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तमिलनाडुः निजी अस्पतालों में कोरोना इलाज के लिए अधिकतम शुल्क सीमा तय

तमिलनाडु में निजी अस्पतालों द्वारा कोरोना के इलाज के लिए अधिक फीस वसूलने संबंधी मरीजों की शिकायत के बाद स्वास्थ्य सचिव की अध्यक्षता वाली समिति ने निजी अस्पतालों के लिए उचित शुल्क संबंधी रिपोर्ट तमिलनाडु सरकार को सौंपी थी.

(फोटोः पीटीआई)

(फोटोः पीटीआई)

चेन्नईः तमिलनाडु सरकार ने निजी अस्पतालों में कोरोना मरीजों के इलाज के लिए अधिकतम शुल्क की सीमा तय कर दी है. नए दिशानिर्देशों के अनुसार अस्पतालों को सुविधाओं के आधार पर वर्गीकृत किया गया है.

इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक, सरकारी आदेश में बताया गया कि ग्रेड-एक और ग्रेड-दो स्तर के अस्पताल जनरल वॉर्ड के लिए प्रतिदिन अधिकतम 7,500 रुपये तक शुल्क वसूल सकते हैं जबकि ग्रेड-तीन और ग्रेड-चार स्तर के अस्पताल प्रतिदिन पांच हजार रुपये तक शुल्क वसूल सकते हैं.

अस्पताल के आईसीयू में भर्ती कराने के लिए ग्रेड-एक से चार तक सभी स्तर के अस्पताल प्रतिदिन अधिकतम 15,000 रुपये तक का शुल्क वसूल सकते हैं.

आदेश में कहा गया है कि निजी अस्पताल इससे अधिक शुल्क नहीं वसूल सकते.

राज्य के स्वास्थ्य मंत्री सी. विजयभास्कर ने कहा कि मुख्यमंत्री के. पलानीस्वामी के आदेश के अनुसार यह फैसला लिया गया है.

इससे पहले निजी अस्पतालों द्वारा कोविड-19 के इलाज के लिए अधिक फीस वसूलने संबंधी मरीजों की शिकायत के बाद स्वास्थ्य सचिव बीला राजेश की अध्यक्षता वाली एक समिति ने निजी अस्पतालों के लिए उचित शुल्क संबंधी एक रिपोर्ट सरकार को दी थी.

बयान में कहा गया कि महामारी के समय सरकारी और निजी अस्पतालों को मिलकर काम करना होगा.

राज्य सरकार का यह फैसला ऐसे समय में आया है, जब लगातार ऐसी खबरें आ रही थीं कि निजी अस्पताल कोरोना मरीजों को भर्ती नहीं कर रहे हैं.

राज्य सरकार ने इससे पहले कोविड-19 का इलाज करने वाले सरकार द्वारा अधिसूचित निजी अस्पतालों में मुख्यमंत्री व्यापक स्वास्थ्य बीमा योजना के लाभार्थियों के लिए उपचार लागत तय की थी.

राज्य के सभी सरकारी अस्पतालों और अन्य कोरोना केयर इकाइयों में कोरोना मरीजों का इलाज नि:शुल्क होता है.

मुख्यमंत्री समग्र स्वास्थ्य बीमा योजना के तहत पहले ही नाम दर्ज करा चुके परिवार सरकार की ताजा घोषणाओं के अनुरूप इलाज करा सकते हैं.

हालांकि, ये उपाय निजी अस्पतालों में इलाज के लिए अत्यधिक शुल्क लिए जाने की शिकायत करने वालों को राहत नहीं दे सकते.

डॉक्टर्स एसोसिएशन फॉर सोशल इक्वलिटी के डॉ. जीआर रविंद्रनाथ का कहना है कि ये कदम सकारात्मक संकेत हैं लेकिन इनसे शायद इलाज में लगने वाला खर्च कम नहीं हो सकता.

उन्होंने कहा, ‘आप देखोगे कि सामान्य बिल में कमरे के किराए या इसी तरह की सेवाओं के लिए सिर्फ 20 फीसदी या इससे थोड़ा अधिक शुल्क वसूला जाएगा लेकिन 80 फीसदी से अधिक निजी अस्पतालों के बिल में आमतौर पर दवाओं की लागत, डिस्पोजेबल मेडिकल उपकरण, कंसल्टेशन फीस और अन्य महंगे टेस्ट का शुल्क जुड़ा होगा. सरकार को इन लागतों से छुटकारा दिलाने की दिशा में काम करना चाहिए.’