भविष्य के हसीन सपने कैसे दिख सकते हैं?

Dadri: Migrant workers wait in a queue while being lodged at a camp by the Uttar Pradesh government, during ongoing COVID-19 lockdown, at Dadri in Gautam Buddha Nagar district, Wednesday, May 20, 2020. (PTI Photo/Atul Yadav) (PTI20-05-2020_000214B)

(फोटो: पीटीआई)

क्या नरेंद्र मोदी सरकार ने कोरोना के खिलाफ देश की जंग के किसी तार्किक परिणति तक पहुंचने से पहले ही मोर्चा छोड़ दिया है? स्थितियों के वस्तुनिष्ठ विश्लेषण बताते हैं कि बात इतनी-सी ही नहीं है.

लॉकडाउन के शुरू में जहां प्रधानमंत्री इस जंग को लेकर इतने उत्साहित थे कि महाभारत के 18 दिनों के विपरीत कोरोना को 21 दिनों में ही करुणा से जीत लेने जैसा दावा कर रहे थे, उसके पांचवें चरण में वे हताश-निराश ‘लंबी लड़ाई’ की बात कहते और प्राथमिकताएं बदलते दिखाई देते हैं. इस कदर कि उनके कई आलोचक कहते हैं कि वे लड़ाई का रास्ता ही भूल गए हैं.

इसे कुछ यूं समझ सकते हैं कि उन्होंने गत छह अप्रैल को अपनी पार्टी के स्थापना दिवस पर इस लड़ाई की विकटता का हवाला देते हुए उसके कार्यकर्ताओं से किसी भी तरह के जश्न से परहेज बरतने और महामारी को हराने के ‘एकमात्र’ संकल्प के प्रति समर्पित होने को कहा था.

इससे पहले उन्होंने देशवासियों से 22 मार्च को शाम पांच बजे घरों के दरवाजों, खिड़कियों व बालकनियों पर पांच बजे शाम पांच मिनट तक तालियां व थालियां बजवाने और पांच अप्रैल को रात नौ बजे नौ मिनट तक मोमबत्ती, दीया, टार्च या मोबाइल की फ्लैशलाइट जलवाने जैसी कवायदें भी करवाई थीं.

लेकिन अब उनकी सरकार और पार्टी दोनों की प्राथमिकताएं बदल गई है और दोनों उनकी दूसरी सरकार की पहली वर्षगांठ के जश्न में मुब्तिला हैं. यह तब है जब लंबे लॉकडाउन के कारण देश की श्रमजीवी जमातों की मुसीबतें समाधान से दूर होती जा रही हैं और उसके समक्ष जीवन-मरण का प्रश्न उपस्थित है.

इतना ही नहीं, आईसीएमआर के अनुसार अप्रैल की शुरुआत में कोरोना की जो पॉजिटिविटी दर 4.8 थी और 16 अप्रैल से 28 अप्रैल के बीच गिरकर 3.0 पर आ गई थी, अब दोगुनी से भी ज्यादा बढ़कर 7.0 पर आ गई है. विशेषज्ञ कह रहे हैं कि आगे आने वाले कुछ सप्ताह या महीने महामारी के वापस तेजी से बढ़ने के भी हो सकते हैं.

लॉकडाउन से कोरोना संक्रमण की चेन तोड़ने का सरकारी मंसूबा किस कदर विफल रहा है, उसका गवाह यह तथ्य है कि लॉकडाउन से पहले देश इससे सर्वाधिक प्रभावित दस देशों की सूची में भी नहीं था, अब वह टाॅप सेवन में है.

अब लगभग रोजाना एक दिन में आठ-आठ हजार से ज्यादा नये संक्रमण सामने आ रहे हैं. कई विशेषज्ञ सरकार के दावे को नकारकर कह रहे हैं कि वायरस का सामुदायिक संक्रमण भी आरंभ हो गया है.

इन हालात में भी प्रधानमंत्री कोरोना को हराने के संकल्प को लेकर इस हद तक अनमने हैं कि न उन्हें असहमतों के सुझाव गवारा हैं, न ही सवाल. वे अपनी गलतियां मानने और उनसे सबक लेने को भी तैयार नहीं हैं.

जो सवाल उठाए, उनके समर्थक उसकी समझ पर ही सवाल उठाने लग जाते हैं. इसलिए कि उन्हें हर हाल में प्रधानमंत्री को कोरोना के विरुद्ध लड़ाई का अप्रतिम योद्धा सिद्ध करना है.

लेकिन देश कैसे भूल सकता है कि इन समर्थकों में कब किसने गोमूत्र को कोरोना का रामबाण इलाज या लॉकडाउन को सूतक जैसा बताया और ताली या थाली बजाने से कीटाणुओं के दूर हो जाने जैसी बकवास की?

कौन है जो टेस्टिंग किटों व पीपीई आदि की उपलब्धता या डॉक्टरों व स्वास्थ्यकर्मियों की सुरक्षा आदि पर चल रही चर्चाओं को धीरे-धीरे म्यूट कर देना और देश की वास्तविक चिंताओं को  परदे के पीछे कर देना चाहता है?

बहरहाल, हालत यह हो गई है कि ‘शब्दों के जादूगर’ प्रधानमंत्री को अपनी गत रविवार की ‘मन की बात’ में गरीबों व मजदूरों की पीड़ा बयां करने के लिए शब्द नहीं मिले. शब्द नहीं मिले, कोई बात नहीं, लेकिन उन्होंने जो कुछ कहा, उससे लगता है कि उन्हें इस पीड़ा के खात्मे का कोई रास्ता भी नहीं मिल रहा.

इसीलिए यह कहने के बाद कि इन वर्गों की तकलीफ, उनका दर्द, उनकी पीड़ा शब्दों में बयां नहीं की जा सकती, जैसे डरे हुए हों कि कहीं कोई यह न पूछ बैठे कि आप जैसे महापराक्रमी प्रधानमंत्री के देखते-देखते ऐसा कैसे हो गया, वे खुद पूछने लगे कि हममें कौन ऐसा होगा, जो उनकी और उनके परिवार की तकलीफों को अनुभव न कर रहा हो?

एक पल को उन्होंने यह आश्वस्त करने की कोशिश जरूर की कि हम सब इस तकलीफ को बांटने का प्रयास कर रहे हैं, लेकिन यह वैसे ही था जैसे 25 मार्च को बिना सोचे-समझे देशव्यापी लॉकडाउन से पहले उन्होंने, और तो और, राज्यों के मुख्यमंत्रियों तक को विश्वास में नहीं लिया और अब उसकी विफलता गले आ पड़ी है तो यह तक नहीं बता पा रहे कि श्रमिक स्पेशल ट्रेनें श्रमिकों को समय से और सही-सलामत घर क्यों नहीं पहुंचा पा रहीं?

पहले से कई गुने विषम हालात में जैसे-तैसे जुआ पटककर लॉकडाउन से बाहर निकलने की नौबत है, तो ठीकरे फोड़ने के लिए सिरों की तलाश के क्रम में पीएम से लेकर सीएम और डीएम तक सबको ‘निर्णायक’ बनाया जा रहा है.

इस बीच भारत को आत्मनिर्भर बनाने का नारा देकर लोगों का आत्मविश्वास इस तरह छीन लिया गया है कि वे जैसे लॉकडाउन में रामभरोसे थे, वैसे ही रामभरोसे अनलाॅक भी हो रहे हैं.

कारण यह कि देश के लोकतंत्र को सर्वथा सीमित करते हुए सरकार ने कोरोना वायरस से भी ज्यादा खतरनाक यह अधिकार अभी भी अपने हाथ में रखा हुआ है कि वह जब चाहेगी, ताला खोलकर लोगों को अनलाॅक कर बाहर निकाल देगी और जब चाहेगी फिर से लाॅक कर देगी.

कभी उनसे कहेगी कि न ये कर सकते हैं, न वो, कभी यह कि ये कर सकते हैं पर वो नहीं कर सकते. फिर यह कि वो कर सकते हैं पर ये नहीं कर सकते या ये-वो कर सकते हैं पर वो-ये नहीं कर सकते.

यकीनन, लॉकडाउन के चार चरणों में यही हुआ है और पांचवें में, जिसे अनलाॅक चरण कहा जा रहा है, प्रधानमंत्री के पास इस सवाल का जवाब नहीं है कि क्या इसका उस ‘अतिरिक्त सतर्कता’ से कोई मेल है, प्रधानमंत्री बारम्बार जिसकी वकालत कर रहे है?

अगर नहीं है तो उन्हें कम से कम इतना तो बताना ही चाहिए कि लगातार बढ़ते संक्रमणों से निपटने के लिए उनकी सरकार ने कोई पुख्ता योजना बनाई है क्या? क्या लगातार ड्यूटी में लगे डाक्टरों, नर्सों, स्वास्थ्यकर्मियों, पुलिसकर्मियों के शारीरिक स्वास्थ्य और मानसिक मजबूती को संभावित संकट के लिहाज से परख लिया गया है?

अगर हां, तो बार-बार लंबी लड़ाई की बात कर आंतकित करने के बजाय देश को आश्वस्त क्यों नहीं किया जाता और अतिरिक्त सतर्कता को लेकर यह जताते हुए कि अब सरकार कुछ नहीं कर सकती, सारा जिम्मा लोगों के ही कंधों पर क्यों डाला जा रहा है?

कैसे देश का इस विडंबना से सामना है कि एक ओर प्रधानमंत्री जताने में लगे हैं कि देश कोरोना से पूरी एकजुटता व संकल्प से लड़ रहा है और दूसरी ओर राज्यों द्वारा अपनी सीमाएं सील करने का ऐसा खेल खेला जा रहा है जैसे वे अलग-अलग प्रदेश न होकर अलग-अलग देश हों.

पिछले दिनों कई प्रदेशों की सीमाओं पर प्रवासी मजदूरों को इस तरह इधर से उधर धकेला गया जैसे वे किसी प्रदेश की नहीं, देश की सीमा का उल्लंघन कर रहे हों. इस लड़ाई में केंद्र सरकार भी कभी अमीरों व गरीबों को एक निगाह से देखती नहीं दिखी.

उसने इन दोनों वर्गों में एकजुटता को कौन कहे, सदाशयता के भी प्रयास नहीं किये. उलटे धन के वर्गभेद को पहले से अधिक क्रूर रूप में नजर आने दिया. अन्यथा कामगारों की तकलीफें दूर करने की ईमानदार कोशिशें इतनी मुश्किल न होतीं. वे इसलिए मुश्किल बनी हुई हैं कि जब वे न घर के रह गए हैं न घाट के और उनकी ‘भूखा तब पतियाये, जब दो कौर भीतर जाए’ की हालत है.

प्रधानमंत्री कह रहे हैं कि उनकी सरकार के फैसलों से गांवों में रोजगार, स्वरोजगार और लघु उद्योग से जुड़ी विशाल संभावनाएं खुली हैं, लेकिन यह नहीं बता रहे कि जिसे जिंदा रहने के लिए तत्काल मदद की जरूरत हो, उसे मुंगेरीलाल जैसे भविष्य के हसीन सपने कैसे दिख सकते हैं?

वह भी तब, जब इन करोड़ों कामगारों को कोरोना संक्रमण के प्रबल वाहकों के तौर पर प्रचारित कर उन्हें गांवों और शहरों दोनों में अवांछनीय बना दिया गया है.

प्रधानमंत्री और उनकी सरकार का दायित्व सच पूछिए तो देशवासियों की पीड़ा बयान करने के शब्द नहीं, उसके खात्मे के सूत्र तलाशना है. लेकिन लगातार अपने मुंह मियां मिट्ठू बनी रहने वाली उनकी सरकार का रवैया ऐसा है, जैसे वह चाहती हो कि यह आपदा और किसी के लिए कुछ भी साबित हो, उसके लिए विरोधियों पर राजनीतिक बढ़त पाने के अवसर के रूप में तब्दील हो जाए.

ऐसा लगता है कि जनता के बेहतर जीवन, स्वास्थ्य, शिक्षा व रोजी-रोजगार से जुड़े मसलों पर वस्तुनिष्ठ विचार-विमर्श में उसकी कोई रुचि नहीं है. तिस पर उसे यह तक देखना गवारा नहीं कि प्रधानमंत्री द्वारा कथित तौर पर 20 लाख करोड़ का जो राहत पैकेज दिया गया है, उसकी कितनी रकम जरूरतमंदों तक पहुंच रही है और कितनी बिचैलियों की जेबों में जा रही है?

फिलहाल, ‘दूसरी सरकार की पहली वर्षगांठ के वर्चुअल जश्न’ में प्रधानमंत्री और उनकी सरकार का सारा जोर अपनी तथाकथित उपलब्धियां गिनाकर कोरोना से जटिल जंग के वक्त शुतरमुर्गों की तरह रेत में सिर गड़ाकर तूफान के गुजर जाने का इंतजार करने पर है.

यह तक देखना गवारा नहीं कि जिस कथित गुजरात माॅडल का प्रचार करके उन्होंने देश की सत्ता हासिल की, कोरोना काल में उसका अहमदाबाद स्थित सिविल अस्पताल कालकोठरी जैसा कहा गया है और हाईकोर्ट को दवाओं की कमी व मरीजों के साथ भेदभाव को लेकर जांच समिति बनानी पड़ी है.

इसे जंग के वक्त मोर्चा छोड़ना कहें या हाथ पर हाथ धरकर बैठ जाना, बात तो एक ही है.

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं.)