भारत

सोशल मीडिया पर एससी/एसटी के ख़िलाफ़ ​जातिसूचक टिप्पणी दंडनीय अपराध

दिल्ली हाईकोर्ट ने एक अनुसूचित जाति की महिला की याचिका पर सुनाया फैसला.

A 3D plastic representation of the Facebook logo is seen in front of displayed logos of social networks in this illustration in Zenica, Bosnia and Herzegovina May 13, 2015. REUTERS/Dado Ruvic

(फोटो: रॉयटर्स)

दिल्ली हाईकोर्ट ने सोशल मीडिया पर अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के किसी व्यक्ति पर की गई अपमानजनक टिप्पणी को दंडनीय अपराध बताया है.

‘ऑनलाइन एब्यूज़’ और ‘ट्रोलिंग’ के बढ़ते मामलों को ध्यान में रखते हुए हाईकोर्ट ने अपमानजनक टिप्पणी करने वालों पर सख़्ती से कारवाई करने का ये फैसला सुनाया है.

हाईकोर्ट के इस फैसले के दायरे में वॉट्सऐप चैट जैसे अन्य सोशल मीडिया प्लेटफार्म भी आ सकते हैं.

कोर्ट ने अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निरोधक) अधिनियम को अब सोशल मीडिया पर होने वाली जातिसूचक टिप्पणियों के ख़िलाफ़ लागू करते हुए ये साफ़ कर दिया है कि ऐसी आपत्तिजनक टिप्पणी करने वालों पर अब क़ानूनी कारवाई हो सकती है.

दैनिक जागरण की ख़बर के अनुसार जस्टिस विपिन सांघी ने कहा कि यदि कोई फेसबुक यूजर अपनी सेटिंग को ‘प्राइवेट’ से ‘पब्लिक’ करता है, इससे जाहिर होता है कि उसके ‘वॉल’ पर लिखी गई बातें न सिर्फ उसके फ्रेंड लिस्ट में शामिल लोग देख सकते हैं, बल्कि अन्य फेसबुक यूजर्स भी देख सकते हैं.

हालांकि, किसी अपमानजनक टिप्पणी को पोस्ट करने के बाद अगर प्राइवेसी सेटिंग को ‘प्राइवेट’ कर दिया जाता है, तो भी उसे एससी/एसटी ऐक्ट की धारा 3(1)(एक्स) के तहत दंडनीय अपराध माना जाएगा.

टाइम्स ऑफ़ इंडिया की खबर के अनुसार अगर सोशल मीडिया पर किसी अनुसूचित जाति और जनजाति के व्यक्ति की ग़ैरमौजूदगी में भी उसके ख़िलाफ़ आपत्तिजनक बात कही जाती है तो उस मौक़े पर भी मुद्दा इस अधिनियम के दायरे में आता है.

दैनिक जागरण की ख़बर के मुताबिक़ हाईकोर्ट ने ये फैसला एक अनुसूचित जाति की महिला की याचिका पर हो रही सुनवाई के बाद दिया.

मामले में महिला का आरोप दूसरी राजपूत महिला पर था जिसने अपनी फ़ेसबुक ‘वॉल’ पर एक पोस्ट में ‘धोबी’ के लिए आपत्तिजनक शब्दों का इस्तेमाल किया.

ये दोनों महिला एक ही परिवार से हैं. शिकायतकर्ता की वकील नंदिता राव ने कोर्ट से कहा कि आरोपी ने एससी/एसटी ऐक्ट के तहत अपराध किया है. राजपूत महिला ने जानबूझ कर अपनी दलित भाभी का अपमान करने के लिए फेसबुक पर पोस्ट किया था.

वहीं राजपूत महिला ने अपने बचाव में ये दलील दी कि उसकी फेसबुक ‘वॉल’ उसका ‘निजी स्पेस’ है . इसका मकसद किसी को ठेस पहुंचाना नहीं था. आरोपी ने यह दलील भी दी कि उसके पोस्ट में उसने कभी अपनी भाभी का जिक्र नहीं किया. देवरानी ने कहा कि उसने धोबी समुदाय की महिलाओं को लेकर पोस्ट लिखी थी, न कि किसी खास व्यक्ति के लिए.

कोर्ट ने राजपूत महिला के ख़िलाफ़ एफआईआर को ख़ारिज करते हुए फ़ेसबुक को निजी स्पेस मानने से इनकार कर दिया है