विज्ञान

क्या वजह है कि कोरोना वायरस की वैक्सीन बनाना मुश्किल साबित हो रहा है

अमूमन वायरस का डीएनए ऐसा होता है कि अनेक वायरस बनाते समय उनके ब्लू-प्रिंट में कोई ग़लती नहीं होती, इसीलिए वे ज़्यादा स्थिर रहते हैं और ब्लू प्रिंट में आसानी से बदलाव नहीं आते. पर कोरोना वायरस का ब्लू-प्रिंट डीएनए नहीं आरएनए है. बावजूद इसके ये अपने ब्लू-प्रिंट में कुछ हद तक ग़लतियां रोकने में सक्षम है, इसी कारण से हम नहीं जानते कि अगर कोई एक वैक्सीन विकसित की जाए, तो वह सब तरह के कोविड-19 वायरस पर असर करेगी या नहीं?

REUTERS/Dado Ruvic/Illustration

(फोटो: रॉयटर्स)

आज कुछ महीने हो गए हैं जब कि पूरी दुनिया कोरोना वायरस के कहर के नीचे आकर थमकर खड़ी है.  स्कूल, कॉलेज, रेस्टोरेंट, सिनेमाघर सब बंद हैं, दुनिया भर मे लाखों लोग अपनी जान खो चुके हैं और कोई नहीं जानता कि जीवन कब कोरोना के डर के बिना वाली स्थिति पर लौटेगा.

इसी बहाने से हम इस लेख की जरिये जानेंगे कि आखिर वायरस क्या होता है? क्यों उसे सभी प्रकार के जीवों से अलग कहा जाता है? जब हम वायरस के बारे मे ये जान लेंगे तो अब समझ पाएंगे कि कोरोना वायरस में ऐसी क्या ख़ास बात है, जिसकी वजह से दुनिया भर के तमाम वैज्ञानिकों के लगातार शोधों और प्रयोगों के बावजूद हम अब भी इस वायरस से जूझ रहे हैं.

जैसा कि कहा जाता है कि डीएनए जीवन का ब्लू-प्रिंट है. हमारे शरीर के रूप की अधिकतर जानकारी हमारे डीएनए मे होती है. उदाहरण के तौर पर, हमारी आंखों का रंग, हाथों में कितनी उंगलियां हैं जैसी शारीरिक बारीकियां हमारे डीएनए में हैं. जब एक नवजात पैदा होता है, तो उसे अपना आधा डीएनए मां  और आधा पिता से मिलता है.

अब जानिए कि डीएनए क्या होता है? सरल तरीके से देखें तो डीएनए केवल एक कड़ी है, जिसकी संरचना की खोज 1953 में वॉटसन और क्रिक नामक दो वैज्ञानिकों ने की थी. यह कड़ी चार अलग तरीके के एकलक [monomerous] से बनी है.

इन एकलकों का नाम A, T, G, और C है.  हमारे शरीर में लगभग 40 ट्रिलियन कोशिकाएं हैं. अगर किसी भी एक कोशिका के भीतर झांककर देखें, तो पाएंगे की डीएनए की कड़ी उसके अंदर है. एक व्यक्ति की हर कोशिका मे डीएनए की कड़ी एक जैसी है और वो 3 बिलियन एकलकों से बनी है.

इस कड़ी को जीवन का ब्लू प्रिंट क्यों कहा जाता है? वह इसलिए की शरीर को कोई भी काम करने के लिए प्रोटीन की जरूरत होती है. यह काम देखना, बोलना, सोचना, दो आंखों का बनना, गरम तवे से हाथ खींच पाना से लेकर खाना खाने के लिए चम्मच पकड़ने तक कुछ भी हो सकता है.

इस सब के लिए हमें प्रोटीन चाहिए होते हैं और हमारा शरीर कौन-से प्रोटीन बनाने की क्षमता रखता है, इसकी कुंजी हमारे डीएनए में ही होती है. इसका एक उदाहरण हमारा ब्लड ग्रुप है- हमारी डीएनए की कड़ी ये निर्धारित करती है कि हमारा ब्लड ग्रुप A, B, AB या O होगा.

डीएनए की कड़ी के विभिन्न हिस्से शरीर के अलग-अलग पहलू नियंत्रित करते हैं. कई हिस्से मिलकर ये निर्धारित करते हैं कि आंखों का रंग क्या होगा, तो कोई हिस्सा ये निर्धारित करता है कि मेरे खून में पर्याप्त मात्रा में ऑक्सीजन शरीर के सब अंगों तक ले जाने की क्षमता है या नहीं. यह सब डीएनए मे एकलकों के अनुसार बने प्रोटीन निर्धारित करते हैं.

असल में हमारी हर कोशिका में कुछ बहुत सूक्ष्म मशीनें होती हैं. इन मशीनों का काम बस इतना होता है कि डीएनए के एकलकों को पढ़ें और उस पर लिखे विवरण के अनुसार प्रोटीन बनाएं.  शरीर की हर कोशिका यही करती है.

अक्सर हम बैक्टीरिया से पीड़ित हो जाते हैं. बैक्टीरिया एक कोशिका वाले जीव होते हैं जिनके अंदर अपना डीएनए होता है और उस डीएनए को पढ़कर अपने प्रोटीन बनाने वाली मशीन भी. इस तरह से वह हमारी कोशिकाओं पर जीवित रहने के लिए निर्भर नहीं होते.

हैजा, टीबी जैसी बीमारियां बैक्टीरिया के कारण होती हैं, इसीलिए जब हमें बैक्टीरिया वाली कोई बीमारी होती है तो हम एंटीबायोटिक खाते हैं. यह एंटीबायोटिक, हमारी कोशिकाओं को छोड़कर केवल बैक्टीरिया पर हमला करती हैं.

पर जैसा कि आजकल देख रहे हैं कि डार्विन के प्राकृतिक चयन के सिद्धांत के चलते एंटीबायोटिक के अत्यधिक प्रयोग से अब बहुत से बैक्टीरिया एंटीबायोटिक से बच निकलना सीख गए हैं.

पर वायरस और बैक्टीरिया में बहुत अंतर होता है. एक बैक्टीरिया को देखें, तो वह अपने आसपास के वातावरण से अपनी ऊर्जा की जरूरतें पूरी कर लेगा और ऐसा होने पर जब पर्याप्त मात्रा में उसके पास प्रोटीन होंगे, तो बीच से अपने आप को बांटकर एक से दो बैक्टीरिया हो जाएगा, पर वायरस ऐसे नहीं होते.

वायरस के पास केवल डीएनए (या उसके जैसा आरएनए) ही होता है. अपने दम पर एक वायरस एक नवजात वायरस को जन्म नहीं दे सकता. ऐसा इसलिए है कि वायरस के पास डीएनए पढ़कर उससे प्रोटीन बनाने वाली मशीन नहीं होती.  बिना उस मशीन के वायरस प्रोटीन नहीं बना सकता और बिना प्रोटीन बनाए वायरस फैल नहीं सकता. इस कारण से बैक्टीरिया से लड़ने वाली एंटीबायोटिक वायरस के खिलाफ कोई काम नहीं आती.

तो फिर एक वायरस कैसे फैलता है?  इसका एक सरल उदाहरण लेते हैं. जब एक वायरस एक बैक्टीरिया पर बैठता है, तो वायरस के शरीर के केमिकल उस बैक्टीरिया के शरीर के एक केमिकल को पहचान जाते हैं.  जब ऐसा होता है, तो वायरस जान जाता है कि इस कोशिका के अंदर जाना ठीक है.

इसको सोचने का एक और तरीका यह है कि एक एक वायरस एक ही तरह की कोशिका पर आक्रमण करता है. जो वायरस एक बैक्टीरिया पर आक्रमण कर रहा है, वो हमारी कोशिकाओं के लिए हानिकारक नहीं है. तो जब वायरस अपने लिए ठीक कोशिका तक पहुंच जाता है, तो वह अपना डीएनए उस कोशिका के अंदर डाल देता है.

VIRUS DNA

यह डीएनए, वायरस के अंदर किसी काम का नहीं था क्योंकि वायरस के पास वो मशीन ही नहीं थी, जिससे डीएनए पढ़कर प्रोटीन बनाए जा सकते हैं. पर अब जबकि डीएनए एक बैक्टीरिया की कोशिका में है और बैक्टीरिया के पास डीएनए पढ़कर प्रोटीन बनाने की क्षमता है, तो वह वायरस का डीएनए पढ़ उसके प्रोटीन बैक्टीरिया के अंदर बनाना शुरू कर देता है.

ऐसा होने से वायरस के बहुत से प्रोटीन बैक्टीरिया के अंदर बनने लग जाते हैं. सभी प्रोटीन के बन जाने के कारण, वायरस के कण बैक्टीरिया के अंदर ही बन जाते हैं. फिर धीरे-धीरे ये वायरस, बैक्टीरिया को छोड़कर बाहर निकलते हैं, जिस से बैक्टीरिया की कोशिका को क्षति पहुंचती है.

ये सिलसिला तब तक चलता है, जब तक वायरस के निकलने से बैक्टीरिया मर न जाए.  पर इस बीच एक वायरस के कण से सैंकड़ों वायरस के कण पैदा हो गए और जो वायरस निकला है, वह अपने आप तो बढ़ नहीं सकता. उसे फिर से बढ़ने के लिए नयी कोशिका चाहिए.

जब तक वायरस को नई कोशिका मिलती रहेगी, वह बढ़ता जाएगा, जब उसे बढ़ने के लिए नई कोशिका नहीं मिलेगी, तो वह खत्म हो जाएगा. मोटे तौर पर वायरस इस पद्धति से काम करते हैं, पर सब वायरस एक तरह के नहीं होते.

कुछ अपना ब्लू प्रिंट डीएनए में नहीं लाते, एड्स का कारक वायरस एचआईवी और अभी की महामारी वाला कोरोना वायरस अपना ब्लू प्रिंट डीएनए नहीं, पर उससे मिलता आरएनए में लाते हैं.

क्या है कोरोना वायरस और कोविड-19

अब जानते हैं कि किस कारण  से कोरोना वायरस का इलाज ढूंढना इतना चुनौतीपूर्ण सिद्ध हो रहा है. साल 2003 मे वैज्ञानिकों ने चीन मे एक वायरस को पहचाना. यह वही वायरस था जिस से सार्स (SARS) नामक घातक बीमारी दुनिया में महामारी बन फैली थी.

उस वायरस का नाम कोरोना वायरस था. अब कुछ 16 साल बाद कोरोना वायरस फिर से चर्चा में हैं. प्राचीन रोम की भाषा लैटिन मे कोरोना का मतलब ताज होता है. इस वायरस का नाम इसी वजह से कोरोना रखा गया क्योंकि इसकी सतह पर प्रोटीन के कण ताज जैसे लगे होते हैं.

हम अब जान चुके हैं कि प्रोटीन कैसे बनते हैं और कैसे वायरस इसे खुद बनाने मे असमर्थ होते हैं. वायरस बेहद छोटे होते हैं. औसतन एक मनुष्य की लंबाई 5 से 6 फीट के बीच होती है. एक सामान्य बैक्टीरिया, जैसे हमारी आंतों मे रहते हैं, एक फुट का लगभग 10 लाखवां हिस्सा होते हैं.

कोरोना वायरस इस बैक्टीरिया से करीब 10 गुना छोटा होता है.  मतलब एक कोरोना वायरस आकार मे एक फुट का लगभग 1 करोड़वां हिस्सा होता है. असल में कोरोना वायरस एक वायरस का नहीं बल्कि सैकड़ों वायरस के परिवार का एक सामूहिक नाम है. उनमें से कुछ मनुष्यों मे रहकर फैल सकते हैं और इस दौरान एक बीमारी फैला सकने में सक्षम हैं.

2003 की महामारी सार्स एक कोरोना वायरस जिसका नाम SARS-CoV के कारण फैली थी. 2012 मे सऊदी अरब मे पहचानी गई बीमारी MERS, कोरोना वायरस MERS-CoV के कारण हुई थी. इसी तरह से 2019 मे फैली महामारी कोविड-19 कोरोना वायरस SARS-CoV2 के द्वारा फैल रही है.

अब तक पहचाने गए ऐसे 7 कोरोना वायरस हैं, जो मनुष्यों मे बीमारी फैलाते हैं. उनमें से 4 नाक और गले के संक्रमण से जुड़े हुए हैं और कोई गंभीर बीमारी नहीं पैदा करते हैं.  सात में से और दो फेफड़ों की बीमारी देते हैं- और पहले चार से कहीं ज्यादा गंभीर हैं. SARS-CoV2 सातवां है – और इसका कुछ स्वभाव पहले चार और कुछ स्वभाव आखिरी दो के जैसा है.

जैसा कि हम अब समझते हैं कि वायरस हमारे फेफड़ों से खांसी के साथ छोटी बूंदों में बाहर फैलता है. वहां से बाहर वायरस खुद से जीवित नहीं रह सकता, इसलिए उसे एक नया मेजबान मनुष्य चाहिए. अगर बाहर ठंडा रहेगा तो छोटी बूंद को सूखने में अधिक समय लगेगा, जिससे वायरस उसमें ज्यादा समय तक रह सकता है. अगर बूंद सूख जाती है, तो नमी की कमी के कारण वायरस नष्ट हो जाएगा.

एक बार जब वायरस एक व्यक्ति के फेफड़ों तक पहुंचता है, तो उसकी सतह पर लगे ताज जैसे प्रोटीन हमारे फेफड़ों की कोशिकाओं को पहचान लेते हैं. ऐसा होने के बाद वायरस हमारी कोशिका की मशीनों की मदद से अनेक वायरस पैदा करता है, जो न सिर्फ पीड़ित व्यक्ति के फेफड़ों को खराब करता है, बल्कि उसके खांसने के साथ वातावरण में और वायरस भी छोड़ता है.

A researcher at the University of Pittsburgh works on a COVID-19 vaccine candidate, a fingertip-sized patch with dissolvable microscopic needles, in Pittsburgh, Pennsylvania, U.S., March 28, 2020. UPMC/Handout via REUTERS

(फोटो: रॉयटर्स)

अधिकतर वायरस के अंदर उनका ब्लू-प्रिंट डीएनए के रूप में होता है. एक मेजबान कोशिका में जाने के बाद इस डीएनए के ब्लू-प्रिंट और कोशिका की मशीनों की मदद से वायरस के प्रोटीन बनते हैं. इस प्रक्रिया मे पहले डीएनए को मशीन द्वारा पढ़कर उससे मिलता-जुलता आरएनए और फिर आरएनए को एक और मशीन द्वारा पढ़ प्रोटीन बनता है.

अमूमन वायरस के डीएनए में यह क्षमता भी होती है कि अनेक वायरस बनाते समय उनके ब्लू-प्रिंट (डीएनए) में कोई गलती न हो जाए. इस कारण से डीएनए वाले वायरस अक्सर ज्यादा स्थिर रहते हैं और उनके ब्लू प्रिंट में आसानी से बदलाव नहीं आते.

दुर्भाग्य से कोरोना वायरस ऐसा नहीं है. उसका ब्लू-प्रिंट डीएनए नहीं आरएनए के रूप में होता है. ऐसा होने से कोशिका से निकलते नए कोरोना वायरस मे ब्लू-प्रिंट में गलतियां होने की संभावना अधिक होती है. इसका मतलब है कि जब फेफड़ों की एक कोशिका में से 100 कोरोना वायरस निकलते हैं, तो उनमे से कुछ का ब्लू-प्रिंट उस कोरोना वायरस से अलग होने की संभावना है, जिसने उस कोशिका को संक्रमित किया था.

ब्लू-प्रिंट आरएनए के रूप में होने के बावजूद, कोरोना वायरस मे अपने ब्लू-प्रिंट में कुछ हद तक गलतियां रोकने की क्षमता है. पर ब्लू-प्रिंट में ऐसी गलतियां बीमारी के दृष्टिकोण से अच्छी खबर नहीं होती.

आमतौर पर ब्लू-प्रिंट में गलती होना वायरस की संक्रमण करने की क्षमता को कमजोर करता है, पर अकस्मात अगर सैकड़ों कोरोना वायरस में से एक में अगर ब्लू-प्रिंट में कोई ऐसी गलती हो जाए, जिससे वायरस और जानलेवा बन जाए, या फिर वो एक व्यक्ति से दूसरे तक और आसानी से पहुंचे, तो एक नई चुनौती बन नया वायरस खड़ा हो जाएगा.

ब्लू-प्रिंट में यह गलतियां ही एक कारण है कि कोरोना वायरस एक प्रजाति से दूसरी प्रजाति को पीड़ित करने मे अत्यधिक सफलता रखता है. इसी कारण से हम नहीं जानते कि ब्लू-प्रिंट में गलतियों के कारण, अगर हम एक वैक्सीन विकसित करते हैं, तो वह सब तरह के SARS-CoV2 वायरस पर असर करेगी या नहीं?

पिछली महामारी सार्स और MERS में भी वैक्सीन बनने से पहले महामारी थम गई, पर 2019-20 मे इसका एक ज्यादा जानलेवा स्वरूप बाहर आया है. वैज्ञानिक मानते हैं कि अन्य प्रजातियों से वायरस मनुष्यों तक आते रहे हैं.

बीसवीं सदी मे एचआईवी भी चिंपांजी मे रहने वाले एक वायरस से बदल कर मनुष्यों तक पहुंचा और दुर्भाग्य से ऐसा आगे भी चलता रहेगा. जरूरत है कि वायरस के हमारी प्रजाति मे फैलने के हर कदम को जल्दी और सटीक तरीके से समझ पाएं ताकि भविष्य मे उसका फैलाव SARS-CoV2 जैसा न हो.

(लेखक आईआईटी बॉम्बे में एसोसिएट प्रोफेसर हैं.)