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द अदर साइड ऑफ द डिवाइड: पंजाब की साझी विरासत, संस्कृति और भाषा का आईना

पुस्तक समीक्षा: किसी यात्रा वृतांत को पढ़ने के बाद अगर उस जगह जाने की इच्छा न जगे, तो ऐसे वृतांत का बहुत अर्थ नहीं है. पत्रकार समीर अरशद खतलानी द्वारा अपनी एक लाहौर यात्रा पर लिखी गई किताब ‘द अदर साइड ऑफ द डिवाइड’ इस मायने पर खरी उतरती है.

(फोटो साभार: amazon.in)

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‘द अदर साइड ऑफ द डिवाइड- अ जर्नी इनटू हार्ट ऑफ पाकिस्तान’ एक यात्रा वृतांत है, जो पाकिस्तान के शहर लाहौर के बारे में है. इसे लिखा है पत्रकार समीर अरशद खतलानी ने… बंटवारे के दूसरी ओर.

समीर अपने अखबार की तरफ से लाहौर में विश्व पंजाबी सम्मेलन के एक आयोजन को कवर करने गए थे. किताब की शुरुआत बाघा अटारी सीमा से शुरू होती है और लाहौर के सभी महत्वपूर्ण जगहों का भ्रमण कराकर वापस आ जाती है.

यात्रा वृतांत की सबसे बड़ी विशेषता यह होती है कि किताब पढ़ते समय पाठक खुद को लेखक के हमराह के तौर पर दिखे और जहां-जहां वह जा रहा है, जो देख रहा है, जो खा-पी रहा है, जिनसे मिल रहा है उन सब जगहों पर पाठक अपनी भी उपस्थिति महसूस करे.

समीर की यह किताब पढ़ते समय मुझे बिल्कुल ऐसा ही लगा कि मैं उनके हमराह भी हूं. इसमे थोड़ा इतिहास भी है, थोड़ी पर्यटन गाइड की सुगंध और ढेर सारी मुल्क के बंट जाने की खलिश. बाघा सीमा से पाकिस्तान में घुसते ही जो कुछ समीर को दिखता है वह पंजाब की साझी विरासत, संस्कृति, भाषा और ये एक ही देह के दो कटे अंग जैसे दिखते हैं.

पाकिस्तान की यात्रा पर जा चुके लोगों से जानने की एक सामान्य जिज्ञासा यह होती है कि वहां की आम जनता की भारत से गए लोगों के प्रति क्या प्रतिक्रिया होती है. समीर की इस किताब से मुझे भी यही जिज्ञासा हुई थी.

लेकिन जैसे ही समीर बाघा सीमा से आगे बढ़ते हैं तो इमिग्रेशन से ही जिस गर्मजोशी से उनसे वहां के लोग पेश आ रहे थे, वह एक सुखद आश्चर्य था. दोनों ही एक दूसरे के मुखालिफ मुल्क है. स्वागत की तो बात ही छोड़ दीजिए, लगता है कहीं जगह-जगह अपमान न हो, लेकिन ऐसा कहीं भी इस सफरनामे में नहीं मिला.

लाहौर अविभाजित भारत का एक खूबसूरत शहर था, जिसके बारे में यह कहावत मशहूर हुई कि जिसने लाहौर नहीं देखा वह जन्मा ही नहीं. वही शहर 1947 के भयानक बंटवारे के दंगे में तबाह हो जाता है पर इस किताब से लगता है कि लाहौर की संस्कृति और शहर की आब भले ही अब बहुलतावादी न रही हो, पर पंजाब की स्वाभाविक मस्ती और खुलेपन से भरपूर रही है.

समीर कश्मीर के हैं और वैसी पंजाबी बहुत अच्छी तरह नहीं जानते हैं, जैसी लाहौर की ठेठ पंजाबी होती है, लेकिन वहां उन्होंने भारत से गए पंजाबी लेखकों, जो उस सम्मेलन में भाग लेने गए थे, को धड़ल्ले से अपने पाकिस्तानी मित्रों के साथ पंजाबी बोलते हुए देखा.

उन्हें दोनों की संस्कृति, भाषा, बोली, सभ्यता और ठहाकों में कोई अंतर नहीं लगता है, सिवाय धर्म के. कितना दुर्भाग्य है धर्म जो बिल्कुल निजी आस्था और विश्वास पर टिका है, इतना महत्वपूर्ण बन गया कि एक ही इलाका उसी धर्म के आधार पर बंट गया और लाखों लोग, मारे गए, जलावतन हुए और न जाने कितने कष्ट सहे.

लाहौर का पुराना हिस्सा दिल्ली के पुराने हिस्से और कैंट का इलाका आम तौर पर हमारे शहरों के कैंटोनमेंट जैसे है. बसाया तो उसे भी अंग्रेजों ने ही है, लेकिन वहां के कैंट में जाने के लिए पाकिस्तान सरकार वीसा नहीं देती है लेकिन फिर भी किसी महत्वपूर्ण साहित्यिक समारोह में भाग लेने के लिए समीर के मेजबान समीर को वहां ले गए.

जब तक समीर उस प्रतिबंधित क्षेत्र में रहे, तब तक जो ऊहापोह उनके मन में थी, उसे किताब में उन्होंने बेहद खूबसूरती से बयान किया है. यह उहापोह उन्हें सेना द्वारा पकड़े जाने के बारे में थी. जब तक सेना का जवान उनके मेजबान से कैंट में जाने का कारण दरयाफ्त कर रहा था, तब तक वे अपने मोबाइल से उलझे थे, पर हुआ कुछ नही.

एक ‘दुश्मन’ मुल्क में कितने भी वैध तरीके से आप जाएं, पर जो धुकधुकी लगी रहती है वह तो भुक्तभोगी ही जान सकता है. हम सब के मन में यह धारणा हो सकती है कि इस्लामिक देश होने के कारण पाकिस्तान में आधुनिकता की झलक नहीं मिलेगी, लेकिन इस किताब के अनुसार ऐसा बिल्कुल भी नहीं लगा.

कोई शत्रुता का भाव नहीं और न ही कोई नजरअंदाजी. राजनीति चाहे जैसी भी हो पर जनता की जहां तक बात की जाए, तो वहां भारत से गए पर्यटकों को पर्याप्त सम्मान और प्रेम ही मिलता है. यह बात समीर की किताब से तो ज्ञात होती ही है और भी जिन लोगों ने पाकिस्तान की यात्रा की है उनका भी अनुभव यही कहता है.

लाहौर शहर के दर्शनीय स्थल जैसे मुगलकालीन स्थापत्य के लाल किला, बादशाही मस्जिद, फिर पंजाब केसरी रणजीत सिंह जी की समाधि और भारत-पाक दोनों ही देशों में समान रूप से याद किए जाने वाले भारतीय क्रांतिकारी आंदोलन के शहीद-ए-आज़म भगत सिंह के बलिदान स्थल शादमान चौक का वर्णन बहुत ही दिलचस्प है.

इस किताब में इन सब दर्शनीय स्थलों का जहां उल्लेख किया गया है वहां उनसे जुड़ी ऐतिहासिक या लौकिक कथाओं का भी समीर ने संक्षिप्त वर्णन कर दिया है, जिससे न केवल पुस्तक की रोचकता बढ़ गई है बल्कि यह किताब इन महत्वपूर्ण जगहों के बारे में महत्वपूर्ण सूचनाएं भी देती है.

उर्दू ज़रूर वहां की राष्ट्रभाषा है पर, जब पाकिस्तान बना तो उर्दू पाकिस्तान के पांच प्रांतों, पंजाब, खैबर पख्तूनख्वा, बलूचिस्तान, सिंध और बंगाल में से किसी भी प्रांत की भाषा उर्दू नहीं थी. इन प्रांतों की भाषा क्रमशः पंजाबी, पश्तो, बलोची, सिंध और बांग्ला थी.

चूंकि भारत मे उर्दू एक व्यापक रूप से बोली जाने वाली भाषा के साथ सरकारी भाषा के रूप में भी लागू थी, तो जब यह मुल्क बंटा तो पाकिस्तान ने उर्दू को अपनी राजभाषा मान लिया, जिसका कारण था कि प्रांतों में भाषाई विवाद न पनपे.

लेकिन बांग्ला को लेकर विवाद शुरू हुआ, जिसका अंत पूर्वी पाकिस्तान के विभाजन के साथ हुआ. 1947 में पाकिस्तान के बनने का कारण अगर धर्म था, तो 1971 में उसे टूटने का कारण भाषा बनी. जब पूर्वी पाकिस्तान यानी बांग्लादेश में उर्दू थोपी गई तभी पाकिस्तान के टूटने की नींव पड़ गई.

लाहौर के पंजाब का केंद्र होने के कारण वहां पंजाबी एक मुख्य भाषा के रूप में लोकप्रिय है. पंजाबी के बहुत से नामचीन लेखक अमृता प्रीतम, कंवर महेन्दर सिंह बेदी आदि लाहौर के ही थे. लाहौर पाकिस्तान का एक फिल्म केंद्र भी रहा है लेकिन यह और बात है कि हमारे मुंबई के फिल्म केंद्र की तुलना में वह इतना समृद्ध नहीं है.

पाकिस्तान का पहला राष्ट्रगान लिखने वाले जगन्नाथ आज़ाद, जो एक अखबार से जुड़े थे लाहौर के ही थे और जिन्ना साहब के अनुरोध पर उन्होंने यह राष्ट्रगान लिखा था.

कोई भी यात्रा वृतांत पढ़ लेने के बाद अगर उस जगह के भ्रमण की इच्छा न जाग जाए तो ऐसे यात्रा वृतांत का कोई बहुत अर्थ नहीं है. पर समीर की इस पुस्तक में हर उस जगह जाने, देखने, लोगों से मिलने, वहां के रेस्तरां में मनपसंद लाहौरी व्यंजन जो मूलतः भारतीय या पंजाबी व्यंजन ही हैं, खाने की इच्छा लगातार पन्ने दर पन्ने बनी रही है.

पढ़कर बार-बार यह अफसोस होता रहा कि आखिर उस पागलपन की क्या ज़रूरत थी जिससे यह महान देश बंटा, हजारों कत्ल हुए, लाखों विस्थापित. लेकिन इतिहास में रीटेक नहीं होता है.

(लेखक पूर्व आईपीएस अधिकारी हैं.)